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वह बैग उठाए घर की दहलीज के बाहर कदम रख देती है। इसके साथ ही कहानी खत्म हो जाती है। लतिका कहानी के समापन को एक अवास्तविक मोड़ मान उसका विश्लेषण करने लगती है। कहानी का हर पहलू, हर घटना उसे लगातार उलझन में डालती जाती है। उसे लगता है कि हंसा जैसी औरतों का समाज में होना सच है, पर उसके फैसले को कभी भी समाज की स्वीकारोक्ति नहीं मिल सकती है।

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-


सुमन बाजपेयी का जन्म दिल्ली में हुआ। यहीं एम.ए. हिन्दी आनर्स व पत्रकारिता का अध्ययन किया।
१२ साल की उम्र से ही कवितायें लिखना आरंभ कर दिया था। कालेज में पढ़ते हुये ही इनकी कहानी "अपना घर" युववाणी से प्रसारित हुई। कैरियर का आरंभ ’चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट’ से किया तथा यहीं से बाल-लेखन की भी शुरुआत हुई। तत्पश्चात ’जागरण सखी’, ’मेरी संगिनी’ और ’फोर्थ डी वुमन’ नामक पत्रिकाओं में काम किया।

पिछले २७ वर्षों से कहानी, कविता व महिला विषयों तथा बाल-लेखन में संलग्न। ’खाली कलश’, ’ठोस धरती का विश्वास’ और ’अगिनदान’ नामक कहानी-संग्रहों समेत ३०० से अधिक कहानियाँ व २०० से अधिक लेख प्रकाशित। २५ अंग्रेजी पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद भी कर चुकीं हैं। पैरेंटिंग पर दो किताबें शीघ्र प्रकाश्य हैं।

पिछले दो हफ्तों से वह लगातार प्रेम कहानियों पर आधारित टी.वी. पर आने वाले सीरियल की इस कहानी को देख रही थी। कहानी थी हंसा नाम की एक औरत की जिसके जीवन में अनायास ही एक पुरुष का प्रवेश होता है। पति के ज्यादातर बाहर रहने व उसे समय न दे पाने के कारण अपनी वीरान व उदास जिंदगी में रंग भरने की इच्छा उस पुरुष से मिलते ही उसके मन में पलने लगती है। बार-बार होती मुलाकातें नजदीकी बढ़ाती हैं। यहाँ तक कि उसका 8 वर्षीय बेटा भी उसमें अपने पिता की छवि व प्यार पाने की उम्मीद से उससे जुड़ता है। पर पिता के आते ही अंकल की उपस्थिति उसके लिए गौण हो जाती है। उथल-पुथल से घिरी हंसा उस पुरुष के प्यार व सान्निध्य से जान पाती है कि पुरुष का स्पर्श कितना सुखद होता है। उसका साथ कितना विश्वास देने वाला होता है। वह घर छोड़ कर उसके साथ जाने का फैसला करती है। अपनी बसी-बसाई गृहस्थी व बेटे को यों छोड़ कर चले जाना उसके लिए सहज नहीं था, लेकिन स्वयं के लिए जीने की ख्वाहिश या पति के साथ बीते नौ वर्षों की पीड़ा शायद उसे स्वार्थी बनने को मजबूर कर देती है। 

उसका जाना लतिका को ऐसा लग रहा था मानो किसी असंभव को जान-बूझकर लेखक ने संभव बनाने की कोशिश की है। समाज के नियमों व मर्यादाओं को उलाँघने की हिम्मत हंसा के अंदर हो ही नहीं सकती थी, उसे तो जबर्दस्ती उसके अंदर ठूँसा गया था ताकि नारी शक्ति को प्रस्तुत किया जा सके। फेमीनिज्म की परिभाषा को गढ़ने का यह प्रयास लतिका को परेशान किए जा रहा था।

आखिर क्यों? 

लतिका तो हंसा नहीं है। . 

लतिका हंसा नहीं है, हो भी नहीं सकती। पर एक बार उसने भी तो हंसा बनने की कोशिश की थी...

हर औरत के अंदर कहीं न कहीं एक हंसा छिपी होती है। कुछ उसे बाहर निकाल दबी-घुटी जिंदगी से छुटकारा पा लेती हैं तो कुछ जीवन भर दर्द के अंधेरों में स्वयं को गुम कर उस गुनाह की सज़ा भुगतती हैं, जो उन्होंने किया तो नहीं, बस उसके बारे में किसी कोने में बैठ कर सोचा जरूर था। वही सोच उसे जीवन भर एक अपराधबोध, पीड़ा और गुस्से के मिले-जुले भावों से जूझने के लिए मजबूर कर देगी, इसकी तो कल्पना उसने नहीं की थी। वही क्या कोई भी इस तरह की कल्पना नहीं कर सकता है। 

लतिका ने भी सोचने की हिम्मत की थी। बहुत बार उसका मन किया कि वह इस नीरस और बेमानी जिंदगी के खोल से स्वयं को मुक्त कर ले। उसके और राजीव के बीच शादी के शुरुआती दिनों से ही तालमेल नहीं बैठ पाया था। कारण अनेक थे। शारीरिक, भावनात्मक व दृष्टिकोण से जुड़े। हो सकता है कि उसे ही राजीव को समझने में भूल हुई हो। सच तो यही था कि एक औरत को पुरुष के जिस साथ की अपेक्षा होती है, वह उसे राजीव से नहीं मिला। न ही शारीरिक रूप से न ही मानसिक रूप से। न तो वह लतिका की जरूरतों को समझ पाया न ही उसके अंदर किसी तरह की अनुभूति जाग्रत कर पाया। वह हमेशा 'ठंडी औरत’ होने का ताना सहती रही। राजीव हर बात में उसका मजाक उड़ाता, उसकी बेइज्जती करता। सीधी-सी बात थी वह उससे हर तरह से बेहतर थी- रूप-रंग, नौकरी व बुद्धि में भी। अपनी हीनभावना से उबरने के बजाय लतिका के अंदर गलतियाँ ढूँढना उसे ज्यादा आसान लगता। ''कहा जाता है कि जोडि़याँ स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन गलती तो किसी से भी हो सकती है। इसीलिए अक्सर दो विपरीत दिशाओं में सोचने वालों की ईश्वर जोड़ी बना देता है। वह भी क्या करे, उसके पास काम का प्रैशर भी तो बहुत रहता है।" आलोक कहता था| वह भी तो अपने बेमेल विवाह को संभाल नहीं पा रहा था। 

दिन-रात के झगड़े, और राजीव का जब-तब घर से गायब रहना। वह जानना चाहती तो कहता, ''मैं तुम्हें बताना जरूरी नहीं समझता।" वह लाख सामंजस्य करने की कोशिश करती, उसके साथ ही खुशियाँ ढूँढने की चाह में एक कदम उसकी ओर बढ़ाती तो वह दो कदम पीछे हट जाता। शराब की आदत ने और भी बुराइयों को उसके अंदर भर दिया था। दूसरी औरतों का साथ उसे प्रिय लगता था। 

जब राजीव और उसके बीच कोई रिश्ता ही नहीं था तो बच्चे होने का तो सवाल ही नहीं उठता था। अकेलापन उसके अंदर इस कदर भर गया था कि दिन भर ऑफिस में थकने के बावजूद वह सो नहीं पाती। रात का सन्नाटा उसे तड़पाता। पुरुष की बलिष्ठ बाँहों में समा जाने की चाह उसे करवटें बदलते हुए रात बिताने को मजबूर कर देती। क्या उसकी इच्छा अस्वाभाविक थी? राजीव और वह अलग-अलग कमरों में सोते थे। शराब पीकर होश खोकर सोना कितना आसान होता है। किसी किस्म का ख्याल या भूख तब परेशान नहीं करती है। 

जीने का हक हर किसी को है। एक चिड़िया भी तमाम जिजीविषाओं को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास करती रहती है। उसके अंदर तो दिल, दिमाग, भावनाएं सभी थीं। ऑफिस के टूर से मुंबई गई थी दो दिनों के लिए। वहाँ उसका स्वागत आलोक ने ही किया था। वहाँ की ब्रांच का हैड था वह। दो दिन तक साये की तरह उसके साथ रहा। जान-पहचान, स्वभाव की एकरूपता और मानसिक रूप से तालमेल बैठ ने से उनके बीच ऐसी दोस्ती हुई कि वापस आकर भी ऑफिस के काम के अतिरिक्त संवाद कायम रहा। फोन, ई-मेल और चैटिंग... बड़े ही आनंददायक पल हुआ करते थे वे।

लतिका की बंधी-बंधाई जिंदगी में कुछ परिवर्तन आया। जैसे शांत समुद्र की लहरों में उफान आने लगा हो। दोनो ही अपने स्थिर जीवन से उकताए हुए थे, शायद इसीलिए निकटता का सेतु बहुत जल्दी कायम हो गया। उसको अपना तन-मन समर्पित कर देने की तीव्र इच्छा लतिका को बार-बार उकसाने लगी। आलोक अपनी पत्नी के साथ रिश्ता खत्म कर उसके साथ जीवन बिताने को तत्पर था। तभी एक दिन लतिका के अंदर भी राजीव को छोड़ने की सोच उपजी। बेमानी रिश्ते को ढोने से फायदा भी क्या था। 

फिर पता चला कि राजीव का लिवर बिगड़ गया है। शराब नहीं छोड़ी तो गुर्दे भी खराब हो सकते हैं। अस्पताल में भर्ती करा वह जी-जान से उसकी सेवा में जुट गई। पत्नी का फर्ज़ बाकी इच्छाओं पर भारी पड़ा। वैसे भी उस जैसे कमजोर इंसान को वह इस वक्त कोई झटका नहीं दे सकती थी। आलोक उसे समझेगा यह भरोसा था उसे। पर आलोक का अस्पताल में आना राजीव को खल गया। बिस्तर पर लेटे-लेटे ही उसने उससे बिना कुछ कहे, बिना पूछे अपने मन में अनगिनत जाले बुन डाले। अविश्वास की झलक उसकी आँखों में देख लतिका ने उसे समझाना चाहा पर उसकी हीनता ने तब तक उस पर गालियों के चाबुक बरसा डाले थे। 

वह चुप हो गई। क्या फायदा था ऐसे आदमी को किसी तरह का जस्टिफिकेशन देने का। वैसे भी सच को सुनने की समझ उसमें थी ही नही। आलोक लौट गया। कमजोरी और बेबसी से आतंकित राजीव को भला किस तरह की चुनौती दे वह लतिका को अपने पास आने को कहता। 

आलोक से उसकी मुलाकात फिर कभी नहीं हुई। न ही किसी और तरह से उन्होंने एक-दूसरे से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की। मानो बिना कहे ही वे यह समझौता करने को तैयार हो गए थे। राजीव की हालत कुछ सुधरी तो वह उसे घर ले आई। उसकी सेवा और देखभाल ने उसे उठने के काबिल बना दिया। पर उसका व्यवहार और सोच और ज्यादा संकुचित हो चुकी थी। उसकी नजरों में वह अब 'ठंडी औरत’ से 'गिरी हुई औरत’ हो गई थी। वह अपनी उस सोच को कोसती जिसने उसे ख्वाब देखने के लिए उकसाया था। कभी लगता कि उसे राजीव को बीमारी की हालत में ही छोड़कर चले जाना चाहिए था। वह हर ओर से रिक्त हो गई थी। देखे गए सपने उसे और तंग करते। बिस्तर पर दम तोड़ती इच्छाएं उसे अब जड़ बनाने लगीं। 'ठंडी औरत’ ही बनेगी अब वह। दिन-रात के जुल्म और प्रताड़ना सहने के बावजूद वह राजीव को छोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाई। कमजोर वह थी शायद। तभी तो राजीव उसे छोड़ कर चला गया। साथ में महनता का लबादा भी ओढ़ लिया।
"तुम आलोक के साथ खुश रह सको इसलिए जा रहा हूँ। तुम मुक्त हो आज से।" पत्र में लिखी ये पंक्तियाँ पढ़ उसे लगा कि वह बेदर्दी से छली गई है। 

राजीव जब साथ था; वह उसकी हीनता का बोझ ढोती रही और अब उसके जाने के बाद उसकी महानता का बोझ ढोने पर मजबूर है। अपनी खुशियों को बटोर कर अंजुरी में भरने की उसे इतनी बड़ी सज़ा मिलेगी, उसने सोचा तक नहीं था। राजीव को क्या पता कि उसकी अंजुरी में से खुशियाँ और तमाम इच्छाएं तो कब की फिसल कर सर्द और नंगी जमीन पर बिछ चुकी हैं।
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13 comments:

  1. परिवार विखंडन और मानसिक कश्मकश को दर्शाती अच्छी कहानी है।

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  2. राजीव जब साथ था; वह उसकी हीनता का बोझ ढोती रही और अब उसके जाने के बाद उसकी महानता का बोझ ढोने पर मजबूर है। अपनी खुशियों को बटोर कर अंजुरी में भरने की उसे इतनी बड़ी सज़ा मिलेगी, उसने सोचा तक नहीं था। राजीव को क्या पता कि उसकी अंजुरी में से खुशियाँ और तमाम इच्छाएं तो कब की फिसल कर सर्द और नंगी जमीन पर बिछ चुकी हैं।
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    कहानी का अंत प्रभावी है।

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  3. पंकज सक्सेना25 फ़रवरी 2009 को 8:28 am

    कहानी के उतार चढाव और कश्मकश प्रभावित करते हैं। कहानी में संवाद कम है और नैरेशन में कही गयी कहानी केए यह कमी खटकती है।

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  4. कहानी पढ कर आज की उन स्थितियों का भान होता है जहाँ पति-पत्नि एक तनावपूर्ण रिश्तों का नाम हो गया है।

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  5. "उसकी अंजुरी में से खुशियाँ और तमाम इच्छाएं तो कब की फिसल कर सर्द और नंगी जमीन पर बिछ चुकी हैं।" सही परिणति दर्शायी है आपनें।

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  6. सुमन जी

    आपकी कहानी का शीर्षक ही बहुत कुछ कह जाता है। हम एसे दौर में रह रहे हैं जहाँ कई वर्जनायें टूट गयी हैं कई सिद्धांत धराशाही हो गये हैं और आदमी अकेला रह गया है। कहानी सोचने का बडा धरातल देती है।


    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  7. पारिवारिक परिस्थियों में मानसिक द्वंद का चित्रण करती अच्छी लघु कथा

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