कवि परिचय:-

अजय यादव अंतर्जाल पर सक्रिय हैं।
आप साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं।


सड़कें
वीरान हो आईं हैं
सर्दियों की इस रात में ।
जैसे सब का रुख
मुड़ गया हो सच की ओर ।

अपनी अपनी जगह
भीगती रोशनी में लिपटे
गुमसुम लैम्प-पोस्ट
सब कुछ शांत
सिवाय टपकती ओस के ।

सहसा दूर कहीं कोई आहट
ध्यान बरबस खिंचता है उस ओर
एक तसल्ली:
कोई तो है इसी राह पर ।

दिन में छोटा सा लगता रास्ता
बहुत लम्बा हो चला है
-ब्रह्मांड फैलता जा रहा है
और कदम खुद-ब-खुद
तेज उठने लगते हैं ।
------------

25 comments:

  1. बढिया है...लिखते रहें...जमे रहें...साहित्य की सेवा करते रहें

    उत्तर देंहटाएं
  2. ajay ji ,

    aap to ustaad nikhle bhai .. itni saarthak aur gahri kavita ..

    एक तसल्ली:
    कोई तो है इसी राह पर ।

    ye pankhtiyan hame hamare dukho ko bhool kar ek nayi umeed ko jagane ko kahti hai ....

    अपनी अपनी जगह
    भीगती रोशनी में लिपटे
    गुमसुम लैम्प-पोस्ट
    सब कुछ शांत
    सिवाय टपकती ओस के ।
    behatreen prastuti hai in pankhtiyon me..

    wah ji wah .. aapne to kamaal kar diya ..

    bahut badhai...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर लिखा है।बधाई।
    सड़कें
    वीरान हो आईं हैं
    सर्दियों की इस रात में ।
    जैसे सब का रुख
    मुड़ गया हो सच की ओर ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी कविता है अजय जी। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. दिन में छोटा सा लगता रास्ता
    बहुत लम्बा हो चला है
    -ब्रह्मांड फैलता जा रहा है
    और कदम खुद-ब-खुद
    तेज उठने लगते हैं ।

    कविता में आपके उपमानों के साथ चलता चला गया। वाह।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बेहद चित्रात्मक ।
    गति तेज़ करने से पहले मैने ख़ुद को भी ठंडे ठंडे उसी लेंप-पोस्ट के नीचे खड़े पाया।
    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  7. जैसे सब का रुख
    मुड़ गया हो सच की ओर ।

    सब कुछ शांत
    सिवाय टपकती ओस के ।

    -ब्रह्मांड फैलता जा रहा है
    और कदम खुद-ब-खुद
    तेज उठने लगते हैं ।

    ऑबजर्वेशन को बहुत सुन्दरता से प्रस्तुत कर रही है आपकी कविता। सच कहूँ तो प्रकृति या उससे जुडे विषयों/संदर्भों की कविता से जैसे बिदायी हो गयी है। आपकी कविता में डूबा जा सकता है, साथ ठिठुरा जा सकता है...

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  8. aaj sahitya shilpi kaafi badla badla laga, header to pahle hi achcha tha, aur kavi paricyay, dene ka bhi vichar bahut achcha hai

    उत्तर देंहटाएं
  9. ब्रह्मांड फैलता जा रहा है
    और कदम खुद-ब-खुद
    तेज उठने लगते हैं ।
    - ajay bhai aap hamesha achcha likhte hain

    उत्तर देंहटाएं
  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  11. दिन में छोटा सा लगता रास्ता
    बहुत लम्बा हो चला है
    -ब्रह्मांड फैलता जा रहा है
    और कदम खुद-ब-खुद
    तेज उठने लगते हैं ।
    ....Bahut khubsurat bhavabhivyakti...keep it up Ajay Ji !!!

    उत्तर देंहटाएं
  12. अपनी अपनी जगह
    भीगती रोशनी में लिपटे
    गुमसुम लैम्प-पोस्ट
    सब कुछ शांत
    सिवाय टपकती ओस के.
    Sundar bhav-Sundar Kavita.

    उत्तर देंहटाएं
  13. जैसे सब का रुख
    मुड़ गया हो सच की ओर ।


    एक तसल्ली:
    कोई तो है इसी राह पर ।

    बहुत सुन्दर ...


    अजय जी,
    बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  14. दिन में छोटा सा लगता रास्ता
    बहुत लम्बा हो चला है
    -ब्रह्मांड फैलता जा रहा है
    और कदम खुद-ब-खुद
    तेज उठने लगते हैं ।

    एक तसल्ली:
    कोई तो है इसी राह पर ।

    kitni gharayi se likhi hai ye kavita
    har pankti ke bhaav bahut achhe lage

    उत्तर देंहटाएं
  15. SAAF-SUTHREE KAVITA HAI.SAMAJHNE
    MEIN KAHIN KOEE DUROOHTAA NAHIN
    HAI.ACHCHHEE KAVITA KE LIYE AJAY
    YAADAV JEE KO BADHAAEE.

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति है।
    दिन में छोटा सा लगता रास्ता
    बहुत लम्बा हो चला है
    -ब्रह्मांड फैलता जा रहा है
    और कदम खुद-ब-खुद
    तेज उठने लगते हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  17. अजय जी,
    कम शब्दों में गहन बात कह गये आप... बधाई
    आपके नये तेवर पसन्द आये

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत अच्छी और सुलझी हुई रचना है अजय जी।

    बधाई स्वीकारें।

    -विश्व दीपक

    उत्तर देंहटाएं
  19. एक तसल्ली:
    कोई तो है इसी राह पर ।

    sahitya ummide bandh sake aisi rachan lagi
    nijii rup se bahut achhi lagi dhnyawad

    उत्तर देंहटाएं
  20. एक तसल्ली:
    कोई तो है इसी राह पर ।

    sahitya ummide bandh sake aisi rachan lagi
    nijii rup se bahut achhi lagi dhnyawad

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget