पिछले माह हमने शरद चन्द्र गौड और कविता गौड की पुस्तक "बस्तर एक खोज" का प्रथम अंश पाठको के सम्मुख प्रस्तुत किया था। आज पेश है इसी पुस्तक का द्वितीय अंश जो बस्तर के पर्यटन-स्थलो पर आधारित है। आशा है कि सुधी पाठको को बस्तर के प्राकृतिक व संस्कृतिक सौन्दर्य से परिचित कराने मे यह प्रयास सफल होगा।
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कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान
बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर से दक्षिण में 35 किलोमीटर की दूरी पर कांकेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान स्थित है। यह उद्यान अपने जलप्रपातों, गुफाओं एवं जैव विविधता के लिये प्रसिद्ध है। कांकेर घाटी के मुख्य पर्यटन स्थल निम्नानुसार हैं-

1. तीरथगढ़ प्रपात :-
जगदलपुर से 35 किलामीटर की दूरी पर स्थित यह मनमोहक जलप्रपात पर्यटकों का मन मोह लेता है। पर्यटक इसकी मोहक छटा में इतने खो जाते हैं कि यहाँ से वापिस जाने का मन ही नहीं करता। मुनगाबहार नदी पर स्थित यह जलप्रपात चन्द्राकार रूप से बनी पहाड़ी से 300 फिट नीचे सीढ़ी नुमा प्राकृतिक संरचनाओं पर गिरता है, पानी के गिरने से बना दूधिया झाग एवं पानी की बूंदों का प्राकृतिक फव्वारा पर्यटकों को मन्द-मन्द भिगो देता है। भूविज्ञान में एम.टेक. होने के नाते मैने इसकी भूवैज्ञानिक उत्पत्ति जानने का प्रयास किया; मैनें यह पाया कि करोड़ो वर्ष पहले किसी भूकंप से बने चन्द्र-भ्रंस से नदी के डाउन साइड की चट्टाने नीचे धसक गई एवं इससे बनी सीढ़ी नुमा घाटी ने इस मनोरम जलप्रपात का सृजन किया होगा। तीरथगढ़ जलप्रपात से 20 किलोमीटर की दूरी पर पुरातात्विक महत्व का मंदिर चिंगीतराई में स्थित है।

तीरथगढ़ के साथ चिंगीतराई एवं चन्द्रगिरी ऐतिहासिक महत्व रखते हैं। ऐसा कहा जाता है कि उस रियासत के किसी राजा के दो पुत्र थे एक का नाम चन्द्रदेव एवं दूसरे का नाम तीरथदेव था। राजकुमार चन्द्रदेव को विरासत में चन्द्रगिरी का क्षेत्र मिला जिसका नाम उनके नाम पर चन्द्रगिरी पड़ा वहीं उनके भाई को तीरथगढ़ की जागीर मिली जिसका नाम उनके नाम पर तीरथगढ पड़ गया। चन्द्रगिरी एवं चिंगीतराई में पुरातात्विक महत्व के अवशेष प्राप्त होते हैं।

2. कोटमसर गुफा :-
जगदलपुर से 30 किलोमीटर की दूरी पर विश्व प्रसिद्ध कोटमसर की प्राकृति गुफाएं स्थित है। विश्व की सबसे लम्बी इस गुफा की लंबाई 4500 मीटर है। चूना पत्थर के घुलने से बनी ये गुफाएं चूनापत्थर के जमने से बनी संरचनाओं के कारण प्रसिद्ध है। चूनापत्थर के जमाव के कारण स्टलेगटाइट, स्टलेगमाइट एवं ड्रपिस्टोन जैसी संरचनायें बन जाती हैं। छत पर लटकते झूमर स्टलेग्टाइट, जमीन से ऊपर जाते स्तंभ स्टलेगमाइट एवं छत एवं जमीन से मिले बड़े-बड़े स्तंभ ड्रपिस्टोन कहलाते हैं। 

डा.शंकर तिवारी ने प्रथम बार इस गुफा का वर्णन किया था। इस गुफा में छोटे-छोटे पोखर स्थित हैं जिनमें पायी जाने वाली छोटी-छोटी मछलियों की आखें नहीं पायी जातीं। वैज्ञानिकों का मानना है कि सदियों से अंधेरे में रहने के कारण इनकी आँखों की उपयोगिता खत्म हो गई एवं अब ये जन्म से ही अंधी पैदा होती हैं जोकि डार्विन के सिद्धांत की पुष्टि करती है।

3. कैलाश गुफा :-
कोटमसर से 16 किलोमीटर की दूरी पर कैलाश गुफा स्थित है। इसके बड़े-बड़े हाल किसी राजा के दरबार सा भान देते हैं एवं चूना पत्थर की आकृतियां शिवलिंग के समान जान पड़ती हैं । इसलिये इस गुफा का धार्मिक महत्व भी हैं। यहाँ महाशिवरात्रि के दिन भक्तों का तांता लगा रहता है। यह गुफा 50 मीटर की ऊँचाई पर तथा 2500 मीटर लम्बी है।

4. दण्डक गुफा :-
कोटमसर से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस गुफा में भी कोटमसर गुफा के समान ही स्टलेगटाइट, स्टलेगमाइट एवं ड्रपिस्टोन जैसी संरचनायें भव्य स्वरूप प्रदान करती है।

5. अरण्यक गुफा :-
कांगेर घाटी से लगी इस गुफा में जाधरा झांपी और मकर कक्ष की अवशैल संरचनाएं देखते बनती है।

केशकाल घाटी 

लेखक परिचय:-

शरद चन्द्र गौड तथा कविता गौड बस्तर अंचल में अवस्थित रचनाकार दम्पति हैं। आपका बस्तर क्षेत्र पर गहरा अध्ययन व शोध है।

आपकी प्रकाशित पुस्तकों में बस्तर एक खोज, बस्तर गुनगुनाते झरनों का अंचल, तांगेवाला पिशाच, बेड नं 21, पागल वैज्ञानिक प्रमुख हैं। साहित्य शिल्पी के माध्यम से अंतर्जाल पर हिन्दी को समृद्ध करने के अभियान में आप सक्रिय हुए हैं।

रायपुर से जगदलपुर आते समय बस्तर जिले का स्वागत करने कांकेर की विशाल पहाड़ियाँ तत्पर दिखाई देती है। कांकेर से 22 किलोमीटर आगे शुरू होती है केशकाल की मनोरम घाटी। हेयर पिन मोड़ लिये हुये यह मनोरम घाटी पर्यटकों का मन मोह लेती है। घाटी के अंत में शुरू होता है दण्डकारण्य का पठार। पंचवटी के विश्रामगृह एवं वाचिंग टावर से केशकाल घाट का मानोरम दृश्य दिखाई पड़ता है। एकाएक तो यह एहसास ही नहीं होता कि हम मैदानी क्षेत्र के दृश्यो को देख रहे हैं। दूर-दूर तक फैली पर्वत मालायें। हरी चादर में लिपटी सुन्दर वसुन्धरा, बादलों के पर्वतों से टकराते झुण्ड हमें मानों हिमालय पर्वत सा एहसास कराते हैं। बस्तर की वास्तविक सीमा यहीं से शुरू होती है।

बारसूर  
बस्तर के सदर मुकाम जगदलपुर से 105 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बारसूर तक पहुँचने के लिये गीदम से होकर जाना पड़ता है। बारसूर गीदम से 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ गणेश जी की विशाल मूर्ति है। बारसूर नाग राजाओं एवं काकतीय शासकों की राजधानी रहा है। बारसूर ग्यारहवीं एवं बारहवीं शताब्दी के मंदिरो के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के मंदिरों में मामा-भांजा मंदिर मूलत: शिव-मंदिर है। मामा-भांजा मंदिर दो गर्भगृह युक्त मंदिर है। इनके मंडप आपस में जुड़े हुये हैं। यहाँ के भग्न मंदिरों में मैथुनरत प्रतिमाओं का अंकन भी मिलता है। इतिहासकार एवं विख्यात शिक्षाविद डा.के.के.झा के अनुसार यह नगर प्राचीन काल में वेवश्वतपुर के नाम से जाना जाता था। चन्द्रादित्य मंदिर का निर्माण नाग राजा चन्द्रादित्य ने करवाया था एवं उन्हीं के नाम पर इस मंदिर को जाना जाता है। बत्तीस स्तंभों पर खड़े बत्तीसा मंदिर का निर्माण बलुआ पत्थर से हुआ है। इसका निर्माण गुण्डमहादेवी ने सोमेश्वर देव के शासन काल में किया। 

इस मंदिर में शिव एवं नंदी की सुन्दर प्रतिमायें हैं। एक हजार साल पुराने इस मंदिर को बड़े ही वैज्ञानिक तरीके से पत्थरों को व्यवस्थित कर बनाया गया है। ये मंदिर आरकियोलाजी विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक हैं। गणेश भगवान की दो विशाल बलुआ पत्थर से बनी प्रतिमायें आश्चर्यचकित कर देती है। मामा-भांजा मंदिर शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट एवं दर्शनीय है।

नारायणपाल का विष्णु मंदिर
बस्तर जिले के विकास खण्ड बस्तर में जगदलपुर से करीब 80 किलोमीटर दूर छिंदक नागवंशी राजा धारावर्षा की रानी गुण्डमहादेवी द्वारा इस मंदिर को ई.सन 1111 में बनवाया गया। गुण्डमहादेवी का पुत्र सोमेश्वर देव एक प्रतापी राजा था। मंदिर के पूर्ण होते-होते धारावर्षा एवं सोमेश्वर देव दिवंगत हो चुके थे एवं गुण्डमहादेवी के पौत्र छिंदक नागवंशी राजा कन्हर देव का शासन था। गुण्डमहादेवी और उसकी बहू सोमेश्वर देव की रानी के शिलालेख यहाँ पर हैं। नारायण पाल का यह मंदिर पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक है एवं छिंदक नागवंशी शासन के समय की जानकारी प्राप्त करने का मुख्य स्त्रोत भी है।

दण्तेवाड़ा  
शंखनी एवं डंकनी नदी के संगम स्थल पर स्थित दण्तेवाड़ा जगदलपुर से 85 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ बस्तर की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी देवी का प्राचीन मंदिर है।

 दंतेश्वरी देवी यहाँ के रहवासियों की आस्था का प्रतीक है। दशहरे के समय देश-विदेश के पर्यटक यहाँ आते है। पैदल चलकर आने वाले श्रद्धालुओं के लिये विभिन्न स्वयं सेवी संस्थाओं के द्वारा नि:शुल्क भोजन, नास्ते, रहने एवं चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करायी जाती है। 

यहाँ पर दण्तेश्वरी माई के अलावा शिव, गणेश, विष्णु, सूर्य, भैरव की प्रतिमाये हैं जो पुरातात्विक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

बैलाडीला
बैलाडीला में लौह अयस्क का खनन देखना भी अद्भुत अनुभव होता है। बचेली एवं किरंदूल में एन.एम.डी.सी. की खदाने हैं। यहाँ प्छज्न्ज्ञ एवं च्तवरमबज गेस्ट हाऊस में रुका जा सकता है। लौह अयस्क की खदानों को देखने के लिये अनुमति लेना आवश्यक है। बचेली की खदानें टाउनशिप से 25 किलोमीटर दूर हैं। यहाँ का अयस्क अच्छे ग्रेड का माना जाता है जिसमें लोहे का प्रतिशत 86 तक रहता है।


के.के.रेलवे लाइन (कोत्सावल्या से किरन्दूल)
के.के.रेलवे लाइन में पेसेंजर से सफर करना एक रोमांचक अनुभव होता है। रास्ते में घने जंगल एवं गगन चुम्बी पहाड़ियों के बीच से गुजरती ट्रैन। यू-टर्न लेती ट्रैन एवं बादलों के बीच से झाँकते पहाड़ मनमोहक दृश्य उपस्थित करते हैं। जो जैवविविधता यहाँ दिखलाई पड़ती है वह अन्यत्र देखने को नहीं मिलती। इस रोमांच भरे सफर में एशिया का सबसे ऊँचा ब्राड गेज रेलवे स्टेशन शिमलीगुड़ा पड़ता है। ताड़ी के रसभरे फल लेकर बेचने वाले पूरे रास्ते में मिलते हैं, जिन्हें खाना अच्छा लगता है। इस रोमान्चकारी सफर में दो इलेक्ट्रिक इंजनों से चलने वाली ट्रैन 84 बोगदों (टनल) से होकर गुजरती है जिनकी लम्बाई 50 से 900 मीटर तक है। के.के.लाइन का निर्माण जापानियों ने बैलाडीला के लौह अयस्क को विशाखापटनम होते हुए जापान ले जाने के लिये किया था। विशखापटनम से लौह अयस्क पानी के जहाज से जापान ले जाया जाता है। इस सफर में खाने पीने की सामग्री नहीं मिलती। अत: यदि इस सफर का आनंद लेना हो तो खाने-पीने की भरपूर सामग्री साथ लेकर चलना चाहिए। यह रेलवे लाइन विगत 40 वर्षों से लोह अयस्क का परिवहन कर रही है। औसतन 16 मालगाड़ियाँ इस मार्ग पर प्रतिदिन चलती हैं। 525 किलोमीटर लम्बे इस रेलमार्ग से लौह अयस्क परिवहन कर रेलवे को प्रतिवर्ष लगभग 8 बिलियन का फायदा होता है।

चित्रकोट जलप्रपात 
जगदलपुर से 40 किलोमीटर की दूरी पर विश्वप्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात स्थित है। यहाँ इन्द्रावती नदी विस्तारित होकर मनमोहक जलप्रपात का निर्माण करती है। इसे बस्तर का नियाग्रा भी कहा जाता है। फ्लड लाइट में जलप्रपात को देखना जहाँ अलग ही अनुभव प्रदान करता है वहीं पर्यटन विभाग की पूर्णसुविधा संपन्न हट में रुकने का आनंद ही अलग है।

चित्रकोट जलप्रपात से 10 किलोमीटर की दूरी पर तामड़ाघुमड़ जलप्रपात है। तामड़ाघुमड़ जलप्रपात में एक छोटी सरिता सीधे लगभग 100 फिट की ऊँचाई से निचले भाग में गिरकर एक मनोरम जलप्रपात का निर्माण करती है। प्रपात को नीचे से उतरकर देखना अच्छा लगता है किंतु उतरने का मार्ग दुर्गम होने के कारण अतिरिक्त सावधानी रखना आवश्यक होता है।

शहीद पार्क 
जगदलपुर के हृदयस्थल में स्थित एक मनोरम स्थान है। यहाँ बच्चों के लिये बाल उद्यान एवं रेलगाड़ी की व्यवस्था है। साथ ही एक विशाल स्केटिंग रिंग युवाओं को आकर्षित करती है। सुन्दर लान एवं पुष्प उद्यान पर्यटकों का मन मोह लेते हैं।

दलपत सागर एवं आइलैण्ड
काकतीय वंश के महाराजा पुरूषोत्तम देव द्वारा बनाये गये इस तालाब को छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े तालाब होने का गौरव प्राप्त है। प्रात: एवं सांयकालीन भ्रमण के लिये यह उपयुक्त स्थान है। तालाब में बने आइलैण्ड में मोटरबोट के साथ पैडलबोट से सैर की सुविधा उपलब्ध है। आइलैण्ड में लगी पवन चक्की भी आकर्षित करती है।

दण्तेश्वरी मंदिर एवं राजमहल 
बस्तर के राजमहल के मुख्य द्वार पर बस्तर की आराध्य देवी माँ दण्तेश्वरी का मंदिर है। मंदिर के साथ “दशहरे” पर चलने वाले विशाल रथ भी इसके द्वार पर देखे जा सकते हैं। दण्तेश्वरी मंदिर के सामने बस्तर के काकतीय वंश के अंतिम महाराजा प्रवीरचन्द्र भंजदेव की प्रतिमा बस्तर वासियों की आस्था का प्रतीक है।

बालाजी मंदिर 
धरमपुरा रोड पर भगवान बालाजी का भव्य मंदिर है। यहाँ प्रदेश ही नहीं वरन देश के अन्य भागों से भी श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।

13 comments:

  1. भई वाह राजीव जी बड़ा ही सजीव चित्रण मां दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाडा और चितरकोट देखा है वाकई मनोहारी है कुछ और स्थानों को भी देखा है पर अभी स्मृति उजागर नहीं हो रही इस संस्मरण के लिये बधाई स्वीकारें

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  2. बस्तर में बहुत लम्बा समय बिताया है और यह कह सकता हूँ कि धरती पर यह स्थल एक तिलिस्म है और स्वर्ग भी है।

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  3. तीरथगढ़ में मधुमती फिल्म का एक दृश्य फिल्मांकित किया गया था. शंकर तिवारीजी ने कोटमसर गुफा का सूक्ष्म अध्ययन किया था और वह प्रचारित हुआ. गुफा के बारे में वर्णन पहले भी हो चुका है. नीचे उतरने की व्यवस्था पूर्व से ही बनायीं गयी थी. अलबत्ता कैलाश गुफा आदि की खोज बाद में हुई है. दंतेस्वारी मंदिर पुनर्रचना है. कहीं का ईंट कही का रोड़ा. मंदिर के सामने लगा ध्वज स्तंभ पर गरुड़ आसीन है. यह विष्णु मंदिर के सामने ही पाया जाता है. यह भी कहीं और का है. संभवतः बारसूर से ही लाया गया होगा. के.के रेलवे लाइन भारतीय इंजीनियरिंग का कमाल है. जापानियों ने मात्र धन राशि उपलब्ध करायी थी. प्रस्तुति ज्ञानवर्धक और सुन्दर है.
    यदि संभव हो तो जो शिव लिंग यहाँ दर्शाया गया है उसका एक चित्र उपलब्ध करावें और यह भी बताएं कि यह है कहाँ पर. (मामा भांचा, बारसूर होना चाहिए)

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  4. बहुत बढ़िया।
    बस्तर अद्वितीय है।

    यदि यह लेख बस्तर ब्लॉग के लिए उपलब्ध हो सके तो आभारी रहूंगा।

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  5. बस्तर पर जानकारी से परिपूर्ण अद्वितीय लेख। यह क्षेत्र की नैसर्गिकता की जानकारी देता है। तस्वीरे बहुत अच्छी व दुर्लभ हैं।

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  6. जानकारी और चित्र दोनों की अच्छे हैं। अच्छी प्रस्तुति है।

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  7. Rajeev ji
    ye adbhut varan padh kar satbdh rahe gaye bus man jhoom utha ki yaha jaaya jaaye

    bahut sunder hai sawarg ke jaisa

    bahut achha laga aapka ye lekh

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  8. शरद गौड एव कविता गौड जी बधाई की पात्र हैं। बस्तर की नैसर्गिकता को अंतर्जाल पर प्रस्तुत कर आपने बडा काम किया है। पर्यटन की दृष्टि से इस क्षेत्र में बहुत कुछ है व इस क्षेत्र के लिये बहुत कुछ किया जाना है।

    पी. एन. सुब्रण्यम जी इतिहास पर गहरी पकड रखते हैं। गरुड स्तंभ पर अधिक जानकारी प्रदान करने के लिये मैं शरद व कविता जी से अनुरोध करूंगा जिनका गहरा शोध है इस पर।

    शिवलिंग का चित्र माँ दंतेश्वरी के मंदिर के भीतर से खींचा गया है।

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  9. जानकारी से परिपूर्ण बढिया आलेख

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  10. छत्तीसगढ़ के जशपुर में दो कस्बे हैं सन्ना और बगीचा। क्या इनके बारे में किसी को जानकारी है और वो जानकारी क्या मुझे देना चाहेंगे आप।

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  11. आलेख में विवरण पढ कर ऐसा लगा जैसे मैं स्वंय पूरे प्रदेश की यात्रा कर के लौटा हों.. जानकारी के लिये आभार

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