साहित्य शिल्पी पर नये स्थायी स्तंभ " काव्य का रचना शास्त्र" आरंभ करते हुए हम हर्षित हैं। आचार्य संजीव वर्मा "सलिल" की समर्पित रचनाकार हैं जो अंतर्जाल को साहित्य के प्रसार का महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं एवं हिन्दी तथा साहित्य को इस माध्यम में स्थापित करने की दिशा में आप समर्पित हैं। सलिल जी  नें साहित्य शिल्पी को कविता, उसके स्वरूप, आयामो, इतिहास, छंद व उसके स्वरूप, रस, अलंकार और भी बहुत से विषयों को स्थायी स्तंभ के रूप प्रस्तुत करने की स्वीकृति प्रदान की है। हमने इस स्तंभ के विधिवत आरंभ करने से पूर्व यह उचित समझा कि आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी से पाठकों को परिचित कराया जाये। आईये उनका अभिनंदन करें। 
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बहुमुखी प्रतिभा के धनी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' एक व्यक्ति मात्र नहीं अपितु संस्था भी है. अपनी बहुआयामी गतिविधियों के लिए दूर-दूर तक जाने और सराहे जा रहे सलिलजी ने हिन्दी साहित्य में गद्य तथा पद्य दोनों में विपुल सृजन कर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है. गद्य में कहानी, लघु कथा, निबंध, रिपोर्ताज, समीक्षा, शोध लेख, तकनीकी लेख, तथा पद्य में गीत, दोहा, कुंडली, सोरठा, गीतिका, ग़ज़ल, हाइकु, सवैया, तसलीस, क्षणिका, भक्ति गीत, जनक छंद, त्रिपदी, मुक्तक तथा छंद मुक्त कवितायेँ सरस-सरल-प्रांजल हिन्दी में लिखने के लिए बहु प्रशंसित सलिल जी शब्द साधना के लिए भाषा के व्याकरण व् पिंगल दोनों का ज्ञान व् अनुपालन अनिवार्य मानते हैं. उर्दू एवं मराठी को हिन्दी की एक शैली माननेवाले सलिल जी सभी भारतीय भाषाओं को देव नागरी लिपि में लिखे जाने के महात्मा गाँधी के सुझाव को भाषा समस्या का एक मात्र निदान तथा राष्ट्रीयता के लिए अनिवार्य मानते हैं.
श्री सलिल साहित्य सृजन के साथ-साथ साहित्यिक एवं तकनीकी पत्रिकाओं और पुस्तकों के स्तरीय संपादन के लिए समादृत हुए हैं. वे पर्यावरण सुधार, पौधारोपण, कचरा निस्तारण, अंध श्रद्धा उन्मूलन, दहेज़ निषेध, उपभोक्ता व् नागरिक अधिकार संरक्षण, हिन्दी प्रचार, भूकंप राहत, अभियंता जागरण आदि कई क्षेत्रों में एक साथ पूरी तन्मयता सहित लंबे समय से सक्रिय हैं. मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता एवं म.प्र. सड़क विकास निगम में उप महाप्रबंधक के रूप में उन्होंने बिना लालच या भय के अपने दायित्व का कुशलता से निर्वहन किया है. 

साहित्य सृजन :- 
श्री सलिल की प्रथम कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है जिसमें चराचर के कर्म देव श्री चित्रगुप्त को परात्पर परमब्रम्ह, सकल सृष्टि रचयिता एवं समस्त शक्तियों का स्वामी प्रतिपादित कर नव अवधारणा प्रस्तुत की गई है. 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' सलिल जी की छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं. सम्यक शब्दावली, शुद्ध भाषा, सहज प्रवाह, सशक्त प्रतीक, मौलिक बिम्ब विधान, सामयिक विषय चयन तथा आशावादी दृष्टिकोण के सात रंगों के इन्द्र धनुष सलिल जी की कविताओं को पठनीय ही नहीं मननीय भी बनाते हैं. सलिल जी की चौथी प्रकाशित कृति 'भूकंप के साथ जीना सीखें' उनके अभियांत्रिकी ज्ञान का समाज कल्याण हेतु किया गया अवदान है. इसमें २२ मई १९९७ को जबलपुर में आए भूकंप से क्षतिग्रस्त इमारतों की मरम्मत तथा भूकंपरोधी भवन निर्माण की तकनीक वर्णित है.

उक्त के अतिरिक्त विविध विषयों एवं विधाओं पर सलिल जी की २० कृतियाँ अप्रकाशित हैं. होशंगाबाद से प्रकाशित पत्रिका 'मेकलसुता' के प्रवेशांक से सतत प्रकाशित-प्रशंसित हो रही लेखमाला 'दोहा गाथा' सलिल जी का अनूठा अवदान है जिसमें हिन्दी वांग्मय के कालजयी छंद दोहा के उद्भव, विकास, युग परिवर्तन में दोहा की निर्णायक भूमिका के प्रामाणिक उदाहरण हैं.

संपादन :- 
इंजीनियर्स टाइम्स, यांत्रिकी समय, अखिल भारतीय डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ पत्रिका, म.प्र. डिप्लोमा इंजीनियर्स मंथली जर्नल, चित्राशीश, नर्मदा, दिव्य नर्मदा आदि पत्रिकाओं;  निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों एवं शिल्पान्जली, लेखनी, संकल्प, शिल्पा, दिव्यशीश, शाकाहार की खोज, वास्तुदीप, इंडियन जिओलोजिकल सोसायटी स्मारिका, निर्माण दूर भाषिका जबलपुर, निर्माण दूर्भाशिका सागर, विनायक दर्शन आदि स्मारिकाओं का संपादन कर सलिल जी ने नए आयाम स्थापित किए हैं. 

समयजयी साहित्य शिल्पी भागवतप्रसाद मिश्र 'नियाज़' : व्यक्तित्व एवं कृतित्व श्री सलिल द्वारा संपादित श्रेष्ठ समालोचनात्मक कृति है. उक्त के ऐरिक्त सलिल जी ने ८ परतों के २१ रचनाकारों की २४ कृतियों की भूमिकाएँ लिखी हैं. यह उनके लेखन-संपादन कार्य की मान्यता, श्रेष्ठता एवं व्यापकता का परिणाम है.

काव्यानुवाद: 
हिन्दी, संस्कृत एवं अंग्रेजी के बीच भाषा सेतु बने सलिल ने ११ कृतियों के काव्यानुवाद किए हैं. रोमानियन काव्य संग्रह 'लूसिया फैरुल' का काव्यानुवाद 'दिव्य ग्रह' उनकी भाषिक सामर्थ्य का प्रमाण है. उन्होंने हिन्दी, अग्रेजी के साथ-साथ भोजपुरी, निमाड़ी, छत्तीसगढ़ी, बुन्देली, मराठी, राजस्थानी आदि में भी कुछ रचनाएं की हैं. विविध साहित्यिक एवं तकनीकी विषयों पर १५ शोधपत्र प्रस्तुत कर चुके सलिल भाषा सम्बन्धी विवादों को निरर्थक तथा नेताओं का शगल मानते हैं. 

५ साहित्यकार कोशों में सलिल जी का सचित्र जीवन परिचय तथा ६० से अधिक काव्य- कहानी संग्रहों में रचनाएँ सादर प्रकाशित की जा चुकी हैं.

सामाजिक-साहित्यिक कार्य :
सलिल जी ने अभियंता संगठनों, कायस्थ सभाओं, साहित्यिक संस्थाओं तथा सामाजिक मंचों पर गत ३१ वर्षों से निरंतर उल्लेखनीय योगदान किया है. अभियान जबलपुर के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में पौधारोपण, कचरा निस्तारण, बाल एवं प्रौढ़ शिक्षा प्रसार, स्वच्छता तथा स्वास्थ्य चेतना प्रसार, नागरिक एवं उपभोक्ता अधिकार संरक्षण, आपदा प्रबंधन आदि क्षेत्रों में उन्होंने महती भूमिका निभाई है.

अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण अभियान के माध्यम से साहित्यकारों की स्मृति में अलंकरण स्थापित कर १९९५ से प्रति वर्ष उल्लेखनीय योगदान हेतु रचनाकारों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करने के लिए वे चर्चित हुए हैं. 'दिव्य नर्मदा' शोध साहित्यिक पत्रिका के कुशल संपादन ने उन्हें राष्ट्रीय ख्याति दिलाई.

इंजीनियर्स फॉरम के राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में अभियंता प्रतिभाओं की पहचानकर उन्हें जोड़ने एवं सम्मानित करने, अभियंता दिवस के आयोजन, जबलपुर में भारत रत्न मोक्ष्गुन्दम विस्वेस्वरैया की ७ प्रतिमाएं स्थापित कराने, म.प्र. डिप्लोमा अभियंता संघ के उपप्रान्ताध्यक्ष, पत्रिका संपादक, प्रांतीय लोक निर्माण समिति अध्यक्ष आदि पदों पर २७ वर्षों तक निस्वार्थ उल्लेखनीय कार्य करने के लिए वे सर्वत्र प्रशंसित हुए.

प्रादेशिक चित्रगुप्त महासभा म.प्र. के महामंत्री व संगठन मंत्री. अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के उपाध्यक्ष, प्रशासनिक सचिव व मंडल अध्यक्ष, राष्ट्रीय कायस्थ महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आदि पदों पर उन्होंने अपनी मेधा, लगन, निष्पक्षता तथा विद्वता की छाप छोड़ी है. नागरिक उपभोक्ता संरक्षण मंच जबलपुर के माध्यम से जन जागरण, नर्मदा बचाओ आन्दोलन में डूब क्षेत्र के विस्थापितों को राहत दिलाने, आपात काल में छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी में सहभागिता, समन्वय जबलपुर के माध्यम से लोक नायक व्याख्यान माला का आयोजन, शहीद परिवारों को सहायता आदि अभिनव कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने में उन्होंने किसी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं ली. उनकी सोच है की लोक तंत्र की सफलता के लिए लोक को तंत्र पर आश्रित न होकर अपने कल्याण के लिए साधन ख़ुद जुटाना होंगे अन्यथा लोक अपनी अस्मिता की रक्षा नहीं कर सकेगा. 

शिक्षा:
कलम के धनी कायस्थ परिवार में कवयित्री श्रीमती शान्ति देवी तथा लेखक श्री राज बहादुर वर्मा,सेवा निवृत्त जेल अधीक्षक के ज्येष्ठ पुत्र सलिल को शब्द ब्रम्ह आराधना विरासत में मिली है. उन्होंने नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है. वे सेवा निवृत्ति के बाद एम.बी.ऐ. तथा पी-एच.डी. करना चाहते हैं.

सम्मान :
श्री सलिल को देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, कायस्थ कीर्तिध्वज, कायस्थ भूषण २ बार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, वास्तु गौरव, सर्टिफिकेट ऑफ़ मेरिट ५ बार, उत्कृष्टता प्रमाण पत्र २, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, सत्संग शिरोमणि, साहित्य श्री ३ बार, साहित्य भारती, साहित्य दीप, काव्य श्री, शायर वाकिफ सम्मान, रासिख सम्मान, रोहित कुमार सम्मान, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, नोबल इन्सान, मानस हंस, हरी ठाकुर स्मृति सम्मान, बैरिस्टर छेदी लाल स्मृति सम्मान, सारस्वत साहित्य सम्मान २ बार . उनकी प्रतिभा को उत्तर प्रदेश, राजस्थान, एवं गोवा के महामहिम राज्यपालों, म.प्र. के विधान सभाध्यक्ष, राजस्थान के माननीय मुख्या मंत्री, जबलपुर - लखनऊ एवं खंडवा के महापौरों, तथा हरी सिंह गौर विश्व विद्यालय सागर, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर के कुलपतियों तथा अन्य अनेक नेताओं एवं विद्वानों ने विविध अवसरों पर उनके बहु आयामी योगदान के लिए सम्मानित किया है.

20 comments:

  1. आचार्य संजीव वर्मा सलिल का साहित्य शिल्पी पर स्वागत। काव्य का रचना शास्त्र महत्वपूर्ण स्तंभ सिद्ध होगा।

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  2. आदरणीय संजीव जी का साहित्य शिल्पी मंच पर स्वागत है। उनके इस स्तंभ से हिंदी-साहित्य के सभी छात्रों को इसकी बारिकियों को समझने में बहुत सहायता मिलेगी; ऐसी आशा है।
    मैं स्वयं व्यक्तिगत रूप से इस स्तंभ के लिये प्रतीक्षारत हूँ।

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  3. आचार्य संजीव सलिल का अभिनंदन। काव्य का रचना शास्त्र आवश्यक है स्तंभ के रूप में प्रस्तुत करना, हम कुछ सीख सकेंगे।

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  4. आपका अभिनंदन सलिल जी, हम आपसे सीखने को तत्पर हैं।

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  5. इस स्तंभ की घोषणा से अच्छा लगा। आपका स्वागत है सलिल जी।

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  6. आचार्य संजीव वर्मा सलिल का साहित्य शिल्पी पर स्वागत है। इस स्तंभ की बहुत आवश्यकता थी।

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  7. सलिल जी के स्थायी स्तंभ की शुरुआत निश्चय ही एक सराहनीय प्रयास है जिस के लिए साहित्य शिल्पी टीम बधाई की पात्र है | अंतर्जाल पर सक्रिय नवीन प्रतिभाशाली लेखकों के लिए ये महत्त्वपूर्ण है कि वे काव्य और हिंदी भाषा से जुडी सभी बारीकियों को समझें | ग़ज़ल व्याकरण सम्बन्धी स्तंभ एवं समालोचना स्तंभ के पश्चात काव्य रचनाशास्त्र के लिए और स्थाई स्तंभ दे आप ने एक और नयी कड़ी आरम्भ की है | साहित्य शिल्पी को एक अध्ययन शाला कहना ग़लत ना होगा | :-)

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  8. पंकज सक्सेना4 मार्च 2009 को 11:59 am

    स्वागत।

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  9. इस स्तंभ की प्रतीकःआ रहेगी। संजीव सलिल जी का बायोडाटा पढ कर ही यह उम्मीद जग गयी है कि हम इस स्तंभ द्वारा बहुत लाभांवित होंगे।

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  10. साहित्य-शिल्पी के ये प्रयास ऐतिहासिक हैं....आचार्य सलिल की कक्षा का इंतजार रहेगा

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  11. सलिल जी
    आपका साहित्य शिल्पी पर हार्दिक स्वागत है. सभी पाठक आपके इस स्थायी स्तंभ से लाभाविन्त होगे.
    आभार

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  12. आचार्य संजीव सलिल का साहित्य शिल्पी में अभिनंदन है। आपके माध्यम से साहित्य शिल्पी के पाठक लाभांवित होंगे।

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  13. Aachharya Sanjeev Verma Salil kaa
    Sahitya Shilpi par hardik abhinandan.Unkee vidvataa se hum
    sabhee avashya laabhanvit honge.

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  14. sanjeev ji ke bare me itni jankari pa ke bahut hi achchha laha .
    aap ka naman karti hoon
    saader
    rachana

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  15. आचार्य संजीव सलिल का साहित्य शिल्पी पर अभिनंदन है। इस स्थाई स्तंभ से सभी
    बहुत लाभानवित होंगे।
    महावीर शर्मा

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  16. sanjeev ji ka swagat hai , at least ab mujh jaise nauseekhyeo ko kuch na kuch to seekhne ko milenga . main shahityashilpi ko is prayaas ke liye dhanyawad deta hoon ..

    vijay
    http://poemsofvijay.blogspot.com/

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