वे बहुत सारे हैं। अलग अलग उम्र के लेकिन लगभग सभी रिटायर्ड या अपना सब कुछ बच्चों को सौंप कर दीन दुनिया से, सांसारिक दायित्वों से मुक्त। सवेरे दस बजते न बजते वे धीरे–धीरे आ जुटते हैं यहाँ और सारा दिन यहीं गुजारते हैं। मुंबई के एक बहुत ही सम्पन्न उपनगर भयंदर में स्टेशन के बाहर, वेस्ट की तरफ। रेलवे ट्रैक के किनारे गिट्टी पत्थरों के ढेर पर उनकी महफिल जमती है और दिन भर जमी ही रहती है। यहाँ अखबार पढ़े जाते हैं, समाचारों पर बहस होती है, सुख दुख सुने सुनाये जाते हैं और मिल जुल कर जितनी भी जुट पाये, दो चार बार चाय पी जाती है, पत्ते खेले जाते हैं और शेयरों के दामों में उतार चढ़ावों पर, अकेले दुकेले बूढ़ों की हत्या पर, बलात्कार के मामलों और राजनैतिक उठापटक पर चिंता व्यक्त की जाती है। सिर्फ बरसात के दिनों में या तेज गर्मी के दिनों में व्यवधान होता है उन लोगों के बैठने में।

रचनाकार परिचय:-


सूरज प्रकाश का जन्म १४ मार्च १९५२ को देहरादून में हुआ। आपने विधिवत लेखन १९८७ से आरंभ किया। आपकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं: - अधूरी तस्वीर (कहानी संग्रह) 1992, हादसों के बीच - उपन्यास 1998, देस बिराना - उपन्यास 2002, छूटे हुए घर - कहानी संग्रह 2002, ज़रा संभल के चलो -व्यंग्य संग्रह – 2002। इसके अलावा आपने अंग्रेजी से कई पुस्तकों के अनुवाद भी किये हैं जिनमें ऐन फैंक की डायरी का अनुवाद, चार्ली चैप्लिन की आत्म कथा का अनुवाद, चार्ल्स डार्विन की आत्म कथा का अनुवाद आदि प्रमुख हैं। आपने अनेकों कहानी संग्रहों का संपादन भी किया है। आपको प्राप्त सम्मानों में गुजरात साहित्य अकादमी का सम्मान, महाराष्ट्र अकादमी का सम्मान प्रमुख हैं। आप अंतर्जाल को भी अपनी रचनात्मकता से समृद्ध कर रहे हैं।

कंकरीट के इस जंगल में कोई पार्क, हरा भरा पेड़ या कुंए की कोई जगत नहीं हैं, नहीं तो यह चौपाल वहीं जमती। वे दिन भर आती जाती ट्रेनों को देखते रहते हैं और इस तरह से अपना वक्त गुजारते हैं। शाम ढलने पर वे एक–एक करके जाने लगते हैं। एक बार फिर यहाँ पर लौट कर आने के लिए।

उनके दिन इसी तरह से गुजर रहे हैं। आगे भी उन्हें यहीं बैठकर इसी तरह से पत्ते खेलते हुए बातें करते हुए और मिल जुल कर कटिंग चाय पीते हुए दिन गुजारने हैं।

ये बूढ़े, सब के सब बूढ़े अच्छे घरों से आते हैं और सबके अपने घर–बार हैं। बरसों बरस आपने सारे के सारे दिन यहाँ स्टेशन के बाहर, रेलवे की रोड़ी की ढेरी पर आम तौर पर धूप बरसात या खराब मौसम की परवाह न करते हुए बिताने के पीछे एक नहीं कई वजहें हैं।

किसी का घर इतना छोटा है कि अगर वे दिन भर घर पर ही जमे रहें तो बहू बेटियों को नहाने तक की तकलीफ हो जाये। मजबूरन उन्हें बाहर आना ही पड़ता है ताकि बहू बेटियों की परदेदारी बनी रहे। किसी का बेशक घर बड़ा है लेकिन उसमें रहने वालों के दिल बहुत छोटे हैं और उनमें इतनी सी भी जगह नहीं बची है कि घर के ये बुजुर्ग, जिन्होंने अपना सारा जीवन उनके लिए होम कर दिया और आज उनके बच्चे किसी न किसी इज्जतदार काम धंधे से लगे हुए हैं, उनके लिए अब इतनी भी जगह नहीं बची है कि वे आराम से अपने घर पर ही रह कर, पोतों के साथ खेलते हुए, सुख दुख के दिन आराम से गुजार सके। गुंजाइश ही नहीं बची है, इसलिए रोज रोज की किच किच से बचने के लिए यहाँ चले आते हैं। यहाँ तो सब उन जैसे ही तो हैं। किसी से भी कुछ भी छुपा हुआ नहीं है।

बेशक वे आपस में नहीं जानते कि कौन कहाँ रहता है, कइयों के तो पूरे नाम भी नहीं मालूम होते उन्हें, लेकिन फिर भी सब ठीक ठाक चलता रहता है। 

बस, संकट एक ही है। अगर उनमें से कोई अचानक आना बंद कर दे तो बाकी लोगों को सच्चाई का पता भी नहीं चल पाता।बेशक थोड़े दिन बाद कोई नया बूढ़ा आ कर उस ग्रुप में शामिल हो जाता है।

भयंदर में ही रहने वाले मेरे मार्क्सवादी दोस्त हृदयेश मयंक इसे पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते हैं जहाँ किसी भी अनुत्पादक व्यक्ति या वस्तु का यही हश्र होता है – कूड़े का ढेर। दोस्त की दोस्त जानें लेकिन सच यही है कि इस देश के हर घर में एक अदद बूढ़ा है जो समाज से, जीवन से, परिवार से और अपने आसपास की दुनिया से पूरी तरह रिटायर कर दिया गया है और वह अपने आखिरी दिन अपने शहर में सड़क या रेल की पटरी के किनारे पत्थर–गिट्टियों पर बैठ कर बिताने को मजबूर है।

20 comments:

  1. मार्मिक लघुकथा। जि़न्‍दगी की सच्‍चाई से रूबरू कराती हुई। आखिर किया भी क्‍या जाये, बदलती मानसिकता, संवादहीनता, बदलता परिवेश, यह सब स्‍वीकार करना ही होगा। उन बच्‍चों की भी अपनी मज़बूरियां होंगी।
    सूरजप्रकाश की एक और लघुकथा पाठकों को याद होगी जहां एक महिला देवर के डर के मारे स्‍कूल में देर तक बैठती है क‍ि पति घर आये तो वह घर जाये क्‍योंकि देवर की नज़र में वह रिश्‍तों की पाकीज़गी नहीं देखती।

    ये दुनियां है। सूरजप्रकाश को बधाई इस लघुकथा के लिये।

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  2. बुजुर्गों पर कम ही लिखा जाता है। आपकी यह छोटी सी लघुकथा बहुत बडा संदेश देती है।

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  3. भयंदर में ही रहने वाले मेरे मार्क्सवादी दोस्त हृदयेश मयंक इसे पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते हैं जहाँ किसी भी अनुत्पादक व्यक्ति या वस्तु का यही हश्र होता है – कूड़े का ढेर। दोस्त की दोस्त जानें लेकिन सच यही है कि इस देश के हर घर में एक अदद बूढ़ा है जो समाज से, जीवन से, परिवार से और अपने आसपास की दुनिया से पूरी तरह रिटायर कर दिया गया है और वह अपने आखिरी दिन अपने शहर में सड़क या रेल की पटरी के किनारे पत्थर–गिट्टियों पर बैठ कर बिताने को मजबूर है।

    कुछ कहने के लिये नहीं है। आप संवेदनशील कहानीकार हैं।

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  4. बहुत अच्छी लघुकथा है सूरज जी, बधाई।

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  5. हमारे बुजुर्ग कैसे गैर जरूरी होते चले गये यह सोचने की बात है। आपने जो शब्द चित्र खीचा है वह आम दृश्य है।

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  6. मन वेदना से भर उठता है -

    "किसी का घर इतना छोटा है कि अगर वे दिन भर घर पर ही जमे रहें तो बहू बेटियों को नहाने तक की तकलीफ हो जाये। मजबूरन उन्हें बाहर आना ही पड़ता है ताकि बहू बेटियों की परदेदारी बनी रहे। किसी का बेशक घर बड़ा है लेकिन उसमें रहने वालों के दिल बहुत छोटे हैं और उनमें इतनी सी भी जगह नहीं बची है कि घर के ये बुजुर्ग, जिन्होंने अपना सारा जीवन उनके लिए होम कर दिया और आज उनके बच्चे किसी न किसी इज्जतदार काम धंधे से लगे हुए हैं, उनके लिए अब इतनी भी जगह नहीं बची है कि वे आराम से अपने घर पर ही रह कर, पोतों के साथ खेलते हुए, सुख दुख के दिन आराम से गुजार सके।"

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  7. सही कहा है आपने...अपनी इस लघुकथा में...इसे पढ़ कर आने वाले दिनों की कल्पना से ही मन सिहर उठता है...अद्भुत लेखन है आपका...बधाई.

    नीरज

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  8. सच यही है कि इस देश के हर घर में एक अदद बूढ़ा है जो समाज से, जीवन से, परिवार से और अपने आसपास की दुनिया से पूरी तरह रिटायर कर दिया गया है| महसूस कर रहा हूँ इस शब्दों को और सिहर रहा हूँ।

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  9. सच लिखा है। साहित्य समाज का दर्पण है दुर्भाग्य यह है कि हमें अपनी कुरूपता से शिकायत नहीं।

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  10. इस लघु कथा में भी " देखन में छोटे लगे पर घाव करे गंभीर" वाली बात चरितार्थ होती है। कहानी से पाठको को अनेकों आयाम मिलते हैं मसलन एक पहलु पर मधु जी नें चर्चा की तो दूसरी पर कई पाठकों की चिंतायें पढने को मिलीं। आपके लेखन की यही सफलता है कि उसमें पाठकों के लिये बहुत स्पेस होता है।


    बुजुर्गों के लिये समाज को सोचना और आगे आना ही होगा।

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  11. aapki khanai jab bhi padhi hai aapke shabdon se jaise soch ka ek jaal bunta hai zindgi ka itna sachha aaina
    itne achhe shabdon main

    aap waqayi mahan kathakaar hai

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  12. suraj ji ,

    bahut hi marmik katha.. is lagu katha men aapne bahut badi baat likh di hai .. sochene ki baat ye hai ki kya mulya ab jeevit nahi rahe...

    aapko dil se badhai .is rachna ke liye ...

    vijay
    http://poemsofvijay.blogspot.com/

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  13. साहित्‍यशिल्‍पी के सभी पाठकों का आभार कि मेरी रचनाएं पसंद की जाती है। जीवन में सब कुछ आस पास होता रहता है और कलम अपना काम करती रहती है। बात दिल से निकलने और दिल को छूने भर की है।
    एक शिकायत साहित्‍यशिल्‍पी के आयोजकों से। वे विश्‍वास रखें कि वे किसी टीआरपी के लिए ये पत्रिका नहीं निकाल रहे हैं कि सुबह 6 बजे ओर दोपहर एक बजे अगर ब्रेकिंग न्‍यूज की तरह नयी रचना नहीं डाली तो आसमान नीचे आ जायेगा। अपने हर पाठक को इतना समय तो दीजिये कि वह इत्‍मीनान से आ कर रचना पढ़ सके। अगर राजीवजी का संदेश न आता तो मु्झै पता ही न चलता कि मेरी रचना आ कर अगली ब्रेकिंग रचना के लिए जगह खाली करके जा चुकी है। आपके पास वक्‍त बहुत है। पाठक के पास नहीं।
    मेरा सुझाव है कि आप हर रचना को कम से कम तीस घंटे का समय दीजिये कि वह पहले नम्‍बर पर रहे। सोमवार सुबह 6 बजेअगर पहली रचना आती है तो दूसरी रचना मंगलवार 12 बजे और तीसरी रचना बुधवार शाम 6 बजे अाये आघ्‍ेर इसी क्रम को आगे बढ़ाये।
    मेरा मानना है कि और पाठक भी जल्‍दी जल्‍दी रचना पढ़ने का ये दबाव महसूस करते होंगे

    सूरज

    उत्तर देंहटाएं
  14. बेशक घर बड़ा है
    लेकिन उसमें रहने वालों के
    दिल बहुत छोटे हैं

    दिल छोटे नहीं बौने कहिए

    सूरज भाई

    विचारों से भी बौने हो चुके हैं हम

    इस गम से भी नहीं होता है गम

    करें इसे कैसे कम

    सूरते हाल बदलनी चाहिए

    पर शायद बुजुर्ग बदलते जाएंगे

    हाल नहीं बदलेंगे

    विचार नहीं बदलेंगे

    पर बदलेंगे अवश्‍य

    रूकते नहीं हैं एक ही रहते नहीं हैं

    यही तो विचारों की और मन की कहानी है

    इनकी रूकती नहीं रवानी है

    बड़ी सुंदर भावपूर्ण आपकी लिखी
    छोटी कहानी है।

    उत्तर देंहटाएं
  15. सहमत

    सूरज जी के मत से

    साहित्‍य शिल्‍पी

    एक दो तीन चार पांच

    निकाल सकते हैं

    एक कविता के लिए

    कहानी के लिए

    व्‍यंग्‍य के लिए

    संस्‍मरण के लिए

    वगैरह वगैरह

    पर समय तो पाठकों को अवश्‍य दीजिए

    पूरे खुले जी से विचार कीजिए राजीव जी।

    उत्तर देंहटाएं
  16. मार्मिक लघुकथा....

    सूरज प्रकाश जी,
    बधाई...

    उत्तर देंहटाएं

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