देश के अन्‍य प्रदेशों के लोक में प्रचलित लोकनाट्यों की परम्‍परा में छत्‍तीसगढी लोक नाट्य नाचा का विशिष्‍ठ स्‍थान है । नाचा में स्‍वाभाविक मनोरंजन तो होता ही है साथ ही इसमें लोक शिक्षण का मूल भाव समाहित रहता है जिसके कारण यह जन में रच बस जाता है । वाचिक परम्‍परा में पीढी दर पीढी सफर तय करते हुए इस छत्‍तीसगढी लोकनाट्य नाचा में हास्‍य और व्‍यंग के साथ ही संगीत की मधुर लहरियां गूंजती रही है और इस पर नित नये प्रयोग भी जुडते गये हैं । इसका आयोजन मुख्‍यत: रात में होता है, जनता ‘बियारी’ करके इसके रस में जो डूबती है तो संपूर्ण रात के बाद सुबह सूरज उगते तक अनवरत एक के बाद एक गम्‍मत की कडी में मनोरंजन का सागर हिलोरें लेते रहता है । गांव व आस-पास के लोग अपार भीड व तन्‍मयता से इसका आनंद लेते हैं और इसके पात्रों के मोहक संवादों में खो जाते हैं । नाचा की इसी लोकप्रियता एवं पात्रों में अपनी अभिनय क्षमता व जीवंतता सिद्ध करते हुए कई नाचा कलाकार यहां के निवासियों के दिलों में अमिट छाप बना गए है । मडई मेला में आवश्‍यक रूप से होने वाले नाचा को इन्‍हीं जनप्रिय कलाकरों नें गांव के गुडी से महानगर व विश्‍व के कई देशों के भव्‍य नागरी थियेटरों तक का सफर तय कराया है । जिनमें से सर्वाधिक लोकप्रिय नाम है गोविन्‍दराम निर्मलकर, जिन्‍हें इस वर्ष पद्मश्री पुरस्‍कार प्रदान किया गया है ।

छत्‍तीसगढ में शिवनाथ नदी के तट पर बसे ग्राम मोहरा में 10 अक्‍टूबर 1935 को पिता स्‍व. गैंदलाल व माता स्‍व. बूंदा बाई के घर में जन्‍में गोविन्‍दराम के मन में नाचा देख-देखकर ऐसी लगन जागी कि वे 20 वर्ष की उम्र में पैरों में घुघरू बांधकर नाचा कलाकार बन गये । उन्‍होंनें अपना गुरू बनाया तत्‍कालीन रवेली रिंगनी साज के ख्‍यात नाचा कलाकार मदन निषाद को । इनके पैरों के छन-छन व कमर में बंधे घोलघोला घांघर नें पूरे छत्‍तीसगढ में धूम मचा दिया । इन्‍हीं दिनों 50 के दशक के ख्‍यात रंगकर्मी रंग ऋषि पद्म भूषण हबीब तनवीर नें छत्‍तीसगढी नाचा की क्षमता को अपनाते हुए इनकी कला को परखा और नया थियेटर के लिए मदन निषाद, भुलवाराम यादव, श्रीमति फिदाबाई मरकाम, देवीलाल नाग व अन्‍य सहयोगी कलाकार लालू, ठाकुर राम, जगमोहन आदि को क्रमश: अपने पास बुला लिया ।

गोविन्‍दराम निर्मलकर जी 1960 से नया थियेटर से जुड गये । उन दिनों हबीब तनवीर जी के चरणदास चोर नें संपूर्ण भारत में तहलका मचाया था । अभिनय को अपनी तपस्‍या मानने वाले गोविन्‍दराम निर्मलकर नया थियेटर में आते ही नायक की भूमिका में आ गए वे मदनलाल फिर द्वारका के बाद तीसरे व्‍यक्ति थे जिसने चरणदास चोर की भूमिका को अदा किया । अपनी अभिनय क्षमता के बूते पर उन्‍होंनें सभी प्रदर्शनों में खूब तालियां एवं संवेदना बटोरी । इसके साथ ही हबीब तनवीर जी की दिल्‍ली थियेटर की पहली प्रस्‍तुति आगरा बाजार (1954) में भी गोविन्‍दराम निर्मलकर जी नें अभिनय शुरू कर दिया । इसके बाद गोविन्‍दराम निर्मलकर जी नें हबीब तनवीर के प्रत्‍येक नाटकों में अभिनय किया और अपने अभिनय में निरंतर निखार लाते गए । लोकतत्‍वों से भरपूर मिर्जा शोहरत बेग (1960), बहादुर कलारिन (1978), चारूदत्‍त और गणिका वसंतसेना की प्रेम गाथा मृच्‍छकटिकम मिट्टी की गाडी (1978), पोंगा पंडित, ब्रेख्‍त के नाटक गुड वूमेन ऑफ शेत्‍जुवान पर आधारित शाजापुर की शांतिबाई (1978), गांव के नाम ससुरार मोर नाव दंमांद (1973), छत्‍तीसगढ के पारंपरिक प्रेम गाथा लोरिक चंदा पर आधारित सोन सरार (1983), असगर वजाहत के नाटक जिन लाहौर नई देख्‍या वो जन्‍मई नई (1990), शेक्‍सपियर के नाटक मिड समर्स नाइट ड्रीम पर आधारित कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना (1994) आदि में गोविन्‍दराम जी नें अभिनय किया ।

गोविन्‍दराम जी के अभिनय व नाटकों के अविश्‍मरणीय पात्रों में चरणदास चोर की भूमिका के साथ ही आगरा बाजार में ककडी वाला, बहादुर कलारिन में गांव का गौंटिया, मिट्टी की गाडी में मैतरेय, हास्‍य नाटकों के लिए प्रसिद्ध मोलियर के नाटक बुर्जुआ जेन्‍टलमेन का छत्‍तीसगढी अनुवाद लाला शोहरत बेग (1960) में शोहरत बेग जैसी केन्‍द्रीय व महत्‍वपूर्ण भूमिकायें रही । इन्‍होंनें बावन कोढी के रूप में सोन सागर में सर्वाधिक विस्‍मयकारी और प्रभावशाली अभिनय किया । महावीर अग्रवाल जी इस संबंध में तत्‍कालीन ‘चौमासा-1988’ में लिखते हैं ‘ एक-एक कदम और एक-एक शव्‍द द्वारा गोविन्‍दराम नें अपनी शक्ति और साधना को व्‍यक्‍त किया है । मुडी हुई अंगुलियों द्वारा कोढ का रेखांकन अद्भुत है ।‘में तोर संग रहि के अपने जोग ला नी बिगाडों’ जैसे संवादों की अदायगी के साथ-साथ ‘चंदा ला लोरिक के गरहन लगे हे’ संवाद सुनकर आंखों में उतर जाने वाले यम रूपी क्रोध को, वहशीपन को अपनी विलक्षण प्रतिभा द्वारा प्रभावित किया है । शुद्ध उच्‍चारण और मंच के लिये अपेक्षित लोचदार आवाज द्वारा गोविन्‍दराम चरित्र से एकाकार होने और संवेदनाओं को सहज उकेरने की कला में दक्ष हैं ।‘ मृच्‍छकटिकम मिट्टी की गाडी (1978) में नटी और मैत्रेय की भूमिका में चुटीले संवादों से हास्‍य व्‍यंग की फुलझडी बिखेरने वाले एवं पोंगा पंडित में लोटपोट करा देने वाले पोंगा पंडित की भूमिका में निर्मलकर जी नें जान डाल दिया था । मुद्राराक्षस में जीव सिद्धि, स्‍टीफन ज्‍वाईग की कहानी देख रहे हैं नैन में दीवान, कामदेव का अपना वसंत ऋतु में परियों से संवाद करने वाला बाटम, गांव के नाम ससुरार मोर नाव दंमांद(1973) में दमांद की दमदार भूमिका, जिन लाहौर नई देख्‍या वो जन्‍मई नई (1990) में अलीमा चायवाला, वेणीसंघारम में युधिष्ठिर, पोंगवा पंडित में ‘पईसा म छूआ नई लगे कहने वाले’ पंडित की जोरदार भूमिका में गोविन्‍दराम निर्मलकर छाये रहे हैं ।

अंतर्राष्‍ट्रीय नाट्य समारोह, एडिनबरा लंदन में गोविन्‍दराम अभिनीत चरणदास चोर का प्रदर्शन 52 देशों से आमंत्रित थियेटर ग्रुपों के बीच हुआ और चरणदास चोर को विश्‍व रंगमंच का सर्वोच्‍च सम्‍मान प्राप्‍त हुआ । इस प्रसिद्धि के बाद चरणदास चोर का मंचन विश्‍व के 17 देशों में हुआ । गोविन्‍दराम को पहलीबार हवाई जहाज चढने का अवसर एडिनबरा जाते समय प्राप्‍त हुआ उसके बाद वह निरंतर हबीब तनवीर और साथी कलाकारों के साथ हवा एवं यथार्थ के लोक अभिनय की उंचाईयों पर उडते रहे । चरणदास चोर की प्रसिद्धि के चलते श्‍याम बेनेगल नें फिल्‍म ‘चरणदास चोर’ बनाया जिसमें गोविन्‍दराम जी नें भी अभिनय किया है ।

2005 से लकवाग्रस्‍त गोविन्‍दराम जी को विगत दिनों बहुमत सम्‍मान दिये जाने के समय उन्‍होंनें अपने द्वारा अभिनीत आगरा बाजार के ककडी वाले के गीत को सुनाया, यह नाटक और उनका अभिनय ‘आगरा बाजार’ की जान है । आगरा बाजार में पतंगवाला हबीब तनवीर के साथ इस ककडी वाले के स्‍वप्‍नो को सामंतशाही सवारी नें रौंद दिया था, उस दिन भी वही कसक पद्म श्री गोविंदराम निर्मलकर जी के हृदय से हो कर आंखों से छलकी जा रही थी । मध्‍य प्रदेश सरकार के तुलसी सम्‍मान व छत्‍तीसगढ सरकार के मदराजी सम्‍मान के बावजूद 1500 रूपये पेंशन से अपनी गृहस्‍थी की गाडी खींचते गोविंदराम छत्‍तीसगढिया स्‍वाभिमान और संतोष के पारंपरिक स्‍वभाव के धनी हैं, पैसा नहीं है तो क्‍या हुआ जिंदादिली तो है । बरसों गुमनामी की जिन्‍दगी जीते इस महान कलाकार की सुध पुन: सरकार नें ली है, गोविन्‍दराम नें अपनी परम्‍परा व संस्‍कृति के प्रति आस्‍था का डोर नहीं छोडा है । उसी तरह जिस तरह आगरा बाजार में रौंदे जाने के बाद भी रोते ककडी वाले के अंतस को अपूर्व उर्जा से भर देने वाले जस गीत व मांदर के थापों नें दुखों को भूलाकर ब्रम्‍हानंद में मगन कर दिया था । वह ककडी वाला आज भी हमारे बीच जीवन में आशा का संचार करता हुआ हमारी संस्‍कृति और परम्‍परा के ध्‍वज को सर्वोच्‍च लहराता हुआ अडा खडा है।

12 comments:

  1. जानकारी भरा आलेख। गोविन्‍दराम निर्मलकर की जीवटता को आपनें अच्छी तरह प्रस्तुत किया है।

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  2. "पैसा नहीं है तो क्‍या हुआ जिंदादिली तो है।" हमारे देश के अधिकतर कलाकारों की यही हालत है। हम कला के क्षेत्र में फिसड्डी ही रहेंगे चूंकि हम अपनी कला और कलाकारों को सही तरह और सही समय पर सम्मानित करना नहीं जानते।

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  3. कलाकार और धन शायद दोनों एक दूसरे के शत्रु हैं। हाँ कुछ को पैसा मिलता है लेकिन कला के बिक जाने पर।

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  4. संजीव जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद इस मूल्यवान व अति-महत्वपूर्ण प्रस्तुति के लिये। गोविन्द राम जी को पद्मश्री देर से मिली उपलब्धि अवश्य है लेकिन हौसला दिलाती है कि कलाकार उपेक्षित नहीं रहेगा।

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  5. संजीव तिवारी जी नें बडा काम किया है। असल प्रतिभा ग्रामीण अंचलों में छुपी हैं। उनका पूरा जीव कार्य करते गुजर जाता है और उनपर कम ही चर्चायें होती हैं।

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  6. पद्मश्री गोविन्‍दराम निर्मलकर जी पर अच्छी जानकारी है धन्यवाद।

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  7. लोक नाट्य, लोक कला और मनोरंजन का एक दुर्लभ माध्यम रहा है. आज भले ही इस चकाचौंध ने सब मटियामेट करने का प्रयास किया हो परंतु आज भी लोक कलाकार इस बात का जीता जागता उदाहरण पेश करते हैं कि कलाकार के पास भले ही धन न हो पर जीवन की शांति सुख और संतोष उनके पास रहा है.. और जीवन की यही उपलब्धता है.. आपने एक जीवट कलाकार से भेंट कराकर उपकार किया है. आपका आभार और बधाई.. लोक कलाओं को एक बार फिर सार्वजनिक मंच मिलने चाहिये.. इस और हम कुछ प्रयास करे...

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  8. नाटय विधा आज भी ग्रामीण आंचलों में मंनोरजन और लोग सम्पर्क का एक सशक्त माध्यम है जो आजकल की आधुनिकता मे विलुप्त प्राय होता जा रहा है.. इसे जीवत रखने के प्रयास आवश्यक हैं.. सुन्दर आलेख के लिये संजीव जी का आभार

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  9. ..... गृहस्‍थी की गाडी खींचते गोविंदराम छत्‍तीसगढिया स्‍वाभिमान और संतोष के पारंपरिक स्‍वभाव के धनी हैं, पैसा नहीं है तो क्‍या हुआ जिंदादिली तो है .....

    प्रेरणास्पद व्यक्तित्व गोविन्‍दराम निर्मलकर जी के बारे में जानकर सुखद लगा. किन्तु आदरणीय अग्रज दिनेशराय द्विवेदी जी के कथन से सहमत हूं " कलाकार और धन शायद दोनों एक दूसरे के शत्रु हैं। हाँ कुछ को पैसा मिलता है लेकिन कला के बिक जाने पर।" इसका अपवाद अपवाद से ही मिलता है.

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