होली का हुड़दंग समाप्त हुआ। सड़कों, बगीचों --वातावरण में रंग ही रंग बिखरे पड़े थे। रंगों से विभोर भावनाएं भी दिनचर्या की ओर मुड़ गई थीं। बलकार के बगीचे के कोने में कुछ फूल गर्दन उठाये चारों ओर निहार रहे थे। होली के रंग एक दूसरे पर डालते समय बहुत सी क्यारियां बलकार के दोस्तों के पैरों तले कुचली गईं थीं। कोने की ही कुछ क्यारियां बच पाई थीं। समीर के हल्के से झोंकें ने ज़मीन पर पड़े सूखे रंग थोड़े से उड़ा दिए थे। उसी की मस्ती में कोने के सुरक्षित एक फूल ने झूमते हुए कहा --"यार,आदमी अपने आप को क्या समझता है? कृत्रिम रंगों से अपने जीवन में रंग भरता है गले मिल मित्रता निभाता है और फिर एक दूसरे से गाली-गलौच , लड़ाई -झगड़ा, मार- पिटाई ,खून -खराबा यहाँ तक कि एक दूजे पर गोली तक दाग देता है।" 

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-


पंजाब के जालंधर शहर में जन्मी डा. सुधा धीगरा हिन्दी और पंजाबी की सम्मानित लेखिका हैं। इनकी कई रचनाये जैसे- मेरा दावा है (काव्य संग्रह-अमेरिका के कवियों का संपादन ), तलाश पहचान की (काव्यसंग्रह) ,परिक्रमा (पंजाबी से अनुवादित हिन्दी उपन्यास), वसूली (कथा- संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी), सफर यादों का (काव्य संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी), माँ ने कहा था (काव्य सी.डी). पैरां दे पड़ाह (पंजाबी में काव्यसंग्रह), संदली बूआ (पंजाबी में संस्मरण) आदि प्रकाशित हैं।
अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये कार्यरत डा. सुधा को अनेक सम्मान प्राप्त हुये हैं जिनमें अक्षरम प्रवासी मीडिया सम्मान (२००६), सर्वोतम कवयित्री (२००६) आदि हैं। वे अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) द्वारा हिन्दी के प्रचार -प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए भी कई बार सम्मानित की गई हैं।

दूसरा फूल बोला --"अरे दुखी क्यों होते हो? आदमी नादान प्राणी है -आदि काल से देखता आ रहा है कि प्रकृति इसके हर दिन, त्यौहार, उत्सव, मेले, जन्मदिन और सालगिरह को हम फूलों से रंगीन और महकीली बनाती आ रही है अरे हम तो इसका शोक भी कम कर देते हैं....पर यह ऐसा स्वार्थी और कृतघ्न है कि प्रकृति से ही सब सीखता है और प्रयोगशाला में उसे थोड़ा फेर बदल कर अपने आप को अविष्कारी समझता है।" 

तीसरा बोला--"अरे यार मैंने तो यहाँ तक सुना है कि प्राकृतिक साधनों की पुरानी पद्धतियों को नया रूप देकर यह सौन्दर्य प्रसाधन ,खुश्बूएँ यहाँ तक कि बहुत सी दवाईयां बना कर स्वयं पर गर्वीला हो रहा है।" 

तभी बलकार के माता -पिता होली के बाद नहा धो कर बाहर आते दिखाई दिए -- पहले फूल ने सिर नीचे कर लिया जैसे मुरझा गया हो--बोला --"मैं मोटे के कोट पर नहीं टंगना चाहता। साँस की दुर्गन्ध और शराब की बदबू से मैं मर जाऊंगा। जब हमें सूंघने आता है तो कितनी बास मारता है।" 

दूसरा इठलाया -- "अगर बलकार की मम्मी ने हाथ बढ़ाया, मैं तो कट जाऊँगा। उनके जूड़े पर लग कर इतराऊँगा। कितनी सुंदर हैं, कलिओं के इत्र से हर समय सुगंधित रहती हैं। मुरझा कर गिरते समय भी उन्हें छु कर गिरूंगा।" 

तीसरा बोला --"लुच्चा कहीं का।" 

बलकार के मम्मी -डैडी फूलों की उधड़ी हुई क्यारियां देखते गेट से बाहर चले गए। हवा में तेज़ी आई और जहाँ तहाँ फैले रंग उड़ा ले गई। फूल खीं..खीं ..खीं कर हँसनें लगे "बच गए भाई, आज तो झूम लें कल तो हमारी पंखुड़ियों ने बिखरना ही है।" 
*****

23 comments:

  1. एक बेहद खूबसूरत रचना ! बधाई !

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  2. बहुत प्रभावी लघुकथा। अनेकों रंग समाहित हैं।

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  3. LAGHUKATHA "UPRAANT" MEIN SUDHA
    OM DHINGRA BAHUT BADEE BAAT KAH
    GAYEE HAIN.UNKEE ANYA RACHNAAON
    KEE TARAH YAH RACHNA BHEE MAN KO
    CHHOOTEE HAI.bADHAAEE

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  4. पृकति के दृष्टिकोण से मानव की ओर देखने का अनुपम प्रयास और मासूम सवालों के घेरे में खुद को देखपाना इस छोटे से कथ्य की विलक्षण उप्लब्धि है. लेखिका को धन्यवाद

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  5. बिम्बों में कही गयी यह लघुकथा काव्यात्मक है। गहरे संदेश के साथ उत्कृष्ट कथा शिल्प।

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  6. kya hi sahi likha hai .kitni sahi baat phulon ke madhyam se kah di sunder kahani
    saader
    rachana

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  7. बहुत खूब. बहुत मार्मिक. प्रतीकों और बिम्बों के जरिये कम शब्दों में बहुत सारा कह दिया आपने. और बस यही कमाल है. रोजनदारी की ज़िंदगी में हम जिन बातों और मुद्दों को गैरज़रूरी मानकर चलता कर देते हैं, आपने वहीं से कीमती विचार उठाया और प्रेरक तरीके से बयान कर दिया.

    बधाई और शुभकामनाएँ.

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  8. sudha jee aapki laghu katha padi aapne holi ke saath-saath phoolo ke madhyam se bade hi prabhavi dhang se aaj ki maanviya soch par gehra katakchh kiya hai jo iss laghu katha ko prabhavi bana deta hai tatha aapki gehrii soch evam vishay ki pakad se nai pehchaan karata hai meri or se badhai sviikaren

    ashok andrey

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  11. दिल को छू गई ये लघु कथा बहुत-बहुत बधाई...

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  12. एक सार्थक लघुकथा के लिए सुधा जी को और इसे प्रकाशित करने के लिए आपको बधाई.

    रूपसिंह चन्देल

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  13. सुधा जी की लघु कथा जीवन का कडवा सच फूलोँ की महक के सँग कहती , बडी भली लगी

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  14. सहज शब्दों में एक सशक्त लघु कथा लिखने का हुनर 'उपरांत' में देखा जा सकता है। सुधा जी, बधाई स्वीकारें

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  15. पंकज सक्सेना1 अप्रैल 2009 को 8:04 am

    लघुकथा प्रभावी है।

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  16. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  17. सुधा जी बहुत अच्छी लघुकथा पडःअवाने के लिये धन्यवाद।

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  18. Hamesha kee tarha Sudha jee ne ek saarthak Laghu Katha likhi hai. PhooloN ke madhayam se poore aadim samaj par sateek tippni hai ye kahani. Vyangyatamak tone ne kahani ko aur maarmik banaa diya hai.

    Tejendra Sharma
    Katha UK (London)
    aaj kal Delhi mein hooN.

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  19. प्रतीकों और बिम्बों से सजी लघु कथा के रूप में एक सशक्त अभिव्यक्ति

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  20. इस लघु कथा के माध्यम से सुधा जी ने मानव के द्वारा प्राकृतिक संहार एवम् फूलों की कोमल भावनायों को सादे शब्दों में पिरोकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है । सभी उत्सवों,त्योहारों में फूलों द्वारा रंग भरने की बात बहुत सुन्दर लगी।
    एक प्रेरक रचना ।
    शशि पाधा

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