"बधाई हो! घर में लक्ष्मी आई है", कहते हुए नन्हीं सी बिटिया को दादी की गोद में देते हुए नर्स बोली। "हुँह..... क्या खाक बधाई। पहली ही बहू के पहली संतान वो भी लड़की हुई और वो भी सिजेरियन......" कहते हुए उन्होंने मुँह फेर लिया और उस नन्हीं सी जान पर स्नेह की एक बूँद भी बरसाने की जरूरत नहीं समझी प्रीती की सासू माँ ने। जल्द ही अपनी गोद हल्की करते हुए बच्ची को बढ़ा दिया अपने बेटे की गोद में।

रवि को तो जैसे सारा जहाँ मिल गया अपने अंश को अपने सामने पाकर। पिछले नौ महीने कितनी कल्पनाओं के साथ एक-एक पल रोमांच के साथ बिताया था प्रीती और रवि ने। खुशी के आँसू की दो बूँदें टपक पड़ी उस नन्ही सी बिटिया पर।

रचनाकार परिचय:-


आकांक्षा यादव अनेक पुरस्कारों से सम्मानित और एक सुपरिचित रचनाकार हैं।
राजकीय बालिका इंटर कालेज, कानपुर में प्रवक्ता के रूप में कार्यरत आकांक्षा जी की कवितायें कई प्रतिष्ठित काव्य-संकलनों में सम्मिलित हैं।
आपने "क्रांति यज्ञ: 1857 - 1947 की गाथा" पुस्तक में संपादन सहयोग भी किया है।

कुछ दिनों के अंतराल पर अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद जब घर जाने की तैयारी हुई तो प्रीती फूली न समा रही थी। पिछले नौ महीनों से जिस घड़ी की इंतजार वह कर रही थी, आज आ ही गई। अपनी गोद भरी हुई पाकर जब प्रीति ने घर में प्रवेश किया तो मारे खुशी के उसके आँसू बहने लगे। वह इस खुशी के पल को संभालने की कोशिश करने लगी। हँसते-खेलते ग्यारह दिन कैसे बीत गये, पता ही नहीं चला। लेकिन सासू माँ का मुँह टेढ़ा ही बना रहा। प्रीति चाहती थी कि दादी का प्यार उस नन्हीं सी जान को मिले, लेकिन उसकी ऐसी किस्मत कहाँ ?

खैर, जब बारहवें दिन बरही-रस्म की बात आयी तो सासू माँ को जैसे सब कुछ सुनाने का अवसर मिल गया और इतने दिन का गुबार उन्होंने एक पल में ही निकाल लिया...... "कैसी बरही, किसकी बरही, बिटिया ही तो जन्मी है। हमारे यहाँ बिटिया के जन्म पर कोई रस्म-रिवाज नहीं होता.... कौन सी खुशी है जो मैं ढोल बजाऊँ, सबको मिठाई खिलाऊँ.... कितनी बार कहा था जाँच करा लो, लेकिन नहीं माने तुम सब। लो अब भुगतो, मुझे नहीं मनाना कोई रस्म-रिवाज......।

सासू माँ की ऐसी बात सुनकर प्रीति का दिल भर आया। रूँधे हुए गले से बोली, "सासू माँ! आज अगर यह बेटी मेरी गोद में नहीं होती तो कुछ दिन बाद आप ही मुझे बाँझ कहती और हो सकता तो अपने बेटे को दूसरी शादी के लिए भी कहती जो शायद आपको दादी बना सके, लेकिन आज इसी लड़की की वजह से मैं माँ बन सकी हूँ। यह शब्द एक लड़की के जीवन में क्या मायने रखता हैं, यह आप भी अच्छी तरह जानती हैं। आप उस बाँझ के या उस औरत के दर्द को नहीं समझ सकेंगी, जिसका बच्चा या बच्ची पैदा होते ही मर जाते हैं। ये तो ईश्वर की दया है सासू माँ, कि मुझे वह दिन नहीं देखना पड़ा। आपको तो खुश होना चाहिए कि आप दादी बन चुकी हैं, फिर चाहे वह एक लड़की की ही। आप तो खुद ही एक नारी हैं और लड़की के जन्म होने पर ऐसे बोल रही हैं। कम से कम आपके मुँह से ऐसे शब्द नहीं शोभा देते, सासू माँ!" इतना कहते ही इतनी देर से रोके हुए आँसुओं को और नहीं रोक सकी प्रीती।

प्रीती की बातों ने सासू माँ को नयी दृष्टि दी और उन्हें उसनी बातों का मर्म समझ में आ गया था। उन्होंने तुरन्त ही बहू प्रीती की गोद से उस नन्हीं सी बच्ची को गोद में ले लिया और अपनी सम्पूर्ण ममता उस पर न्यौछावर कर उसको आलिंगन में भर लिया।

शायद उन्होंने इस सत्य को स्वीकार लिया कि लड़की भी तो ईश्वर की ही सृष्टि है। जहाँ पर नवरात्र के पर्व पर कुँवारी कन्याओं को खिलाने की लोग तमन्ना पालते हैं, जहाँ दुर्गा, लक्ष्मी, काली इत्यादि देवियों की पूजा होती है, वहाँ हम मनुष्य ये निर्धारण करने वाले कौन होते हैं कि हमें सिर्फ लड़का चाहिए, लड़की नहीं।

23 comments:

  1. माँ के मर्म को समझा पाने में आपकी कहानी सफल रही है....बधाई स्वीकार करें

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  2. भारतीय समाज में औरत ही औरत की शत्रु बनी हुई है। औरत के अन्दर औरत के प्रति सदियों से बैठी इस तरह की नकारात्मक सोच को बदलने की आवश्यकता है। आकांक्षा यादव की यह लघुकथा उसी नकारात्मक सोच पर चोट करते हुए एक सकारात्मक सोच को बल देती है। एक अच्छे लेखक का धर्म भी यही होना चाहिए कि वह अपनी रचना के माध्यम से समाज में पनपी हुई नकारात्मक सोच/धारणा को सकारात्मक ढंग से बदलने का प्रयास करे। एक अच्छी लघुकथा के लिए आकांक्षा जी को बधाई !

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  3. इस मर्म स्पर्शी कहानी के लिए साधुवाद.

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  4. बेहद उम्दा लघुकथा...लघुकथा के बहाने आकांक्षा जी ने एक सच को सामने रखा है.

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  5. समाज की विसंगतियों पर आकांक्षा यादव जी की लेखनी सक्रिय है. इतनी सहज भाषा में आप अपनी रचनाओं को प्रस्तुत कर रही हैं कि बरबस ही उनका प्रिंट-आउट निकलकर फाइल में सुरक्षित रख लेता हूँ. इस बेहतरीन लघुकथा के लिए साधुवाद !!

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  6. एक प्रभावशाली लघुकथा जो पहली ही नजर में ध्यान खींचती है. जहाँ आज लघुकथा के नाम पर कुछ भी लिख देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, वहाँ आकांक्षा जी की यह लघु कथा नए राह खोलती है.

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  8. बंधी बंधाई लकीर पर चलने वाली सामाजिक सोच पर सटीक कुठाराघात करती सफ़ल लघु कथा.

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  9. सुभाष नीरव जी ने इस लघुकथा पर सम्यक टिपण्णी की है. मैं भी सुभाष जी से इत्तेफाक रखता हूँ. एक मार्मिक लघुकथा हेतु आकांक्षा जी को बधाई.

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  10. वाह! अद्भुत लघुकथा. दिल को छूती है.

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  11. वाह! अद्भुत लघुकथा. दिल को छूती है.

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  12. जहाँ पर नवरात्र के पर्व पर कुँवारी कन्याओं को खिलाने की लोग तमन्ना पालते हैं, जहाँ दुर्गा, लक्ष्मी, काली इत्यादि देवियों की पूजा होती है, वहाँ हम मनुष्य ये निर्धारण करने वाले कौन होते हैं कि हमें सिर्फ लड़का चाहिए, लड़की नहीं।
    __________________________________
    बहुत सही बात कही है आपने...बधाई.

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  13. इस लघु कहानी के लिए आकांक्षा जी की जितनी भी तारीफ की जय कम होगी. नारी के दर्द को भला नारी से ज्यादा कौन समझ सकता है. पर इसके लिए कभी-कभी नारी में ही दंद पैदा हो जाता है. कसे हुए शब्दों में बात को संजीदगी से रखती एवं समाज को राह दिखाती एक बेहतरीन कहानी...अनुपम!!

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  15. कम शब्दों में आकांक्षा यादव ने बेहद सारगर्भित बात कही है, यही तो लघुकथा की जान है.आशा है की इससे समाज को भी सीख मिलेगी.

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  16. इस लघुकथा को पढ़कर लगता है की हम भले ही प्रगतिशीलता का कितना भी ढोल पीट लें पर अभी भी हमारी सोच १६-१७ वीं सदी की ही है. आज भी बहुत से परिवारों में बेटी के जन्म पर बरही नहीं मनाई जाती, यह सौभाग्य सिर्फ लड़कों को मिलता है...आखिर क्यों ??....बेहतर होगा हम इस पर सोचें.किसी रचना को मात्र टिपण्णी के बाद भूल जाना सार्थक नहीं लगता, उसमें निहित भावनाओं को समाज की संवेदनाओं से जोड़ने की भी जरुरत है. वाकई आकांक्षा जी इस लघु-कथा के लिए बधाई की पात्र हैं.

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  17. आकांक्षा जी !

    साहित्यशिल्पी मंच का यह सौभाग्य है कि पिछले कुछ समय से मंच की प्रत्येक लेखनी अपने अपने ढंग से सामाजिक समस्याओं विसंगतियों पर कुठार कर रही है.

    अभी पिछली पोस्ट संगीता जी की दहेज समस्या पर थी वही नवरात्र के अवसर पर आपने क्न्या शिशु से जुड़ी इस भयावह समस्या पर सभी का ध्यान सफ़लता पूर्वक खींचा है.

    रचनात्मक दृष्टि से प्रथमतः मुझे लगा कि सशक्त शैली में कोई लम्बी रचना पढ़्ने जा रहा हूं किन्तु पढ़्ते ही दादी जी को बात इतनी शीघ्रता से समझ आ गयी कि कहानी लघु कथा में परिवर्तित हो गयी. कहानी शिल्प के किन्हीं अवयवों का अभाव लगा. किन्तु लघु कथा पर प्रमुखत: संदेश संप्रेषण के अतिरिक्त कुछ और की अपेक्षा करना संभवत: अतिरेक होगा अत: संतोष कर लिया ..

    यदि मेरी जानकारी सही है तो नरबल जैसे आपके बालिका विद्यालय में वर्षों पूर्व उस स्थल को और ऐतिहासिक भूमि को मैने देखा है. उस कन्या विद्यालय (इण्टर कालेज) से निकले अंकुर इन विसंगतियों से मुक्त होंगे ऐसा विश्वास भी है.

    पुन: सामजिक और सामयिक कथा के लिये आभार . शुभकामना.

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  19. माँ का मर्म एक प्रेरणा दायक और सकारात्मक सोच को प्रोत्साहित करती कहानी है.सुभाष नीरव जी मेरे मन की बात अपनी प्रतिक्रिया में कह गए हैं.
    उनकी आभारी हूँ और आपको बधाई देतीं हूँ.

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  20. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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