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विरल आर्य दिल्ली के नाटक जगत में बड़ी तेजी से अपनी पहचाना बना रहे हैं. तंजील थियेटर ग्रुप के नाम से उनका नाट्य ग्रुप है जिसके तहत उनके दो नाटक पिछले दिनों दिल्ली में मंचित हुए एक "हमारी मातृभाषा हिंदी" और दूसरा "प्राण जाए पर राजनीति न जाए". दोनों ही नाटक दिल्ली के नाटक जगत मैं खासे चर्चा का विषय बने. २ सितम्बर १९८४ को आगरा उत्तर प्रदेश में जन्में विरल आर्य बहुआयामी प्रतिभा के धनि है. उन्हें अपने किशोर अवस्था से ही कहानी लेखन में रूचि थी. उनकी एक कहानी पर उनके विद्यार्थी काल में ही एक टेलीफिल्म भी बनी जो दूरदर्शन पर प्रसारित हुई. फिलहाल अपनी स्नातक की पढाए दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरा करने के बाद विरल जी दिल्ली में नाटक जगत मैं अपना योगदान देने मैं जुटे है. पिछले दिनों हमने उनसे विस्तृत बातचीत की. यहाँ प्रस्तुत है उस बातचीत के कुछ अंश:

साहित्य शिल्पी : आप दिल्ली में थियेटर से जुडे है. आज के दौर में थियेटर के सामने क्या चुनौतियाँ आप महसूस करते है?

विरल : आज के दौर में थिएटर को गंभीरता से नहीं लिया जाता वो वक़्त चला गया जब शाहरुख खान, अनुपम खेर, आशुतोष राणा जैसे लोग थिएटर को बड़ी गंभीरता से लिया करते थे! लेकिन आज कल के आर्टिस्ट तो स्टेज पर उतरने से पहले ही स्टार बन जाते हैं !
१) टाइम पर न आना, संवाद याद न होना ये तो आम बात हे पर हद तो तब हो जाती हे जब प्ले वाले दिन भी टाइम पर नहीं आते!
२) आज कल के आर्टिस्टों को मतलब ही नहीं है के हम क्या प्ले कर रहे हैं! अपना रोल खत्म काम ख़त्म! फिर मतलब ही नहीं है कि बेक स्टेज पर भी कुछ काम हो सकते है! ग्रुप को लेकर गंभीर ही नहीं होते!
३) कुछ लोगों द्वारा थिएटर को दुकान बना देने से भी थिएटर की तरफ लोंगो का रुझान कम हुआ है!
४) मीडिया का उभरते ग्रुप्स की तरफ बेरुखी भी खटकती है! भले ही नए ग्रुप पुराने ग्रुप्स से बेहतर हों!
५) थिएटर आमंदनी अगर चवन्नी है तो खर्चा रूपया! अब चवन्नी अपने पास से + चवन्नी की आमंदनी हो जाती है + चवन्नी यहाँ वहां से जुगाड़ करके कर लेते है + चवन्नी का घाटा!
और टीम समझती है के "सर" बहुत कमा रहे है! दरअसल देखा जाये तो आज थिएटर निर्देशक अपने से ज्यादा अपने आर्टिस्टों के लिए काम कर रहे है, लेकिन फिर भी निर्देशकों के प्रति आर्टिस्टों की निष्ठां में कमी आई है! लेकिन मुझे इस से कोई फरक नहीं पड़ता, मैं इस सब को एक चुनौती के तौर पर स्वीकार करता हूँ!

साहित्य शिल्पी : क्या दिल्ली मे आपको अपने नाटको के लिये टिकट खरीद कर देखने वाले दर्शक मिल जाते है...

विरल : जी बिलकुल नहीं, कला के कदरदान दिन पर दिन कम होते जा रहे है! आज लोग सौ रूपए एक बेकार सी मूवी पर मॉल में खर्च कर देंगे पर पचास रूपए थिएटर में नहीं!

साहित्य शिल्पी : थियेटर से जुडे व्यक्ति की आजीविका का प्रश्न बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। आप इस सवाल को कैसे देखते हैं...

विरल : अगर आप थियेटर में आजीविका कमाने के लिए आना चाहते है तो न ही आयें क्योंकि मैं पहले ही कह चूका हूँ "आमंदनी चवन्नी तो खर्चा रूपया"! थियेटर आप के अन्दर की कलाकार की कला की भूख को खत्म कर सकता है पर पेट की नहीं!

साहित्य शिल्पी : दो तरह के थियेटर है एक तो वह जिन्होंने इसे शौक के कारण चला रखा है और दूसरा प्रोफैशनल चलाते है. आप दोनो को गुणवत्ता की दृष्टि से क्या क्या टिप्पणी देना चाहेंगे?

Photobucket कवि परिचय:-

योगेश समदर्शी का जन्म १ जुलाई १९७४ को हुआ।
बारहवी कक्षा की पढाई के बाद आजादी बचाओ आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण औपचारिक शिक्षा बींच में ही छोड दी. आपकी रचनायें अब तक कई समाचार पत्र और पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।

आपकी पुस्तक “आई मुझको याद गाँव की” शीघ्र प्रकाशित होगी।

विरल : जिन्होंने इसे शौक के तौर पर चला रखा है उनके काम में प्रोफेशन नज़र नहीं आता और जिन्होंने इसे प्रोफेशन के तौर पर चला रखा है उनके काम में कला की भूख नज़र नहीं आती! इस लिए मेरे विचार से इन दोनों का परफेक्ट कॉम्बिनेशन ही गुणवत्ता की दृष्टि पर खरा उतर सकता है! इस लिए थियेटर अगर ऐसे प्रोफैशनल चलायें जिन्हें कला का शौक है तो कुछ बात बने!

साहित्य शिल्पी : थियेटर संकट मे है, थियेटर मर रहा है. क्या आप इस बात से सहमत हैं?

विरल : जी बिलकूल नहीं! थियेटर कलाकार की आत्मा है और आत्मा कभी नहीं मरती!

साहित्य शिल्पी : आम तौर पर थियेटर से जुडने वाले नये कलाकार इसे एक फिल्मों मे जाने के माध्यम के रूप में लेते है. आप क्या मानते है?

विरल : हर बड़े से बड़े सफ़र की शुरआत पहले कदम से होती है! मैं फिल्मों को एक सफ़र और थियेटर को उस सफ़र का पहला कदम मानता हूँ!

साहित्य शिल्पी : आम जनता से जुडकर थियेटर क्या कर सकता है? क्या आम जनता को इससे जोडा जाना जरूरी नहीं?

विरल : जब तक आम जनता थियेटर से नहीं जुड़ेगी तब तक थियेटर आगे नहीं बढेगा! क्योंकि फिल्म एक कल्पना है और थियेटर एक सच्चाई और आम जनता को सच्चाई के जितने करीब रखा जाये उतना ही अच्छा है!

साहित्य शिल्पी : आपने बहुत अच्छे अभियान की तरह से राष्ट्र भाषा हिंदी पर नाटक खेला. इस नाटक के बारे में कुछ बताएं.

विरल : इस नाटक के बारे में बता कर में इस नाटक की आत्मा को ख़त्म नहीं करना चाहता! उम्मीद है कि ये नाटक फिर होगा और अगर आप आ कर महसूस करें हमारी मातृभाषा हिंदी के दर्द को तो बाद ही कुछ और होगी!

साहित्य शिल्पी : क्या इस नाटक से आप कोई आंदोलन चलाने की सोचते है या फिर मंच पर मंचित हो गया; कवरेज मिल गई; नाटक मंडली का काम खतम...

विरल : मेरी योजना इस नाटक को भारत के लगभग सभी बड़े शहरो में मंचित करने की है, लेकिन आर्थिक सहयोग न होने के कारण ये योजना अभी अधर में लटकी है! वेसे मैंने "भारतीय हिंदी निदेशालय से इस विषय में बात की थी लेकिन उनका कहना था कि दिल्ली जैसे शहरो में हिंदी की क्या जरूरत है! खैर अब मैं इसे अपने लेवल पर करने की सोच रहा हूँ और उम्मीद है कि कर पाउँगा!

साहित्य शिल्पी : भविष्य की क्या योजना है...

विरल : भविष्य में मेरी योजना पानी की राजनीति पर "Water.com" और पूर्ण स्वराज दिवस पर "मोहे रंग दे तिरंगा" नाटक मंचित करने की है! "Water.com" को मै एक टेलीफिल्म और Documentary बनाने की भी सोच रहा हूँ! अगर टीम साथ दे तो ये भी कर लेंगे!

साहित्य शिल्पी : नाटक के क्षेत्र मे रह क्या अफसोस रहता है, क्या खुशी महसूस करते हो और कब मन मसोस कर रह जाते हो?

विरल : "अफसोस" तब होता है जब टीम साथ नहीं देती! लगता है की गलती कर दी इनको टीम में लेकर और उससे भी बड़ी गलती कर दी आसानी से रोल देकर, क्योंकि जितने भी पुराने ग्रुप है वो न तो आसानी से रोल देते हैं और न ही एंट्री!
"ख़ुशी" तब होती है जब टीम के ही 1-2 लोग उम्मीद से ज्यादा साथ देते हैं और उन्ही की मेहनत की वजह से नाटक में जान आ जाती है!
"मन मसोस" कर जब रह जाता हूँ जब प्ले से चार दिन पहले कोई रिहर्सल पर नहीं आता और उससे कुछ कहो तो Attitude दिखाता है!

साहित्य शिल्पी : हमारे पाठकों मे से बहुत से लोग नाटक मे अभिनय करना चाह्ते है आप ऐसे लोगों को क्या कहना चाहेंगे...

विरल : अगर आप में थिएटर के प्रति लगन है तो तुंरत ही कोई ऐसा थिएटर ग्रुप Join कर ले जो Activity में हो, वरना अपना और दूसरो का टाइम ख़राब न करें सीधे मुंबई जाएँ!

7 comments:

  1. "अगर आप थियेटर में आजीविका कमाने के लिए आना चाहते है तो न ही आयें "....तो फिर कहाँ जाएँ...घर वाले हाथ खड़े कर देते हैं..

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  2. स्पष्ट और सीधी बात. आज हमारे सामजिक मूल्यों में रंगमंच सचमुच विलुप्त होता जा रहा है मात्र मुम्बई दिल्ली जैसे इक्का दुक्का महानगरों को छोड़्कर लोक कला से जुड़ी कई विधायें अब लुप्तावस्था की ओर बढ़ रही हैं - इस संबन्ध में जागरूकता लाने के लिये मीडिया के योगदान की बहुत संभावना हो सकती हैं.

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  3. कला प्रदर्शन एंव भाव अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम "नाटक" आज जिस दौर से गुजर रहा है वह निश्चिय ही बहुत दुखद है..

    सार्थक लेख के लिये योगेश जी का आभार

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  4. थियेटर पर लोगों की खो गयी अभिरुचि जगानी ही होगी। योगेश जी का धन्यवाद।

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  5. एक बेकार सी मूवी पर लोग 100 रुपये खर्च कर देते हैं... थियेटर के लिए 50 भी नहीं... बल्कि थियेटर जाने को युवा तो बोरिंग सबजेक्ट के तौर पर लेते हैं... हालांकि कुछ जोशीले युवाओं की वजह से ही थियेटर जिंदा है... पर इस दिशा में व्यावसायिकता खोजी जा सकती है...

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  6. mitra theatre ke logo ko theaere ke log hi todte hai mahatwakancchaye iski jimmedar hai phir bat aati hai ki kab tak actor strruggle kare nirdeshak ko glamour milta hai par actor ke bare me bhagawan hi malik hai
    abhi tak aap theatre actor ke 10 nam batana kathin hoga filmi duniya ko chhodakar par nirdeshak ko sab jante hai yahi karan hai team bikharne ka

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  7. जनजीवन दूर होता जा रहा है कला से । रंगकर्मी हैं रंगमंच है ....प्रेक्षागृह खाली है ....क्योंकि समाज संवेदनहीन हो गया है । आज दर्शक खोजना एक बड़े संघर्ष का काम है । संचार सुविधाओं की सहज उपलब्धि ने बाकी कसर भी पूरी कर दी । बच्चे-बूढ़े सब पोर्न देख रहे हैं ...थियेटर के लिये वक्त नहीं है लोगों के पास । कल बस्तर के एक गाँव में चार लड़के अपने ही गाँव की एक लड़की को उठाकर दूर एक मंदिर में ले गये । मन्दिर प्रांगण में सबने उसके साथ यौनदुष्कर्म किया । संवेदना कहाँ है ? पूरे देश में समाज मर रहा है ...इस समाज में से दर्शक कहाँ मिलेंगे ? कला और साहित्य के रचयिता ही स्वयं दर्शक और पाठक हैं ।

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