........साहित्य शिल्पी एक पूर्ण वेबसाईट में परिवर्तित हो चूका है। अब हमारी रचनाये यहाँ पढ़े... - www.sahityashilpi.in तथा कृपया हमें अपनी प्रतिक्रिया एवं सुझावों से अवश्य अवगत करायें जिससे हम आवश्यक सुधार कर सकें.....

बुधवार, १५ अप्रैल २००९

परिंदा [कविता] - मुकेश पोपली

Photobucket

काश! मैं कोई परिंदा होता
बहुत सी शाखाओं पर
बैठता
इतराता
गीत गाता
रिमझिम बरसात में
पंख भिगोता
पिहू-पिहू करता
बच्‍चों के हाथ न आता
फर्र से उड़ जाता
नदिया-नाले पार करता
पहाड़ों पर उड़ान भरता
ढूंढ ही लेता आश्रय अपना
कर लेता साकार
प्रकृति पाने का सपना।

रचनाकार परिचय:-

11 मार्च 1959 को (बीकानेर, राजस्‍थान) में जन्मे मुकेश पोपली ने एम.कॉम., एम.ए. (हिंदी) और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्‍नातकोत्‍तर किया है और वर्तमान में भारतीय स्‍टेट बैंक, दिल्‍ली में राजभाषा अधिकारी के पद पर कार्यरत है|

अनेक पुरुस्कारों से सम्मानित मुकेश जी की रचनायें कई प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं| इनका एक कहानी संग्रह "कहीं ज़रा सा..." भी प्रकाशित है। आकाशवाणी, बीकानेर से भी इनकी कई रचनाओं का प्राय: प्रसारण होता रहा है।
ये अंतर्जाल पर भी सक्रिय हैं और अपना एक ब्लाग "स्वरांगन" चलाते हैं।

दुनिया मेरी होती निराली
नहीं कोई देता
धर्म की गाली
अजान कर लेता
कहीं भी
किसी दर माथा
टिका देता
श्रद्धा रखता
मन में जीवित
मजहब के ताने
कपूर बना देता
हज करने की इच्‍छा है
मगर वो
मेरा देश नहीं है
गुरुद्वारे में सेवा
के लिए
सिर पर
पगड़ी
केश नहीं है।

उस दिन भी तो जलाई गई थी
एक मोटर-गाड़ी
पति और बच्‍चों के शव
देखती रह गई थी अबला बेचारी
इंसानी जुनून कैसे कोई माने
यह तो थी
धर्म के नाम पर
दानवी चिंगारी
आग की ताकत से अनजान
तमाशा
देख झूम रही थी
भीड़ सा॥

काश।! उस भीड़ में से
दो-चार परिंदे बन जाते
पहुंच जाते बादलों के पार
सारे नभ से जल भर लाते
मगर वहां तो सब इंसान(?) थे
डरपोक
कायर
उनमें कहां परिंदों जैसा प्‍यार निर्मल
उनमें कहां वो प्रेम का बहता जल
वो तो एक दूसरे को छलना जानते हैं
नहीं हो पाता और कुछ
मासूमियत का कत्‍ल कर डालते हैं।

आएगा कहीं दूर आकाश से
जब कोई परिंदा मुझसे मिलने
पूछूंगा
मानवीय जमीन का पता
जानता हूं
नहीं बता पाएगा
प्रतीक्षा करुंगा
अगले जनम की
फिर बनकर आऊंगा
एक परिंदा
शाखाओं पर फुदकूंगा
इतराऊंगा
मुस्‍कराऊंगा
इस दुनिया
के भविष्‍य को
प्‍यार से भरे
मीठे गीत सुनाऊंगा।

14 comments:

श्यामल सुमन २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

बहुत खूब। मुन्नवर राणा साहब कहते हैं कि-

यह देखकर पतंगे भी हैरान हो गयीं।
अब तो छतें भी हिन्दु मुसलमान हो गयीं।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com:

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

परिन्दें का उपमान ले कर आपने बहुत बढिया रचना गढी है..सचमुच धर्म ही इन्सान न हो कर हिन्दू या मुस्लमान बनाता है..
आपकी रचना पढ कर एक गाना याद आ गया

मालिक ने तो हर इन्सान को इन्सान बनाया
हमने उसे हिन्दू या मुस्लमान बनाया
मालिक ने तो बक्शी थी हमें एक ही धरती
हमनें कहीं भारत कहीं ईरान बसाया..

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

प्रतीक्षा करुंगा
अगले जनम की
फिर बनकर आऊंगा
एक परिंदा
शाखाओं पर फुदकूंगा
इतराऊंगा
मुस्‍कराऊंगा
इस दुनिया
के भविष्‍य को
प्‍यार से भरे
मीठे गीत सुनाऊंगा।

सुन्दर अभिव्यक्ति।

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

साम्प्रदायिकता पर प्रहार करती अच्छी रचना है।

nitesh २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

आपकी इच्छा पूरी हो।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

बहुत अच्छी कविता है, बधाई।

नंदन २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

कविता आज के यथार्थ से उद्वेलित भावुक कवि की मनोभावना को भली प्रकार प्रस्तुत कर रही है।

दिगम्बर नासवा २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

परिंदों की इर्द गिर्द ताने बाने बुनती हुयी सुन्दर रचना...........
बहूत कुछ कह गयी है ये कविता

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

Nice Poem.

Alok Kataria

rachana २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

sunder bimb ke sath umda kavita
saader
rachana

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

सही बिम्ब लिया है आपनें।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

सशक्त-सामयिक रचना

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

काश हम सब परिंदे हो पाते, हम इनसान भी कहाँ रह गये? सशक्त कविता।

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

बहुत सुंदर ..... भावप्रवण रचना

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:-
श्रद्धांजलि:-
साक्षात्कार:-
विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-
संस्मरण:-
वीडियो:-
बाल साहित्य:-
पुस्तक चर्चा:-
अनुवाद:-

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP