‘बडे बूढों की सेवा और आशीर्वचनों से ही सारी खुशियां प्राप्‍त की जा सकती हैं’, बचपन में सुनी हुई ये बातें उसके मस्तिष्‍क से कभी अलग नहीं हो पायी थी और उसने अपना जीवन इन आदर्शों को मानने में ही लगा दिया था। सास और ससुर को खुश रखने के प्रयास में आजतक घरगृहस्‍थी में उन्‍हीं के द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करती आ रही थी। उनके विचारों और अनुभवों के साथ सारे कार्यों को मन मुताबिक समेटने तथा बच्‍चों के कर्तब्‍यों के बीच तालमेल बैठाने में आए दिन उसे काफी कठिनाइयों का सामना भी करना पडता था, पर वह कभी भी इस असुविधा से विचलित नहीं हुई थी। पांच वर्ष पहले ही मांजी का देहांत हो गया था। खाट पर बैठे पिताजी अपनी कमजोर शारिरिक हालत के बावजूद उन्‍हें अपनी सलाह की घूंटी अक्‍सर पिलाते ही रहते थे । मुकुल पिताजी के निर्णय को ही सर्वोपरि समझते। कितनी ही बार ससुरजी के निर्णय से परेशानी मोल ले चुके मुकुल की पितृभक्ति में कोई कमी न देख उसे ताज्‍जुब होता।

आज भी अपने घर की परंपरा एवं अपने तीस वर्षों के पुराने रूटीन के अनुसार ही वह सुबह उठकर नहा धोकर पूजा पाठ कर रसोई में आ गयी। नाश्‍ते में क्‍या बनाए, सोंच ही रही थी कि तुषार की आवाज आयी ‘नाश्‍ते में क्‍या बना रही हो मम्‍मी’ ‘मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा, तुम ही बताओ क्‍या बनाउं’ उसने अपना बोझ तुषार पर डालते हुए कहा। नाश्‍ते में क्‍या बनें, यह फैसला करना मां के लिए जितना कठिन था, बेटे के लिए उतना ही आसान। ‘मम्‍मी, बहुत दिन से तुम्‍हारे हाथों के बने आलू के परांठे नहीं खाए, आज वही बना लो’ उसने आग्रह से कहा। ‘बस, इतनी छोटी सी फरमाइश’ आज तो उसे भी आराम मिल गया था, वरना तीन दिनों से जब से इंगलैंड से वापस आया है, दिनभर उसे किचन में ही रहना पड रहा है। ‘आज ये बनाओ, आज वो’, मुकुल भी तो खाने पीने के इतने ही शौकीन हैं, हमेशा बेटे के ही पक्ष में रहेंगे, ‘बना दो ना, दो वर्षों बाद तो आया है’, वह खुद भी तो यही चाहती है, क्‍या क्‍या बनाकर खिलाए बेटे को। एक महीने बाद ही तो ज्‍वाइनिंग है, नौकरी पर चला जाएगा, तो खुद भी कुछ बनाकर खाने की इच्‍छा नहीं होगी।

आलू के परांठे बनाने में व्‍यस्‍त उसे वह दिन याद आया, जब मेडिकल में प्रवेश के लिए तुषार का चयन हो गया था। इस सफलता ने घर परिवार के सभी लोगों के आंख के तारे तुषार के मूल्‍य को और भी बढा दिया था। वैसे तो वह बपचन से ही पढाई में अव्‍वल रहा करता था, पर इस कठिन प्रतियोगिता में खुद को निकाल पाएगा, वह सशंकित रहा करती थी , पर बेटे ने मां की इस शंका को मिटा दिया था। तुषार के मेडिकल की पढाई के दौरान नीमा के कारण उसका मन थोडा बहल भी जाता था, पर जब उसकी शादी हो गयी और मांजी का भी देहांत हो गया ,कई वर्ष काफी नीरसता में व्‍यतीत हुए। मेडिकल की पढाई पूरी होने के बाद मुकुल ने तुषार को उच्‍चस्‍तरीय पढाई के लिए इंगलैंड भेज दिया था। दरअसल मुकुल को इंगलैंड जाकर पढाई करने का बडा शौक रहा था, पर घर के आर्थिक हालात उनकी महत्‍वाकांक्षा को पूरी न कर सके थे। इसलिए उन्‍होने तुषार को इंगलैंड भेजकर अपने अधूरे सपने को पूरा किया था। तुषार ने न केवल सफलतापूर्वक अपनी पढाई ही पूरी की, वहीं नौकरी भी ज्‍वाइन कर ली थी। इतना होनहार पुत्र हर माता पिता को मिल पाता है क्‍या? इंगलैंड में व्‍यतीत किए हुए दो वर्ष जहां उसके हाव भाव और चाल ढाल के विदेशी अंदाज में नजर आते, वहीं भारतीय सभ्‍यता और संस्‍कृति उसकी रूचि में परिलक्षित होकर उसके व्‍यक्तित्‍व को चार चांद लगाती थी।

‘नाश्‍ता बन गया, मम्‍मी? मुझे बाहर जाना है’ तुषार की आवाज से ही उसकी तंद्रा भंग हुई। अपने पुराने दोस्‍तों से मिलने जुलने और पुरानी यादों को ताजा करने का सिलसिला अभी जारी था। उसने काम करने की अपनी गति को तेज किया और शीघ्र ही सबका नाश्‍ता लेकर डायनिंग टेबल पर आ गयी। ‘खाने में कढी चावल बना लो मम्‍मी’ दिनभर खाने की फरमाइश करता तुषार सबकी बातचीत की श्रृंखला को तोडता हुआ बोला। कोई भी मां बेटे की इच्‍छा को नजरअंदाज कर सकती है क्‍या, मुकुल और तुषार को विदा कर वह पूरी तन्‍मयता से काम में जुट गयी।

जबसे तुषार इंगलैंड गया है, इसके रिश्‍ते के लिए प्रस्‍ताव आने शुरू हो गए हैं। कहीं बुआजी के ननद की पोती है, तो कहीं मासीजी के भतीजे की लडकी, कहीं चाचाजी के साले की लडकी है तो कहीं मामाजी के दोस्‍त की भतीजी। हमेशा ही तुषार की अनुपस्थिति का बहाना बनाकर वे लोग सबको टालते आए हैं, कह दिया है, तुषार के इंडिया लौटने पर ही आपको खबर की जाएगी। जबसे इसके आने की खबर मिली है, लोग पीछे ही पड गए हैं, इस होनहार लडके के। लडकी भी तो इसके साथ इंगलैंड जाएगी, शानोशौकत और ऐश मौज की जिंदगी जिएगी। ससुर जी भी कहां पीछे रहने वाले हैं। इस होनहार लडके पर उन्‍होने पूरा भरोसा कर रखा है। उन्‍होने ऐलान कर दिया है, जो उनकी सब मांगे पूरी करेगा, उसी की लडकी से तुषार की शादी होगी। ‘लडकी की अपनी योग्‍यता हो न हो’ तुषार तो दादाजी के इस निर्णय से घबडा ही गया था’ ‘नहीं पोते, लडकी तो पढी लिखी और खूबसूरत होगी ही’ दादाजी ने गर्व से सीना तानकर कहा था। वह और मुकुल हमेशा की तरह कुछ नहीं कह पाए थे।

दो दिन पहले ही तो बुआजी के एक रिश्‍तेदार कामेश्‍वर सिंह जी अपनी पुत्री के तुषार के साथ रिश्‍ते की बात लेकर आए थे। बडे सरकारी अधिकारी थे वे, एक लडके और एक ही लडकी के पिता। उन्‍होने अपने बच्‍चों को विशेष देख रेख के साथ काण्‍वेन्‍ट में पढाया था। अभी दोनो ही बच्‍चे बी एच यू में थे। लडका पत्रकारिता और लडकी अंग्रेजी साहित्‍य में स्‍नातकोत्‍तर की पढाई कर रहें थे। लडकी की फोटो देखते ही वह चौंक पडी थी। दो वर्ष पहले जब तुषार मेडिकल की पढाई पूरी करके यहां आया था और वे दोनो बुआजी के यहां विवाह में गए थे तो वह लडकी भी उस विवाह में आयी हुई थी। दुबली पतली, बहुत सुंदर नहीं, पर आकर्षक व्‍यक्तित्‍व वाली, मिलनसार और घरेलू किस्‍म की वह लडकी अपने व्‍यवहार के कारण पूरी शादी में छायी हुई थी। चाहे दुल्‍हन का मेकअप हो या रसोई की व्‍यवस्‍था, मेहमानों का स्‍वागत या फिर रस्‍म अदायगी, हर वक्‍त कार्य करने को तैयार मिलती। उसकी कई बातों पर खुश होकर उसने तुषार को भी तालियां बजाते पाया था। तुषार को आज भी वह लडकी याद है, तभी तो फोटो देखते ही वह उसे पहचान गया। ‘अरे यह तो वही लडकी है शिल्‍पा, जो बुआजी के यहां शादी में आयी हुई थी’ ‘तुझे यह लडकी पसंद है’ उसने तुषार की इच्‍छा जाननी चाही। ‘वह लडकी किसे पसंद नहीं आएगी मां, स्‍मार्टनेस के साथ ही साथ गुण ,ज्ञान, सरलता और व्‍यवहार कुशलता, किसी भी चीज की तो कमी नहीं उसमें। आखिर मुझे और क्‍या चाहिए‘ तुषार शायद मां से अपनी भावनाएं नहीं छिपाना चाहता था। उसे भी बेटे की खुशी से बढकर और किसी प्रकार की इच्‍छा नहीं थी। वह कामेश्‍वर जी के यहां उसका वि‍वाह करने को तैयार थी, पर ससुर जी कहां माननेवाले थे। उन्‍हें सपाट शब्‍दों में उनसे लेन देन की बात करने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई थी। ‘मैं एक ईमानदार अफसर हूं। मैने कभी रिश्‍वत नहीं ली। मासिक तनख्‍वाह में ही बच्‍चों को अच्‍छी शिक्षा देकर अच्‍छा मानसिक स्‍तर देकर उन्‍हें भी अपने समान देश का अच्‍छा नागरिक बनाया है। मैं अपनी बेटी का विवाह अच्‍छी तरह करूंगा, आखिर मेरे भी तो सपने हैं, इच्‍छाएं हैं, अरमान हैं।‘ उन्‍होने सरलता से कहा था। पर ससुरजी को इन संकेतों को समझने की कोई दिलचस्‍पी नहीं थी। उन्‍होने तो अपनी बीस लाख की मांग सामने रख दी थी। उन्‍होने वापस लौटने में ही अपनी खैरियत समझी और हमलोग चाहकर भी कुछ न बोल सके। यह पहला किस्‍सा नहीं था। रोज एक दो लोग आते और बाबूजी की मांग के सामने सर झुकाकर चल देते।

पापाजी यह पहली गलती नहीं कर रहे थे। मुकुल ने भी जब मेडिकल पास कर नौकरी करना आरंभ किया था, उनके लिए एक से बढकर एक रिश्‍ते आने आरंभ हो गए थे। अच्‍छे पदों पर आसीन पिताओं की सुंदर उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त कन्‍याएं, किसी प्रकार की नौकरी करती या फिर कोई विशेष प्रकार की ट्रेनिंग करती हुई, पर पापाजी को दिलचस्‍पी उन अभिभावकों में थी, जिसके पास शादी करने के लिए एक लाख रूपए हों। तीस साल पहले एक लाख रूपयों का खासा महत्‍व था, अच्‍छी अच्‍छी नौकरी करनेवालों की भी तनख्‍वाह कम हुआ करती थी। जीने का स्‍तर अच्‍छा, बडे परिवार, सब कुछ खरीदकर खाना पीना, सबको पढाना लिखाना, इतना बचत कर पाना आसान न था। रिश्‍ते के लिए जो भी आते, मुंह लटकाकर वापस चले जाते, तीन चार वर्षों में वे कहीं भी बात पक्‍की न कर सकें। अंत में उनके पास आनेवाले अभिभावकों की संख्‍या घटती हुई बहुत कम हो गयी।

इधर मायके में उसके विवाह के लिए लडकों की खोज आरंभ हो गयी थी। उसका मायका शहर से 25 या 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक कस्‍बा था। शहर से दूरी के बावजूद काफी चहल पहल का इलाका, पिताजी ने पढाई लिखाई कर गांव में ही व्‍यवसाय आरंभ किया था। घर में खेती बारी थी, गाय बैल थे, दुकान थे, आटे पीसने वाली चक्‍की थी और भाडे पर चलाने के लिए एक गाडी भी। यूं तो हर प्रकार के कार्य के लिए नौकर चाकर की व्‍यवस्‍था थी, फिर भी घर के हर सदस्‍यों को किसी न किसी प्रकार के कार्य के लिए उलझे ही रहना पडता था। इसके बावजूद मेधावी व्‍यक्तित्‍व होने के कारण उन चारो भाई बहनों की पढाई लिखाई अच्‍छी तरह हो रही थी। मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्‍तीर्ण करके उन्‍होने गांववालों को चकित ही कर दिया था। आगे की पढाई के लिए गांव के ही कुछ पढे लिखे लोगों ने एक कालेज खोल रखा था, फंड की कमी, कमरे की दिक्‍कत, अच्‍छे शिक्षकों का अभाव आदि अनेक समस्‍याओं के बावजूद वह कालेज बडी संख्‍या में बोर्ड से उत्‍तीर्ण हुए विद्यार्थियों की वजह से घिसटता चल रहा था। उस कालेज में नाममात्र के लिए दाखिला लेकर बच्‍चों को अपनी पढाई खुद ही करनी पडती थी। मां पिताजी की महत्‍वाकांक्षा, उसकी प्रतिभा एवं मेहनत से उसे स्‍नातक की डिग्री मिल ही गयी थी। दादा जी के बहुत आग्रह करने पर पिताजी रिश्‍ते के लिए मुकुल के घर आ गए थे। मुकुल के पिताजी को उसकी फोटो, पढाई खानदान, सबकुछ पसंद आ गया था, सिर्फ एक लाख रूपए की मांग पूरी कर उसके पिताजी उसे उस घर की बहू बना सकते थे। पिताजी ने सोंचने के लिए एक सप्‍ताह का वक्‍त लिया था। उसके मायके का वह एक सप्‍ताह बहुत ही जोड तोड वाला रहा। आखिर एक लाख रूपए की व्‍यवस्‍था किस प्रकार की जाए? पर मजबूत पूंजी वाले परिवार में विशेष दिक्‍कत नहीं हुई थी। मां ने अपनी इकलौती बेटी के विवाह के लिए अपनी शादी के गहनों का बलिदान कर दिया था। एक अच्‍छी फसल देनेवाली खेत भी बिक गयी थी। कुछ पैसे बाजार से कर्ज भी लिए गए थे। पैसों की व्‍यवस्‍था होते ही बडे आराम से उसका शगुन, रोक और विवाह की तिथि का निर्णय हो गया था। उसके बाद तैयारी आरंभ हुई, पूरे गांव को खिलाने पिलाने, गाजे बाजे, विवाह मंडप और जनवासे, उसकी शादी में कोई कमी नहीं रह गयी थी। एक व्‍यवसायी परिवार डाक्‍टर दामाद के स्‍वागत के लिए खासा उत्‍साहित था। उसके और उसके बरातियों के स्‍वागत में कोई कसर छोडना नहीं चाहता था। बहुत जल्‍द ही सखियों की छेड छाड और परिवारवालों के प्‍यार दुलार को छोडकर वह बडे बुजुर्गों के आशीर्वचनों और ननदों जेठानियों के हंसी ठिठोली में शामिल हो गयी थी। ससुराल में सबलोग उससे काफी खुश थे, खुश भी भला क्‍यों न हों, सुंदरता, सुघडता, मृदु व्‍यवहार और कर्तब्‍य पालन से उसने सबका दिल जो जीत लिया था। मुकुल को तो अब सारी दुनियां ही खूबसूरत दिखायी देने लगी थी।

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-


संगीता पुरी का जन्म 19 दिसम्‍बर 1963 को झारखंड के बोकारो जिला अंतर्गत ग्राम - पेटरवार में हुआ। रांची विश्‍वविद्यालय से अर्थशास्‍त्र में 1984 में स्‍नातकोत्‍तर की डिग्री ली। 

उसके बाद झुकाव अपने पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा विकसित की गयी ज्‍योतिष की एक नई शाखा गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की ओर हुआ और सब कुछ छोडकर इसी के अध्‍ययन मनन में अपना जीवन समर्पित कर दिया। गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर आधारित अपना साफ्टवेयर भी वे बना चुकी हैं। 

सितम्‍बर 2007 से ही ज्‍योतिष पर आधारित अपने अनुभवों के साथ ब्‍लागिंग की दुनिया में हैं। अनेक पत्र पत्रिकाओं के लिए लेखन करती आ रही हैं। ज्‍योतिष पर आधारित एक पुस्‍तक 'गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति: ग्रहों का प्रभाव' 1996 में प्रकाशित हो चुकी है।

विवाह के दूसरे ही दिन उसने मुकुल के साथ अपनी मधुर मिलन की स्‍मृति को हमेशा ताजा रखने के लिए आम का एक वृक्ष लगाया था। उसकी गृहस्‍थी और दाम्‍पत्‍य जीवन का प्रतीक आम का वह वृक्ष उसे जान से प्‍यारा था, तभी तो वह हमेशा उसकी देख रेख करती। समय पर उसे पानी और खाद देती। धीरे धीरे दो वर्षों में वह पेड उसके दाम्‍पत्‍य प्रेम की तरह ही पूर्ण रूप से पल्‍लवित हो गया था। सासूजी की इच्‍छा का आदर करते हुए उसने दो वर्ष घर के अंदर पर्दे में ही व्‍यतीत कर दिए थे। उसके बाद मुकुल के साथ अक्‍सर ही यत्र तत्र जाने लगी थी । जब भी वह मुकुल के सहकर्मियों और उनकी पत्नियों से मिलती, उसे अपने अंदर किसी कमजोरी का अहसास होता। उनकी बातों और विचारों का स्‍तर काफी उंचा था। उनके मध्‍य सामाजिक, राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय घटनाओं की चर्चाएं होती , जो उसकी समझ से परे होतीं , वह चुपचाप सुना करती। उसके यहां तो घर बार, खेती बारी, व्‍यवसाय में सब उलझे होते थें, इन सब बातों की किन्‍हे फुर्सत थी, मुकुल को अब इस बात का बुरा लगने लगा था कि उसने गांव के एक व्‍यवसायी परिवार में विवाह क्‍यों की। इस बात पर मुकुल खरी खोटी भी सुना देते तो वह चुप्‍पी साधे सुनती रहती। एक दिन वैसे ही उदास बरामदे पर बैठी थी कि उसकी नजर अपने द्वारा लगाए गए आम के उस पेड पर गयी। किसी जानवर ने उसके सारे पत्‍तों को चट कर डाला था। अभी कुछ दिनों से ही तो आम का वह पेड अपने घेरे को लांघकर उपर आया था। इतने दिनों से घेरे में सुरक्षित आम के पेड की दुनिया को देखने की एक कोशिश ने उसे ठूंठ बना दिया था, बिल्‍कुल उसके दाम्‍पत्‍य की तरह। उसकी देख रेख से बची ठूंठ से फिर पत्तियां निकलती और फिर वे जानवरों का भोजन बनती। न जाने यह क्रम कितनी ही बार चलता रहा था। पर इस वृक्ष की जीने की जीतोड कोशिश उसके उदास और नीरस जीवन में उत्‍साह का संचार करती, जिससे उसे जीने की प्रेरणा मिलती। अपने स्‍थायित्‍व को सुरक्षित रखने के लिए उसने अपने मानसिक स्‍तर को बढाना आरंभ कर दिया था, वह नियमपूर्वक समाचार सुनने लगी थी, पत्र पत्रिकाएं पढने लगी थी अपने रहन सहन बोल चाल को सुधार लिया था। कालांतर में दोनो बच्‍चे तुषार और नीमा ने जन्‍म लेकर उसे काफी व्‍यस्‍त बना दिया था। बच्‍चों को पढाने लिखाने के क्रम में भी उसने काफी कुछ सीखा था और अपने व्‍यक्तित्‍व को प्रभावशाली बना लिया था। और फिर धीरे धीरे मुकुल भी बिल्‍कुल सामान्‍य हो गए थे, उसे कामयाबी मिल गयी थी। फिर उस वृक्ष के साथ ही साथ उसकी गृहस्‍थी और दाम्‍पत्‍य ने प्रौढावस्‍था में कदम रख दिया था। दोनो को ही विनाश का कोई भय नहीं रह गया था। इन सब बातों के कितने वर्ष व्‍यतीत हो गए।

इंगलैंड गए भी तुषार को दो वर्ष हो गए। कहा करता था, पढाई पूरी करके वापस लौट आएगा, पर वहां की चकाचौंध जीवनशैली, पैसा, प्रतिष्‍ठा और भविष्‍य के प्रति निश्चिंति, किसी को इतनी जल्‍दी भारत वापस लौटने दे सकती है क्‍या? वह तो मुकुल को ही रिटायरमेंट लेकर इंगलैंड जाने को कह रहा है। पर मुकुल कहां राजी हैं ’बेटे , तुम अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीओ, मैं अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीउंगा,तुम्‍हारी शादी करना मेरा अंतिम फर्ज है और इसे इसी महीनें पूरा करना है। फिर तुम वापस चले जाना, जब हमलोग थकहार जाएंगे, तुम अपनी जिम्‍मेदारी निभाना’ मुकुल का कहना उसे भी सही ही लगता है।

खाना तैयार हो गया था। मुकुल और तुषार कोई भी अभी तक नहीं पहुंचे थे। वह रसोई से निकलकर कमरे में बैठी ही थी कि दरवाजे पर दस्‍तक हुई। ‘मुकुलजी हैं’ आगंतुक ने पूछा। ‘नहीं, पर आपका परिचय’ वह तो समझ ही गयी थी कि ये रिश्‍ते के लिए ही आए होंगे। ‘मेरा नाम दिवाकर सिंह है। मुझे सोनपुर के रविशंकर ने भेजा है। अपनी लडकी की शादी के लिए। सुना है आपका लडका इंगलैंड से आया हुआ है।‘ उन्‍होने अविराम कहना आरंभ किया। ‘हां, हां, आइए, बैठिए’ उसने उन्‍हें ड्राइंग रूम में बैठा दिया। गर्मी काफी थी, इसलिए ठंडा भी भेज दिया। घर में मात्र ससुर जी ही थे, मजबूरन उन्‍हें ही उनके पास भेजना पडा। थोडी ही देर में ससुर जी बडे खुश होकर उसके पास आए’ वे हमारी सब मांगे पूरी करने को तैयार हैं’ कहकर फोटो उसके हाथों में रख दिया। लडकी स्‍मार्ट और फैशनेबल दिखाई पड रही थी। बाबूजी से मालूम हुआ, उसने इसी साल ग्रेज्‍युएशन किया है। वह चौंक गयी, वे 20 लाख रूपए खर्च करेंगे, आखिर वे करते क्‍या हैं? इच्‍छा न होने पर भी दवाब देने पर बाबूजी उससे यह प्रश्‍न पूछने को तैयार हुए। मालूम हुआ, उनका ट्रांसपोर्ट का बिजनेस है। थोडी ही देर में मुकल और तुषार भी आ गए। उन दोनों का भी परिचय हुआ, ससुर जी तो उनसे इतने प्रभावित थे कि चाहते थे, जल्‍द ही विवाह की बात तय हो जाए, पर इन तीनों ने कोई हडबडी नहीं दिखाई। आखिर उनके बारे में बिना कोई जानकारी के विवाह कैसे पक्‍का करे? उन्‍होने फोन नं ले लिया और सोंच विचार के लिए समय मांगा।

उनके जाने के बाद उसने मामाजी के यहां फोन लगाया, उनसे जो जानकारी मिली वह तो हतप्रभ करने वाली थी। दिवाकर जी ने ट्रांसपोर्ट के बिजनेस में तो पैसा कमाया ही था, अब राजनीति में भी आ गए थे। इस कारण उन्‍हें काफी व्‍यस्‍त रहना पडता था। घरवालों को हर प्रकार की सुविधा देकर वे स्‍वयं काम में भागे भागे फिरते थे। इसका फायदा बच्‍चों ने खूब उठाया था। सारे बच्‍चे स्‍कूलों और कालेजों में फेल होते हैं, पर पिताजी की उंची पहुंच और प्रभाव के कारण उन्‍हें प्रोमोशन मिल जाया करता है। उनके बच्‍चे सडकों गलियों में घूमते देखे जा सकते हें, उन्‍हें खाने पीने की भी बुरी लत लगी हुई है। उनकी लडकी भी बस बनाव, श्रृंगार और फैशन में ही व्‍यस्‍त रहती है।

डायनिंग टेबल पर खाने बैठे घर के सारे सदस्‍य तुषार के विवाह की ही चिंता में डूबे थे। एक एक दिन खिसका जा रहा था और उसके जाने का समय निकट आ रहा था। ससुर जी तो दिवाकर जी के यहां शादी करने का दृढ निश्‍चय कर चुके थे। उनके परिवार के इतने अवगुणों को सुनकर भी उनका मन विचलित नहीं हुआ था। ‘अरे, पैसेवालों का तो सब दोष ढंक जाता है’ 20 लाख रूपयों की चमक से जहां एक ओर उनकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया था, वहीं दूसरी ओर उनकी सोंचने समझने की शक्ति भी क्षीण हो गयी थी। तभी तो यह परिवार उन्‍हें पसंद आ रहा था।

पर वह इस बात से बिल्‍कुल राजी नहीं थी। इंडिया की फैशनपरस्‍त लडकी इंगलैंड जाकर तुषार के जीवन से भी निकलने से बाज नहीं आएगी। तुषार बडा ही भोला भाला लडका है, उसकी जिंदगी के साथ खिलवाड करने का उन्‍हें कोई अधिकार नहीं। तुषार को पैसे की कोई कमी नहीं है। उसे अपने मानसिक स्‍तर के समकक्ष लडकी की आवश्‍यकता है। तीस वर्ष पहले मुकुल के स्‍तर की लडकी न चुनकर बाबूजी ने एक गल्‍ती की थी, आज वे उससे बडी गल्‍ती दुहराने जा रहे हैं। वह ऐसा नहीं होने देगी, पर वह विरोध करे तो करे कैसे? उसे तो हिम्‍मत ही नहीं थी।

कमरे में घुटन सी महसूस होने लगी। वह आकर बाहर बरामदे में बैठ गयी। आम के वृक्ष की छाया बरामदे को ठंडक पहुंचा रही थी। इस वृक्ष के भी तीस वर्ष पूरे हो गए। वह फिर अपने वैवाहिक जीवन की तुलना इस वृक्ष से करने लगी। आज आम के इस वृक्ष को अब किसी सहारे की जरूरत नहीं है, वरन् यह वृक्ष तो इतना समर्थ हो चुका है कि आसपास के कई परिवारों को जेठ की तपती धूप और गर्मी से राहत दे रहा है, तो फिर उसकी गृहस्‍थी किसी दूसरे के निर्णय की मुंहताज क्‍यो? उसका अनुभव क्‍या इतना कम है कि उसे दूसरों का सहारा लेना पडे। अब तो वह कई परिवारों को अपना सहारा दे सकती है, उस वृक्ष की तरह। उसने दृढ निश्‍चय कर लिया। वह कामेश्‍वर जी की पुत्री से ही तुषार का विवाह करेगी। एक सभ्‍य और सुसंस्‍कृत परिवार से रिश्‍ता जोडने से उसे कोई नहीं रोक सकता। उसने बुआजी के यहां विवाह में उसे समझ लिया है। तेजी से वह ड्राइंग रूम में आयी, डायरी निकाला और कामेश्‍वर सिंह जी को फोन लगाने लगी। अपने बेटे के भविष्‍य के लिए आज पहली बार वह ससुर जी का विरोध करने को तैयार थी।

18 comments:

  1. kahaani maine thodi si padhi, achchhi lagi, save kar le ja raha hoon, dhire-dhire paddhoonga.

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  2. bahut achhi kahani thi,rushiyon se hatkar sochneki jarurat ka zamana hai ab.

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  3. विषय साधारण किन्तु सामाजिक और आम जीवन से लिया है तो पढने की चाह जगाता है ,सिरलेख पढकर ही समझ आ जाता है कि कही किसी विरोध की बात है, बींच मे अनावश्यक खिंचाव से कहानी में नीरसता आती है ,संवादों का अभाव खटकता है , अंत वही है जो सिरलेख से अपेक्षित है |कुल मिला कर ठीक-ठाक कहानी |

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  4. सामाजिक परिवेश पर अच्छी रचना. थोडी कांट छांट और कसाव से कहानी और अच्छी बन पाने की गुंजाईश थी

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  5. Samaajik vishay par lihi yah kahani achchee lagi.Sangeeta ji ki likhi kahani pahli baar padhi hai.
    ant sakaratmak aur sajeev laga.

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  6. बहुत सुंदर कहानी .ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत मन से अपनी भावपूर्ण आत्मकथा सुना रहा हो .

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  7. संगीता जी !

    पिछले दिनों आपकी कहानी ’एक झूठ’ पढ़ी थी. उस कथा के प्रस्तुतीकरण से आपकी शैली में आकर्षक परिपक्वता स्प्ष्ट परिलक्षित है. हां कई मित्रों के विचार से मैं सहमत हूं कि संवाद के अभाव से कथानक कहीं पर थोड़ा लम्बा लगने लगता है. मित्र मोहिन्देर जी का सुझाव उचित है.

    कथावस्तु सामाजिक होने से परिचित सा भले ही हो किन्तु दुर्भाग्य से अब तक सामयिक बना हुआ है.

    शुभकामना

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  8. कहानी का प्रवाह लगतार बना रहा...इसलिए एक बार में ही पूरी कहानी पढ गया।

    औरों का तो पता नहीं लेकिन मुझे कहानी पसन्द आई

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  9. संगीता जी बहुत ही अच्छी लगी आप की लिखी यह कहानी, सच मै कई बार बुजुर्ग लोग बहुत कठिनाईयां पेदा कर देते है, लेकिन यहां तो लालच ज्यादा था, लेकिन अन्त बहुत ही सुंदर लगा, मुझे बहुत अच्छी लगी यह कहानी.
    धन्यवाद

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  10. परिपक्व और सोचने को मजबूर करती हुई कहानी है। आपको बहुत बहुत बधाई।

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  11. मुझे आपकी लिखी यह कहानी बहुत पसंद आई संगीता जी ..कहीं कहीं थोडा सा प्रवाह खटका पर अंत तक इसने बांधे रखा ..

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  12. कहानी बहुत अच्छी है, परन्तु कथानक को अधिक लम्बा खींच दिया है।
    शुभकामनाएँ।

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  13. अच्छा विषय....सधी हुई भाषा
    सुलझी हुई प्रस्तुति और साहित्य शिल्पी
    जैसा उत्कृष्ट स्थल.....उत्तम....बधाई.
    =============================
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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  14. अच्छी कहानी,परिस्थति ही ऐसी थी की विरोध करना परा,कभी,कभी परिस्थति विरोध करने को विवश कर देती है

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साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
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