प्रेम की अमर सच्चाई [कविता] - अमन दलाल
भावो में मेरे थोडा रस लिया होता,
आंसुओ की आहट को, जब सुन लिया होता,
भूलता न हर ख़ुशी,संजोता न कोई गम,
तुम छू लेती अंतर्मन,में सिहर लिया होता।
रचनाकार परिचय:-तुम सुन न सकी किसी आह को,
मन की पवित्र,पावन चाह को,
इसी बीचोबीच मन बात करते हैं,
तुम क्यों न देख सकी, मुझमे तेरी परवाह को.
अब तो बैठे हैं, सहजकर हरे घावो को,
तुम फिर आती हो लिए, उन खुदगर्ज भावो को,
छू लूँ कैसे, फिर लौ फिर वहीं..
परवाना था, डरता हूँ अब उन हवाओ को।
आज दीप लिए, तुम खड़ी हो वही,
कदम ठहरे, जब मेरे कहीं,
कैसी फरियाद,किसके लिए,
रोशनी जो ना गलत,न सहीं।
यहीं बद्लोबदल की, एक बदल हैं,
नए वक़्त की नयी ग़ज़ल हैं,
तुम लिए भले हो,अमर सादगी,
मेरे मनोभाव अब ,बैठे तल हैं।
मन में डर हे,उस मधुमास का,
तुम बिन मेरे, जग-हास का,
अब मुझे वो सिहरन,मंजूर नहीं,
जाकर छू लो, काबा कोई पास का।
मैं बस यह कह, चुप होता हूँ,
सच, तुम बिन रोता हूँ,
बख्श दो ना दो! व्यर्थ नए उल्लास, क्षमा
मैं अब चैन की नींद सोता हूँ.










7 comments:
Nice One.
Alok Kataria
shandaar........bahut hi badhiya abhivyakti
प्रयास अच्छा है।
बहुत सुंदर कविता
uski batt sune bina kaise maan le? tharo jara puri hakikat jaan le? yadi sach me wo bevafa hi nikle to ek baat meri jarur maan le dil us ko date hi kyon ho? jo nadan ki jaan le
आपकी रचना उत्तम है ........
परवाना था, डरता हूँ अब उन हवाओ को।
yah pankti kuchh adhuri lagi aman mere taur se yaHAAN hawaaon se....likhnA sahi hai kintu isse tumhaari oopar ki panktiyaan ladkhada jaayengi.....aur shesh kavita sundR hai waqai prashaNshneey
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