११ अप्रैल, २००९ को हिन्दी साहित्य के वरिष्ठतम लेखक विष्णु प्रभाकर का निधन हो गया. वह गांधीवादी लेखन-परम्परा के अंतिम स्तंभ थे. वह इतने शांत और मृदुभाषी थे कि आश्चर्य होता था. मुझे नहीं लगता कि किसी व्यक्ति की बात तो दूर कभी किसी जानवर को भी उन्होंने सख्त लहजे में डांटा होगा. लंबे, गोरे-चिट्टे (वृद्धावस्था में भी चेहरा अंगारे की भांति देदीप्यमान था) सुडौल-देह-यष्टि के धनी विष्णु जी के साहित्यकार से मेरा परिचय १९६६-६७ (तब मैं हाई स्कूल में था) में ही हो गया था, लेकिन वह उनकी दो-चार बाल-कहानियों तक ही सीमित था. १९७८ में ’आवारा मसीहा’ पढ़ा और मैं उनका मुरीद हो उठा. उन दिनों मैं मुरादनगर में था और साहित्य की ओर लौट रहा था. वहां के साहित्यिक मित्र सुभाष नीरव से विष्णु जी के विषय में सुनता तो उनसे मिलने की आकांक्षा प्रबल हो उठती. मेरे स्व. मित्र प्रेमचन्द गर्ग उनके मुग्ध प्रशंसक थे. गर्ग जी का ताल्लुक भी शायद मुजफ्फर नगर (उत्तर प्रदेश) से था और विष्णु जी का जन्म वहीं हुआ था. अपने नगर-क्षेत्र का कोई व्यक्ति जब किसी भी क्षेत्र में उच्च शिखर पर पहुंच जाता है तब वहां के लोगों में उसकी चर्चा स्वाभाविक है.

मैंने ’आवारा मसीहा’ दोबार पढ़ा और विष्णु जी से मिलने की ललक और प्रबल हो उठी, लेकिन मिल नहीं पाया. ११ अक्टूबर, १९८० को मैं स्थायी रूप से दिल्ली आ बसा. अब किसी से भी मिलना सहज था.

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

१२ मार्च, १९५१ को कानपुर के गाँव नौगवां (गौतम) में जन्मे वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल कानपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), पी-एच.डी. हैं। 

अब तक आपकी ३८ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ६ उपन्यास जिसमें से 'रमला बहू', 'पाथरटीला', 'नटसार' और 'शहर गवाह है' - अधिक चर्चित रहे हैं, १० कहानी संग्रह, ३ किशोर उपन्यास, १० बाल कहानी संग्रह, २ लघु-कहानी संग्रह, यात्रा संस्मरण, आलोचना, अपराध विज्ञान, २ संपादित पुस्तकें सम्मिलित हैं। इनके अतिरिक्त बहुचर्चित पुस्तक 'दॉस्तोएव्स्की के प्रेम' (जीवनी) संवाद प्रकाशन, मेरठ से प्रकाशित से प्रकाशित हुई है।आपनें रूसी लेखक लियो तोल्स्तोय के अंतिम उपन्यास 'हाजी मुराद' का हिन्दी में पहली बार अनुवाद किया है जो २००८ में 'संवाद प्रकाशन' मेरठ से प्रकाशित हुआ है।

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

दो चिट्ठे :  रचना समय और वातायन
विष्णु जी नियमित (दिल्ली में रहते हुए प्रतिदिन) कॉफी हाउस जाते थे . शनिवार की शाम कॉफी हाउस में साहित्यकारों की होती थी. विष्णु जी जाड़े के दिनों में शाम साढ़े पांच बजे और गर्मियों में कुछ देर से वहां पहुंचते और प्रायः गेट के सामने खुली छत पर एक मेज पर जा बैठते. आध-घण्टा में उनकी मेज के साथ दो-तीन मेजें और जुड़ जातीं और साहित्यकारों का जमघट लग जाता. ये वे दिन थे जब विष्णु जी के साथ नियमित बैठने वालों में वरिष्ठ कथाकार रमाकांत और कवि आलोचक राजकुमार सैनी अवश्य होते थे. विष्णु जी से कुछ दूर गेट से दक्षिण दिशा की ओर मार्क्सवादियों (इनमें कई छद्म मार्क्सवादी भी होते थे बाद में जिनके मुखौटे स्वतः उतर गये थे) का ग्रुप बैठता था और प्रायः देखने आता कि रमेश उपाध्याय जैसे एक-दो को छोड़कर विष्णु जी की ओर कोई अन्य नहीं आता था. इसे वैयक्तिक और वैचारिक संकुचन के अतिरिक्त अन्य कोई संज्ञा नहीं दी जा सकती.

एक शनिवार को शाम छः बजे कंधे से थैला लटकाये (उन दिनों यही फैशन था) मैं पहली बार कॉफी हाउस पहुंचा था. नवम्बर , १९८० की बात है. मेरे साथ सुभाष नीरव थे. विष्णु जी साहित्यकारों से घिरे हुए थे. इस दिन आलोचक डॉ. हरदयाल, डॉ. रत्नलाल शर्मा, वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी, कवि कांति मोहन-----लम्बी सूची है --- आदि पहुंचते थे. उस दिन मैंने केवल उनके दर्शन ही प्राप्त किये थे. संवाद नहीं हुआ. संवाद वहां मेरा किसीसे भी नहीं हुआ था, क्योंकि सबके लिए मैं एक अपरिचित चेहरा था.

उसके बाद मैं प्रतिमाह के दूसरे शनिवार कॉफी हाउस जाने लगा था. जाना प्रति शनिवार चाहता था, लेकिन पारिवारिक कारणॊं से यह संभव न था. कभी-कभी सरकारी अवकाश होने पर बीच में भी चला जाता . लेकिन जब भी मैं वहां गया विष्णु जी को लोगों से घिरा ही पाया. वह मेरे चेहरे से तो परिचित हो गये थे लेकिन मैं कौन हूं यह जता पाने में तीन-चार महीने व्यतीत हो गये थे. एक दिन मैं विष्णु जी के पहुंचने से पहले ही कॉफी हाउस जा पहुंचा और गेट के सामने ही एक मेज पर जा बैठा. पांच मिनट बाद ही वह मुझे गेट पर दिखे और जब वह मेरी मेज की ओर बढ़ते दिखे तब मैं उठ खड़ा हुआ था उनके स्वागत के लिए.

"अरे, आप खड़े क्यों हो गये ? बैठें." मेरे सामने कुर्सी पर थैला लटकाते हुए मुस्कराकर वह बोले थे.

बातों का सिलसिला चल पड़ा था. उन्होंने जितना मुझसे पूछा मैंने उससे अधिक उन्हें अपने बारे में बताया. वह मुस्कराते रहे-- एक निर्छ्द्म - सरल और मोहक मुस्कान.

****

विष्णु जी कॉफी हाउस से तीन किलोमीटर दूर कुण्डेवालान में रहते थे, जो अजमेरी गेट से चावड़ी बाजार जाने वाली सड़क पर पड़ता है. अजमेरी गेट से चावड़ी बाजार जाते हुए दाहिनी ओर ऊंचा हवेली-नुमा उनका मकान था, जहां वह किरायेदार थे. लेकिन उनके पास इतनी अधिक जगह थी कि लंबे समय तक मैं उन्हें मकान मालिक ही समझता रहा था. साहित्य जगत में दो चीजें उनके नाम का पर्याय बन चुकी थीं -- एक शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय की उनकी जीवनी ’आवारा मसीहा’ और दूसरा उनका निवास.

मुझे विष्णु जी के और अधिक निकट आने का अवसर मिला १९८२ में जब प्रसिद्ध हिन्दी बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबन्धु ने अपनी पत्रिका ’बाल साहित्य समीक्षा’ का एक अंक विष्णु प्रभाकर विशेषांक के रूप में प्रकाशित करने का निर्णय किया और उसकी जिम्मेदारी मुझे सौंप दी, अर्थात उस अंक का अतिथि सम्पादक. सामग्री संचयन, बाल साहित्य संबन्धी उनके विचार जानने के लिए उनका साक्षात्कार आदि के सिलसिले में कई बार मुझे उनसे मिलने कुण्डेवालान जाना पड़ा था.

            (चित्र में विष्णु प्रभाकर एवं रूप सिंह चंदेल)  
विष्णु जी साहित्य-साधक पुरुष थे. वह प्रतिदिन सुबह से दोपहर एक बजे तक लिखने-लिखवाने का काम करते थे. लंबे समय से कोई युवक या युवती उनके सहयोग के लिए उनके पास होता था. प्रायः वह सहयोग करने वालों को अच्छे सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों में नौकरी दिलवा देते थे. बाद के दिनों में वह लेखन के लिए इन सहयोगियों पर ही निर्भर रहने लगे थे और उन्हें बोलकर लिखवाने लगे थे. मेरे पास उनके अनेक पत्र हैं, जिनमें हस्तलेख उन युवाओं के हैं, विष्णु जी के केवल हस्ताक्षर हैं. लेकिन नवें दशक के उत्तरार्द्ध तक के उनके पत्र उनके ही लिखे हुए हैं. वह हिन्दी के उन इने गिने लेखकों में थे, बल्कि यदि एक मात्र कहूं तो अत्युक्ति न होगी, जो न केवल बाल-साहित्य लिखने के पक्ष में बोलते थे, बल्कि स्वयं प्रभूत मात्रा में बाल साहित्य लिखा भी था. ’बाल साहित्य समीक्षा’ विशेषांक के लिए बातचीत के दौरान बहुत दुखी स्वर में उन्होंने कहा था, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिन्दी के लेखक बाल-साहित्य लिखना हेय समझते हैं. लिखने वाले के प्रति उनका दृष्टिकोण बदल जाता है. जबकि बांग्ला में साहित्यकार ही उसे मानते हैं जिसने बाल-साहित्य भी लिखा होता है. रूस के अनेक लेखकों का अपने बाल-साहित्य लेखन पर गर्व है."

विष्णु जी ने बहु-विधाओं पर कार्य किया. कहना उचित होगा कि शायद ही कोई विधा ऎसी रही होगी जिसमें उन्होंने लेखनी न चलायी हो. उनकी अनेक कहानियां उल्लेखनीय हैं, और ’धरती अब भी घूम रही है’ उनकी विश्वप्रसिद्ध कहानी है. जब मैं उनसे लंबी बातचीत के लिए अपने कवि मित्र अशोक आंद्रे के साथ उनके यहां गया तब उन्होंने विस्तार से इस कहानी के विषय में चर्चा की थी. उन्होंने वह कमरा भी दिखाया था जहां कुछ मित्रों के साथ बैठे वह किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे और वही चर्चा बाद में उस कहानी का कारण बनी थीं.

डॉ. कुमुद शर्मा (रीडर , हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) उन दिनों ’साहित्य अमृत’ पत्रिका से जुड़ी हुई थीं और उनका यह जुड़ाव संभवतः स्व. डॉ. विद्यानिवास मिश्र के कारण था, जो पत्रिका के प्रधान सम्पादक थे. कुमुद शर्मा ने एक दिन फोन पर पत्रिका के लिए विश्णु जी का साक्षात्कार लेने का मुझसे आग्रह किया. दरअसल उन्होंने कुछ प्रश्न बना रखे थे और मुझे उन्हीं पर चर्चा करनी थी. मेरे लिए केवल उन पर चर्चा करना कठिन था. विष्णु जी से लंबी बातचीत लंबे समय से मेरे जेहन में थी. समय नहीं निकाल पा रहा था. कुमुद के फोन ने उत्साह बढ़ाया और मैंने अशोक आंद्रे से अनुरोध किया कि वह अपना टेप रेकार्डर और कैमरा संभाल मेरा साथ दें. कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, अजीत कौर (पंजाबी) और एस.एल.भैरप्पा (कन्नड़ -- मैसूर) से बातचीत के दौरान भी अशोक ने मेरा साथ दिया था.

मैंने विष्णु जी से समय ले लिया और सुबह दस बजे मैं अशोक के साथ कुण्डेवालान में था. उस दिन उन्होंने अपने पी.ए. की छुट्टी कर दी थी या उन दिनों उनका कोई पी.ए. था ही नहीं. बातचीत प्रारंभ हुई. पहले प्रश्न के उत्तर के बाद विष्णु जी ने टेप रेकार्डर चेक करने के लिए कहा और टेप ने न सूं की न सां. उसने मौनवृत धारण कर लिया था. अब------ विष्णु जी मुस्कराये ----- वही सरल-निर्छद्म मुस्कान .मैं बोला, " विष्णु जी वक्त तो लगेगा---- लेकिन यदि आप तैयार हों तो आप बोलते रहें और मैं आपके उत्तर लिखता रहूंगा. " वह तैयार हो गये थे.

हमें तीन घण्टे लगे थे, लेकिन हमने विभिन्न विषयों पर खुलकर बातचीत की, जो टाइप के चौंतीस पृष्ठों में समायी थी. ’साहित्य अमृत’ के अंश को (जो छोटा ही था) छोड़कर विष्णु जी का साक्षात्कार टुकड़ों में कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ था.

विष्णु जी के साथ कानपुर यात्रा की सुखद स्मृति आज भी ताजा है. कानपुर का ’बाल कल्याण संस्थान’ प्रतिवर्ष फरवरी (प्रायः २७-२८ फरवरी) में हिन्दी और अहिन्दी भाषी बाल साहित्यकारों और नगर के दो प्रतिभाशाली छात्रों को पुरस्कार प्रदान करता है. यह कार्यक्रम डॉ. राष्ट्रबन्धु के सद्प्रयासों से लगभग तीस वर्षों से अबाधरूप से होता आ रहा है. दो दिवसीय कार्यक्रम चार सत्रों में होता है. १९९६में एक महत्वपूर्ण सत्र की अध्यक्षता के लिए विष्णु जी को बुलाया गया था. उसी सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में मैं भी आमंत्रित था. हमारे साथ स्व.डॉ रत्नलाल शर्मा और दिल्ली विश्वविद्यालय के एक महाविद्यालय में हिन्दी की रीडर डॉ. शकुन्तला कालरा भी थीं.

वह फरवरी की ठंडभरी सुबह थी. शताब्दी एक्स्प्रेस, जो नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से सुबह छः बजे के लगभग कानपुर के लिए जाती थी, से हमारा आरक्षण था. डॉ. रत्नलाल शर्मा यद्यपि योजना विभाग से वर्षों पहले अवकाश प्राप्त कर चुके थे, लेकिन किसी युवा से अधिक उत्साह था उनमें. हम सभी को पिक करने का जिम्मा उन्होंने अपने ऊपर लिया था. शर्माजी समय के बहुत पाबंद थे. जब हम विष्णु जी के यहां पहुंचे सुबह के साढ़े पांच बजे थे. उनके घर से स्टेशन मात्र पांच मिनट की दूरी पर था. उस यात्रा के दौरान विष्णु जी ने बचपन से लेकर युवावस्था के अपने अनेक संस्मरण सुनाये थे. उनके साथ वह एक अविस्मरणीय यात्रा थी.

२८ मार्च, १९९७ को सपरिवार मुझे दक्षिण भारत भ्रमण पर जाना था. लगभग सभी जगह मैंने ठहरने की व्यवस्था कर ली थी, लेकिन तिरुअनंतपुरम में कहां ठहरूंगा यह विचार-मंथन चल ही रहा था कि कॉफी हाउस में एक दिन विष्णु जी से इस विषय पर चर्चा हुई. बोले, "इसमें इतना सोचने की क्या बात है. ’केरल हिन्दी प्रचार समिति’ के सचिव डॉ. वेलायुधन नायर (अब स्वर्गीय) से बात कर लो. मेरा नाम ले लेना. कोई कठिनाई न होगी. बहुत ही प्यारे लोग हैं----- हिन्दी वालों का बहुत ही आदर करने वाले.." विष्णु जी के सुझाव पर मैंने केरल सूचना केन्द्र, नई दिल्ली से वेलायुधन नायर साहब का फोन नंबर लिया और विष्णु जी का उल्लेख करते हुए उन्हें अपनी समस्या बतायी. जब उन्हें ज्ञात हुआ कि मैं भी लेखक हूं वह बहुत प्रसन्न हुए. फोन पर छलकती उनकी प्रसन्नता मैं अनुभव कर पा रहा था. उन्होंनें स्टेशन से लेने, ठहरने, घुमाने आदि की जो व्यवस्था की उसका विस्तृत उल्लेख मैंने अपने यात्रा संस्मरण ’दक्षिण भारत के पर्यटन स्थल’ में किया है.

दरअसल विष्णु जी ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अनगिनत बार दक्शिण भारत की यात्राएं की थीं. वहां उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी---- विशेषरूप से केरल में. जात-पांत - क्षेत्रवाद, साहित्यिक राजनीति से वह बहुत ऊपर थे. उन्हें यह गर्व था कि उनके घर में बहुएं अहिन्दी भाषी प्रांतों से थीं या उनके घर की लड़कियों के विवाह अहिन्दी भाषियों के साथ हुए थे और वे सब सफल पारिवारिक जीवन जी रहे थे. वह वसुधैव कुटम्बकम मे विश्वास करने वाले व्यक्ति थे.

जैसा कि उल्लेख कर चुका हूं मुझे यह जानकारी बहुत बाद में हुई कि कुण्डेवालान का मकान उनका अपना नहीं था. कॉफी हाउस में एक दिन चर्चा सुनी कि उनके मकान पर रेलवे के एक ठेकेदार माफिया ने कब्जा कर लिया था और विष्णु जी उसके साथ मुकदमा में उलझे हैं. लेकिन उनके चेहरे - बातचीत से कभी ऎसा आभास नहीं मिला था कि वह परेशान थे. उनके चेहरे पर सदैव सरल मुस्कान विद्यमान रहती थी.

पश्चिमी दिल्ली में महाराणा एन्क्लेव में उनका अपना आलीशान मकान था --- यह तभी पता चला था. उनके पुत्र ने विज्ञापन के माध्यम से उसे उस माफिया को किराये पर दे दिया था. कुछ दिनों तक उसने किराया दिया, बाद में देना ही नहीं बंद कर दिया , बल्कि मकान खाली करने से भी इंकार कर दिया. उसने उससे भी आगे जाकर मकान के जाली कागजात तैयार करवाये, उसे विष्णु जी द्वारा अपने एक मित्र को बेचा दिखाया, फिर उससे उसने स्वयं खरीद लिया. बात तत्कालीन सांसद शंकरदयाल सिंह के द्वारा गृहमंत्री राजेश पायलट तक पहुंची और जब विष्णु जी से पूछा गया कि आपको किसके विरुद्ध क्या शिकायत है तब वहां भी गांधीवादी भाव से उन्होंने कहा था, "मुझे किसी के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है."

अंततः कोर्ट में उस माफिया की जालसाजी सिद्ध हुई थी और उसे जेल भेज दिया गया था. उसके तुरंत बाद विष्णु जी कुण्डेवालान छोड़ अपने घर आ गये थे. गृह-प्रवेश के बाद उन्होंने घर के सामने के पार्क में दावत दी थी, जिसमें बड़ी मात्रा में साहित्यकार-पत्रकार सम्मिलित हुए थे. उसके बाद भी अनेक बार मैं उनके उस आवास में उनसे मिलने गया था. लेकिन वहां पहुंचकर उनका नियमित कॉफी हाउस आने का सिलसिला टूट गया था.

१९९८ में मैंने अपना उपन्यास ’पाथर टीला’ उन्हें समर्पित किया और जब उन्हें भेंट किया तब वह बहुत ही संकुचित हो उठे थे. लेकिन पन्द्रह दिन के अंदर ही उसे पढ़कर उन्होंने उपन्यास की प्रशंसा करते हुए मुझे बधाई दी थी.

हिन्दी साहित्य में सदैव गुटबाजी से दूर ईमानदारी से काम करने वाले व्यक्ति को हाशिये पर डालने की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही है. विष्णु जी सदैव इसका शिकार रहे. जिस साहित्य अकादमी के वह सदस्य रहे थे उसने उनके ’आवारा मसीहा’ की उपेक्षा की थी. ’अर्द्धनारीश्वर’ को भी शायद ही पुरस्कार मिला होता यदि उस बार ज्यूरी में डॉ. शिवप्रसाद सिंह न होते. मीटिगं से लौटकर जब शिवप्रसाद जी होटल पहुंचे थे, मैं उनके कमरे में उनकी प्रतीक्षा कर रहा था. वह बहुत उत्तेजित थे और उनके विरुद्ध बोल रहे थे जो ’अर्द्धनारीश्वर’ का विरोध कर रहे थे. कुछ देर बाद शांत होने पर उन्होंने कहा था, "आखिर ’अर्द्धनारीश्वर’ को पुरस्कार दिलाने में सफलता मिल ही गई."

आजीवन विष्णु जी मसिजीवी रहे. अनेक पीढ़ियों का संग-साथ मिला उन्हें --- जैनेन्द्र जी से लेकर आजकी युवा पीढ़ी तक का . उनकी एक खूबी यह भी थी कि बीमारी से पहले तक वह नये से नये लेखक को पढ़ते रहे थे और अच्छा लगने पर सीधे लेखक को या पत्र-पत्रिका को रचना के विषय में अपनी राय देने में संकोच नहीं करते थे. अपने विचारों पर उनकी आस्था अडिग थी. शायद यही कारण रहा कि मरणॊपरांत उन्होंने अपनी देह ’अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान’ को दान करने का निर्णय किया था.

सच ही वह एक महान लेखक और विशाल हृदय व्यक्ति थे.

22 comments:

  1. रूपसिंह चंदेल जी नें संस्मरण में विष्णु प्रभाकर जी के जीवन और उनकी महानता को बहुत प्रभावी ढंग से उजागर किया है। साथ ही साहित्य जगत के कुछ एसे पृष्ठों को भी उलटा है जिनपर बिरले ही चर्चा होती है।

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  2. हिन्दी साहित्य में सदैव गुटबाजी से दूर ईमानदारी से काम करने वाले व्यक्ति को हाशिये पर डालने की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही है. विष्णु जी सदैव इसका शिकार रहे. जिस साहित्य अकादमी के वह सदस्य रहे थे उसने उनके ’आवारा मसीहा’ की उपेक्षा की थी. ’अर्द्धनारीश्वर’ को भी शायद ही पुरस्कार मिला होता यदि उस बार ज्यूरी में डॉ. शिवप्रसाद सिंह न होते. मीटिगं से लौटकर जब शिवप्रसाद जी होटल पहुंचे थे, मैं उनके कमरे में उनकी प्रतीक्षा कर रहा था. वह बहुत उत्तेजित थे और उनके विरुद्ध बोल रहे थे जो ’अर्द्धनारीश्वर’ का विरोध कर रहे थे. कुछ देर बाद शांत होने पर उन्होंने कहा था, "आखिर ’अर्द्धनारीश्वर’ को पुरस्कार दिलाने में सफलता मिल ही गई."

    अनिल जी संभवत: आप उपरोक्त पंक्तियों की ओर इशारा कर रहे हैं। मैं भी आपके स्वर मेंस वा मिलाते हुए श्री चंदेल के लेखन को साहसिक कहूंगा।

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  3. विष्णु प्रभाकर जी को श्रद्धांजलि। रूप सिंह जी नें विष्णु जी की सादगी और महानता से परिचित कराया। विष्णु जी एक सच्चे साहित्यकार थे किनकी कथनी और करनी में समानता रही। यह उनके मरणोपरांत देहदान से सिद्ध भी होता है।

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  4. इस संस्मरण को प्रस्तुत करने का बहुत बहुत धन्यवाद।

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  5. Bhai Roop jee, aapne Vishnu Prabahkar jee ke baarey mein bahut khoobsoorat baateiN batayeeN. Aap ne Vishnu jee kee mahanataa batatey batatey bhee Chhadam MarkswadioN ke mukhaautoN kee charcha bhee kar hee daali. aap ke lekh mein kahani kee see rawani hai.

    Badhaai

    tejendra sharma
    Katha UK London

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  6. VIKHYAAT SAHITYAKAR SHRI ROOP SINGH
    CHANDEL NE SANSMARAN MEIN MANASVEE
    VISHNU PRABHAKAR JEE KE JEEVAN KEE
    PUSTAK KAA EK-EK PAGE PADH -SUNAA
    KAR SAB PAATHKON PAR UPKAAR KIYAA
    HAI.VISHNU PRABHAKAR JEE HINDI
    SAHITYA KEE AAN,BAAN AUR SHAAN SAB
    KUCHH THE.

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  7. साहित्यकार और छद्मसाहित्यकार दो धारायें हैं और साहित्यकार हमेशा विष्णु प्रभाकर की तरह संघर्षरत ही पाया जाता है। लेकिन विष्णु जी को हमेशा याद रखा जायेगा यह भी अटल सत्य है।

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. Nice Article. Compact and to the point.

    Alok Kataria

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  10. हिन्दी साहित्य के स्तंभ पुरुष कह कर आपने विष्णु जी को जैसे पारिभाषित कर दिया। अपने संस्मरण बाँटने का आभार।

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  11. बहुत सार्थक और रोचक संस्मरण हैं. विष्णु जी के साथ आपके संस्मरण पढ कर ऐसा लगा कि कुछ वक्त जैसे हम भी विष्णु जी के साथ बैठ लिये हों..... साहित्य शिल्पी को इस उत्तम रचना को प्रकाशित करने के लिये आभार..

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  12. shree roop singh chandel ka sathiya manishi vishnu prabhakar per lekh padhkar nahan aatma ke jeevanke kai pahaluao ko janane ka avsar mila dhanyad
    anand jagani jaisalmer rajasthan

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  13. shree roop singh chandel ka sathiya manishi vishnu prabhakar per lekh padhkar nahan aatma ke jeevanke kai pahaluao ko janane ka avsar mila dhanyad
    anand jagani jaisalmer rajasthan

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  14. विष्णु प्रभाकर जी पर भाई चन्देल का यह संस्मरण नि:संदेह बहुत सारगर्भित और रोचक है। जब चन्देल ने इसे अपने ब्लॉग "वातायन" पर लगाया था, तब भी मैंने इस पर टिप्पणी की थी। "साहित्य शिल्पी" ने इस संस्मरण को पुन: प्रकाशित करके एक अच्छा कार्य किया। इससे यह हुआ कि जो पाठक इसे "वातायन" में नहीं पढ़ पाए थे, उन्होंने इसे यहाँ पढ़ा और सराहा है। मेरा मानना है कि अगर किसी ब्लॉग में कोई महत्वपूर्ण और खास रचना का प्रकाशन हुआ है और उसका पुनर्प्रकाशन किसी अन्य ब्लॉग या वेब साईट पर होता है तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं है। हर ब्लॉग और वेब साईट के अपने अपने पाठक हैं। इससे एक अच्छी रचना और अधिक विस्तार पा जाती है।

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  15. प्रतिष्ठित लेखक रूप सिंह जी की लेखनी चित्रात्मक लेखनी है-चित्र खींचती चली जाती है और पाठक उन पलों को जी लेता है.
    साहित्यिक गुटबंदियों को करीब से देखा है और जिस बेबाक तरीके से लिखा है, यह आप की कलम ही लिख सकती है .. विष्णु प्रभाकर जी एक सच्चे साहित्यकार थे, उन्हें भुला पाना किसी के बस की बात नहीं. उनके सादे व्यक्तित्व और कृतत्व के दर्शन कराने का आभार.

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  16. नया ज्ञानोदय ,पाखी ....ओर बाकि जगह उनके बारे में पढ़कर यही लगा .विनम्रता ओर सादगी से भरपूर व्यक्तित्व था उनका....निसंदेह वे न केवल एक अच्छे लेखक थे....अपितु एक अच्छे इन्सान भी....

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  17. रूप सिंह जी नें विष्णु प्रभाकर जी के व्यक्तित्व को अपने संस्मरण में स्वरूप दिया है। पढ कर विश्णु जी के प्रति मन श्रद्धा से नत हो उठा।

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  18. पंकज सक्सेना12 मई 2009 को 6:45 am

    क्रांतिकारी आलेख है। कडुवे सच भी हैं। विष्णु जी को प्रणाम।

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  19. आदरणीय रूप सिंह चंदेल जी की लेखनी की प्रशंसा इस बात के लिये भी करनी होगी कि प्रस्तुत संस्मरण केवल एक आलेख भर नहीं रह गया अपितु हिन्दी साहित्य के स्तंभ पुरुष को सच्ची श्रद्धांजलि देते हुए आपने साहित्य की दुर्दशा के कारणों को भी जैसे सामने ला दिया है। हिन्दी सेवियों के लिये भी यह लज्जा का विषय है कि हम अपने रचनाकारों को वह सम्मान नहीं देते जिनके वे हकदार है।

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  20. प्रिय राजीव जी,

    साहित्य शिल्पी में विष्णु जी पर मेरा संस्मरण प्रकाशित करने के लिए हार्दिक आभार. आभार उन सभी मित्रों का जिन्होंने उसे पढ़ा और अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया से अवगत कराया.

    रूपसिंह चन्देल

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  21. विष्णु प्रभाकर जी पर इस सारगर्भित लेख के लिये रूपसिंह चंदेल जी का आभार.

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  22. Is vishesh Sansmaran se Vishnu Prabhakar ji kee any visheshtaon jaane ka mauka mila. Sajeev sakatamak vivaran.

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