पंख कुतर कर जादूगर जब चिड़िया को तड़पाता है
सात समंदर पार का सपना , सपना ही रह जाता है

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परिचय:-


द्विजेन्द्र ‘द्विज’ का जन्म 10 अक्तूबर,1962 को हुआ। आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं : जन-गण-मन (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशन वर्ष-२००३। आपकी ग़ज़लें अनेक महत्वपूर्ण संकलनों का भी हिस्सा हैं।
आप की ग़ज़लें देश की सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित व आकाशवाणी से प्रसारित होती रही हैं। आप अंतर्जाल पर भी सक्रिय हैं।

‘जयद्रथ’ हो या ‘दुर्योधन’हो सबसे उसका नाता है
अब अपना गाँडीव उठाते ‘अर्जुन’ भी घबराता है

जब सन्नाटों का कोलाहल इक हद से बढ़ जाता है
तब कोई दीवाना शायर ग़ज़लें बुन कर लाता है

दावानल में नए दौर के पंछी ने यह सोच लिया
अब जलते पेड़ों की शाख़ों से अपना क्या नाता है

प्रश्न युगों से केवल यह है हँसती-गाती धरती पर
सन्नाटे के साँपों को रह-रह कर कौन बुलाता है

सब कुछ जाने ‘ब्रह्मा’ किस मुँह पीछे इन कंकालों से
इस धरती पर शिव ताण्डव-सा डमरू कौन बजाता है

‘द्विज’! वो कोमल पंख हैं डरते अब इक बाज के साये से
जिन पंखों से आस का पंछी सपनों को सहलाता है।

29 comments:

  1. सात समंदर पार का सपना , सपना ही रह जाता है
    pichle 15 salon se ye misra meree zahn me hai , aur Dwij ji to mere guru hain unhe shagird ki taraf se pranam !

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  2. वाह ! वाह ! वाह !

    बहुत बहुत सुन्दर रचना....आनंद आ गया पढ़कर....लाजवाब !!!

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  3. dwij ji ,

    bahut hi saarthak rachna . gazal ka ek ek shabd kuch na kuch kah raha hai ..
    जब सन्नाटों का कोलाहल इक हद से बढ़ जाता है
    तब कोई दीवाना शायर ग़ज़लें बुन कर लाता है
    mujhe ye sher bahut pasand aaya bhai .. aapko badhai

    vijay

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  4. सब कुछ जाने ‘ब्रह्मा’ किस मुँह पीछे( pooche) इन कंकालों से ..
    Ranjan ji pls correct its typing error.yahan "pooche" kar do.
    thanks

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  5. जयद्रथ’ हो या ‘दुर्योधन’हो सबसे उसका नाता है
    अब अपना गाँडीव उठाते ‘अर्जुन’ भी घबराता है

    in panktiyo ko daad dene ke liye shabda kin ke paas haiN ....!!!!!!!!

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  6. पंख कुतर कर जादूगर जब चिड़िया को तड़पाता है
    सात समंदर पार का सपना , सपना ही रह जाता है

    सिहरन हो गयी इन पंक्तियों से।

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  7. अपने फेवरेट शायर को एक नये रंग में और वो भी तीखे विद्रोह के रंग में पढ़ना अच्‍छा अनुभव है । व्‍यक्तिगत रूप से कहूं तो मुझे
    ‘जयद्रथ’ हो या ‘दुर्योधन’हो सबसे उसका नाता है
    अब अपना गाँडीव उठाते ‘अर्जुन’ भी घबराता है
    ये बहुत पसंद आया । अप्रत्‍यक्ष रूप से पूरी व्‍यवस्‍था को कटघरे में खड़ा कर रहा हॅ ये । जयद्रथ, दुर्योधन और अर्जुन के रूप में जो प्रतीक लिये हैं वे अद्भुत हैं । शायद ऐसी ही ग़ज़लों की मांग आज का ये दौर कर रहा है । आपकी लेखनी को प्रणाम और ये भी कि यूं ही लिखते रहें । ये सचमुच ही सन्‍नाटों का दौर है, हो सकता है इस लिखने लिखाने से ही ये सन्‍नाटा टूट जाये ।
    सन्‍नाटों का कोलाहल एक बिल्‍कुल ही अनोखा प्रयोग है जब सन्नाटों का कोलाहल इक हद से बढ़ जाता है
    तब कोई दीवाना शायर ग़ज़लें बुन कर लाता है
    शायद ऐसा ही कुछ किया था गुलजार साहब ने आंखों की महकती खुश्‍बू में । आपकी ये पूरी ग़ज़ल नये युग की ग़ज़ल है । ग़ज़ल की नयी दिशा क्‍या होगी ये आपकी इस ग़ज़ल से ज्ञात होता है । आपकी पुस्‍तक जन गण मन भोपाल में कहीं नहीं मिल पाई तो नेट से डाउनलोड करके पढ़ रहा हूं । नेट पर से पढ़ने में आनंद नहीं आता । पर आपकी ग़जलें स्‍वयं में ही आनंद हैं ।
    लिखते रहें सिरजते रहें यही कामना है

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  8. Just Toooooo good....

    Bahut si sundar rachna...
    Anand aa gaya padh kar...

    Really shabd kam paD rahe hai.n.........

    lajavaab.......

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  9. बढिया लगी पौराणिक बिम्बोँ से सज्जित,
    आपकी कविता द्विज भाई

    - लावण्या

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  10. इन वर्षों में अभी तक की सबसे बेहतरीन ग़ज़लों में से एक- ये कहने में कोई झिझक नहीं।
    हर एक शेर ऐसे तेवर लिये कि सम्मोहित मन बस द्विज जी की जयकार कर उठता है।

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  11. इतनी अच्छी गज़ल है कि क्या कहें...पढ़ने में इस कदर खो गया कि काफ़ी देर बाद आया कि कमेंट भी कर दूं। लाजवाब।

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  12. कुछ फिल्में बहुत सहज होती हैं पर कई बार देखने का मन करता है... आपकी कविता भी कई बार पढने का जी हो रहा है... 1975 में बनी शोले जैसी कविता...
    खबरी
    http://deveshkhabri.blogspot.com/

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  13. प्रश्न युगों से केवल यह है हँसती-गाती धरती पर
    सन्नाटे के साँपों को रह-रह कर कौन बुलाता है

    bahut khuub!
    umda ghazal!

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  14. बहुत बढ़िया ग़ज़ल--नए तेवर, नया रंग--
    ‘जयद्रथ’ हो या ‘दुर्योधन’हो सबसे उसका नाता है
    अब अपना गाँडीव उठाते ‘अर्जुन’ भी घबराता है
    जब सन्नाटों का कोलाहल इक हद से बढ़ जाता है
    तब कोई दीवाना शायर ग़ज़लें बुन कर लाता है
    वाह-लाजवाब.

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  15. यह ग़ज़ल एसी है जिसे भुलाना संभव नहीं। हर शेर का कथ्य सशक्त है।

    पंख कुतर कर जादूगर जब चिड़िया को तड़पाता है
    सात समंदर पार का सपना , सपना ही रह जाता है

    दावानल में नए दौर के पंछी ने यह सोच लिया
    अब जलते पेड़ों की शाख़ों से अपना क्या नाता है

    प्रश्न युगों से केवल यह है हँसती-गाती धरती पर
    सन्नाटे के साँपों को रह-रह कर कौन बुलाता है

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  16. आदरणीय द्विजेन्द्र द्विज मेरे पसंदीदा शायरों में हैं। उनके शेरों के तेवर, गहरायी, भाषा और भाव सौन्दर्य पर लम्बी बाते की जा सकती हैं। द्विज जी की प्रस्तुत ग़ज़ल असाधारण है। बिम्ब और अलंकार के एसे प्रयोग ग़ज़ल में कम ही देखने को मिलते हैं।

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  17. बहुत ही सुन्दर गजल... हर शेर में आज की व्यवस्था पर एक गहरा आघात है और आम आदमी के मन की आवाज है.

    उत्तर देंहटाएं
  18. पंख कुतर कर जादूगर जब चिड़िया को तड़पाता है
    सात समंदर पार का सपना, सपना ही रह जाता है

    इन दो पंक्तियों के बाद मैं रुक गया। पूरी ग़ज़ल आधे घंटे बाद जा कर पढी। संवेदना को कुरेद कर जगा दिया शेर नें। पूरी की पूरी गज़ल जबरदस्त है।

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  19. बेहद नायाब गजल. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  20. लाजवाब शेर सब के सब.......नमन है द्विज जी की कलम को

    जब सन्नाटों का कोलाहल इक हद से बढ़ जाता है
    तब कोई दीवाना शायर ग़ज़लें बुन कर लाता है

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  21. खूबसूरत है भाई यह गजल भी।मेरी बधाई लें द्विजेन्द्र द्विज जी।
    प्रश्न युगों से केवल यह है हँसती-गाती धरती पर
    सन्नाटे के साँपों को रह-रह कर कौन बुलाता है
    ***सुशील कुमार

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  22. जब तक ताण्‍डव डमरू बजता रहेगा, तब तक निरीह और सच्‍चे लोगों को कोई नहीं पूछेगा, आइए इस डमरू को बजने से रोकें ।
    ग़ज़ल हृदय को छूती है ।

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  23. जयद्रथ’ हो या ‘दुर्योधन’हो सबसे उसका नाता है
    अब अपना गाँडीव उठाते ‘अर्जुन’ भी घबराता है

    बहुत ही बढिया...

    इस उम्दा रचना को पढवाने के लिए साहित्य शिल्पी का बहुत-बहुत धन्यवाद

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  24. द्विज जी,

    मेरी हार्दिक बधाईयाँ बेहद अच्छी गज़ल के लिये।
    मुझे तो व्यक्तिगत तौर पर यह बात बहुत पसंद आई :-

    प्रश्न युगों से केवल यह है हँसती-गाती धरती पर
    सन्नाटे के साँपों को रह-रह कर कौन बुलाता है

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  25. सबसे पहले इस जानदार रचना के लिए बधाई...

    अब एक अनिवार्य विमर्श. 'पंख कुतर कर जादूगर' यहाँ या तो टंकन की त्रुटि है या रचनाकार की. 'कुतरना यानी दांत से काटना, यथा- वह नाखून कुतरती रही.., कतरना यानी कैंची आदि से काटना. यहाँ 'कतरना' होना चाहिए 'कुतरना' नहीं. कृपया, त्रुटि सुधार दें.

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  26. kafi dinon ke bad aapki ghazal sahitya shilpi par padane ko mili. Itani sashakt ghazal ke liye badhai sweeharen. 'jaydrath' wala misra aj ki vyavastha par karara vyang hai.Bahut bahut badhai aur shubh kaamnayen.

    उत्तर देंहटाएं

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