अभी बहुत दिन नहीं हुए जब साहित्य शिल्पी पर तेजेन्द्र शर्मा से मुलाकात प्रकाशित हुई थी। तेजेन्द्र नें अपने साक्षात्कार में महज इतना कहा था कि साहित्य में विचार महत्वपूर्ण होते हैं विचारधारा नहीं। यह वाक्यांश साधारण नहीं था। इसका अहसास इस साक्षात्कार के अंतर्जाल पत्रिका पर प्रकाशित होने के एक घंटे बाद ही हो गया जब “कट्टर वामपंथी टाईप” कुछ लेखक अपनी प्रतिक्रिया में बरस पडे और तेजेन्द्र के पूरे लेखन को ही कटघरे में खडा कर दिया। मैं जोर दे कर कहना चाहता हूँ कि तेजेन्द्र का लेखन कटघरे में खडा किये जाने योग्य है क्योंकि वह साहित्य के वर्तमान ठेकेदारों के प्रतिमानों के अनुरूप नहीं है। तेजेन्द्र की कहानी पढने की शुरुआत करने के बाद आप रह नहीं सकते, आपको उस कहानी से गुजरना ही होगा। इसका कारण केवल रोचकता नहीं वरन कथानक की नवीनता भी है। तेजेन्द्र की कहानी को नकारना तभी संभव है जब आपने उन्हे पढा न हो। तेजेन्द्र पर चर्चा होनी चाहिये, तेजेन्द्र सराहना के हकदार है चूंकि उनकी अपनी ही दशा और दिशा है जिससे गुजर कर कहानी नें नया कलेवर पाया है। “तेजेन्द्र शर्मा – वक्त के आईने में” एक आगाज़ है। बृजनारायण शर्मा एवं हरिभटनागर के संपादन में रचनासमय भोपाल से प्रकाशित यह पुस्तक लेखक का आईना तो है ही। चार सौ दस पन्नों की इस पुस्तक में तेजेन्द्र की जीवन और रचनाधर्मिता की बहुआयामिता दृष्टिगोचर होती है। वक्त के आईनें में शीर्षक संपूर्ण है चूंकि वक्त के साथ तेजेन्द्र के जीवन के अनुभव और उतारचढाव उनकी कहानियों के विषय बनते रहे हैं जिसकी झलक पुस्तक में दिखायी पडती है। संपादक द्वय भूमिका में यह स्पष्ट करते हैं कि “यह पुस्तक अभिनंदन ग्रंथ नहीं है यह एक एसे लेखक के बारे में है जो निर्माण की प्रकृया में है जिसमें बहुतेरी खामियाँ हैं क्योंकि वह इंसान है।“ अर्थात यह तय है कि एक इंसान के रूप में तेजेन्द्र शर्मा को जानने के लिये यह पुस्तक सचमुच महत्व की है।

रचनाकार परिचय:-

राजीव रंजन प्रसाद का जन्म बिहार के सुल्तानगंज में २७.०५.१९७२ में हुआ, किन्तु उनका बचपन व उनकी प्रारंभिक शिक्षा छत्तिसगढ राज्य के जिला बस्तर (बचेली-दंतेवाडा) में हुई। आप सूदूर संवेदन तकनीक में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से एम. टेक हैं। विद्यालय के दिनों में ही आपनें एक पत्रिका "प्रतिध्वनि" का संपादन भी किया। ईप्टा से जुड कर उनकी नाटक के क्षेत्र में रुचि बढी और नाटक लेखन व निर्देशन उनके स्नातक काल से ही अभिरुचि व जीवन का हिस्सा बने। आकाशवाणी जगदलपुर से नियमित उनकी कवितायें प्रसारित होती रही थी तथा वे समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुईं। वर्तमान में आप सरकारी उपक्रम "राष्ट्रीय जलविद्युत निगम" में सहायक प्रबंधक (पर्यावरण) के पद पर कार्यरत हैं। आप "साहित्य शिल्पी" के संचालक सदस्यों में हैं।

आपकी पुस्तक "टुकडे अस्तित्व के" प्रकाशनाधीन है।

पुस्तक की रूपरेखा पर गंभीरता से कार्य किया गया है। छ: खंडों में विभक्त इस पुस्तक का आरंभ लेखक के आत्मकथ्य से होता है। आत्मकथ्य इमानदार है और लेखक अपने आत्मविश्लेषण को रोचकता से प्रस्तुत भी करता है। आत्मकथा की एक बानगी ही सही यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि तेजेन्द्र जब भी अपनी आत्मकथा लिखेंगे वह रोचक होगी। तेजेन्द्र की महत्वपूर्ण और चर्चित कहानियों – कब्र का मुनाफा, एक ही रंग, कैंसर, काला सागर, ढ्बरी टाईट, पासपोर्ट का रंग और देह की कीमत पुस्तक के पहले खंड का हिस्सा हैं। संपादक द्वय नें तेजेन्द्र को एक लेखक के तौर पर ही अधिक अहमियत दी है तथापि पुस्तक में संकलित तेजेन्द्र की कवितायें व ग़ज़लें उत्कृष्ट हैं। एक कवि अथवा शायर के तौर पर तेजेन्द्र पर भले ही बात न होती हो लेकिन उनकी कविताओं में भी एक प्रकार की नवीनता है, उनके प्रयुक्त बिम्ब उधार के नहीं हैं या कि जबरदस्ती ठूंसे हुए। प्रवासी लेखक जैसे शब्दों से तेजेन्द्र को चिढ है इस लिये उनके बिम्बों के प्रवासी-पने को सही शब्द देने की कोशिश समालोचकों को करनी होगी। यह कहना फिर भी अनुचित न होता कि तेजेन्द्र नें जितना हृदय अपनी कहानियों को दिया है उतना अपनी कविताओं को नहीं।

पुस्तक के पहले खंड का चौथा हिस्सा है संवाद। हरि भटनागर से तेजेन्द्र शर्मा की विस्तृत बातचीत संग्रहित है। शीर्षक है “कहानी के लिये विचार आवश्यक है, विचारधारा नहीं” साक्षात्कार यह स्पष्ट करता है कि तेजेन्द्र दरअसल मार्क्सवाद के खिलाफ नहीं हैं, उनकी खिलाफत मार्क्स के नाम पर जारी साहित्यिक खेमेबाजी के विरुद्ध है। साक्षात्कार के प्रश्न इस तरह बुने गये हैं जो तेजेन्द्र की रचना प्रकृया को परत दर परत समझाते हैं। प्रश्न बहुत साधारण प्रतीत होते हैं और लेखक को उलझाने के लिये नहीं गढे गये हैं। तेजेन्द्र नें विस्तृत उत्तर दिये हैं, इतने संपूर्ण कि पूरक प्रश्नों की गुंजायिश कम ही रह गयी है। तेजेन्द्र नें साहित्य, कविता, विदेशों में रचे जा रहे साहित्य पर भी बेबाक राय रखी है। इसी खंड में मोहन राणा के पाच प्रश्न और तेजेन्द्र के उत्तर रोचक बन बडे हैं। सवाल लीक से हट कर हैं और एक कथाकार को कुरेदने की कला मोहन राणा के प्रश्नों में है। स्व. इंदु शर्मा से जुडे संस्मरण साहित्य शिल्पी के पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किये गये थे। इन्हे भी इस पुस्तक में समुचित स्थान दिया गया है।

पुस्तक का दूसरा खंड है “ समीक्षकों/आलोचकों की नजर में”। तेजेन्द्र शर्मा पर इस हिस्से में दौर के कई महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों नें बात की है। राजेन्द्र यादव कहते हैं कि “तेजेन्द्र उन कहानीकारों में हैं जिनकी रचनाओं को आप मुख्यधारा के किसी भी कहानीकार के साथ पढ सकते हैं। उनके अनुभवों का भूगोल ही विस्तृत नहीं है, बल्कि पात्रों की मानसिकता और स्थितियाँ भी अलग होने का रोमांच देती हैं"परमानंद श्रीवास्तव तेजेन्द्र की कहानियों को जीवनधर्मी मानते हैं। उनका कहना है कि कहानियाँ “जीवन के गहरे अंधकार में धसती हैं और जीवन के लिये एक मूल्यवान सच बचा लेती हैं"| प्रेम जन्मेजय की यह बात मायने रखती है कि “ तेजेन्द्र की कहानियों में कथ्य की दृष्टि से जो प्रवासी का दर्द और उसका चिंतन मिलता है वि उसके लंदन जाने के कारण पैदा नहीं हुआ है और न ही उसने ये सोच कर कि लंदन आ गये हैं तो कहानी में प्रवासीपन जोड कर विशिष्ठ हो लिया जाये या फिर प्रवासी होने के आरक्षण का लाभ उठा लिया जाये।“ ज़किया जुबैरी नें अपने आलेख का आरंभ ही बडी रोचकता से किया है जहाँ वे लिखती हैं कि “कहते हैं लेखक कभी नहीं मरता। मेरा मानना है कि तेजेन्द्र शर्मा जैसा लेखक यदि स्वयं को मारने का प्रयास भी करे तो उसका लेखन उसे मरने नहीं देगा” ज्ञान चतुर्वेदी अपने आलेख के अंत में कहते हैं “ ये कहानियाँ इस रूप में तो बेजोड है कि ये प्रवासी भारतीय जगत की कहानियाँ कहती हैं। जो हिन्दी कथा में बहुत कम उपलब्ध है। पर जब कहानी कला, कहानी की भाषा, कहने के तरीके और कहानी के सौन्दर्यशास्त्र पर इन कहानियों को तौलते/ कसते हैं तो ये कहानियाँ बार बार पहुँच कर भी चूक चूक जाती हैं।“ वहीं राजेन्द्र दानी मानते हैं कि “उनकी भाषा में एक नवजात सा भोलापन है पर कथ्य में एक सादगी के साथ एक विश्वदृष्टि विकसित करने की गंभीर सक्रियता है “उर्मिला शिरीष मानती हैं कि “उनकी कहानियों में विषयों की विविधता है चूंकि उनका स्वयं का अनुभव संसार बहुआयामी तथा व्यापक है”| शंभु गुप्त अपने आलेख में जोर देते हैं कि तेजेन्द्र की कहानिया “निजता की पराकाष्ठा लेकिन फिर भी कहानी रचनात्मकता सुरक्षित”। यह आलेख रोचक है तथा तेजेन्द्र की रचनात्मकता का बरीक विश्लेषण करता है।

पुस्तक के इसी खंड से आलेख के अगले अंक में चर्चा करेंगे।

22 comments:

  1. राजीव जी,
    बहुत कुछ समेटा आपने
    और तेजेन्द्र जी की रचनात्मकता के बारे मेँ हम तक यह खँड पहुँचाया - आपका आभार -
    आगे की कडी का इँतज़ार रहेगा
    - लावण्या

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  2. तेजेन्द्र शर्मा जी की जितनी भी कहानियाँ पढी उनसे प्रभावित हुआ। साहित्य शिल्पी पर उनकी दो कहानियाँ आयी थीं फिर बहुत दिनों से उनकी कोई कहानी नहीं प्रकाशित हुई है।

    पुस्तक चर्चा बारीकी से की गयी है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. राजीव जी आपने बहुत पारखी विश्लेषण किया है। यह पुस्तक कहाँ उपलब्ध होगी?

    उत्तर देंहटाएं
  4. अपेक्षा के अनुरूप अच्छी पुस्तक चर्चा।

    उत्तर देंहटाएं
  5. Thanks Rajiv Bhai.

    Alok Kataria

    उत्तर देंहटाएं
  6. RAJIV JEE,
    TEJENDRA SHARMA KE KRITITV PAR
    VIDVAN LEKHKON KE VICHAARON KO
    SMET KAR AAPNE ACHCHHA PRAKASH
    DALA HAI.IS SUNDAR VISHLESHAN KE
    LIYE AAPKO BADHAAEEYAN.

    उत्तर देंहटाएं
  7. "Tejendra Sharma-waqt ke aaine meiN" iss pustak per Rajeevji ne acchi shuruaat kee hai.jab wey sabhee khandoN per review karenge tabhee sahi mayanoN mein sameeksha hogee. nahiN tow 34 articles mein sirf 5 highlight kiye jaate hain baki haashiye per chale jaate haiN.
    jab oonkee personality ko dekhana hai tow sabhee taraf se dekhana hoga naki sirf lekhak. ek baat tow clearly kahoongee ki ek lekhak ka ek accha insaan hona bahut zarooree hai,anyatha woh kisi kaam ka nahin. yadi writer accha insaan nahin hai tow ooska lekhakeey roop apne aap khaariz ho jata hai.

    ummeed hai ki rajeev tejendraji per likhi iss kitab ke sabhee lekhakoN ke articles padhkar sahi aankalan karenge.

    agle bhaag ki prateeksha rahegee.

    उत्तर देंहटाएं
  8. राजीव जी तेजेन्द्र जी को जानने में यह पुस्तक सहायक होगी। आपने जो वाक्यांश कोट किये हैं सभी तेजेन्द्र शर्मा के व्यक्तित्व को सामने ला रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  9. तेजेन्द्र का लेखन कटघरे में खडा किये जाने योग्य है क्योंकि वह साहित्य के वर्तमान ठेकेदारों के प्रतिमानों के अनुरूप नहीं है। तेजेन्द्र की कहानी पढने की शुरुआत करने के बाद आप रह नहीं सकते, आपको उस कहानी से गुजरना ही होगा। इसका कारण केवल रोचकता नहीं वरन कथानक की नवीनता भी है। तेजेन्द्र की कहानी को नकारना तभी संभव है जब आपने उन्हे पढा न हो। तेजेन्द्र पर चर्चा होनी चाहिये, तेजेन्द्र सराहना के हकदार है चूंकि उनकी अपनी ही दशा और दिशा है जिससे गुजर कर कहानी नें नया कलेवर पाया है।

    सारगर्भित है राजीव जी।

    उत्तर देंहटाएं
  10. tejendra ji ki kahaniyon me hamesha naya vishya hota hai .aap ne sahi kaha hai .aap ne bahut si batein likhin hai .bahut kuchh ko apni shashkt lekhni se kagaj pr utara hai aap badhai ke patr hain
    saader
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  11. राजीव जी,
    'वक्त के आईने में' पर आप की समीक्षा पढ़ी. मैंने अभी दो दिन पहले यह पुस्तक समाप्त की है.
    हंस में भी इस पर समीक्षा पढ़ी. आप की अगली कड़ियों का इन्ज़ार रहेगा. फिर मेरी प्रतिक्रिया
    आप तक ज़रूर पहुँचेगी. अभी तक आप ने बहुत बढ़िया लिखा है. मुझे आप के लेख का आनन्द
    इस लिए भी बहुत आ रहा है क्योंकि मैं यह पुस्तक पढ़ चुकी हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  12. तेजेन्द्र जी के बारे में जानने की उत्सुकता हमेशा रहती है...

    बढिया आलेख

    उत्तर देंहटाएं
  13. राजीव जी,

    तेजेन्द्र जी , की पुस्तक पर
    आपका आलेख सारगर्भित है...प्रतीक्षा
    है अगले आलेख की.....

    आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  14. मुझे यह कहना होगा कि मैने बहुत कम एसी समीक्षायें पढी हैं जिसमें लेखक पुस्तक को इतनी गहरायी से निचोडता है।

    उत्तर देंहटाएं
  15. पंकज सक्सेना20 जून 2009 को 1:46 pm

    पुस्तक चर्चा कठिन काम है। राजीव जी आप सफ़ल हुए हैं। आपमें अच्छा आलोचक बनने की क्षमता है।

    उत्तर देंहटाएं
  16. स्वस्थ समालोचना है किताब के प्रति जिज्ञासा बढती है।

    उत्तर देंहटाएं
  17. बहुत अच्छी समीक्षा है, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  18. राजीव जी तेजेंद्र जी के बारे मेंमें जानने की उत्सुकता हमेशा बनी रहती है , यहाँ पर आपने आप ने पुस्तक चर्चा बहुत ही सार गर्भित तरीके से और सयंमित भाषा में की जिससे पुस्तक के प्रति और जिज्ञाषा बढ़ती है
    आप का बहुत बहुत आभार
    सादर
    प्रवीण पथिक

    उत्तर देंहटाएं
  19. Rajiv ji
    Badhai

    Aapnay vistrit sameeksha ka pahla bhaag prakashit kerkay hum per ehsan kiya haye. ek tou Tejendra Sharma aala lekhak haye hi aapnay aur char chaNd laga diye.

    Zakia Zubairi

    उत्तर देंहटाएं
  20. acchee at huyee hai .

    hindi lekhkon ko unka sthaan dilane kee yah ek acchee koshish bhee hai

    good one

    Avaneesh s Tiwari

    उत्तर देंहटाएं
  21. साहित्य शिल्पी को देख कर मई हतप्रभ रह गया. इतनी सुन्दर प्रस्तुति..? इसकी पठनीयता के कारन अब इसे बार-बार देखने का मन करेगा.

    उत्तर देंहटाएं
  22. Tajendr sharma Hindi ka sabse bada kahanikar hai. Mahantam. premchand aur renu se bhi bada.

    उत्तर देंहटाएं

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