कथा यू.के और साहित्य शिल्पी की संयुक्त प्रस्तुति है यह कथा महोत्सव। महोत्सव इस लिये कि इंदु शर्मा अंतर्राष्ट्रीय कथा सम्मान का यह पंद्रहवां वर्ष है। जिन पंद्रह माननीय कथाकारों को यह प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुआ है उनकी रचनायें हम अगले पंद्रह सप्ताह तक लगातार साहित्य शिल्पी के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं अर्थात - पंद्रह बेहतरीन कहानियाँ/उपन्यास अंश। 

इस कडी में आज पहली प्रस्तुति है उपन्यास अंश तबादला। यह उपन्यास अंश कथा यू.के द्वारा प्रकाशित पुस्तक "कथा दशक" से लिया गया है जिसमें संकलित कहानियों का संपादन किया है वरिष्ठ कथाकार सूरजप्रकाश नें। 

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कमलाकान्त जिस बड़े दफ्तर के इस हालनुमा कमरे में बैठे हुए थे उसके गलियारों और दरवाजों पर एक वाक्य मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था-`कृपया तबादलों के बारे में बात न करें।' वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति सिर्फ तबादलों के बारे में बात कर रहा था। किसी को किसी का तबादला करवाना था और किसी को किसी का रुकवाना था। इस कमरे में लोग खचाखच भरे थे और सामने एक घूमने वाली कुर्सी पर बैठे हुए व्यक्ति को एक साथ सम्बोधित कर रहे थे। सामने वाला व्यक्ति अपने चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान लिये धैर्य और सहिष्णुता की साक्षात प्रतिमूर्ति बना बैठा था। एक साथ कई लोगों की बातें सुन रहा था, उनके उत्तर दे रहा था, बीच-बीच में उन्हें हँसा रहा था और खुद भी ठहाके लगा रहा था। वह एक साथ कई लोगों की दरखास्तें पकड़ता, उन पर कुछ लिखता और अपने पी.ए. को पकड़ा देता। लगभग सभी को एक ही जैसा वाक्य सुनने को मिलता- "हो जाएगा...लिख दिया है...आप घर जाइए। आदेश पहुँच जाएगा।"

कागज के पी.ए. के हाथों में पहुँचते ही कागज देने वाले पी.ए. के पास लपकते। पी.ए. के हाथ और होंठ साथ-साथ चल रहे होते। वह हाथों से कागजों को तह लगा कर एक फाइल में लगाता जाता और उसके होंठ जो कुछ बुदबुदाते रहते उसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि अब तो साहब ने लिख दिया है, अब घर जाकर मौज करो, आदेश खुद ही पहुँच जाएगा। पर दरखास्त देनेवाले जानते थे कि आदेश ऐसे नहीं पहुँचता। वे पहले भी ऐसे वाक्य सुन चुके थे। इसलिए वे वहीं मँडराते रहते।

कमलाकान्त यही दृश्य कई बार देख चुके थे। वे सारे शोर-शराबों से निर्लिप्त सिर्फ एकसूत्री कार्यक्रम के तहत कमरे में अपना स्थान बदल रहे थे। वे किसी तरह ऐसी जगह पर बैठना चाहते थे जहाँ से घूमने वाली कुर्सी के इतना करीब पहुँच सकें कि उसे सीधे सम्बोधित किया जा सके। कुर्सी-दौड़ के सिद्धान्त के अनुसार वे जैसे ही आगे कोई कुर्सी खाली होती, उस पर झपट पड़ते। इस दौड़ में उनके अलावा भी कई लोग थे इसलिए निरन्तर सावधानी बरतनी पड़ रही थी। कोई अपनी दरखास्त हाथ में लेकर खड़ा होता कि ये लोग सतर्क हो जाते। जैसे ही उसका एक कदम आगे बढ़ता पीछे से कोई झपटकर उसकी कुर्सी हथिया लेता। एकाध बार तो ऐसा भी हुआ कि दरखास्ती घूमती कुर्सी को व्यस्त देखकर वापस अपनी कुर्सी पर बैठा तो उसने अपने को किसी की गोद में पाया।

पुरानी कहावत है कि सब्र का फल मीठा होता है। कमलाकान्त पूरी तरह इसमें विश्वास करते थे और उन्हें भी तीन घंटे के सब्र का फल मीठा मिलने वाला था कि कमरे में हंगामा हो गया।

रचनाकार परिचय:-


२८ नवम्बर, १९५१ को जिला आज़मगढ़ (उत्तर प्रदेश) में जन्मे विभूति नारायण राय १९७५ बैच के यू.पी.कैडर के आई.पी.एस. अधिकारी हैं।

विशिष्ट सेवा के लिये राष्ट्रपति पुरुस्कार तथा पुलिस मैडल से सम्मानित श्री राय एक संवेदनशील पुलिस अधिकारी के साथ-साथ एक उच्चकोटि के कथाकार के रूप में भी जाने जाते रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास "तबादला" पर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्राप्त हुआ है। उनका उपन्यास "शहर में कर्फ्यू" हिंदी के अलावा अंग्रेजी, पंजाबी, उर्दू, बांग्ला, मराठी आदि में भी अनूदित हो चुका है। उनके एक अन्य उपन्यास "किस्सा लोकतंत्र" के लिये उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का भी सम्मान प्राप्त हुआ है। उपन्यासों के अलावा उनका व्यंग्य-संग्रह "एक छात्र-नेता का रोजनामचा" भी बहुत लोकप्रिय है।

वर्तमान में आप महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति हैं।

अपने ब्लाग "Vibhuti Narain Rai" के माध्यम से वे अंतर्जाल पर भी सक्रिय हैं।

हुआ कुछ ऐसे कि घूमने वाली कुर्सी के सामने दो कागज एक साथ पहुँचे। उसने दोनों पर लिख दिया कि आदेश जारी कर दिए जाएँ पर अचानक एक कागज वाले की निगाहें दूसरे कागज पर पड़ गईं। यह तो शोरगुल से मालूम हुआ कि एक कागज किसी को किसी जगह पर एक वर्ष और रखने से सम्बन्धित था और दूसरा उसी जगह पर नियुक्त व्यक्ति को हटाकर दूसरे को वहाँ नियुक्त करने का अनुरोध लिये था। पहले कागज के साथ दो लोग थे और दूसरे के साथ तीन। इन पाँच लोगों ने एक साथ जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। एक बार तो कमरे में बैठे लोग सहम कर चुप हो गए और घूमने वाली कुर्सी के चेहरे से भी मुस्कान गायब हो गई।

घूमने वाली कुर्सी ने समझाने की कोशिश की कि दोनों अपने हैं। चलो, दोनों को वहीं रख देते हैं।

एक क्षण को लगा कि मामला सुलझ गया है। दोनों पक्षों की आवाज़ें मन्द पड़ गईं। यकायक उस पक्ष को, जो पहले से उस जगह पर काबिज था जिसके लिए झगड़ा हो रहा था, यह अहसास हुआ कि उसे इस कमाऊ जगह पर किसी दूसरे के साथ हिस्सेदारी करनी पड़ेगी। इस पक्ष के तीन लोग थे। उन्होंने अपनी आँख, कान और मुँह जैसी इद्रियों का उदारता के साथ प्रयोग किया और एकदम से कमरा फिर चिल्ल-पों से भर गया। दूसरा पक्ष जिसमें दो लोग थे और जिसने अहसान करने के अन्दाज में कि चलिए आपने कहा तो मान लेते हैं अपनी आवाज़ धीमी कर ली थी, फौरन चौकन्ना हो गया। उसने देश की संसदीय राजनीति का वह मूल मत्र पकड़ा जिसके अनुसार अगर आपके फेफड़ों में ताकत है तो आप कोई भी स्याह सफेद कर सकते हैं। इस पक्ष के दोनों योद्धाओं के फेफड़े कुछ ज्यादा ही मजबूत थे, इसलिए दूसरे पक्ष के महारथी जब चीखते-चीखते खाँसने-खँखारने लगे तब भी वे चिल्लाते रहे और तब तक चिल्लाते रहे जब तक घूमने वाली कुर्सी पर बैठे सज्जन जिन्हें लोग मंत्रीजी की संज्ञा से सम्बोधित कर रहे थे, अचानक अपनी कुर्सी से उठकर अन्दर की तरफ नहीं खिसक गए।
मंत्रीजी के अन्दर लपकने की जाहिर वजह किसी शंका का समाधान था, पर जब वे काफी देर तक बाहर नहीं आए तब लोगों की समझ में आ गया कि वे चाहते थे कि समस्या अपना समाधान स्वयं ढूंढ ले। यह वह नायाब नुस्खा था जिसके बल पर हमारे देश के बाज महापुरुष सालों साल सरकारें चलाते हैं। किसी समस्या के पैदा होने पर शतुरमुर्ग की तरह गर्दन रेत में गड़ा लेने से कुछ समय बाद समस्या खुद अपना हल ढूँढ लेती है। पर यहाँ यह नुस्खा नहीं चला और मंत्रीजी को बाहर निकलना पड़ा।

हुआ कुछ ऐसे कि दोनों पक्षों ने आपसी वाद विवाद को उस बिन्दु पर पहुँचा दिया जहाँ पहुँचने की उम्मीद ऐसे किसी मौके पर हमेशा की जा सकती है।

उस पक्ष ने, जो कमाऊ जगह पर बैठा था, अचानक यह घोषित कर दिया कि अगर उसे इस जगह से अपदस्थ किया गया तो उसकी बिरादरी के जो हजारों-लाखों वोटर थे वे चुप नहीं बैठेंगे और अगले चुनाव में मंत्रीजी को इस अन्याय का सबक सिखाकर रहेंगे।

दूसरे पक्ष ने इससे भी ऊँची आवाज़ में घोषित किया कि बहुत हो चुकी लूट। आखिर कोई हद होती है। एक ही आदमी क्यों उस कमाऊ जगह पर रहे। अगर फौरन वहाँ इनके आदमी को नहीं रखा गया तो उन चौबीस गाँवों में मंत्रीजी का घुसना मुहाल हो जाएगा जहाँ इनकी बिरादरी का बहुमत था।

कमरे में बैठे हर आदमी को लगा, मामला गम्भीर है और जैसी अपनी राष्ट्रीय आदत है, लोग बीच-बचाव करने लगे।
एक सुझाव आया कि दोनों को वहीं रख दिया जाए और कुर्सी का क्षेत्रवार बँटवारा कर दिया जाए। एक आदमी लूटकर दाहिना क्षेत्र चरे और दूसरा बायाँ। इस सुझाव को पहले से नियुक्त पक्ष ने ठुकरा दिया।

दूसरा सुझाव आया कि छह महीने अभी पहले से नियुक्त पक्ष को और रहने दिया जाए। बेचारे को कई लड़कियों की शादी करनी है। इसे दूसरे पक्ष ने अस्वीकार कर दिया। उसे भी तो बाल-बच्चे पालने थे।

यह सिलसिला काफी देर तक चला। सुझाव आते गए और अस्वीकृत होते गए। मंत्रीजी अन्दर शंका समाधान करते रहे। लोग कुर्सियों पर पसर गए। पी.ए. ने चुनाव में उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए कुछ लोगों के लिए चाय मंगा दी। चाय दूसरों ने हड़प ली और उपयोगी लोगों के लिए और चाय आ गई। कुछ लोग बाहर गए और उनकी जगह पर दूसरे आ गए। सब कुछ उसी तरह चल रहा था जिस तरह राजकाज को चलना चाहिए था।

कमलाकान्त इस तरह की स्थिति कई बार झेल चुके थे। अभी पता नहीं कितनी देर यह सब चलेगा। उन्होंने सोचा, झपकी ले लें। वे न जाने कितनी देर तक सोये कि सपना देखने लगे। सपने में उन्होंने देखा कि जिस कमरे में वे बैठे थे,। वह यकायक युद्धस्थल में तब्दील हो गया है। लोग बहस करने के लिए सिर्फ मुँह का नहीं बल्कि हाथ-पैरों का भी इस्तेमाल करने लगे हैं। कोई किसी के परिवार की महिलाओं के बारे में कसीदे पढ़ रहा है तो कोई दूसरे के शरीर पर पटक कर कुर्सियाँ तोड़ने का प्रयास कर रहा है। एक रणबाँकुरे को जब कोई कुर्सी नहीं मिली तो उसने कमलाकान्त की कुर्सी हिलाने की कोशिश की। कमलाकान्त ने हड़बड़ाकर आँखें खोलीं तो पाया कि वे सपना नहीं देख रहे हैं, कमरा सचमुच क्षत-विक्षत योद्धाओं और विकलांग कुर्सियों से भरा हुआ था।

हुआ कुछ ऐसे कि दोनों पक्षों के वाद-विवाद से ऊबकर कुछ लोगों का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने भी घोषित कर दिया कि मत्रीजी पर सिर्फ इन्हीं दोनों पक्षों का हक नहीं बनता है। उन्होंने भी चुनाव में मत्रीजी के पसीने पर अपना खून बहाया है। इसलिए अगर इनके काम के सम्बन्ध में आज सहमति नहीं बन पा रही तो ये दोनों पक्ष कुछ देर बैठें। दूसरे लोगों के कागजों पर आदेश हो जाने तक मत्रीजी इन लोगों का भी अला-भला कर देंगे।

ऐसे समय में जो हो सकता था, वही हुआ। युद्धरत दोनों पक्षों में सुलह हो गई और उन्होंने दूसरे लोगों के खिलाफ साझा मोर्चा खोल दिया। उनमें से एक पक्ष पिछले सात दिन से राजधानी में पड़ा था और अब जाकर उसे मंत्रीजी से मिलने का मौका मिला था। दूसरा दस दिन से ज्यादा धूल फाँकने के बाद यहाँ तक पहुँच सका था। यह बात और थी कि यह धूल इस पक्ष ने शहर के सबसे आलीशान होटल में फाँकी थी। इस पक्ष के एक व्यक्ति को छोड़कर जिसकी जेब से इस धूल का बिल अदा हो रहा था, शेष दोनों को कोई आपत्ति नहीं थी कि यह मामला अगले कुछ दिनों तक लटका रहे। पर इन दोनों के कमजोर पड़ते ही बिल वाला उन्हें कुछ ऐसी चीजें याद दिला देता जिससे उनकी आवाजें फिर तेज़ हो जातीं। दोनों पक्ष अड़ गए कि पहले उनका फैसला हो जाए। दूसरे लोग इस राय के थे कि ये दोनों चुपचाप बैठ जाएँ और पहले और सबका काम हो जाए, तब इनकी बात सुनी जाए।

मंत्रीजी रात को दौरे पर जाने वाले थे और अगले कुछ दिनों तक फिर उनके दर्शन नहीं होते इसलिए कोई भी अपने मामले को बाद के लिए नहीं टालना चाहता था। बहस का अन्त इस युद्ध में हो सकता था और इसी में हुआ।

पर युद्ध का एक लाभ भी हुआ। कमलाकान्त ने जब आँखें खोलीं तो मंत्रीजी अपनी शंका का समाधान कर कमरे में वापस प्रवेश कर रहे थे।

मंत्रीजी के कमरे में प्रवेश करने पर न जाने कहाँ से उनके चपरासी, शैडो वगैरह उपस्थित हो गए। उन्होंने कुर्सियाँ ठीक कर दीं। लोग फिर उन पर बैठ गए और उनके हाथों में फिर से कागज़ लहराने लगे।

कमलाकान्त ने ऐसी कुर्सी हथिया ली जिस पर बैठा आदमी अपना कागज़ हाथ में लेकर खड़ा हो गया था और जो मंत्रीजी के ठीक बगल में थी। खड़े आदमी को लगा कि अभी नम्बर देर में आएगा, इसलिए वह वापस कुर्सी पर बैठ गया। कुर्सी पर क्या कमलाकान्त की गोदी में बैठ गया। वह कुछ देर तक इस उम्मीद में बड़बड़ाता रहा कि कमलाकान्त कुर्सी छोड़कर उठ जाएँगे पर बेशर्मी की इस लड़ाई में कमलाकान्त जीत गए। वह आदमी उठकर मेज पर पूरी तरह झुक गया और तब तक खड़ा रहा जब तक उसका कागज़ मत्री के हाथ से पी.ए. तक नहीं चला गया। फिर वह पी.ए. की तरफ चला गया।
इस बीच दोनों युद्धरत पक्ष फिर से अपनी पुरानी घोषणा दोहराने लगे जिसके मुताबिक उन्होंने मत्रीजी के लिए पिछले चुनावों में अपना खून-पसीना एक कर दिया था। पर इस बार लगता है, मत्रीजी उनके क्षेत्र में नहीं घुसना चाहते हैं। ठीक है अब मुलाकात चुनाव में होगी। उन्होंने बार-बार बाहर जाने का इरादा दोहराया और अपनी कुर्सी पर जमे बैठे रहे।

मत्रीजी दूसरों के कागजों पर दस्तखत करते रहे और युद्धरत पक्षों को हँसाने के लिए चुटकुले सुनाते रहे जिस पर उनके पी.ए. और चपरासी तो खूब हँसे पर लड़ने वालों ने हँसने से मना कर दिया। अन्त में मत्रीजी ने अपने पी.ए. के कान में कुछ कहा, पी.ए. ने दोनों पक्षों के नेताओं के कानों में कुछ कहा, नेताओं ने अपने अनुयायियों के कानों में कुछ कहा, फिर दोनों पक्षों के एक -एक आदमी ने मत्रीजी के कान में कुछ कहा और फिर मत्रीजी ने अपनी पी.ए. के कान में कुछ कहा। काफी देर तक वह स्थिति रही जिसे भाषा के अध्यापक कानाफूसी कहते हैं। इस बीच लोग अपने कागज भी बढ़ाते रहे और मत्रीजी उन पर दस्तखत भी करते रहे। एकाध बार ऐसा भी हुआ कि कानाफूसी करते हुए मत्रीजी ने दरखास्ती के हाथ पर दस्तखत कर दिए। फिर दोनों हँस दिए और मत्रीजी ने उसके कागज पर भी दस्तखत कर दिए।

कानाफूसी हमारे देश की राष्ट्रीय विधा है। संसद से लेकर डिनर डिप्लोमेसी तक इसकी छटा दिखाई पड़ती है। कानाफूसी शुरू हुई और कमलाकान्त ने राहत की साँस ली। उन्हें लगा, अब मामला तय हो गया और उन्हें कुछ कहने का मौका मिल जाएगा। मामला सचमुच तय होने के कगार पर आ गया था। मत्रीजी का पी.ए.दोनों पक्षों को अन्दर के एक कमरे में ले के चला गया।

कमलाकान्त कुछ मायूस हो गये। दरअसल अन्दर के कमरे में वे जाना चाहते थे। अन्दर का कमरा छोटा था पर बड़े फैसले वहीं होते थे।

मत्रीजी तेजी से कागज़ों का निस्तारण करने लगे। कमलाकान्त समझ गए कि वे अब अन्दर के कमरे में जाने के लिए उठेंगे। समय कम था और मत चूको चौहान की तर्ज पर उन्होंने कुछ तीर छोड़े। ये तीर मुख, उँगलियों और आँखों की मदद से कुछ इस तरह छोड़े गए कि वे रहस्यवादी कला समीक्षकों के लिए नए प्रतिमान पेश कर सकते थे। थोड़ा कहना ज्यादा समझना और कई बार मुँह से कुछ न कहना, सिर्फ आँखों और उँगलियों से मतलब सम्प्रेषित कर देना-अगर मत्रीजी और कमलाकान्त के बीच जो संवाद हुआ उसे परिभाषित करना हो और उसे एक वाक्य में कहना हो तो इसी तरह कहा जाएगा।
एक-दूसरे से डेढ़ फुट के फासले पर बैठे दोनों पक्षों के बीच हुई बातचीत कुछ इस तरह थी।

कमलाकान्त ने कागजों पर दस्तखत करते हुए मत्रीजी को कनखियों से देखते हुए जो कुछ दीवारों से कहा उसका मतलब समझने वाले के लिए साफ था कि खादिम आप से बाहर नहीं है। जैसा हुकुम देंगे तामील हो आएगी।

मत्रीजी ने सामने पड़े कागज़ पर आदेश कुछ ज्यादा लम्बा लिखा और वही भाव बनाए रखा जो कमलाकान्त के कमरे में घुसने के बाद से बनाए हुए थे और अब भी वे कमलाकान्त के कमरे में अस्तित्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। उन्होंने कलम चलाते-चलाते हवा में न जाने किसे सम्बोधित किया कि पिछले चुनाव में खबर भेजने पर भी लोग दिखाई नहीं दिए और अब दर्शन दे रहे हैं।

कमलाकान्त ने कुछ अज्ञात दुश्मनों को कोसा जिन्होंने बार-बार कोशिश के बावजूद उन्हें मत्रीजी से मिलने नहीं दिया था और मत्रीजी की सेवा की उत्कट अभिलाषा अपने दिल में लिये हुए हर बार उन्हें वापस लौटना पड़ा था।

मत्रीजी के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। वे दूसरी दरखास्त पर और लम्बा आदेश लिखने लगे।

कमलाकान्त ने भारतीय रेल और प्रादेशिक रोडवेज के टाइम टेबलों का पाठ करना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि फलाँ-दिन जब अलाँ ट्रेन से वे मत्रीजी की कोठी के लिए रवाना हुए तो ट्रेन अपनी आदत के मुताबिक कितने घंटे लेट थी और उनके पहुँचने के बस तीन मिनट पहले मत्रीजी अपनी कोठी से निर्वाचन क्षेत्र के लिए निकल चुके थे। मत्रीजी के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया तो उन्होंने फिर बताया कि अमुक-दिन तमुकजी के साथ वे रोडवेज बस से समय से घर से रवाना हुए लेकिन जैसा कि मत्रीजी जानते हैं कि रोडवेज की कोई बस भी रास्ते में बिना मुसाफिरों से धक्का लगवाए अपनी मंजिल पर नहीं पहुँचती, यह बस भी रास्ते में एक बार पंक्चर हुई, एक बार इसका ब्रेक फेल हुआ और एक बार ऐसी स्थिति में पहुँच गई जिसे मत्रीजी चाहे तो उलटना कह सकते हैं। इसके बाद भी जब वे मत्रीजी को कोठी पर पहुँचे तो मत्रीजी सिर्फ चार मिनट पहले हवाई अड्डे के लिए रवाना हो चुके थे।

इस कारुणिक यात्रा वृतान्त का भी मत्रीजी पर कोई असर नहीं हुआ। वे अगले कागज पर और लम्बा आदेश लिखने लगे। ऐसा लगता था कि वे भाषा के कठिन उलझाव में डूबे हुए थे और एक बार सिर उठा कर कमलाकान्त की तरफ देखते ही उनकी भाषा भ्रष्ट हो आएगी।

कुर्सी पर मत्रीजी के पृष्ठ भाग ने कुछ ऐसी हरकतें कीं कि कमलाकान्त समझ गए कि वे अब उठने ही वाले हैं। कमरे में मौजूद मुलाकातियों में भी हलचल मच गई। वे सारे घूमनेवाली कुर्सी के इर्द-गिर्द खड़े हो गए।

समय कम था। कमलाकान्त ने अब मुँह के साथ हाथों और उंगलियों का भी प्रयोग करना शुरू कर दिया। सम्प्रेषण की यह विधि भाषा की सीमाओं को तोड़ने के लिए होती है। साहित्य में अभी तक इसका प्रयोग नहीं हो पाया है इसलिए बार-बार सम्प्रेषणीयता के संकट की बात होती रहती है।

कमलाकान्त ने कुहनियाँ मजबूती के साथ मत्रीजी के सामने मेज पर टिकाईं, अपने मुँह को गोल-गोल घुमाया। आँखों में खास तरह की चमक पैदा की और अपनी उँगलियों को एक-दूसरे पर इस तरह रगड़ा कि उनसे सिक्कों के खनकने की याद आने लगी। इन सारे प्रतीकों के साथ उन्होंने भाषा का एक वाक्य भी कहा, "मैं आपसे बाहर थोड़े हूँ। जो हुक्म देंगे। तामील हो जाएगी।"

जिस समय यह वाक्य कहा गया, मत्रीजी के सर, कन्धों, हाथ, सामने की मेज और कुर्सियों पर हर तरफ लोग लदे हुए थे। वे एक साथ बोल रहे थे। उनके हाथों में अलग-अलग रंगों और आकारों के झंडों जैसे कागज़ लहरा रहे थे। इस मछली बाजार में लोगों की भीड़ के बीच में मजबूती से इतनी जगह बनाते हुए कि उनके कोहनी पर टिके सर में अवस्थित आँखें सामने बैठे मत्रीजी की आँखों से संवाद कर सकें, उनकी उँगलियाँ इस तरह की हरकत करती रहें कि मत्रीजी को किसी बैंक में नोट गिनने का भ्रम हो सके और गोल-गोल घूमते हुए होंठों से निकला वाक्य फुसफुसाहट और शोर के बीच इतनी ध्वनि पैदा कर सके कि सामनेवाला सुन भी ले और अनसुना होने का भ्रम भी पैदा कर सके, उन्होंने जो अन्तिम वाक्य कहा उसका असर यह हुआ कि मत्रीजी ने अपने पी.ए. के कानों में कुछ कहा। पी.ए. कमलाकान्त की तरफ बढ़ा पर तब तक कमलाकान्त छोटे कमरे की तरफ बढ़ चले थे। जब वे छोटे कमरे के दरवाजे पर पहुँच कर अन्दर बैठने के लिए जगह तजवीज कर रहे थे तब पी.ए. ने उनके कान में कहा कि वे इस कमरे में बैठ जाएँ जिसे कमलाकान्त ने बड़ी सहृदयता से स्वीकार कर लिया और प्रत्युत्तर में पी.ए. के कान में कुछ ऐसा कहा कि वह खुश हो गया। मुस्कुराता हुआ पी.ए. वापस गया और कमलाकान्त ने एक सोफे पर आठवें व्यक्ति के रूप में अपना पृष्ठ भाग टिका दिया। वे भारतीय रेल के उस दर्शन में विश्वास करते थे जिसके मुताबिक किसी सीट को यदि आप अपने पृष्ठ भाग से छू दें तो वह खिंच कर इतनी बड़ी हो जाती है कि आप उस पर बैठ भी सकते हैं।

कमरे में पहले से बैठे हुए लोग दोनों युद्धरत कैम्पों के लोग थे। बाहर की कटुता समाप्त हो गई थी और वे हँस-हँसकर एक दूसरे से बतिया रहे थे। दरअसल पूरे कमरे में सिर्फ दो ही लोग तनावग्रस्त थे। ये वे थे जिनके तबादला होने या न होने को लेकर थोड़ी देर पहले का महाभारत हुआ था। उनके साथ जो लोग थे वे मस्त थे। मस्ती उनके होंठों से पान की पीक या मुँह से खट्टी डकारों के रूप में निकल रही थी। वे पिछले कुछ दिनों से इन दो तनावग्रस्त प्राणियों को चर रहे थे और मस्त थे। दरअसल वे उस प्रजाति के जन्तु थे जिनका जन्म ही दूसरों की सेवा के लिए होता है। साल भर भाँति-भाँति के दुखियारे उनकी शरण में आते रहते हैं जिनमें किसी को तबादला करवाना होता है, किसी को तबादला रुकवाना होता है, किसी का लाइसेंस या परमिट अटका पड़ा है तो किसी को किसी मुकदमे में मदद चाहिए होती है। वे इन दुखी जनों का दुख दूर करते हैं और मस्त रहते हैं।

ये मस्त लोग एक ही पेशे के थे, इसलिए एक दूसरे को जानते थे। वे कई बार एक साथ किसी मामले की पैरवी के लिए इस छोटे कमरे में बैठे थे। दरअसल वे उन वकीलों की तरह थे जो अलग-अलग मुकदमों में एक-दूसरे के खिलाफ या साथ खड़े होते हैं और फिर बाहर कचहरी की कैंटीन में साथ-साथ चाय पीते हैं और गप्पें लड़ाते हैं। मस्त लोग एक-दूसरे से मज़ाक करने लगे और ठहाके लगाने लगे।

मस्त लोगों की मस्ती से उनके दोनों मुअक्किल दुखी हो गए। जब कोई ठहाका लगता वे घबराकर अपने पैरोकारों को निहारते। उन्हें लगता कि ठहाकों की झील में उनके पैसे और सम्भावनाएँ डूबती जा रही हैं।

कमलाकान्त इस समय तक आराम से सोफे पर अपने बैठने की जगह बना चुके थे। पर अचानक उन्हें लगा कि यह जगह रणनीति के लिहाज से उचित नहीं है। यद्यपि कमरा छोटा था पर इसमें भी सबसे अन्त में बैठना उचित नहीं था। उन्हें किसी तरह मत्रीजी के सोफे के पास वाले सोफे पर जगह चाहिए थी।

कमरा खासा छोटा था। एक छोटा सा दीवान मत्रीजी के लिए दीवार से सटाकर रखा था। उसके सामने एक सेंट्रल टेबल थी और टेबल के दोनों तरफ एक-एक लम्बा सोफा रखा था। इन सोफों पर आराम से तीन-तीन लोग बैठ सकते थे पर जिस सोफे पर कमलाकान्त बैठे थे उस पर आठ लोग बैठ चुके थे। सामने वाले पर भी सात लोग थे। कमरे में आने पर पता चला कि इन दो युद्धरत पक्षों के अलावा और भी कई लोग थे जिनके फैसले इस छोटे कमरे में हो सकते थे और वे पहले से वहाँ थे।

कमलाकान्त को लगा कि उन्हें मत्रीजी के आने के पहले दीवान के पास पहुँच जाना चाहिए। वे उठे और बाहर आ गए।
बाहर कमलाकान्त को मत्रीजी का चपरासी दिखाई दे गया। वह कमलाकान्त को जानता था और कमलाकान्त उसे जानते थे। कमलाकान्त ने तपाक से उसके कन्धे पर हाथ रखा और उसके बाल-बच्चों का हाल-चाल पूछा। हर भारतीय की तरह उसने अपने परिवार की जिम्मेवारी भगवान पर डाल रखी थी, इसलिए उसने ऊपर की तरफ नज़र उठा दी। कमलाकान्त ने उसे दोनों लड़कों की मिठाई के लिए दस-दस के दो नोट दिए। उसने नोट इत्मिनान से अपने अचकन की जेब में रखते हुए यह जानकारी दी कि उसके तीन बेटे हैं। कमलाकान्त ने उसे बताया कि बच्चे तो भगवान की बरक्कत होते हैं और इस बात की शिकायत की कि उसने तीसरे बेटे के जन्म के बारे में पिछली मुलाकात पर नहीं बताया था। चपरासी ने बताया कि पिछली मुलाकात, जो न उसे याद थी कि कब हुई थी और न कमलाकान्त को, पर उन्हें बताया तो था कि उसकी बीवी उम्मीद से है। कमलाकान्त ने अपनी स्मरणशक्ति कम होते जाने की शिकायत की और एक दस का नोट निकालकर चपरासी को थमा दिया। चपरासी ने अपने सत्रह साल के तीसरे बेटे के लिए भी मिठाई खरीदने की सहमति जताते हुए पैसा रख लिया।
इसके बाद चपरासी ने जो कमाल दिखाया उसे देखकर कोई भी शर्त लगा सकता था कि सचिवालय में आने के पहले वह जरूर किसी सर्कस में काम करता रहा होगा। उसने उस ठसाठस भरे हुए कमरे में मत्रीजी के दीवान के ठीक बगल में एक कुर्सी स्थापित कर दी। इसकी वजह से यह जरूर हुआ कि उसने दो लोगों के पैरों की उँगलियाँ कुचलीं, एक के सर की मजबूती की जाँच की और थोड़ी देर तक हवा में इस तरह लटका रहा कि निश्चय के साथ यह कहना मुश्किल था कि वह करतब दिखाकर कमरे में बैठे लोगों का मनोरंजन कर रहा है या फिर सोफों के ऊपर बैठे कुछ लोगों को उनके नीचे ढकेलकर वहाँ कुछ जगह बनाना चाहता था।

कुर्सी स्थापित करने से अधिक मुश्किल था उस पर कमलाकान्त को स्थापित करना। कुर्सी जैसे ही रखी गई उस पर बैठने के लिए दो लोग लपके। कमलाकान्त पीछे रह गए और आगे बैठे हुए एक सज्जन उस पर बैठ गए। कमलाकान्त ने असहाय नज़रों से चपरासी की तरफ देखा। उसकी जेब में मिठाई के लिए पड़े तीन नोट कुछ इस तरह फड़फड़ाए कि चपरासी की जिह्वा पर सरस्वती का वास हो गया। कुर्सी पर बैठे सज्जन दो ही वाक्यों की मार से सहमकर वापस सोफे पर आ गए। वे मत्रीजी के क्षेत्र में जरूर थे पर चपरासी तो सचिवालय नामक इमारत का अभिन्न भाग था। जब मत्रीजी नहीं थे तब भी वह यहीं था और जब मत्रीजी नहीं रहेंगे, तब भी वह यहीं रहेगा।

कमलाकान्त ने कुर्सी पर बैठकर एक बार फिर कमरे का निरीक्षण किया। मत्री के चपरासी द्वारा उनके लिए कुर्सी रखने और फिर उस पर उन्हें बिठा देने से उनका रुतबा बढ़ गया था। कमरे में बैठे लोग उन्हें उत्सुकता, प्रशंसा और ईर्ष्या के मिले-जुले भावों से निहार रहे थे। कमलाकान्त को लगा कि ये सब क्षुद्र लोग हैं जिनसे आँखें मिलाने का कोई मतलब नहीं है, इसलिए वे सामनेवाली दीवार को घूरने लगे और उनका मस्तिष्क अलग रणनीति बनाने में व्यस्त हो गया।

कमरा पारसी थिएटर के स्वगत कथन के सिद्धान्त पर बजबजा रहा था। इस सिद्धान्त के मुताबिक गोपनीय और नितान्त व्यक्तिगत बातें इस आशा से जोर-जोर से बोल कर की जाती हैं कि उन्हें बोलनेवाले के अलावा मंच पर मौजूद कोई पात्र नहीं सुन रहा है। कमरे में ठुँसे हुए लोग एक साथ बोल रहे थे, जोर-जोर से बोल रहे थे और अलग-अलग विषयों पर बोल रहे थे। एक-दूसरे को काटती और पछाड़ती हुई आवाज़ें दीवारों से टकरातीं, सोफों पर रेंगतीं, जमीन पर पसर जातीं, पर उन कानों तक पहुँच ही जातीं जिनके लिए वे बोली गई होतीं। इस पूरे माहौल में सिर्फ कमलाकान्त निर्लिप्त बैठे थे। भीड़ में उनका कोई पैरोकार नहीं था, इसलिए उन्हें वहाँ बैठे सभी लोग ओछे लग रहे थे। यहाँ तक कि उनकी बातें सुनने का प्रयास करते दीखना भी ओछा था, इसलिए वे सिर्फ सामने ताकते रहे और बातों में केवल वही अंश पकड़ते रहे जिनमें मत्रीजी के अगले कुछ दिनों तक राजधानी और उसके बाहर आने-जाने की सूचनाएँ निहित होती थीं।

कमरे में मत्रीजी का प्रवेश हुआ और जैसा होना था, कमरे की आवाज़ें खामोश हो गईं।

लोग खड़े हो गए, जिस कमरे का वर्णन करते समय सबसे पहले यह कहा जाता कि उसमें तिल रखने की जगह नहीं थी, उसमें मत्रीजी न सिर्फ प्रवेश कर गए बल्कि बिना हाथों पर उठाए हुए अपने पाँवों पर चलकर दीवान तक पहुँच भी गए और बैठ गए।

"हाँ...बताइए!"

यह मत्रीजी का तकिया कलाम था। उन्हें जानने वाले जानते थे कि इसका कोई मतलब नहीं है, इसलिए किसी ने कुछ नहीं बताया।

मत्रीजी ने दीवान पर पड़े तौलिए के टुकड़े से अपने चेहरे पर किसी काल्पनिक वस्तु को पौंछना शुरू कर दिया। कमरे में बैठे लोगों में से कुछ खाँसे-खँखारे, कुछ ने अपने शरीर के पृष्ठ भाग को हिला-डुलाकर यह सुनिश्चित किया कि वे हवा में लटके हुए नहीं हैं और फर्नीचर की श्रेणी में आनेवाली किसी वस्तु पर टिके हुए हैं। जिनके काम थे उन्होंने बेचारगी से अपने महँगे पैरोकारों की तरफ देखा और उन्हें तरह-तरह के इशारों से बोलने के लिए प्रेरित किया। मत्रीजी ने तौलिया वापस दीवान पर रखते हुए एक बार फिर कहा- 
"हाँ...तो बताइए!"
किसी ने कुछ नहीं बताया।

थोड़ी देर तक कमरा निरर्थक बातों से गूँजता रहा। लोगों ने मत्रीजी को इलाके में बारिश के बारे में बताया, सड़कों की मरम्मत में होनेवाली देरी पर रोष व्यक्त किया, फसली कीड़ों के सम्बन्ध में अपने ज्ञान का आदान-प्रदान किया। मत्रीजी दिलचस्पी से सुनते रहे और बीच-बीच में अपनी भागीदारी जाहिर करने के लिए कुछ न कुछ बोलते भी रहे।

सभी जानते थे कि मत्रीजी दुनिया की तमाम चीजों में बिना दिलचस्पी के दिलचस्पी दिखा सकते थे। मत्रीजी भी जानते थे कि लोग यहाँ बारिशों, सड़कों या फसली कीड़ों पर बातें करने नहीं आए थे। वे बीच-बीच में टेक की तरह कहते रहे-
"और बताइए...साहब!"

किसी ने कुछ नहीं बताया और यह स्पष्ट हो गया कि कोई भी पहले कुछ नहीं कहना चाहता। सबको उम्मीद थी कि दूसरे चले जाएँगे और केवल वे रह जाएँगे तब अपनी बात अकेले में मत्रीजी से करने का मौका उन्हें मिलेगा और वे अपनी बात करेंगे।

जाहिर था कि ऐसा समय आसानी से नहीं आनेवाला था।

मत्रीजी ने अपने बाएँ बैठे शख्स को देखा और मुस्कुराए। मत्रीजी के बाएँ बैठा शख्स भी मुस्कुराया। फिर मत्रीजी ने अपने दाएँ बैठे और सामने बैठे व्यक्तियों के लिए भी यही क्रिया सम्पादित की। उन्होंने भी `कोई उधार नहीं रखना चाहिए' सिद्धान्त के अनुसार अपने दाँत दिखा दिए। फिर मत्रीजी ने कमलाकान्त वर्मा की तरफ देखा। कमलाकान्त पहले ही मुस्कुरा दिए, इसलिए मत्रीजी नहीं मुस्कुराए। वे उठे और इस छोटे कमरे से भी छोटे एक-दूसरे कमरे में चले गए। यह छोटा कमरा इस छोटे कमरे का अटैच बाथरूम था और नई स्थापत्य कला के अनुरूप हर महत्त्वपूर्ण कमरे के साथ जुड़ा रहता था।

मत्रीजी ने जाते-जाते अपने शरीर के न जाने किस अंग से कौन सा इशारा किया कि उनके पीछे-पीछे कमलाकान्त भी उठकर दूसरे और छोटे कमरे में चले गए।

दरअसल इस खेल में वाणी से अधिक इशारों का महत्त्व था। कमलाकान्त पुराने खिलाड़ी थे, इसलिए वे एक साथ सामनेवाले के हाथ, नाक, आँख, कान, जिह्वा सब पर नज़र रखते थे। मंत्रीजी ने उठते-उठते अपने सिर को जैसे झटका और फिर हवा में फटकारा, उसे सिर्फ कमलाकान्त ही समझ सकते थे।

अन्दर वाश बेसिन और कमोड के बाद जो जगह बचती थी वह बस इतनी थी कि उसमें कमलाकान्त और मंत्रीजी एक-दूसरे से लगभग सटकर खड़े हो सकें। सामने के वाश बेसिन पर लगे शीशे में उनके चेहरे कुछ-कुछ विकृत से नजर आ रहे थे। इस कमरे में वे पहली बार कोई डील कर रहे थे, इसलिए कमलाकान्त को बीच-बीच में शीशे में देखकर लगता कि उनके अतिरिक्त भी कमरे में कोई है। वे थोड़ा सहम जाते पर मत्रीजी के लिए यह कमरा पुराना वार्तास्थल था इसलिए वे सहज ढंग से बात कर रहे थे।

दोनों वार्ताकारों के बीच वार्ता संक्षिप्त वाक्यों के रूप में फुसफुसाहट के साथ हो रही थी। अक्सर एक ही वाक्य बार-बार दोहराया जाता।

"मैं आपसे बाहर थोड़े हूँ। जो हुकुम देंगे हो जाएगा।"
"भाई जो मौके पर गायब हो जाए, उसका क्या भरोसा?"
"जो हुकुम देंगे हो जाएगा।"
"मौके पर गायब हो गए।"
"मैं आपसे बार थोड़े हूं। जो हुकुम...।"

थोड़ी देर में छोटा गुसलखाना बाम्बे स्टाक एक्सचेंज में तब्दील हो गया। फर्क सिर्फ इतना था कि बोलियाँ ऊँचे स्वर की जगह नीचे स्वरों में लग रही थीं-

"पच्चीस।"
"नौ।"
"पच्चीस।"
"मैं आपसे बाहर थोड़े हूँ...चलें दस...।"
"बाइस।,"
"जो हुक्म देंगे बाद में कर देंगे...दस इस बार।"
"इस बार हुक्म...बीस से कम नहीं।"

एक आवाज उत्तेजित होकर डाँट रही थी, दूसरी दीन स्वर में गिड़गिड़ा रही थी।

दोनों आवाज़ें एक-दूसरे को तौल रही थीं, परख रही थीं और दुकानदारी के सिद्धान्त के मुताबिक बेस्ट बारगेन करना चाह रही थीं।

अचानक उत्तेजित आवाज ने अपने हाथ को कुछ इस तरह से झटका जिसका मतलब यह भी हो सकता था कि उसने अपने कोई मक्खी उड़ाने की कोशिश की है और यह भी कि गिड़गिड़ाती आवाज अब बाहर निकल जाए। कमलाकान्त ने मान लिया कि कोई मक्खी उड़ाई गई है।

"बारह कर दें सर। अगली बार जो हुकुम देंगे जो जाएगा।"
"बीस से एक कम नहीं।"

मंत्रीजी ने इस बार दुकानदारी का वह दाँव खेला जिससे कमलाकान्त एकदम चित होते-होते बचे। उन्होंने अपने पैरों और धड़ को इस तरह हिलाया कि वे अब चलनेवाले हैं। दुकानदारी का पुराना सिद्धान्त दोहराया गया कि लेना हो तो लो वरना हम दुकान बढ़ाते हैं। कमरे में इतनी जगह नहीं थी कि मं त्रीजी कुछ कर सकते। पर उनका कदमताल कुछ ऐसा था कि लगा कि वे कमोड की तरफ बढ़ रहे हैं। उनका हाथ भी अपने जामे के नाड़े की तरफ जाने लगा तो कमलाकान्त घबराए। उन्हें लगा मत्रीजी कहीं कमोड पर बैठ न जाएँ। उन्होंने घबराकर मत्रीजी को लगभग घसीट-सा लिया।

"एक मौका और दें सर...आपसे बाहर थोड़े हैं...बारह कर दें...फिर आगे और देख लेंगे।"
"अठारह से कम नहीं। नहीं देना है तो..."
मत्रीजी फिर कमोड की तरफ चले।

"चलो सर आपकी भी बात रह जाए और मेरे बच्चों के पेट पर भी लात न पड़े...पद्रह कर देते हैं।"
"आप भी इंजीनियर साहब बनियों की तरह बात करते हैं। चलिए सोलह ठीक है। इसके बाद तो मौके पर आप दिखाई नहीं देंगे।"
"हें...हें...हें...आप भी सर मज़ाक करते हैं। आपसे बाहर कब रहा मैं। वो तो..."

कमलाकान्त ने एक बार फिर भारतीय रेलों और रोडवेज की बसों को कोसना शुरू किया जिन्होंने पिछली बार चाहते हुए भी उन्हें मंत्रीजी की सेवा का मौका नहीं दिया था। पर मत्रीजी ने हाथ मे उन्हें बरज दिया।

कमलाकान्त ने सौदे की अन्य शर्तें, मसलन उन्हें कब तक तबादला रुकने का आदेश मिल जाएगा और बदले में तय राशि कहाँ पहुँचानी होगी, भी अभी तय करने की कोशिश की पर मंत्रीजी को देर हो रही थी। बाहर बैठे लोगों को तरह-तरह की बातें बनाने का मौका मिल रहा था, इसलिए वे कमलाकान्त से यह कहकर कि वे शाम को उनकी कोठी पर आएँ, सचमुच कमोड की तरफ बढ़ गए।

कमलाकान्त सीधे सर उठाए छोटे कमरे से बाहर निकल आए। उन्हें इस तरह मत्रीजी के पीछे अन्दर जाते और फिर बाहर आते देखकर बैठे हुए लोगों ने ईर्ष्या से देखा। उनमें से कुछ ने उनहें आदरपूर्वक नमस्कार भी किया पर कमलाकान्त बिना दाएँ-बाएँ देखे बाहर आ गए।

बाहर चपरासी खड़ा था। कमलाकान्त ने इस बार फिर उसे दोनों लड़कों को पान खिलाने के लिए दस-दस के नोट दिए। चपरासी ने याद दिलाते हुए फिर बताया कि उसके एक लड़का और भी है। कमलाकान्त ने फिर जेब में हाथ डाला पर इस बीच बातचीत में चपरासी ने भेद खोल दिया कि रात में साहब की कोठी पर उसकी ड्यूटी नहीं है। कमलाकान्त ने जेब से हाथ निकाल लिया। वे कुछ फुसफुसाए। इसका परोक्ष मतलब चपरासी ने यह निकाला कि वह परले दर्जे का मूख है। अगर कुछ देर बाद अपनी रात की ड्यूटी के बारे में बताता तो कमलाकान्त उसके तीसरे लड़के के पान का पैसा नहीं मारते।
*******

14 comments:

  1. भ्रष्टतंत्र के निगिशियेशन सिस्टम का आपने पर्दाफाश शैली में वर्णन विवेचन किया है।

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  2. बहुत सुन्दर उपन्यास अंश प्रस्तुत हुआ है जो अपने आप में पूरी कहानी है। कमलकांत के माध्यम से भ्रष्टाचार का रेखाचित्र इस उपन्यास अंश में खिंच गया है।

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  3. नेट पर इतना लम्बा उपन्यास अंश एक साथ पढना आसान नहीं लेकिन यह अंश इतना रुचिकर लगा कि एक बार में ही पूरा पढ गयी। इस अंश में पूरी कहानी है, रोचकता है। व्यवस्था पर दु:ख होता है।

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  4. अच्छी उपन्यास अंश है, बधाई।

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  5. लोकतंत्र में लोग जुगाड बाजी कर या फ़िर भ्रष्ट कुर्सीधारियों से मिल जुल कर अपने काम सिद्ध कर रहे हैं और देश की जनता का खून चूस रहे हैं.

    सुन्दर रुचिकर उपन्यास अंश.

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  6. विभति नारायणराय के इस उपन्‍यास अंश को प्रस्‍तुत करने के लिए हार्दिक आभार।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  7. कमलाकांत जैसे लोग भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करने वालों में हैं। इस जुगाड बाजी के लिये होने वाली सभी पतरेबाजी को सुरुचिपूर्ण तरीके से उजागर किया गया है। धन्यवाद।

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  8. कमलाकांत जी के अलावा "तबादला प्रकरण" का वह अंश भी रोचक है जहाँ दो पक्षों की खींचतान और मानमनौव्वल है। सजीव चित्रण।

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  9. रोचकता पूरे उपन्यास अंश में कहीं कम नहीं होती। यहाँ तक कि अंत में चपरासी के तीसरे बच्चे के लिये दस रुपये वाला प्रसंग समस्या के जड को दिखाता है।

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  10. पंकज सक्सेना1 जून 2009 को 12:40 pm

    इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिये कथा यूके और साहित्य शिल्पी को बधाई।

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  11. तबादला उद्योग की यही हकीकत है।

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  12. आदरणीय विभूति नारायण राय का प्रस्तुत उपन्यास अंश बहु-आयामी है। छोटी छोटी घटनाओं और दृष्यों के माध्यम से जिस विलक्षणता से बात कही गयी है वह पाठक को बाँधती ही है। बारीक ऑबजर्वेशन माहौल को बनाते हैं। कथ्य गंभीर है ही।

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  13. उपन्यास अंश पूरी एक कहानी है, वही रोचकता और पूर्णता।

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