साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:- किरण सिन्धु, उत्तर प्रदेश की मूल निवासी हैं। आपकी शिक्षा झारखण्ड में तथा विवाह बिहार में हुआ। वर्तमान में आप मुंबई में अवस्थित हैं। आपको परिवार और परिवेश में बचपन से ही साहित्य प्रेम का भरपूर अवसर प्राप्त हुआ। श्रधेय गुरुजनों की कृपा से जो भी ज्ञानार्जन हुआ उसके सहारे अध्यापन के क्षेत्र में २५ वर्षों तक सुदृढ़ रूप से खड़ी रही। हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति किशोरावस्था से ही प्रेम रहा है.

तपती धरती खोज रही है
सीने में दरार लिए,
बाट देख रहे सभी किसान
आँखों में इक आस लिए;
कहाँ गए तुम काले मेघ?

सूखी खेती देख - देख कर
नयनों में जल भरने लगा है,
कैसे जलेगा घर का चूल्हा
सोंच - सोंच मन डरने लगा है;
कब आओगे काले मेघ?

नदी - नहर सब थम से गए हैं
वृक्ष सभी कुम्हलाये हुए,
कैसे चैन पड़े प्राणी को
बिना तुम्हारे आये हुए;
तरस भी खाओ काले मेघ!

अब जो देर हुई आने में
यम के दूत डराने लगेंगे,
पशुओं के बाडों के ऊपर
गिद्ध चील मंडराने लगेंगे
सुनो गुहार हे काले मेघ!

14 comments:

  1. आरे बादल काले बादल.........
    मॉनसून के इंतजार में बादल को मनाने की कोशिश अच्छी लगी..........

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  2. अति सुन्दर !
    -नितिन

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  3. लगता है आपकी पुकार ऊपरवाले ने सुन ली है...यहाँ दिल्ली में तो बरखा ने आने के संकेत दे दिए हैँ....


    सुन्दर कविता

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  4. बधाई !सुन्दर ।
    आपकी गुहार ही शायद
    तानसेन ने मल्हार के रूप मे
    गाई होगी तब
    सिन्धु पर किरण के प्रभाव ने
    मेघ को जन्म दिया था

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  5. बादलों ने आपकी पुकार सुन ली...वो आ रहे हैं...इतनी सुन्दर कविता जो उन्हें पुकार रही है

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  6. यहाँ अरुणाचल में तो अब मेघ ही मेघ हैं :)

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  7. आज तो किरण जी आपकी फरियाद सुन ली गयी है फरीदाबाद में भी सुबह से बारिश हो रही है।

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  8. काले मेघों की प्रतीक्षा तो सभी को है.............
    अच्छे भाव से सजी कविता

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  9. बहुत अच्छी कविता, बधाई।

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