कविता/गज़ल: अब्दुल रहमान "मन्सूर", ओमप्रकाश शर्मा, श्यामल सुमन, कुलदीप अन्जुम, नीरज गोस्वामी, सुशील कुमार

कहानी/लघुकथा: सूरज प्रकाश, शक्ति प्रकाश

हिन्दी साहित्य का इतिहास: जायसी और उनका पद्मावत (प्रस्तुति - अजय यादव)
वीडियो: ग्लोबल वार्मिंग पर राजीव रंजन प्रसाद की कविता का प्रसारण "चैनल वन" से (प्रस्तुति - देवेश वशिष्ठ ’खबरी’)
काव्य का रचना शास्त्र – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

कार्टून – अभिषेक तिवारी
दर्दे दरिया में आँसू भरे हुए
फरेबे आरजू ये हाथों धरे हुए
तब्दील हुई, शहर की तासीर
जज्बात भी पत्तों से झरे हुए
आए जब तूफां भरे हालात
सोच पुख्ता हौसले खरे हुए
खौफ तारी हर सूरतो कदम
धड़क रहे दिल आँखें डरे हुए
तेग थामेंगे हाथ कैसे सुरेश
मेरे ही दोस्त अदू हो परे हुए
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10 comments:
आए जब तूफां भरे हालात
सोच पुख्ता हौसले खरे हुए
bhut khub mitr
meri bdhayi swikaar kare
saadar
praveen pathik
9971969084
har she'r gazab !
waah
waah
waah
_______umda ghazal !
कमाल के ग़ज़ल है आपके,
बेहद चुनिंदा शब्दो से भरे हुए.
पढ़ कर ऐसा लगा मानो,
दिल के मुरझाए फूल हरे हुए.
आए जब तूफां भरे हालात
सोच पुख्ता हौसले खरे हुए
बहुत बढिया
ajawaab gazal........... khoobsoorat sher
अच्छी ग़ज़ल।
बहुत बढिया गज़ल
रिश्तों का टिकाऊपन,
अब प्यार पर निर्भर नहीं,
वह निर्भर करता है,
अर्थ की शक्ति पर,
सुख-सुविधाओं के सामान पर,
रिश्तों की जितनी अधिक ज़रूरतें
पूरी होंगी,
प्यार गहराता जाएगा,
यदि आप ऐसा न कर सके,
रिश्तों का विशाल भवन,
रेत के महल की तरह,
कुछ पल में भरभरा कर गिर जाएगा । आए जब तूफां भरे हालात
सोच पुख्ता हौसले खरे हुए
बधाई ! डा.साहेब
तब्दील हुई, शहर की तासीर
जज्बात भी पत्तों से झरे हुए...
बहुत सुंदर...दर्द का बयान है
सुन्दर दिलकश गजल... हर शेर अपने आप में एक पूर्ण गजल है
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