रोज की तरह वह उस सुबह भी अपनी अगली टांगों पर थूथन टिकाए गहरी नींद में सोया था। जिस सड़क के किनारे वह सो रहा था, वह सड़क शहर की तरफ जाने वाली मुख्य सड़क थी। नाके के उस पार की सड़क से लगी छोटी-छोटी बस्तियों की गलियों से निकलकर कई छोटे-छोटे दुपहिया वाहन हाइवे पर आ रहे थे और दूर-दराज से चले आ रहे बड़े वाहनों को धकाते हुए बहुत तेजी से एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में एक-दूसरे को रगड़ते और क्रेच मारते चले जा रहे थे। वे सब जल्दी में थे। उनमें से कुछ, जो ज्यादा जल्दी में थे, वे ओवरटेक और शार्टकट की शैली अपनाते हुए रास्ता निकाल रहे थे।

दूसरे को पीछे छोड़ने और खुद आगे निकल जाने की कोशिश में वे बहुत जोर से गुर्राते थे। वे जितनी जोर से गुर्राते उतना ही काला और बदबूदार धुआं हवा में फैल जाता।

रचनाकार परिचय:-


मनोज रूपड़ा एक सुपरिचित कथाकार हैं। अपनी पंद्रह वर्ष से भी अधिक के साहित्यिक जीवन में हालाँकि संख्या के हिसाब से बहुत कम लिखा है परंतु इतनी रचनायें भी अपनी उत्कृष्टता के चलते उन्हें एक सशक्त रचनाकार साबित करने में सक्षम हैं। अपनी पुस्तक "दफ़न और अन्य कहानियाँ" के लिये इंदु शर्मा कथा सम्मान प्राप्त करने वाले मनोज जी के विषय में अधिक जानने के लिये आप प्रसिद्ध कथाकार सूरजप्रकाश जी का संस्मरण भी पढ़ सकते हैं।

कुछ ही देर में उस झबरे के आधे सफेद आधे भूरे बालों पर इतनी कालिख जम गई कि दोनों रंगों के बीच का फ़र्क मटमैला हो गया। लेकिन उसे इसकी जरा भी परवाह नहीं थी। वाहनों की तेज रफ्तारी और कुत्तेगिरी से वह जरा भी विचलित नहीं होता। हार्न की ऊंची से ऊंची चीख हो या टायर की कितनी भी लम्बी चिंचिंयाती हुई घसीट, उसके कानों में जूं तक नहीं रेंगती। जैसे इस दौड़-भाग और चीख-चिल्लाहट के खिलाफ वह कोई सत्याग्रह या मौन विरोध कर रहा हो।

सड़क के उस पार एक छोटी-सी गली के मुहाने पर एक छोटी-सी खोली थी। उस खोली में भी एक ऐसा ही प्राणी बेखबर सोया पड़ा था। उसकी अटूट नींद और अखूट आलस्य में कहीं कोई विलन नहीं था। रोज की तरह वह उस दिन भी स्वाभाविक ढंग से जागा और जागने के बाद भी काफी देर तक यूं ही खाट में पड़ा रहा। वह खोली की खिड़की के बाहर मंडराते काले धुंए को देख रहा था जैसे धुए की उमड़ती-घुमड़ती आकृति में से कुछ और निकलने वाला हो। बहुत देर तक इंतजार करने के बाद भी जब ऐसा कुछ नहीं हुआ तो वह उठकर खिड़की के पास चला आया।

खिड़की से बाहर के दृश्य के विस्तार में एक-दूसरे से बहुत भिन्न मगर सामान्य चीजें थीं। वे सब चीजें एक-दूसरे से अलग होते हुए भी एक-दूसरे से जुड़ी थी, वे बढ़ रही थीं। एक निश्चित दिशा में। वे सब किसी तयशुदा पद्धति से संचालित थीं। यह संचालन चाहे जिसके हाथ में होगा लेकिन वह एक निरंतर बढ़ती गति से उन्हें अपनी तरफ खींच रहा था। इस खिंचाव के सामने सारी चीजें बेबस थीं, सिर्फ उस कुत्ते को छोड़कर, जो सड़क के उस तरफ गहरी नींद में सोया पड़ा था। उसके चेहरे से साफ़ जाहिर था कि वह कोई बहुत बढ़िया और स्वादिष्ट सपना देख रहा था।

वह प्राणी अब दूसरे तमाम दृश्यों से ध्यान हटाकर उस कुत्ते को देखने लगा। पिछले तीन सालों में वह पहली बार उसे इतने गौर से देख रहा था। उसकी नींद इतनी मधुर थी कि उसे अपने थूथन और आंखों के इर्द-गिर्द जमे चिपड़े पर भिनकती मक्खियों को भी दूर भगाने की सुध नहीं थी।

लेकिन तभी कहीं संतुलन बिगड़ा और टायर की घिसटती हुई लम्बी एक चीख के साथ तेज रफ्तार उसकी दुम को कुचलते हुए आगे बढ़ी और एक दूसरी रफ्तार से जा टकराई। यह एक अनिवार्य परिणति थी और उनके लिए अत्यंत साधारण घटना जो रफ्तारों की टक्कर की घातक जद से बाहर होते हैं। लेकिन कुत्ता चपेट में आ गया था। वह बुरी तरह झुंझलाते हुए मारे गुस्से के भौंकने लगा और फिर उसे दर्द का अहसास हुआ और वह कराहने लगा। उसकी कराह कुछ देर वाहनों की गुर्राहट से लड़ती रही फिर धीरे-धीरे शांत हो गई।

अब वह कुत्ता अपनी अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त माध्यम को खोकर चुपचाप खड़ा था। और वह उसे अपनी खिड़की से देख रहा था।

वह सिर्फ़ एक दृश्य था और वह बिना कुछ सोचे सिर्फ देख रहा था। उसे किसी दृश्य को बहुत देर तक देखने और इस दौरान अपने आप को भूल जाने की बीमारी थी। कई बार ऐसा होता था कि दृश्य उसके सामने से हट जाता था। फिर भी वह उसे देखता रहता और कई बार वह खुद दृश्य के सामने से हट जाता मगर दृश्य उसके साथ-साथ चलने लगता।

उसे यह बिल्कुल नहीं मालूम कि उसे यह बीमारी कब और कहां लगी। उसे तो यह भी नहीं मालूम कि उसे कोई बीमारी भी है। उसे बहुत आश्चर्य होता है, जब लोग उसे आलसी निकम्मा या कामचोर कहते हैं। कई बार उसके हाथ से फावड़ा, हथोड़ा, आरी, तसला और डामर की बाल्टी छीनकर उसे काम से निकाल दिया गया था। इंडस्ट्रियल एरिया के अधिकांश कारखानों के गेट कीपर उसे अंदर नहीं जाने देते थे क्योंकि अंदर कोई भी काम ऐसा नहीं था, जो बिना सोचे-समझे किया जा सके, या जिसे वक्त पर पूरा करने के लिए पर्याप्त फुर्ती की जरूरत न हो।

लोग कहते हैं कि पहले वह प्राणी ऐसा नहीं था। उसे हर काम वक्त से पहले और बहुत तेजी से निपटाने की आदत थी, बल्कि कोई भी काम उसके हाथ में आते ही गति पकड़ लेता था। और वह निर्धारित समय से भी पहले उसे पूरा कर देता था। कई बार तो ऐसा होता था कि काम पूरा हो चुकने के बाद भी उसके हाथ उतनी ही गति से चलते रहते थे। काम के नशे में वह इतना डूब जाता था कि कई बार उसे सायरन की आवाज भी सुनाई नहीं देती थी और बहुत देर बाद उसे मालूम पड़ता था कि पाली खत्म हो चुकी है।

मगर अब बात वैसी नहीं थी। अब सब-कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया है। ऐसा अचानक क्यों हुआ यह आज तक किसी को समझ में नहीं आया। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ, कि उसे फैक्ट्रियों में काम मिलना बंद हो गया और वह उस मजदूर मंडी की तरफ जाने लगा, जो शहर के बीचों-बीच एक चौक में थी, जहां हर सुबह दिहाड़ी पर बिकने वाले मजदूरों की खरीद-फरोख्त होती थी।

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रोज की तरह उस दिन भी वह काम की तलाश में निकला। जैसे ही वह सड़क पर आया, कुत्ते की आंखें खुल गई। वह झट से उठा और लपक कर उसकी टांगों से लिपट गया। उसके हाव-भाव और हरकतों में आज भी उतनी ही ताजगी और उत्साह था, सिर्फ उसकी दुम नहीं हिल रही थी लेकिन इससे उसकी ऊल-जलूल उछल-कूद और बेवकूफी से भरी कूं-कां में कोई कमी नहीं आई और वह उतने ही साथीपन के साथ उसके सफर में हमराह बन गया।

दिहाड़ी पर काम करने वालों के बाज़ार में जब वह पहुंचा तब बहुत देर हो गई थी। अधिकांश गठीले और जवान शरीरों का सौदा हो चुका था और बाज़ार मंदा पड़ा था। इस मंदे माहौल में कुछ पियक्कड़, कुछ बूढ़े और कुछ लफंगे इधर-उधर बीड़ी प़ूं€कते बैठे थे। उसने एक बूढ़े से बीड़ी मांगी और सुट्टा मारते हुए कुछ देर तक खड़ा रहा। कुत्ता अभी तक उसके साथ था। वह कान खड़े किये कौतुहल से उसके मुंह से निकलते धुं को देख रहा था। उसने कुत्ते से नज़रें हटाई और चाय के ठेले की तरफ बढ़ा। जब वह उधारी में चाय पी रहा था तब भी कुत्ता दृश्य में था। इस बार उसके देखने में कौतुहल नहीं लालच थी। उसे रोज इसी वक्त एक डबलरोटी खाने को मिलती थी। उसने चाय का प्याला खाली कर ठेले की पटिया पर रखा और कुत्ते की तरफ देखते हुए अपने दोनों हाथ पेंट की जेबों में डाले और दोनों जेबें एक साथ उलट दीं। कुत्ते ने उसकी दोनों जेबों को बारी-बारी से देखा फिर पलटकर चला गया। वह छाती पर हाथ बांधे दृश्य से बाहर जाते कुत्ते की लटकी हुई दुम को देखता रहा।

दूसरे दिन वह उस मंडी के बजाय एम.आई.डी.सी. की तरफ निकल पड़ा। वह जिस सड़क पर चल रहा था उस सड़क पर और भी बहुत से लोग चल रहे थे। उसके इर्द-गिर्द बहुत तेजी से लोगों की तादाद बढ़ रही थी। बढ़ती हुई तादाद ने उस अकेले प्राणी को पीछे छोड़ दिया। उसने उनसे आगे निकलने की कोई कोशिश नहीं की क्योंकि उसका ध्यान कहीं और था। वह अपने आगे एक ऐसे आदमी को देख रहा था, जो बहुत जोर लगा कर धक्का-मुक्की कर रहा था। उसके सिर पर एक सफेद पट्टी बंधी थी। सिर के पिछले हिस्से में, जहां घाव था, वहां एक छोटा-सा लाल धब्बा उभर आया था। वह उस धब्बे को गौर से देख रहा था। उस धब्बे का आकार धीरे-धीरे फैल रहा था और उसकी रंगत और ज्यादा गहराती जा रही थी। उसके कदम खुद-ब-खुद रुक गए और वह आदमी पीछे से धक्के खाते और आगे वालों को धकेलते हुए आगे बढ़ गया। वह आखिर किसी भी तरह फैक्ट्री के गेट तक पहुंच गया और गेट बंद होने से पहले फैक्ट्री के अंदर घुसने में कामयाब हो गया।

गेट जैसे ही बंद हुआ, वह आदमी उसकी नजरों से ओझल हो गया लेकिन उसने जैसे ही गेट से नज़रें हटाई और वापस जाने के लिए मुड़ा, उसे फिर पट्टी से बंधा हुआ सिर और सिर के पिछले हिस्से में बीचों बीच उभरा हुआ लाल धब्बा दिखाई दिया। उसने फिर उस दृश्य से नज़रें हटाईं लेकिन वह दृश्य उसकी आंखों के सामने से नहीं हटा।

अब वह लौटती हुई भीड़ के साथ चल रहा था। इस बार किसी की चाल में तेजी नहीं थी क्योंकि वे किसी निश्चित ठिकाने तक पहुंचने के लिए नहीं चल रहे थे। अब साथ-साथ चलने वालों की तादाद हर मोड़ पर कम होती जा रही थी। वे अब उस ठिकानों की तरफ बढ़ रहे थे जहां कम से कम कीमत पर ज्यादा से ज्यादा श्रम बेचना पड़ता है।

आखिर में वह जिस मोड़ से मुड़ा, उस मोड़ से उसके साथ चलने वाला कोई नहीं था। वह एक उबड़-खाबड़ और लारी के टायरों से कटी-फटी सड़क पर अकेला चलता चला गया। उसे सामने फिर एक गेट दिखाई दिया, जो दूर से ही बंद दिखाई दे रहा था लेकिन वह अपनी जेबों में दोनों हाथ डाले धीरे-धीरे चलते हुए उसके बिल्कुल पास पहुंच गया। गेट पर एक बहुत बड़ा ताला जड़ा हुआ था। उसने ताले को हाथ में लिया और बिना किसी उद्देश्य के उसके वजन का अंदाजा लगाने लगा। फिर आदतन उसे गौर से देखने लगा। काफी देर तक वह यूं ही खड़ा रहा। फिर वापस जाने के लिए मुड़ा। कुछ कदम दूर जाकर वह रुक गया। यह देखने कि कहीं ताला उसके पीछे-पीछे तो नहीं आ रहा। उसे यह देखकर अच्छा नहीं लगा कि ताला अपनी जगह से हिला तक नहीं था। उसकी जंग लगी जड़ अवस्थिति को उसने काल्पनिक तौर पर हटाने की कोशिश की लेकिन थोड़ी ही देर में इस कोशिश ने दम तोड़ दिया।

उसने एक लम्बी सांस ली। अपनी जेबों में हाथ डाले और निश्चिंत भाव से चहल-कदमी करते हुए, टायर के निशानों वाले गड्ढों की सूखी मिट्टी को जूतों से कुचलते हुए सड़क के मोड़ तक पहुंच गया। उसे नहीं मालूम कि वह कितनी बार यहां आ चुका है। जब भी उसे कहीं काम नहीं मिलता, उसके कदम अपने-आप इस बंद फैक्ट्री की तरफ जानेवाली सड़क की तरफ मुड़ जाते हैं। वह फैक्ट्री के गेट पर लगे ताले को हर बार उतने ही अचरज से देखता है जैसे उसे पहली बार देख रहा हो। हर बार वह उसे वहां से हटाने की कोशिश करता है और लौटते समय लारियों के पहियों के पुराने इतिहास से सड़क को मुक्त करवाने में उसे उतना ही आनंद मिलता है, जितना पहली बार ऐसा करने पर मिला था।

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एक बार एक ऐसी ही बीमार फैक्ट्री के पास से गुजरते समय उसने देखा कि उसका गेट खुला था और गेट पर कोई पहरेदार नहीं था। बिना पहरेदार वाला खुला गेट देखकर उसे अचरज हुआ। उसने आदतन जेबों में हाथ डाले और फैक्ट्री के अंदर घुसता चला गया। अंदर जाकर उसे और ज्यादा आश्चर्य हुआ। वहां कोई नहीं था। कोई गतिविधि, कोई आवाज़ भी नहीं थी। सारी पाइप लाइनें खुली पड़ी थीं, केबलों का कुण्डलित ढेर जमीन पर और मोबिल आइल के खाली पीपों पर बिखरा पड़ा था। छोटी-बड़ी मशीनों के अलग-अलग हिस्से, जिन्हें नट-बोल्ट से आज़ाद कर दिया गया था, युद्ध में मारे गए सिपाहियों की लाशों की तरह इधर-उधर बिख़रे पड़े थे। ये हिस्से जब एक थे तब आपस में खूब जोर-जोर से अलग-अलग तरह की आवाजें करते, बार-बार तीखी सीटी के साथ भाप छोड़ते और बहुत तेजी से कुछ निगलते-उगलते रहते थे। लेकिन अब वे बिल्कुल शांत थे। कोक ओवन के पास राख का ढेर पड़ा था। बायलर में जो पानी बचा रह गया था, वह इतना ठंडा था कि उसे अंजुरियों में भरकर पीया जा सकता था।

वह चहल-कदमी करते हुए फैक्ट्री की सबसे बड़ी मशीन के पास पहुंच गया, जो कांक्रीट के एक बहुत बड़े फांउण्डेशन पर टिकी हुई थी। वह फाउण्डेशन अब पूरी तरह टूट-फूट गया था ओर मशीन का गंदा काला आइल दरारों में से रिसता हुआ इधर-उधर फैला पड़ा था। वह आइल के चहबच्चों को फलांगते हुए चिमनी के ठीक नीचे पहुंच गया। वहां भी राख का बहुत बड़ा ढेर पड़ा था। उसने राख मुट्ठी में भरकर उठाई फिर दूसरे हाथ की हथेली पर उसे उंडेलकर गौर से देखने लगा। जब वह राख को देख रहा था तब उसका मस्तिस्क बिल्कुल विचार शून्य था लेकिन थोड़ी देर बाद उसके मस्तिस्क में एक प्रतिक्रिया हुई और हवा में उछल दी। हवा में पड़ते ही राख दूर तक फैल गयी। उसने राख का इस कदर हवा में घुल-मिल जाना कभी नहीं देखा था। उसकी आंखें चिमनी से निकलते धुंए को हवा में घुलते देखने की अभ्यस्त थीं।

उसने मुट्ठी भर भर कर राख हवा में उड़ानी शुरू कर दी। जैसे यह कोई काम हो। किसी असली काम के बरक्स उसका यह किर्यान्वयन उसके लिए एक अनिवार्य जैविक आवश्यकता जितना महत्वपूर्ण था।

कुछ ही देर में जहां राख का ढेर था, वह जगह सपाट हो गयी और हवा में फैलती राख ने फैक्ट्री के पूरे यार्ड को श्मशान में बदल डाला।

बहुत देर बार उसकी चेतना वापस तब सक्रिय हुई जब उसे अपने सिर के ऊपर कोई आवाज सुनाई दी। उसने सिर ऊंचा उठाया, उसकी नज़रें चिमनी के ऊपर फिसलती हुई ऊपर तक पहुंची। चिमनी का मुंह, जो हमेशा धुआं उगलता रहता था, अब बिल्कुल सुनसान था। उसके किनारे पर एक कौआ बैठा था। वह कौआ उसकी तरफ गर्दन झुकाए ऊंची आवाज में कांव-कांव कर रहा था।

उस दिन उस बरसों पुरानी, अपने जमाने की सर्वाधिक सक्रिय, मगर अब बंद पड़ चुकी फैक्ट्री से जब वह वापस लौट रहा था, तब उसे वे दिन याद आए जब वह यहां काम करता था। पुराने दिनों की याद आते ही उसे अपने दिल की धड़कन फिर महसूस हुई। धमनियों में खून तेजी से गर्दिश करने लगा। उसे सब मशीनों की आवाजें एक साथ सुनाई दी और बहुत-से मज़दूर इधर से उधर भागते और मशीनों की पगलाई गति से ताल-मेल बनाने की कोशिश में हड़बड़ाते और एक-दूसरे पर बौखलाते दिखाई दिये। उन सब के बीच वह फोरमैन भी था, जिसके ऊंचे कद और धमकाती हुई भारी आवाज़ से सब कांपते थे। कम आदमियों से ज्यादा काम लेने में माहिर उस फोरमैन को सिर्फ तीन शब्द बोलने आते थे - जल्दी... फुर्ती और तेजी...

उसे इतने "फुल पावर" में काम करवाने की आदत थी कि कभी-कभी तो गति सूचक सुइयां भी डर के मारे कांपने लग जाती थीं। उस फोरमैन के साथ रहते हुए उसे भी फुर्ती का नशा हो गया था। वह हमेशा नशे में रहता था और नशे की रौ में चार-चार आदमियों को पीछे छोड़ देता था। जब भी कोई मशीन रुकावट पैदा करती, फोरमैन सबसे पहले उसे ही आवाज़ देता था और वे दोनों पाने और हथौड़े हाथ में लिए ऐसे आगे बढ़ते जैसे किसी दुश्मन का सफाया करने जा रहे हों।

लेकिन अब वह मशीन खुली पड़ी थी। उसके अलग-अलग कल पुर्जे चारों तरफ बिखरे पड़े थे। एक तरफ उसका बहुत बड़ा पहिया था। दूसरी तरफ दांतेदार गेयर। एक बहुत मोटी लोहे की चेन जो बल पूर्वक गेयर के दांतों को अपने खांचों में फंसाकर पूरी मशीन को गति देती थी, अब टूटी पड़ी थी और फेल्ट बेल्ट, जो पहिये को घुमाकर चेन को आगे बढ़ने की ताकत देता था, किसी मरे हुए सांप की तरह पसरा पड़ा था। वह टूटी हुई चेन और रुके हुए पहिए को काफी देर तक देखता रहा।

उसे यह बात कभी समझ नहीं आती कि मशीनें क्यों चलते-चलते रुक जाती हैं और फैक्ट्रियों में ताले क्यों लग जाते हैं। उसके साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि वह बिल्कुल विचारहीन था। और जीवन की ज़रूरी चीजों के मामले में वह बस उतना ही जानता था जितना एक बैल, या एक घोड़ा, या एक गधा या खच्चर या ऐसा कोई भी प्राणी, जिसे कुदरत ने नोकीले पंजे और धारदार दांत नहीं दिये, सिर्फ मज़बूत पांव और पीठ दी है। उसके दिमाग की वह जगह एकदम ठस्स थी, जहां विचार जन्म लेते हैं या कोई सवाल या कोई असहमति पैदा होती है। शायद यही वजह है कि वह किसी भी चीज की अहमियत को नहीं समझ सकता, वह सिर्फ निभा सकता है। उसे सिर्फ काम करने का तरीका समझ में आता है कि कौन से औज़ार को किस तरह पकड़ना चाहिए और कितनी गति और कितनी ताकत से उसे संचालित करना चाहिए। उसे किसी भी तरह की मशीनी प्रक्रिया से कभी ऊब महसूस नहीं होती थी और वह निरंतर उस काम को जारी रखता था, जब तक काम के लिए निर्धारित घंटे या अवधि समाप्त नहीं हो जाती थी। कई बार सायरन बजने के बाद भी उसे यह पता नहीं चलता था कि पाली खत्म हो गई है। जब दूसरी पाली के मज़दूर काम हाथ में लेने के लिए मशीन के पास आते और उसके हाथ से औजार छुड़ाने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाते तब वह उन्हें आश्चर्य से देखता फिर किसी दूसरे के हाथों में जा पहुंचे अपने दास्ताने और औजार को देखने लगता और फिर उस `काम' को, जिसे थोड़ी देर पहले वह कर रहा था और अब उसे कोई दूसरा कर रहा था। दूसरे के हाथों में अपने काम को देखकर वह थोड़ा विचलित हो जाता। वह दूसरे के काम करने के ढंग और उसकी शुरुआती सुस्त चाल के साथ अपने तौर तरीके और अपने अंदर की तेजी को जोड़ने का प्रयास करता और जब तक उस काम में पहले जैसी तेजी दिखाई नहीं देती थी, वह वहीं खड़ा रहता था। फिर वह लौट जाता था लेकिन गेट से बाहर निकलने के बावजूद काफी देर तक काम की तेज और अमूर्त प्रक्रिया उसके अंदर चलती रहती थी।

अगर किसी दिन किसी बड़ी तकनीकी खराबी या रॉ मटेरियल के अभाव या मंदी की वजह से काम रोक दिया जाता तब उसकी हालत देखने लायक रहती। उसकी बेचैनी और हड़बड़ी किसी ऐसे एडिक्ट जैसी होती थी, जिसे नशे के बहुत हेवी डोज लेने की आदत पड़ गई हो। कई बार उसे `काम बंद' और `तालाबंदी' जैसी और ज्यादा भयानक मुसीबतों का भी सामना करना पड़ता। कई बार तो काम बंद और तालाबंदी की अवधि बहुत लम्बी खिंच जाती थी और तब रुकी हुई मशीनें उसके अंदर चलने लगतीं और उसे हर वक्त एक ऐसी आवाज सुनाई देती जैसी आवाज उन मशीनों से आती है, जो कच्चे माल के अभाव में घरघराती है। अपने अंदर से आती इस घरघराहट और बाहर चल रही नारेबाजी के बीच वह कोई तालमेल नहीं बैठा पाता। ये सारी बातें उसे कुछ और सोचने के लिए प्रेरित नहीं करतीं। हड़ताल, मजदूरों के अधिकार और यूनियन जैसी बातों पर चिन्तन करने का तो सवाल ही नहीं था। ऐसी बातों का उसके लिए एक ही मतलब था - भूख और कष्ट बढ़ेंगे - बस, और कुछ नहीं। उसके दिमाग में कभी यह ख्याल भी नहीं आता था कि इन बातों में कोई और तथ्य भी हो सकता है।

इन सब मुसीबतों के बाद जैसे ही उसे कहीं काम मिलता, वह नदीदों की तरह उस पर टूट पड़ता, जैसे कई दिनों का भूखा हो। उसके हाथ इतनी तेजी से चलते और वह इतनी फुर्ती से इधर-उधर मूव करता कि अगर थोड़ी देर उसे कोई गौर से देखता रहे, तो उसे लगेगा कि वह कोई जीवित प्राणी नहीं, चीजों और मशीनों के बीच की कोई धुरी है, निरंतर एक ही गति में घूमती धुरी।

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लेकिन यह धुरी एक दिन अपने-आप चलते-चलते रुक गई। उसी दिन और उसी वक्त उस अज्ञात बीमारी ने पहली बार उस पर अपना असर दिखाया था।

उस दिन भी वह वही काम कर रहा था, जो रोज करता था। उतनी ही कुशलता, उतनी ही फुर्ती और उतनी ही सफाई के साथ वह ट्रेक पर कच्चे माल से भरी ट्राली को लुढ़काते हुए कन्वेयर बेल्ट तक ला रहा था और बिना किसी की मदद लिये अपने मजबूत पंजों और बलिष्ठ भुजाओं के दम पर उसे पीछे से उचका कर खाली कर रहा था। तीन सौ किलो माल से लदी ट्राली को आम तौर पर दो आदमी मिलकर उचकाते थे लेकिन उस दिन वह अकेला ही काफी था। ट्राली खाली होते ही वह फिर गोदाम की तरफ ट्राली लुढ़काते हुए दौड़ पड़ता और भरी हुई ट्राली लिए फिर वापस मशीन की तरफ। इस काम में उसकी रफ्तार धीरे-धीरे इतनी बढ़ गई कि ट्राली लोड करने वाले चार-चार आदमी उससे पिछड़ गए।

फोरमैन इधर से उधर चक्कर काटते हुए मज़दूरों को तेजी से काम करने के लिए कोंच रहा था। मज़दूर बहुत फुर्ती से अपने-अपने काम को अंजाम दे रहे थे और मशीनें उससे भी ज्यादा तेजी से चीजों को निगल और उगल रही थीं। वे सब एक ही श्रृंखला में आबद्ध थे। सब का काम एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था और उनमें से अगर एक भी आदमी सुस्ती दिखाता या किसी का भी ध्यान थोड़ी देर के लिए भी काम से हट जाता तो काम की पूरी लाइन बिगड़ सकती थी।

लेकिन तात्कालिकता के इन चरम क्षणों में ट्रैक पर ट्राली लेकर दौड़ता वह प्राणी अचानक रुक गया।

यह एक बहुत बड़ी बात थी। चालू काम में बिना किसी तकनीकी खराबी के अगर रुकावट आ जाए तो वहां बावेला मच जाता था। मशीन की बड़ी से बड़ी गलती माफ थी लेकिन मानवीय भूल-चूक के लिए वहां कोई स्थान नहीं था।
लेकिन इस बात की गंभीरता से बेखबर वह ट्रैक पर पड़ी किसी चीज को हैरत भरी नज़रों से देख रहा था और जो कुछ वह देख रहा था, वह सिर्फ उसे दिखाई दे रहा था किसी और को नहीं।

यह उस बीमारी का पहला स्ट्रोक था। पहली बार उसका ध्यान अपने काम से हटा था। पहली बार उसे अपने सामने के वास्तविक दृश्य के बज़ाय कोई दूसरा दृश्य दिखा था।

फोरमैन उसकी तरफ बौखलाते हुए बढ़ा और बांह पकड़कर उसे ट्रैक से बाहर खींच लिया। वह बहुत तेज आवाज में, भयानक गुस्से से उसके दोनों कंधे पकड़कर उसे झिंझोड़ रहा था। उसने एक बार फोरमैन की तरफ देखा, बिल्कुल अकबकाई हुई नज़रों से और फिर ट्रैक की तरफ देखने लगा, जहां उसके पिता की लाश पड़ी थी...ट्रैक की जगह अब उसे घर का आंगन दिखाई दिया, उसे वह सूखा पेड़ भी दिखाई दिया, जिसकी डालियों में एक भी पत्ता नहीं था और जिसकी शाख पर वह रस्सी बंधी हुई थी, जिसके फंदे से अभी-अभी उसके पिता की गर्दन को अलग किया गया था...

फोरमैन ने एक दूसरे मज़दूर को ट्राली ले जाने का आदेश दिया। जिसे आदेश दिया गया था उसने फौरन अपने हाथ का बेलचा एक तरफ फेंका और झपटकर ट्राली के दोनों हत्थे हाथों में थाम लिये। वह पूरी ताकत से ट्राली को धकेलने की कोशिश कर रहा था मगर ट्राली आगे नहीं बढ़ी फिर एक के बजाय दो आदमियों ने धक्का लगाया फिर तीसरे आदमी की जरूरत महसूस हुई तब कहीं ट्राली ट्रैक पर आगे सरकी।

ट्राली तेजी से सरकती हुई आगे बढ़ी और पिता की लाश से आर-पार निकल गई।

फोरमैन अब उसे धकेलते हुए गेट से बाहर चले जाने का आदेश दे रहा था। वह बार-बार धक्के खा रहा था और बार-बार पलटकर ट्रैक की तरफ देख रहा था। उसे हर बार कोई नई चीज पिता के पास पड़ी हुई दिखाई देती। पहली बार जब वह धक्का खाकर पलटा तब उसने देखा कि कुछ ऋण पुस्तिकाएं और दो-तीन सरकारी नोटिसें उनके आसपास पड़ी हैं। दूसरी बार जब वह पलटा तब उसे अपने जीवित पिता दिखाई दिये, उन्हें बैंक के कुछ अधिकारी घेरे खड़े थे। तीसरी बार कुछ पुलिस वाले उन्हें डांट-धमका रहे थे और चौथी बार गेट से लगभग बाहर फेंकते हुए उसने घर की कच्ची मिट्टी की दीवार से टिके बैलगाड़ी के टूटे हुए पहिए, लकड़ी का जुआ और तुतारी दिखाई दी और जब गेट बंद हो रहा था तब उसे वह कमज़ोर और बीमार बैल भी दिखाई दिया जो अपने ही मल-मूत्र से लिथड़ा आंगन के एक कोने में मौत का इंतजार कर रहा था।

गेट बंद होने के बाद जब वह वापस लौट रहा था तब उसने देखा, बैलगाड़ी का वह टूटा हुआ पहिया उसके साथ-साथ चल रहा है, किसी सहारे के बगैर। कभी धचकते और कभी डगमगाते हुए वह लुढकता चला आ रहा था। उसने बांई तरफ देखा, वह लंगड़ा और मरियल बैल भी उसके साथ-साथ चल रहा था, जिसने कई वर्षों तक उसके पिता के खेत में जुताई की थी। जुताई का वह जुआ अब भी उसकी गर्दन पर था लेकिन अब उसके हल के फाल में खेत की सूखी जमीन नहीं, कोई और चीज फंसी हुई थी। वह बूढ़ा, लंगड़ा और मरियल बैल अपनी बची-खुची ताकत से उसे घसीटता हुआ आगे बढ़ रहा था। उस फंसी हुई चीज को देखने के लिए उसने अपनी दृष्टि को विस्तार दिया और तब उसे मालूम हुआ कि उसका समूचा गांव घिसटता हुआ पीछे-पीछे आ रहा था... सारे के सारे घर, कटे-फटे खेत, कंटीली झाड़ियां, मौत का इंतज़ार करते और मरे हुए जानवर, सूखे कुंए और तालाब, काले-कलूटे पेड़... ये सब आपस में गड्ड-मड्ड हो गए थे। चारों तरफ सिर्प़€ धूल उड़ रही थी और उस धूसर दृश्य में कहीं कोई इन्सान नहीं था।

यह सब रास्ते भर उसके साथ चलता रहा। शहर की सड़कों में इस धूसर दृश्य ने कोई घमासान नहीं मचाया। वह दृश्य चुपचाप चलता रहा और शहर की समस्त गतिविधियां अपनी उसी रफ्तार से बिना किसी अवरोध के उस दृश्य में से आर-पार गुजरती रहीं।

अपने घर की तरफ जाने वाली पतली गली में वह जैसे ही मुड़ा, वह धूसर दृश्य सिमटने लगा, जैसे-जैसे उसका घर करीब आता गया, वह सिकुड़ता चला गया और जब वह घर में घुस कर दरवाजा बंद कर रहा था, तब बंद होते किवाड़ों की फांक से सरक कर वह धूसर उसके दिमाग में घुस गया। उसके दिमाग में एक अजीब तरह की सूखी, कंटीली और धूल धुसरित चीज गोल-गोल चकराती रही, फिर सब शांत हो गया।

लेकिन दूसरे दिन से उसे अपने भीतर कुछ बदला-बदला-सा महसूस होने लगा। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह किस तरह का बदलाव है। वह उसे समझ इसलिए नहीं सकता था क्योंकि वह कल्पनाविहीन भी था। किसी भी अज्ञात और रहस्यमय की तह में जाने के लिए जिस अंतर्दृष्टि की जरूरत होती है वह उसके पास नहीं थी। उसके पास जीवन की मूलभूत जरूरतों के बारे में थोड़ी-सी जानकारी थी और इसी जानकारी के चलते वह कोई भी काम कर सकता था और कोई भी कष्ट सहन कर सकता था।

काम करने और कष्ट सहने के अलावा जीवन में और भी कोई चीज हो सकती है, इसका उसे पता नहीं था। उसके पास अगर सबसे अधिक विश्वसनीय कोई चीज थी - तो वह चीज थी उसकी मूलवृत्ति और उसकी वह मूलवृत्ति उसे एक डरावनी और अस्पष्ट आशंका का आभास दे रही थी।

वह हालांकि ज्यादा सोचनेवाला प्राणी नहीं था इसलिए डरावनी आशंका भी उसके ऊपर ज्यादा देर तक हावी नहीं रह पाई। उसने तम्बाकू के रस के साथ उसे थूक दिया और सीधी रफ्तार से चलते हुए फिर कारखाने के गेट तक पहुंच गया। वह जैसे ही अंदर जाने के लिए आगे बढ़ा गेट-कीपर ने उसे रोक दिया,

"ऐ तू अंदर मत जा।"
"क्यों?" उसने हैरानी से पूछा।
"अब यहां तेरे लिए काम नहीं है।"
"..............." वह बिना कुछ समझे उसे देख़ता रहा।
"जा पेमेण्ट काउण्टर से अपना हिसाब ले ले।" गेट कीपर ने बांयी तरफ एक छोटी-सी केबिन की तरफ इशारा किया।

वह कुछ देर भावहीन आंखों से गेट कीपर को देखता रहा, फिर उसने सिर झुका लिया और चुपचाप केबिन की तरफ चल पड़ा।

उसे सिर्फ तीन दिन की रोजी हाथ में मिली, बाकी वह पहले उठा चुका था। जो तनख्वाह उसने पहले उठाई थी, उसका पच्चीस प्रतिशत हिस्सा उसके पेट में समा चुका था और बाकी गांव भेजा जा चुका था।

तीन दिन की रोजी हाथ में लिए वह फिर नए रोजगार की तलाश में निकल पड़ा।

तीन-चार दिनों की भटकन के बाद उसे भारत वायर वर्क्स में काम मिल गया। इस बार के काम की तनख्वाह पहले से कम और काम के घण्टे पहले से अधिक थे। लेकिन अपनी इस `लागत' और इससे मिलने वाले पारिश्रमिक की उसने पिछले काम से कोई तुलना नहीं की। वह सीधे गोडाउन में गया और वहां से वायर के अपने से तीन गुने बड़े रोल को लुढ़काते हुए लारी तक लाने और उन्हें दो और साथियों की मदद से लारी पर लगे ढलवां पटरे पर चढ़ाने लगा। उसके मददगार भी उसी की तरह हट्टे-कट्टे थे लेकिन वे अपेक्षाकृत कम ताकत लगा रहे थे और उनकी गति इस काम में लगने वाली औसत गति से कम थी। वे उसे इशारे से समझा रहे थे कि वह थोड़ी ढील बरते और थोड़ी कम ताकत लगाए। लेकिन वह उनके गुप्त इशारों को समझ नहीं पाया। नतीजा यह हुआ कि जो गोडाउन तीन लोगों की मेहनत से दिन भर में खाली होता था, वह तीन घंटे में खाली हो गया।

इस बात को पीछे खड़े कारिन्दे ने बहुत गंभीरता से लिया और अगले दिन तीन में से एक आदमी को वहां से हटा दिया गया, क्योंकि एक नए, अधिक शक्तिशाली वर्कर के आने से अब वहां तीन के बजाए दो काफी थे।

लेकिन जब इस परिवर्तन के बाद भी काम और समय में कोई फर्क नहीं आया, तो दूसरे वर्कर को भी हटा दिया गया। अब वह अकेले तीन गुना ज्यादा शक्ति के साथ दिन भर उस काम में लगा रहता। शुरुआत के कुछ दिन तो ठीक रहे लेकिन एक दिन जब वह रोल को पटरे पर चढ़ाने ही वाला था, कि उसे फिर अपने सिर में सनसनाहट महसूस हुई और इससे पहले कि वह संभल पाता, एक और ब्रेन स्ट्रोक ने उसकी नजर के सामने से मौजूदा दृश्य को हटा दिया...

...और देखते ही देखते लकड़ी का वह पटरा एक लम्बी, उबड़-खाबड़ गंवई सड़क में बदल गया। उस सड़क में अपनी-अपनी पोटली-पिटारी लिए कई लोग सीधी चलते-चले जा रहे थे। आदमियों के हाथो में गठरी और पिटारी थी। औरतों की कांख में नवजात बच्चे और सिर पर खाने-पकाने के बर्तनों की पोटली।

गांव के इस सूखे और धूल-धक्कड़ वाले मंजर से पलायन करते उस रेले में पीछे-पीछे कुछ कुत्ते दुम हिलाते हुए अपने मालिकों के साथ जाने के लिए मचल रहे थे। लाठियों और झिड़कियों की बौछार से उनमें से अनेक के हौसले पस्त हो गये, लेकिन भुरू सबसे ज्यादा ढीठ था। उसने जिद नहीं छोड़ी। दुम दबाकर भागने के बजाय वह गुर्रा रहा था, जैसे उनके साथ कहीं भी जाने का उसे संवैधानिक अधिकार मिला हो।

कुत्तों के अलावा कुछ बच्चे भी रोते-चीखते, हाथ-पांव पटकते अपनी माताओं के साथ जाने की जिद में जमीन में लोट रहे थे। उनके बूढ़े दादा-दादियों ने उन्हें कसकर पकड़ रखा था। बिफरे हुए बच्चे उन्हें गालियां बक रहे थे, लात मार रहे थे और अपने दांतों से उनके झुर्रियों भरे हाथ की खाल उधेड़ रहे थे लेकिन बूढ़ों ने हार नहीं मानी और बच्चों को बेरहमी से पीटते हुए वापस घर की तरफ घसीट लाए।

आखिर धूल उड़ाता वह रेला गुजर गया और गांव में भूरी खाक, सूखे पेड़, बूढ़े, बच्चे और कुत्ते बचे रह गए।

तब वह पहली बार साथियों की टोली के साथ गांव से बाहर निकला था। ठेकेदार के कारिडदे ने युवा और गठीले लड़कों का एक अलग दल बनाया था, जिन्हें शहर के कारखानों के लिए चुना गया था। शहर की तरफ बढ़ती ट्रेन में वह खिड़की के पास बैठ कर उन सब चीजों को बहुत खुशी और उत्साह से देख रहा था, जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी। उसके साथ उसका कुत्ता भुरू भी था, जो सब को छकाते और चकमा देते हुए चलती ट्रेन में किसी भी तरह कूद-फांद कर डिब्बे में घुसने में कामयाब हो गया था। वह उसकी गोद में साधिकार बैठा था और अपनी लम्बी जुबान निकाले तेजी से हांफ रहा था। अपनी जीत की खुशी के साथ वह अपने स्वामी की खुशी और उत्साह में बराबर का शरीक था...

"क्या है रे...काम क्यों रोक दिया।"

तभी उसे अपनी बाहों पर किसी का स्पर्श महसूस हुआ। यह कारिडदे के हाथ थे, जो उसे झिंझोड़ रहे थे।

वह चकित-विस्मित-सा चारों ओर देखने लगा। जैसे गहरी नींद या लम्बी बेहोशी से जागा हो। वह परिवेश को अपने अनुकूल बनाने और अपनी याददाश्त के वापस लौटने की कोशिश कर रहा था। उसने उल्टे हाथ से अपनी आंखें पोंछी, उस व्यक्ति की तरह जो सोकर उठने के बाद अपने बिस्तर पर अंगड़ाई लेकर नींद की खुमारी को दूर भगाने की कोशिश करता है। लेकिन कई बार उनींदी अंगड़ाई नींद को पूरी तरह तोड़ नहीं पाती और नींद फिर से अपनी जगह पर कब्जा जमा लेती है। उसे बिल्कुल वैसी ही अनुभूति हो रही थी। पूरा जोर लगाने के बावजूद वह अपने वास्तविक परिवेश और मौजूदा परिदृश्य में नहीं लौट पाया। उसे गांव की ऊबड़-खाबड़ सड़क के बाद अब शहर की पक्की सड़क दिखाई दी, जिसमें उसके वे साथी, जो गांव से उसके साथ चले थे, पैर घसीटते और लड़खड़ाते हुए चल रहे थे। उनके बाल और कपड़े बेतरतीब थे और शरीर इतने जर्जर और धंसे हुए, कि उसमें हड्डियों के अलावा कोई दूसरा उभर नज़र नहीं आ रहा था...

उसे फिर एक बार जोर से झिंझोड़े और धकेले जाने की अनुभूति हुई... वह लड़ खड़ा कर दूर जा गिरा लेकिन अपने साथ घट रही उस तात्कालिक घटना का उसकी चेतना पर कोई स्थाई असर नहीं हुआ और एक के बाद एक कई दृश्य उसके सामने बनने-बिगड़ने लगे। कुछ देर तक वह उन दृश्यों को सिर्फ दर्शक की तरह देखता रहा, फिर अनायास वह उसमें सहभागी हो गया। और आस-पास खड़े लोगों ने देखा कि वह किसी अदृश्य रोते हुए आदमी को चुप करा रहा था, किसी अदृश्य बिफरे हुए आदमी के हाथ से हथियार छुड़ा रहा था। कोई अदृश्य ताकत उसे लाठी-डंडे से पीट रही थी और वह चिल्ला-चिल्लाकर, हाथ जोड़कर, पांव पकड़कर जमीन में लौटते हुए बहुत रिरियाती आवाज में गुहार लगा रहा था। फिर उसकी आवाज अचानक एक पगलाए और बौखलाए हुए गुस्से से फट गई... वह अपनी चमकती आंखों और झाग भरे मुंह के साथ तेजी से आगे बढ़ा और जो सामने दिखा उसे लात-घूंसे मारने लगा। बदले में उसे भी लात-घूंसे खाने पड़े। लेकिन इस पिटाई से उसका जोश दो गुना बढ़ गया। वे सारी मानवीय क्रियाएं, जिन्हें वह पिछले तीन सालों से भूल गया था, या जो मशीनों के शोर और काम के बोझ के नीचे दब गई थी, वे सब अचानक एक साथ जाग उठीं। उसने किसी की कांख में ठिठोली करते हुए कोहनी चुभाई, किसी को कूल्हे मटका कर ठुमका मारा, वह जोर-जोर से हंसा, आहें भरीं, किसी को आंख मारी और दो अंगुलियां मुंह में डालकर एक अश्लील और बहुत भोंडी और बहुत कामुक सीटी बजाई। फिर उसने एक से अधिक लोगों की नकल उतारनी शुरू कर दी। उसकी आवाज अविश्वसनीय ढंग से ऊंची हो गई... वह गा रहा था। नाचा में गाया जाने वाला एक मारू, दोगाना, जिसमें पुरुष और स्त्री स्वर एक साथ थे, जिसमें गेंदे के फूल जैसी लड़की को आंख मार कर डाली से गिरा देने का वर्णन था। फिर वह नाचने लगा और साथ ही साथ वाद्य यंत्रों की बजाने की नकल उतारने लगा। उसने अपने मुंह से बेंजो की हू-ब-हू आवाज निकाली फिर सीटी बजाकर बांसुरी का स्वर मिलाया और अपने दानों हाथों की अंगुलियों को अपने कूल्हे पर चलाते हुए ढोलक की भी आवाज उतने ही सटीक तरीके से निकाली जितनी किसी वास्तविक ढोलक से निकलती है।

उसके आस-पास भीड़ जमा हो गई। वह एक साध दस पात्रों का अभिनय करने लगा। उसकी इस एकल प्रस्तुति में पुरुष और स्त्री पात्र थे गायक और गायिकाएं थीं, तरह-तरह के वाद्य थे और अलग-अलग पात्र थे। कुल मिलाकर वह एक समूचा नाचा था।

********

फेक्ट्री के यार्ड में, जहां हर काम का एक निश्चित समय और शिड्यूल होता है, जहां सारे यंत्र अपनी निर्धारित गति से एक जैसी सपाट चाल में चलते हैं और किसी भी तरह की ऊंची से ऊंची और आला दर्जे की टेक्नोलाजी को भी यह छूट नहीं होती कि वह कुछ ऐसा कर सके, जो उसके लिए पूर्वनिर्धारित काम से कुछ अलग हो, ऐसी नपी-तुली, बहुत पुख्त, एकदम नियोजित, कहीं से भी झोल न खाने वाली हर चीज को तुंत उपयोग में लाने और उपयोग में जाने के बाद तुंत परे हटा देने वाली समय के प्रति अत्यंत सचेत काम निकलवाने में माहिर, काम के एक भी क्षण को व्यर्थ में जाया न होने देने के लिए तत्पर और किसी भी गलती या छोटी-मोटी लापरवाही के लिए कोई लिहाज न रखने वाली, बिना एक भी पल गंवाएं किसी भी अवांछित को फौरन गेट से बाहर खदेड़ देने वाली उस निष्ठुर, संवेदनहीन और अमानवीय व्यवस्था में इस कदर बेढंगा, स्वत:स्फूर्त, मानवीय मस्ती, सुस्ती, लापरवाही और गैर जिम्मेदारी से लबरेज भोंडे ढंग से थिरकता बेवजह वक्त बरबाद करता, फालतू और बेकार बातों की लम्बी लड़ी में तू-तू मैं-मैं को पिरोता, अनर्गल संवादों की हा हा ही ही में लोट पोट होता वह आदमी आखिर कितनी देर टिक सकता था?

उसे वहां से तुंत हटा दिया गया। लेकिन वे दृश्य उसके सामने से तब तक नहीं हटे जब तक वह थकान से चूर होकर बिल्कुल लस्त-पस्त न हो गया।

मौसम बहुत गर्म था। पसीने से तर बतर उसका जिस्म लड़खड़ाते हुए गेट से बाहर निकला और सड़क किनारे फुटपाथ पर पसर गया। उसके आस-पास दो-चार लोग जमा हो गए। कोई उसे जूता सुंघा रहा था तो कोई मुंह पर पानी के छींटे मार रहा था। उसे अपने दिमाग में हुए हेर-फेर के कारण कुछ भी समझ में नहीं आया कि वह अब तक क्या कर रहा था और क्यों उसे लोग घेरे खड़े हैं। उसे सिर्फ थकान महसूस हुई, जैसे वह कई मील पैदल चल कर आया हो और रास्ते में उसे एक घूंट पानी तक नसीब न हुआ हो।

उस दिन के बाद उसे यह पक्का भरोसा हो गया कि उसे कुछ हो गया है। उसने मन ही मन तै किया कि अब वह किसी दूसरी चीज पर ध्यान नहीं देगा। सिर्फ काम से मतलब रखेगा। वह रोज सुबह काम की तलाश में निकल पड़ता। उसने उस कुत्ते की तरफ भी देखना बंद कर दिया, जो पहले उसके घर से निकलते ही दुम हिलाता और अपनी अगली टांगें उठाकर उसके पांव से लिपट जाता था। कुत्ता उसके इस बदले हुए व्यवहार से बहुत चिंतित और दुखी था लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था। वह रोज सुबह अपने मालिक को तेज कदमों से गली से बाहर जाते और शाम ढले बहुत सुस्त कदमों से खाली हाथ वापस लौटते देखता था। कुछ दिनों बार कुत्ते ने देखा कि वह बहुत कमजोर हो गया है। वह चलते-चलते रुक जाता था। बार-बार पीछे पलटता था, जैसे अपने पीछे आ रही किसी चीज को देख रहा हो। उसके कदम ऐसे उठते थे, जैसे वह किसी भारी चीज को खींच रहा हो। वह खाली हवा को ऐसे देखता था, जैसे उसमें कुछ हो। उसके इस तरह कुछ देखने से कुत्ता बहुत बेचैन हो उठता, उसके कान खड़े हो जाते, जैसे वह किसी आसन्न खतरे को भांप रहा हो। ऐसी स्थितियों से वह जानवर बहुत अच्छी तरह वाक़िफ था। उसकी मूलवृत्तियों ने तुंत ताड़ लिया कि उसके इर्द-गिर्द कौन-सी चीज मंडरा रही थी। उसने अपनी आशंकाएं जताने की कोशिश की लेकिन बदले में उसे अपने मालिक के मुंह से सिर्फ तीखी और डरावनी घुड़कियां मिलीं।

उस दिन से उसने दखल देना बंद कर दिया, और भौंकना भी। वह केवल किंकियाता रहता था। अपनी नीचे गिरी हुई पूंछ के साथ वह चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलता रहता। अपनी अगली टांगों से उछल कर मालिक के पैरों से लिपट जाना, उसके हाथो से कोई भी खाने की चीज झपट लेना, राह चलते किसी की गाय-बकरी या बच्चे को डराना, गली के दूसरे कुत्तों पर धौंस ज़माना, किसी भी कुतिया के पिछवाड़े को सूंघे बगैर न छोड़ना और पार्किंग में खड़ी स्कूटरों-कारों पर टांग उठाकर मूतना यह सब उसकी पुरानी आदतें थी। अब पहले जैसा कुछ भी नहीं था।

कुछ दिनों बाद जब उसके मालिक का सामान सड़क पर फेंक दिया गया और खोली के मालिक ने उसे खींच कर घर से बाहर निकाल दिया तब भी उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। वह अपनी अगली टांगों पर थूथन टिकाए चुपचाप देखता रहा। उसने आदमी को सामानों की पोटली बांधते देखा फिर पोटली अपने कंधे से लटकाकर वह बहुत सुस्त कदमों से गली पार करने लगा। कुत्ते ने उसके कदमों की इतनी धीमी चाल पहले कभी नहीं देखी थी। जब वह गली के मोड़ पर थोड़ा लड़खड़ाया, तब कुत्ते के कान अचानक खड़े हो गए और वह बहुत व्यग्र आवाज में किंकियाते हुए उसके पीछे दौड़ा। वह आदमी की इस अनभ्यस्त हरकत को बहुत प्रश्नाकुल निगाहों से देख रहा था और उसके तीक्ष्ण कान और ज्यादा आगे की ओर तन गए। उसकी उत्कंठा भरी आंखों से साफ जाहिर था कि वह कुछ करना चाहता था लेकिन बरबस उसने अपने आपको रोक दिया और पता नहीं किस डर से उसके कान वापस सिर से चिपक गए और वह अपनी लटकती हुई हताश पूंछ के साथ उसके पीछे-पीछे चलने लगा।

*******

अब वह वापस अपने गांव लौट रहा था। उसके कंधे पर वही पोटली थी। जब वह गांव के रेल्वे स्टेशन से बाहर निकला और स्टेशन से गांव की तरफ जाने वाली सड़क पर उसने कदम बढ़ाए तब उसकी नज़र बिल्कुल स्थिर थी। तीन साल के बिछोह के बाद घर लौटते कदमों में जो तेजी होनी चाहिए, वह तेजी उसकी चाल में नहीं थी। हालांकि गांव का मंजर बदला हुआ था। इस बार के सफल मानसून ने गांव की धूसर दृश्यावली को लहलहाती हरियाली में बदल दिया था, लेकिन उसे यह सब देखकर कोई अचरज या कोई खुशी नहीं हुई। दिमाग में लगातार हो रहे हेर फेर चलते उसके लिए यह तै करना मुश्किल था कि जो कुछ वह देख रहा है वह उसका भ्रम है या सचाई।

जमीन सचमुच गीली है। पत्ते सचमुच हरे हैं। कुएं से सचमुच कोई पानी निकाल रहा है, तालाब में स्त्री-पुरुष नहा-धो रहे हैं। गलियों में छोकरे मटरगस्ती करते घूम रहे हैं और कुत्ते गाय-बकरियों को छका रहे हैं। चारागाह में इत्मीनान से जुगाली करते पशु, चिड़ियों की चहचहाट से घिरे खेत सब्जियों और खाद से लदी बैलगाड़ियां और धान के खेतों में कटाई की गहमा-गहमी... ये सारे दृश्य उसके सामने से यूंही गुजर गए क्योंकि वह उन्हें देख नहीं रहा था। वह बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था और अपने पैरों से बंधी फेल्ट किसी चीज को बलपूर्वक घसीट रहा था। उसके एक पैर से लोहे की एक बहुत मोटी चेन लिपटी हुई थी और दूसरे पैर से एक बहुत लम्बा बेल्ट बंधा हुआ था। चेन और बेल्ट के दूसरे सिरे उस बीमार और बेकार फेक्ट्री के ढांचे से बंधे हुए थे और फेक्ट्री का वह ध्वस्त ढांचा उसके पीछे-पीछे किसी मरे हुए जानवर की तरह घिसटता चला आ रहा था। मशीनों पर ढही दीवारें और दीवारों पर ढहा पूरा शेड। लोहे के आड़े-तिरछे ऐंगल और एक-दूसरे से उलझी-फंसी पूरी मशीनरी...

जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता जा रहा था, काल के हाथो चिंचोड़ी हुई मशीनरी के सूखे पंजर बिखरते जा रहे थे। वह दृश्य और ज्यादा विकराल होता जा रहा था और उसके बढ़ते आकार की काली परछाई धीरे-धीरे गांव की सब चीजों पर फैलती जा रही थी।

यह काली परछाई सिर्फ उसे दिखाई दे रही थी। किसी और को नहीं।

इस दुनिया में उस कुत्ते के अलावा एक भी ऐसा प्राणी नहीं था, जो इस रहस्य को जानता हो। उस अभागे जानवर की जान भूत और संवेदनशील इंद्रियों ने आनेवाली आपदा का पूर्वानुमान लगा लिया था। अब वह दबे पांव चल रहा था और अपने पूर्वजों की तरह, जो हमेशा भूंप और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व सूचना मानव जाति को देते रहे हैं, वह भी सशंकित और एकदम सचेत हो गया।

आखिर चलते-चलते वह आदमी बीच सड़क पर रुक गया। और रुक जाने का कारण सिर्फ इतना था कि वह चल नहीं पा रहा था। बहुत जोर लगाने के बाद भी उसके पैर आगे बढ़ने के लिए उठ नहीं पा रहे थे।

इन दो दृश्यों के बीच बिजूका बने वह खड़ा का खड़ा रह गया।

जब शाम घिरने लगी और आदमी टस से मस नहीं हुआ, तब कुत्ते पर बेचैनी हावी हो गई। वह पहले धीरे से किंकियाया फिर अपने पिछले पंजों से बेतहाशा धूल उड़ाने लगा, फिर आदमी को सचेत करने के लिए वह जोर जोर से भोंकने लगा। उसके बाद वह दबे पांव आदमी के पास आया, उसने आदमी को सूंघा और चौंक कर पीछे हट गया।

*****

कथा यू.के और साहित्य शिल्पी की संयुक्त प्रस्तुति है यह कथा महोत्सव। महोत्सव इस लिये कि इंदु शर्मा अंतर्राष्ट्रीय कथा सम्मान का यह पंद्रहवां वर्ष है। जिन पंद्रह माननीय कथाकारों को यह प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुआ है उनकी रचनायें हम अगले पंद्रह सप्ताह तक लगातार साहित्य शिल्पी के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं अर्थात - पंद्रह बेहतरीन कहानियाँ/उपन्यास अंश।

इस कडी में आज पाँचवी प्रस्तुति है प्रस्तुत कहानी - दृश्य अदृश्य । यह कहानी, कथा यू.के द्वारा प्रकाशित पुस्तक "कथा दशक" से ली गयी है जिसमें संकलित कहानियों का संपादन किया है वरिष्ठ कथाकार सूरजप्रकाश नें।
********************

6 comments:

  1. एक प्रवाह में कहानी पढी है। कुत्ते का बिम्ब कहानी के साथ साथ चलता हुआ तुलना उत्पन्न करता है। बेकार मजदूर और फिर समाज में उसकी अनुपयोगिता का मार्मिक चित्र।

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  2. बडा विषय उठाया है हमने। कामगारों के अनिश्चित और असुरक्षित भविष्य को चित्रित करती कहानी है।

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  3. नेट पर इतनी लम्बी कहानी पढना इतना सुविधा जनक नहीं है। यह कहानी मर्म स्पर्श करती है अरुअ हमारी मानवीय संवेदनाओं को कुरेदनें में सफल है।

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  4. आज के संदर्भ में बहुत कारगर कहानी. मजदूरों के हित में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.

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  5. दृश्य में दिखाई देने वाले बिम्बों से अधिक बिम्ब मनोज रूपडा की कहानियों के अदृश्य में होते है ,वे बिम्ब ही पाठक को घटना की वास्तविकता के नये अर्थ उद्घाटित करने मे सहायता करते हैं .

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