सात-आठ की उम्र होगी उसकी। साथ वाले प्लॉट पर इमारत बननी शुरू हुई है, वहाँ मजदूरों ने अपनी झोपड़ियाँ-सी खड़ी कर रखी हैं। उन्ही में से किसी मजदूरिन की बेटी है। आते-जाते अक्सर दिख जाती है। मिट्टी, कंकड़-पत्थरों और एक टूटी हुई गुड़िया से अकेली खेलती हुई। कपड़े मैले-कुचैले, बाल उलझे और चेहरे पर ढेर सारा गर्द-गुबार। इसके बावजूद उसके चेहरे पर गज़ब का आकर्षण और भोलापन है। 

रचनाकार परिचय:-


सूरज प्रकाश का जन्म १४ मार्च १९५२ को देहरादून में हुआ।

आपने विधिवत लेखन १९८७ से आरंभ किया। आपकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं:- अधूरी तस्वीर (कहानी संग्रह) 1992, हादसों के बीच (उपन्यास, 1998), देस बिराना (उपन्यास, 2002), छूटे हुए घर (कहानी संग्रह, 2002), ज़रा संभल के चलो (व्यंग्य संग्रह, 2002)।

इसके अलावा आपने अंग्रेजी से कई पुस्तकों के अनुवाद भी किये हैं जिनमें ऐन फैंक की डायरी का अनुवाद, चार्ली चैप्लिन की आत्म कथा का अनुवाद, चार्ल्स डार्विन की आत्म कथा का अनुवाद आदि प्रमुख हैं। आपने अनेकों कहानी संग्रहों का संपादन भी किया है।

आपको प्राप्त सम्मानों में गुजरात साहित्य अकादमी का सम्मान, महाराष्ट्र अकादमी का सम्मान प्रमुख हैं।

आप अंतर्जाल को भी अपनी रचनात्मकता से समृद्ध कर रहे हैं।

कई बार वह गेट से टिकी हमारे कॉलोनी में लगे झूलों पर बच्चों को खेलता देखती रहती है, लेकिन वॉचमैन हर बार उसे दुत्कारकर भगा देता है। न जाने क्यों उसे देखते ही प्यार करने को जी चाहता है, लेकिन हर बार संकोचवश रह जाता हूँ। काश! वह भी साफ-सुथरी रहती और कॉलोनी के बच्चों के साथ खेल सकती। 

बाज़ार से उसके लिए एक अच्छी-सी गुड़िया और चाकलेट लाता हूँ और उसे अपने पास बुलाकर देता हूँ। उसे बिश्वास नहीं होता, खिलौने उसे ही दिए जा रहे हैं। हिचकिचाती है। नहीं लेती। ज़बरदस्ती उसे थमा देता हूँ। वह अपने हाथों मे यह अदभुत उपहार लिए ठिठकी रह जाती है। 

उसे विस्मित-सा छोड़ संतुष्ट होकर घर लौट आता हूँ। थोड़ी देर बाद दसवीं मंज़िल पर बने अपने घर की बाल्कनी से नीचे झाँकता हूँ। गेट के बाहर वॉचमैन ने उसे मज़बूती से बाँह थाम रखा है और गुड़िया छीन ली है। हाव-भाव से यही लगता है जैसे पूछ रहा हो,’अन्दर कैसे आई और ये गुड़िया, चाकलेट किससे छीनकर ले जा रही है?’ लड़की कुछ बताना चाह रही है, पर उसे मेरा घर नहीं पता, कुछ नहीं बता पाती। रूआँसी-सी खड़ी है। वॉचमैन ने उससे सब कुछ छीनकर उसे गेट के बाहर धकेल दिया है। वह वापस मिट्टी के ढेर की तरफ जा रही है, जहाँ कुछ देर पहले वह खेल रही थी। कंकड़-पत्थरों से।

18 comments:

  1. यही वर्ग विभेद है सूरज जी। आदमी और आदमी का अंतर।

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  2. मर्मस्पर्शी लघु-कहानी है। एक आप घटना को आपने इस तरह प्रस्तुत किया है कि मन भारी हो गया।

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  3. सूरजप्रकाश जी ही एसा लिख् सकते हैं। वह लडकी इस समाज के चेहरे को कलंकित करती है। कह लडकी सवाल उठाती है कि उसे मिला प्यार लुक छुप कर क्यों? और फिर अविश्वास क्यों कि वह चोर ही होगी? हम खांचों में बटे हैं।

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  4. बहुत ही अच्छी लघुकथा.... बधाई

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  5. मन को झकझोरती मर्मस्पर्शी यह कथा लघु भले है.....पर इसमें कही गयी बात बहुत बड़ी है...

    आभार आपका..

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  6. जनाबे सूरज साहिब ने एक लघु कथा में बहुत कुछ कह दिया
    मैंने सूरज साहिब को काफी पढ़ा है लेकिन आज एक छोटी सी
    "कहानी" ने मुझे हिला कर रख दिया
    बहुत कुछ कह गया कहानी में
    मेरा सूरज जो "शिल्पी" है उसे मेरा सलाम

    चाँद शुक्ला हदियाबादी
    डेनमार्क

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  7. इस मार्मिकता के पीछे समाज के वर्ग भेद का चेहरा है। कब लोग इंसान को इंसान समझ पाएँगे।

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  8. संवेदनशील, मार्मिक लघु कथा

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  9. ये आप सब का स्‍नेह है कि आप सबको मेरी लघुकथाएं अच्‍छी लगती हैं। ये लघुकथाएं पिछले 25 बरस के दौरान अलग अलग विषयों पर लिखी गयी हैं लेकिन आम तौर पर इनमें मुंबई महानगरीय जीवन की आपाधापी के अलग अलग शेड्स ज्‍यादा दिखायी देते हैं।
    मुंबई का जीवन है ही ऐसा कि कदम कदम पर कहानियां बिखरी नजर आती हैं।

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  10. मार्मिक कथा के लिए सूरजप्रकाश जी को बधाई।

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  11. लघुकथा में गहन मानवीय संवेदना अन्तर्निहित है। एक सर्वहारा श्रमिक की कन्या के माध्यम से कथाकार ने दलित-शोषित वर्ग की भावी पीढ़ी की बनती मानसिकता की बुनियाद की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। आहत बच्ची के ह्रदय की आग एक दिन भड़केगी — ऐसा संकेत पाठक अनुभव करता है।
    *महेंद्रभटनागर

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