कथा यू.के और साहित्य शिल्पी की संयुक्त प्रस्तुति है यह कथा महोत्सव। महोत्सव इस लिये कि इंदु शर्मा अंतर्राष्ट्रीय कथा सम्मान का यह पंद्रहवां वर्ष है। जिन पंद्रह माननीय कथाकारों को यह प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुआ है उनकी रचनायें हम अगले पंद्रह सप्ताह तक लगातार साहित्य शिल्पी के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं अर्थात - पंद्रह बेहतरीन कहानियाँ/उपन्यास अंश।

इस कडी में आज तीसरी प्रस्तुति है उपन्यास अंश - मरीचिका। यह उपन्यास अंश, कथा यू.के द्वारा प्रकाशित पुस्तक "कथा दशक" से लिया गया है जिसमें संकलित कहानियों का संपादन किया है वरिष्ठ कथाकार सूरजप्रकाश नें।
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।। पादुकाराज की अयोध्या ।।

"राम के बिना अयोध्या उस सेना के समान जान पड़ती थी, महायुद्ध में जिसके कवच फट गये हों, जो आपत्ति में फंस कई हो;
राम के बिना अयोध्या उस गर्भिणी होने की इच्छुक गाय के समान लग रही थी, जिसे गोशाला में बंद कर दिया गया है और जिसे सांड़ छोड़ गया हो;
राम के बिना अयोध्या उस बनलता के समान प्रतीत होती थी, जो बसंत के कारण फूलों से लदी हो, पर दावाग्नि के कारण झुलस गई हो;
राम के बिना अयोध्या उस ध्वस्त मधुशाला के समान लग रही है, जिसके पियक्कड़ चले गये हों और जिसकी सफाई न हुई हो;
राम के बिना अयोध्या उस दुर्बल किशोरी के समान प्रतीत होती थी, जिसे कोई युद्ध कुशल अश्वारोही लेकर भाग गया हो और अपनी वासनापूर्ति के पश्चात् छोड़ गया हो;
राम के बिना अयोध्या उस बावड़ी के समान लग रही थी, जिसका जल सूख गया हो..."

-महर्षि वाल्मीकि (रामायण)


अयोध्या...।

राम को वन गये चौदह वर्ष होने को आये।
अयोध्या में चौदह वर्षों से पादुकाराज चल
रहा है, पर लगता है कि मानो सदियां हो गईं।
इसी पादुकाराज के अंतिम दिनों में से कोई एक
दिन...।

अयोध्या में सुबह :
सूर्योदय हो रहा है क्योंकि रामराज
अभी भी एक संभावना तो है ही...

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सुबह हो रही है।
धूप की स्वर्णिम किरणें अयोध्या के दुर्ग पर गिर रही हैं।
दुर्ग का पूर्वी द्वार है यह।
अयोध्या का दुर्ग विशाल, सुदृढ़ तथा अलंघ्य है। कहा यही जाता है, अन्यथा दुर्ग जैसा है, जो आपके समक्ष है ही। प्राचीर की स्थिति आप देख रहे हैं। ध्वस्तप्राय प्राचीर। जीर्ण भोजपत्रों-सी भुरभुरी। जर्जर। यत्र-तत्र दरारें। बल्कि सर्वत्र ही कहिए। पत्थर टपक रहे हैं या लगभग हिलगे हुए हैं। चूना झर चुका है। चींटें-चींटियों के अनगिनत बिल। काई के बड़े-बड़े धब्बे। दरारों में उग रहे पीपल के अनेक पौधे, तृणमूल भी।...वस्तुत: इसे खंडहर कहने की बलवती इच्छा हो रही है हमारी, परंतु देशभक्ति का आग्रह हमें रोक लेता है। अयोध्या में देशभक्ति का सबसे सुगम रसायन यह है कि आप अयोध्या की दुर्बलताओं को ढांके रहिए। इसी नीति के अंतर्गत हमने इस दुर्ग को अलंघ्य कहा है, अन्यथा, वस्तुत: यदि कोई शत्रु काई पर फिसलकर पतित होने से भयभीत न होता हो, कोहनी छिल जाने पर रोता न हो, माथे पर गूमड़ के लिए हल्दी साथ लेकर चले और अधोवस्त्रों में चींटियां घुस जाने पर भी प्राचीर के गड्ढों में धरे पंजों का संतुलन न खोये, तो वह कहीं से भी इसे लांघ सकता है। यह अवश्य है कि प्राचीर के साथ गहन खाई खुदी है तथा वह नित्य ही जल से आकंठ भरी है। उसे यह खाई पार करना अवश्य दुष्कर होगा क्योंकि वर्षों से भरा जल इसमें सड़ रहा है। जल में काई है, कीड़े-मकोड़े हैं, जोंकें हैं और वे जलचर भी हैं जिनका नाम कथालेखक को ज्ञात नहीं परंतु जो यदि कभी काटें तो ऐसी-जैसी हो जाती है।

द्वार कपाट अभी बंद हैं।

रचनाकार परिचय:-


सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, भोपाल द्वारा संचालित एक अस्पताल में हृदय विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत डॉ० ज्ञान चतुर्वेदी हिन्दी के जाने-माने व्यंग्यकार हैं।

अब तक इनके कई उपन्यास, हास्य-व्यंग्य संग्रह तथा कहानियाँ प्रकाशित हो कर लोकप्रिय हो चुके हैं।

2002 में अपने उपन्यास बारामासी के लिए आपको इंदु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित किया गया है।

कपाट सुदृढ़ प्रतीत हो रहे हैं। वैसे द्वार की काष्ठ पुरानी होकर सड़ रही है। सड़ी काष्ठ पर ही ऊपर से लौह-पट्टियां एवम् कील-कांटे ऐसे कौशल तथा कारीगरी से ठोक दिये गये हैं कि द्वार कपाट बिना किसी अन्य कारण के अति सुदृढ़ से निकल आये हैं। सुबह की धूप में ये कील-कांटे ऐसे चमक रहे हैं कि द्वार यूं ही भव्य तथा दृढ़ दीख रहा है।... और पादुकाराज में सर्वत्र बल इस बात पर ही तो है कि कोई वस्तु दीखती कैसे है-वह वस्तुत: है कैसी - इस प्रश्न में किसी की भी रुचि नहीं। जो मूर्ख जिज्ञासु ऐसे मूढ़ प्रश्न पूछते हैं, उनको अयोध्या में कोई नहीं पूछता। वे खाई में ठहरे जल की भांति सड़ते रह जाते हैं।

बंद कपाटों के भी बाहर एक प्रहरी खड़ा है। खाई तथा दुर्गद्वार के बीच की भूमि पर खड़ा प्रहरी सजग, उनींदा, चपल तथा ढीला एक साथ है। खाई के भी पार विराट मैदान है, जहां सैकड़ों बैलगाड़ियां खड़ी प्रतीक्षारत हैं कि द्वार खुलें, तो वे प्रवेश करें। मैदान के भी परे अरण्य है, जो अनंत क्षितिज तक विस्तीर्ण है। क्षितिज सूर्योदय की लालिमा से रक्तिम है। रक्तिम प्रकाश की अनंत चादर से मुख ढांपकर अरण्य के वृक्ष सो रहे हैं। सुबह हुई। अरण्य चादर ओढ़े निद्रामग्न है। आलसी कहीं का! उठ रे! अबेर हुई।...चिड़ियों ने पुकारकर कहा और चादर उठाकर आकाश में ले उड़ीं। अनंत आकाश चिड़ियों की चहचहाहट से भर गया। शोर हुआ तो अरण्य अंगड़ाई लेकर जाग उठा।...सुबह हो गई।
द्वार-प्रहरी ने वस्त्र ठीक किये, नेत्र मले, खाई-जल में थूका, अपान वायु को प्रात: के मंद समीर को सादर अर्पित किया और पुन: वस्त्रों में ही कहीं धरी दातुन के टुकड़े को निकालकर दातुन-चर्वण में लीन हो गया।

रत्नेशजी दृष्टिगोचर नहीं हो रहे?...दातुन-चर्वण में डूबे प्रहरी का नाम सुदर्शन है। वे जिन रत्नेशजी को खोज रहे हैं, वे यहां के दूसरे प्रहरी हैं, जो पूर्वी द्वार बंद हो जाने के पश्चात् खाई और प्राचीर के बीच सुदर्शनजी के साथ रात्रिपर्यंत पहरा देते हैं। खाई पर पड़ा काष्ठ का अस्थायी पुल भी रात्रि में उठा लिया जाता है। रात्रि में अयोध्या को सुदर्शन, रत्नेश जी, खाई में भरे जल, ध्वस्तप्राय दुर्ग प्राचीर तथा प्रारब्ध के भरोसे सुरक्षित मान लिया जाता है।

दातौनजनित थूक अब सुदर्शनजी के ओष्ठों के कूलों से बहकर ठुड्डी पर उगे बालों में उलझता-झूलता धरा की दिशा में गिरकर अयोध्या की माटी में मिल रहा है। वे खाई पर झुक गये। ढेर सा थूक उन्होंने खाई को समर्पित कर दिया। थूक उस अनाम जलचर पर जा गिरा, जिसकी चर्चा हमने प्रारंभिक पंक्तियों में ही की थी। जलचर चौंककर डुबकी मार गया।

सूर्य भगवान प्रकट हो चुके हैं।

धूप की टुकड़ियां बगटुट आईं और समस्त सुरक्षा व्यवस्था को धता बताती हुई अयोध्या में प्रविष्ट हो गईं। सुदर्शनजी न चौंके, न सतर्क हुए। वे दातौन चबाते रहे। वे जान गये कि रत्नेशजी पुन: खाई के किनारे उकडूं बैठकर अपना वह कर्तव्य पूरा कर रहे हैं जिसमें उन्होंने अपना पूरा जीवन ही होम कर दिया। बेचारे उदर के अर्वाचीन रोगी हैं और जल को देखते ही निकट की भूमि पर उकडूं बैठने की हूक-सी उठ जाती है उनके उदर में। खाई मानो उनको पुकारती है। पहरे का बहुत सा समय वे खाई तट पर ही गुजारते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वस्तुत: खाई रत्नेशजी हेतु ही निर्मित हुई है-अयोध्या की सुरक्षा भी लगे हाथों हो जाती है, यह संयोग ही है।

द्वार कपाट बंद हैं।
धूप में चमक रहे हैं कीट-कांटे।
मंद बयार का झोंका चोरी छुपे आया और प्राचीर लांघ गया। सुदर्शनजी थूकने में व्यस्त थे।
"सेतु कब तक स्थापित होगा महोदय?" किसी ने खाई के उस पार से पुकारकर पूछा।
सुदर्शनजी ने मुंह उठाकर देखा। एक बुजुर्ग से व्यापारी हैं, जो यह पूछ रहे हैं।

खाई के उस पार का विराट मैदान बैलगाड़ियों से अंटा है। व्यापारी जब तक माल भरी बैलगाड़ियां लिए रात्रि में पहुंचे थे, तब तक कपाट बंद हो चुके थे। खाई पर पड़ा काष्ठ का अस्थायी पुल भी रात्रि में उठा लिया जाता है। व्यापारी की उत्कंठा है कि पुल कब पुनर्स्थापित होगा।...व्यापार करते हुए वृद्धावस्था को प्राप्त हुए, परन्तु जिज्ञासाएं शिशुवत् हैं। रात्रि में व्यापारियों ने लगनपूर्वक जो सेवा की और जो उत्कोच राशि उनसे सुदर्शनजी ने रात्रिपर्यन्त वसूली है, यदि उसका ध्यान न होता तो वे वृद्धात्मा को इस पार से ही खड़ाऊं फ़ेंक कर मारते।

"प्रथम द्वार-कपाट तो खुलें...तब न सेतु स्थापित होगा?" सुदर्शनजी ने दातौन के शेष बचे टुकड़े को खाई में फ़ेंकते हुए कहा।

दातौन उसी जलचर पर गिरी है, जो जल सतह पर पुन: प्रकट हो गया था।

"सत्य भास रहे हैं श्रीमान..." व्यापारी ने सहमत होते हुए कहा।

सुदर्शनजी ने थूक की अंतिम किस्त खाई में गिराते हुए कहा, "पुन: अभी हम सेतु डाल भी दें, तो भी द्वार कपाट तो बंद ही है ना? पुन: अयोध्या प्रवेश हेतु बैलगाड़ी किस मार्ग से घुसेड़ोगे?"

"उत्तम उद्गार हैं महोदय के..." व्यापारी ने माना कि बंद द्वार से बैलगाड़ी घुसेड़ना संभव न होगा।
सुदर्शनजी कुल्ला करने लगे। वे गले से नाना ध्वनियां करने लगे और लोटे से पानी ले-लेकर खाई को आप्लावित करने के प्रयास में लीन हो गये।

"द्वार-कपाटों के खुलने की कब तक आशा है?" व्यापारी ने पूछा।
अंतिम कुल्ले का जल उसी हठी जलचर की पीठ पर गिराते हुए सुदर्शनजी ने अंगोछे से मुख पोंछते हुए कहा

"खुलते ही होगे...विशालचंद्रजी कभी-कभी लंबी निद्रा में लीन हो जाते हैं।" विशालचंद्रजी पूर्वी द्वार के उप-प्रभारी हैं। वे ही द्वार-कपाट खुलवाते हैं।

"आपके साथी दृष्टिगोचर नहीं हो रहे प्रहरीश्रेष्ठ?" व्यापारी ने रत्नेशजी के विषय में पूछा।
"खाई की दिशा में दृष्टिपात करें महोदय.. वे वहां उकडूं बैठे हैं...।"
"क्या किसी शत्रु पर गुप्त टोह लगाये बिराजे हैं...?"
"परिहास उत्तम है।...जैसा चटपट, मसालायुक्त भोजन आपने रात्रि में करवाया, उसके पश्चात् मनुष्य जल से भरी खाई के दुकूल पर बिराजा और कौन सा उद्योग करेगा?"
"उदरस्थ तो आपने भी किया था..बल्कि दोगुना किया होगा।"
"हमसे तुलना न करें उनकी...।"
"सो भला क्योंकर...?"
"क्योंकि वे ईमानदार, सदाचारी तथा सत्यनिष्ठ कर्मचारी हैं...।"
"सत्य वचन...।"
"तभी तो वे रात्रि में भी कहां तत्पर थे...वो तो आपने बलात् ही खिलाया उन्हें...अब बेचारे वहां विराजे हैं...।"
"सत्य कहा श्रीमान ने...।"
"क्या है कि सत्यनिष्ठ मनुष्य का उदर सदैव ही रिक्त रहने के कारण जठरतंत्र निर्बल हो जाता है..."
"भूखे मनुष्य की क्या तो पाचन शक्ति...।"
"वही तो..."
"पुन: आप-सी पाचन शक्ति तो अयोध्या में भी दुर्लभ ही है।"
"हमारा तो ऐसा है कि लौह खायें तो लौह भस्म और काष्ठ खायें तो..."
"प्रहरी की पाचन शक्ति यदि ऐसी प्रबल न हो तो अंतत: पादुकाराज ही लज्जित होगा...।"
"सत्य कथन है...।"

चर्चा भंग करते हुए द्वार-कपाटों के खुलने की चर्र-चर्र ध्वनि सुनाई दी। चरमराहट सुनकर सतर्क हो सुदर्शनजी ने निकट ही धरती पर टिका भाला तत्परतापूर्वक उठाया और वे सावधान की मुद्रा में स्थिर हो क्षितिज पर स्थित किसी काल्पनिक शत्रु को घूरकर देखने लग गये। व्यापारी वृद्धावस्था में भी ऐसी चपलगति से अपनी बैलगाड़ी की दिशा में भागा कि बैल तक चौंक गये।

द्वार शनै:शनै: अंतत: पूरा खुल गया।

विशालचंद्रजी प्रकट हुए और निष्कंप खड़े सुदर्शनजी को मंदस्मितपूर्वक देखते रहे।

"चिंतित न हों...हम अकेले हैं," उन्होंने कहा।
उनके साथ कभी-कभी द्वार प्रभारी शुभचेतनजी भी निकल आते हैं तो सतर्क रहना पड़ता है, अन्यथा विशालचंद्रजी तो उन्हीं की भांति क्षुद्रमार्ग के पथिक हैं।

सुदर्शनजी ने सुना और सुनकर तनी मुद्रा से सीधे ऐसे ढीले हो गये कि मानों जलसिक्त लत्ते की भांति धरा पर चू जायेंगे।...भाले का संबल लेकर तिर्यक खड़े होकर वे बोले:

"और गुरुजी...?"
गुरुजी ने अब तक बैलगाड़ियों की भारी भीड़ का आकलन कर लिया है।
"वसूली से निवृत्त हुए?" गुरुजी ने वह प्रश्न किया जिसका उत्तर उन्हें स्वयं ज्ञात था।
"रात्रिपर्यंत और क्या करते रहे...?" सुदर्शनजी ने कहा।
"स्थिति रस-सिक्त प्रतीत होती है...।"
"चू रही है..."
"द्वार प्रभारी कुपित हो रहे थे कि पूर्वी द्वार पर अपेक्षित वसूली नहीं हो रही..." विशालचंद्रजी ने हंसते-हंसते ही कहा, मानो यूं ही स्मरण हो आया हो, सो कह दिया।
सुदर्शनजी रूठ चले...

"अब क्या चाम उतार लें व्यापारियों की...?"
"वह तो चर्चा हुई थी, सो हमने बताया...।"
"पुन: आपने ऐसे ढपोरशंख साथ में पकड़ा दिये हैं कि..."
"अरे हां...रत्नेश जी नहीं दिख रहे...।"
"खाई तट पर प्रतिष्ठित हैं...वहीं बैठे रहते हैं...काहे का पहरा और क्या वसूली...।"
"सदाचारी ठहरे...।"
"हम अकेले क्या-क्या करें...?"
"वसूली के लिए तो आप अकेले पर्याप्त हैं...।"
"एक-एक मुद्रा के लिए जैसा विकट विमर्श हम करते हैं, अन्य कोई भी प्रहरी करके बताये तो...।"
"तभी तो शुभचेतनजी आपका हार्दिक सम्मान करते हैं। उनके ही उद्गार हैं कि सुदर्शन को यदि बैल भी पकड़ा दो तो वह उससे भी दुग्ध निकाल दे...।"
"ये तो अतिवचन कहाये श्रीमान, क्योंकि अयोध्या की गायों तक में तो दुग्ध शेष रहा नहीं, यहां आप बैलों की चर्चा करते हैं...।"
"ऐसे कुबोल उच्चारने से पूर्व आगे-पीछे दृष्टिगत कर लिया करो मित्र।"
"हम तो दसों दिशाओं में दृष्टिपात के पश्चात् ही सत्य उच्चारते हैं अयोध्या में...।"
दोनों हंसने लगे।
कि रत्नेशजी प्रकट हुए। एक हाथ में भाला, दूसरे में लोटा। मुख पर अतृप्ति के स्थायी भाव।

"कहां अदृश्य थे पंडितजी...?" विशालचंद्रजी ने पूछा।
"और कहां जायेंगे महोदय...," रत्नेश ने लोटे की दिशा में इंगित करते हुए कहा।
इधर सूर्य भगवान पूर्वी क्षितिज पर धूप का लोटा संसार पर उड़ेल रहे हैं। धूप बह नकली है चहुंओर।

"आप कर्तव्य स्थल तज कर वहां खाई तट पर लोटायुक्त बिराजे रहते हो, और यहां कदाचित् कहीं से कोई शत्रु आ जाये, तो...?" स्पष्ट है कि विशालचद्रजी परिहास कर रहे हैं।

"अयोध्या पर कौन मंदबुद्धि आक्रमण करेगा महाराज...यहां शेष बचा ही क्या है? शत्रु को ऐसा मूर्ख भी न मानिए गुरुजी...।"

उत्तर सुदर्शनजी ने दिया। संतों की वाणी सी खनक एवम् उत्तर में ऐसा निस्पृह भाव कि मानो अयोध्या को इस जीर्णावस्था में पहुंचाने में उनका कोई योग ही नहीं रहा हो।

"अभी-अभी हमने निषेध किया था कि यत्र-तत्र टोह कर ही अनर्गल बोला करो...," विशालचंद्र जी ने प्रताड़ना के दुर्बल स्वरों में कहा।

"तो...?"

"तो यह कि वे वहां आपका समस्त प्रलाप सुन रहे हैं...," विशालचंद्रजी ने खाई के उस और एकत्रित हो गये व्यापारी गणों की दिशा में इंगित करते हुए कहा और पुन: व्यापारियों को फटकराते हुए बोले, "क्या प्रयोजन है?"

"स्वामी सेतु स्थापना करा देते...," एक व्यापारी ने प्रार्थना प्रस्तुत की।
"तुम तो ऐसे प्राण उत्सर्ग करने पर तुले दीखते हो कि मानो कदाचित् सूर्योदय न हो कर सूर्यास्त की बेला आ गई हो...?"
"आदरणीयों में सर्वश्रेष्ठ, समय पर अयोध्या प्रवेश कर लेते तो मंडी में सामग्री पहुंच जाती और...।"
"कर लेना प्रवेश...पर मरो मत...।"
"उत्कंठा में कहीं प्राण न त्याग देना बुढ़ऊ।...और बैल किंचित् विश्राम कर लेंगे तो पुर्ण्याजन ही होगा...।"
"महाराज, पुण्य पुन: कभी अर्जित कर लेंगे, संप्रति तो मुद्रा अर्जन का योग बने तो...," एक युवा व्यापारी ने हंसते हुए कहा।
"नितांत दुष्ट और नटखट हो रे तुम," विशालचंद्रजी ने हंसकर कहा और संकेत दिया।

सुदर्शनजी ने यही संकेत रत्नेशजी को स्थानांतरित किया, जो लोटा भूमि पर धर कर उदर पर हस्त फेर रहे थे।

रत्नेश ने द्वार की चौखट के निकट किसी कल में चाभी डाली और कोई कल घुमानी प्रारंभ कर दी। चर्र-चर्र की ध्वनि के साथ काष्ट के विराट पटिये द्वार के निकट से प्रकट हुए एवम् वायुमंडल में शनै:शनै: नीचे आते हुए इस तट से उस तट तक खाई पर बिछ गये। अस्थायी काष्ठ-सेतु स्थापित हो गया।

सैकड़ों बैलगाड़ियां सेतु पर चल पड़ीं।

सूर्यभगवान आकाश में।
पादुकाराज अयोध्या में।

अयोध्या में एक और सुबह हो रही है। अयोध्या में आपका स्वागत है। पधारें। परंतु ध्यान से पधारें। काष्ठ-सेतु के पटिये यत्र-तत्र सड़ चुके हैं। आप किंचित् भी चूके कि खाई के सड़ते जल में टपक जायेंगे।
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15 comments:

  1. ज्ञान चतुर्वेदी जी को साहित्य शिल्पी पर पढना अच्छा लगा। पक्का और गहरा व्यंग्य किसे कहते हैं इस उपन्यास अंश से समझा जा सकता है।

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  2. पादुका शासन और अव्यवस्थायें केवल एक पुराने पृष्ठभूमि पर व्यंग्य नहीं है बल्कि आज को कटघरे में खडा करने का व्यंग्यात्मक प्रयास है।

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  3. Nice Satire with new vision.

    Alok Kataria

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  4. बहुत अच्छी व्यंग्य प्रस्तुति, बधाई।

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  5. पादुकाराज की अयोध्य की अच्छी छिलाई की है ज्ञान जी नें। समकालीन है।

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  6. पंकज सक्सेना15 जून 2009 को 9:57 am

    करारा कटाक्ष, अनुपम प्रस्तुति।

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  7. यह कहानियों की श्रंखला अच्छी व महत्वपूर्ण है। ज्ञान जी के इस अंश को ही पूरा व्यंग्य लेख माना जा सकता है साथ ही इससे उनके उपन्यास की गहरायी व रोचकता मापी जा सकती है।

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  8. रोचक है, व्यंग्यात्मक शैली में लिखे उपन्यास कम ही पढने मिलते हैं।

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  9. मरीचिका हिंदी का एक अद्भुत व्यंग उपन्यास है...राम की अयोध्या के माध्यम से ज्ञान जी ने आज के हालत का जो ब्यौरा दिया है वो विलक्षण है...ये उपन्यास सारे हिंदी प्रेमियों को एक बार जरूर पढना चाहिए ,क्यूँ की ऐसा व्यंग हिंदी में इस पैमाने पर कभी नहीं लिखा गया...
    नीरज

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  10. मरीचिका पढने की इच्छा हो गयी है।

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  11. मरीचका एक अद्भुत उपन्यास है. बिना पढ़े हुए, कल्पना भी कर पाना मुश्किल है कि इस तरह का व्यंग लिखा जा सकता है.

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  12. बहुत सुन्दर उपन्यास अंश, बधाई।

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  13. मज़ा आया

    अनुज कुमार सिन्हा

    भागलपुर

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  14. अच्छी भाषा के साथ करारा व्यंग कैसे किया जाता है, चतुर्वेदी जी ने सिखा दिया... पूरा उपन्यास पढ़ने का मन है...
    खबरी

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