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मंगलवार, ७ जुलाई २००९

सोफिया अन्द्रेयेव्ना तोल्स्तोया की डायरी के शेष अंश [लियो तोल्सतोय की पत्नी की डायरी से] - अनुवाद व प्रस्तुति : रूपसिंह चन्देल

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फरवरी १५, १८७०

कल लेव ने देर तक शेक्सपियर के विषय में मुझसे बात की और उसके प्रति बहुत प्रशंसा प्रकट की. वह नाटककारों में उन्हें बहुत बड़ा मानते हैं. जहां तक गोयेथ का प्रश्न है, सौन्दर्य और सादृश्यबोध से वह उसे सौन्दर्यबोधी मानते हैं, लेकिन उसमें नाटकार की प्रतिभा नहीं---- वहां वह कमजोर है. लेव फेट से उनके प्रेमपात्र गोयेथ के विषय में बात करना चाहते हैं. लेकिन लेव ने कहा कि जब गोयेथ दार्शनिक रूप प्रस्तुत करते हैं तब निश्चित ही वह महान है..

जब मैं आज सुबह लेव की स्टडी के दरवाजे के सामने से गुजर रही थी, उन्होंने मुझे अंदर आने के लिए कहा. उन्होंने मुझसे रूसी इतिहास और महान व्यक्तियों के विषय में लंबी चर्चा की. वह ’पीटर दि ग्रेट’ पर उस्त्र्यालोव का इतिहास पढ़ रहे थे.

’पीटर दि ग्रेट’ और मेन्सिकोव जैसे व्यक्तियों में उनकी बहुत रुचि है. मेन्सिकोव को उन्होंने शक्तिशाली और विशुद्ध रूसी चरित्र बताया, जो केवल आमजन के मध्य से आते हैं. पीटर दि ग्रेट के विषय में उन्होंने कहा कि वह अपने समय का कठपुतली था, कि वह निर्दयी था , लेकिन भाग्य ने उसे रूस और योरोपीय संसार के बीच संपर्क स्थापित करने के मिशन के लिए निर्दिष्ट किया था. लेव को एक ऎतिहासिक नाटक के लिए विषय की तलाश है और वह नोट्स ले रहे हैं, जिसे वह अच्छी सामग्री मानते हैं. आज उन्होंने मिरोविच की कहानी लिखी, जो इयोन एण्टोनोविच को किले से मुक्त करवाना चाहता है. कल उन्होंने मुझसे कहा था कि उन्होंने पुनः कॉमेडी लिखने का विचार त्याग दिया था, लेकिन एक ड्रामा के विषय में सोच रहे थे. वह कहते रहते हैं कि आगे कितना अधिक काम है !

हम साथ-साथ स्कैटिंग के लिए गये और उन्होंने सभी प्रकार के प्रदर्शन में भाग लिया. उन्होंने एक पैर से, दोनों पैरों से, पीछे चलकर, घूमकर और भी कई प्रकार से स्कैटिंग की. वह एक बच्चे की भांति प्रसन्न थे.


फरवरी २४, १८७०

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-
१२ मार्च, १९५१ को कानपुर के गाँव नौगवां (गौतम) में जन्मे वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल कानपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), पी-एच.डी. हैं। अब तक उनकी ३८ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ६ उपन्यास जिसमें से 'रमला बहू', 'पाथरटीला', 'नटसार' और 'शहर गवाह है' - अधिक चर्चित रहे हैं, १० कहानी संग्रह, ३ किशोर उपन्यास, १० बाल कहानी संग्रह, २ लघु-कहानी संग्रह, यात्रा संस्मरण, आलोचना, अपराध विज्ञान, २ संपादित पुस्तकें सम्मिलित हैं। इनके अतिरिक्त बहुचर्चित पुस्तक 'दॉस्तोएव्स्की के प्रेम' (जीवनी) संवाद प्रकाशन, मेरठ से प्रकाशित से प्रकाशित हुई है।उन्होंने रूसी लेखक लियो तोल्स्तोय के अंतिम उपन्यास 'हाजी मुराद' का हिन्दी में पहली बार अनुवाद किया है जो २००८ में 'संवाद प्रकाशन' मेरठ से प्रकाशित हुआ है।सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन
दो चिट्ठे- रचना समय और वातायन

आज अंततः बहुत हिचकिचाहट के बाद वह काम करने बैठे . कल उन्होंने कहा कि जब भी वह गंभीरता पूर्वक विचार करते हैं वह चीजों को नाट्य रूप की अपेक्षा महाकाव्यात्मक रूप में ही देखते हैं.

कुछ दिन पहले वह फेट के पास गये थे, जिन्होंने उनसे कहा कि ड्रामा उनकी विधा नहीं है. इसलिए अब ऎसा प्रतीत होता है कि उन्होंने ड्रामा अथवा कॉमेडी का विचार छोड़ दिया है.

आज सुबह एक शीट पेपर के दोनों ओर उन्होंने मिनटों में भर दिये. बहुत ही चमत्कारिक ढंग से काम प्रारंभ हुआ. उन्होंने बहुत से मान्य व्यक्तियों पर ध्यान केन्द्रित किया, जिनमें कुछ महान लोग भी हैं जो बाद में उनके मुख्य चरित्र बनेंगे.

कल उन्होंने कहा कि वह आभिजात्यवर्ग की एक विवाहिता स्त्री के विषय में सोच रहे थे जो गलत दिशा में जा चुकी थी. उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य यह चित्रित करना था कि वह निन्दा की अपेक्षा दया की पात्र थी. जैसे ही अपनी हीरोइन के विषय में उनकी दृष्टि स्पष्ट हुई, उनके अन्य पात्र जिनकी कल्पना उन्होंने की थी (पुरुष और महिला पात्र) उसके इर्द-गिर्द एकत्रित हो लिए थे.

"अब मुझे सब कुछ स्पष्ट है." वह बोले थे. जहां तक कृषक मूल के पढ़े-लिखे लोगों की बात है, जो उनके मस्तिष्क में लंबे समय से विद्यमान हैं----- उनके विषय में उन्होंने निर्णय किया है कि वह उसे किसी जागीर के कारिन्दा के रूप में चित्रित करेंगे.

मार्च २७, १८७१

दिसम्बर से वह दृढ़ निश्चय के साथ ग्रीक भाषा का अध्ययन कर रहे हैं. दिन और रात वह उसके लिए बैठे रहते हैं. एक नये ग्रीक शब्द को जान लेने अथवा उसकी अभिव्यक्ति को समझ लेने से उन्हें जो आनंद और प्रसन्नता प्राप्त होती है वह दुनिया की किसी अन्य बात में नहीं मिल सकती.---- जेनोफॉन से प्लेटो, फिर ओडिसी और इलियाड (जिसके लिए वह पागल हैं) . वह चाहते हैं कि मैं उन्हें मौखिक अनुवाद करता सुनूं और उनके अनुवाद को ग्नेडिच (Gnedich) से मिलाऊं, जिसे वह बहुत अच्छा और ईमानदार मानते हैं. ग्रीक में उनकी प्रगति (दूसरों को समझकर, जबकि उनमें से वे भी हैं जो विश्वविद्यालय का कोर्स समाप्त कर चुके हैं ) अद्भुत है.

कभी-कभी उनके दो-तीन पृष्ठों के अनुवाद में मुझे दो या तीन से अधिक त्रुटियां अथवा अबोध्य-वाक्यांश नहीं मिले.

वह मुझसे कहते रहते हैं कि वह लिखना चाहते हैं. वह ग्रीक कला और साहित्य जैसा शास्त्रीय , सुबोध्य, ललित और अपेक्षाकृत भारमुक्त कुछ लिखने का स्वप्न देख रहे हैं. मैं बता नहीं सकती, हांलाकि मैं स्पष्टतः महसूस करती हूं कि उनके मस्तिष्क में क्या है. उनका कहना है कि "लिखने की अपेक्षा न लिखना अधिक मुश्किल है." अर्थात मुश्किल चीजें किसी को निस्सार शब्द लिखने से रोकती हैं. कुछ ही लेखक इसमें सक्षम होते हैं.

वह रूसी पुराकाल पर लिखने की सोच रहे हैं ---- चेत्यी-मिनेई (Chetyi-Minei) और संतों के जीवन का अध्ययन कर रहे हैं, और कहते हैं कि यही हमारा वास्तविक रूसी काव्य है.

मार्च १९, १८७३
कल शाम अचानक लेव ने मेरी ओर देखा और बोले, "मैंने डेढ़ पृष्ठ लिखे हैं और मैं सोचता हूं कि वह अच्छा है." यह मानकर कि यह पीटर दि ग्रेट काल पर लिखने का उनका एक और प्रयास है, मैंने उनकी बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया. लेकिन बाद में मुझे ज्ञात हुआ कि उन्होंने निजी जीवन के विषय में एक समसामयिक उपन्यास प्रारंभ किया था. यह विलक्षण है कि उन्होंने उस पर कितनी सफल रचना की है.

सेर्गेई ने हमारी वृद्धा आण्ट के लिए ऊंचे स्वर में पढ़ने के लिए कुछ देने को कहा. मैंने उन्हें पुश्किन की ’दि स्टोरीज ऑफ बेल्किन ’ (The stories of Belkin) दी. लेकिन वृद्ध आण्ट सो गयीं और मैं इतनी आलसी कि नीचे जाकर पुस्तक को पुस्तकालय में नहीं रखा. उसे ड्राइंग रूम में खिड़की की दहलीज पर रख दिया. अगली सुबह जब हम कॉफी पी रहे थे, लेव ने वह पुस्तक उठायी, उसे देखा और बोले यह कितनी अच्छी है. उसके पीछे उन्होंने कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियां देखीं. (अनेन्कोव संस्करण ) और बोले, "मैंने पुश्किन से बहुत कुछ सीखा है. वह मेरे पिता हैं, वह मेरे अध्यापक भी हैं. " फिर उन्होंने उससे एक परिच्छेद पढ़कर सुनाया कि पुराने समय में किस प्रकार जमींदार राजमार्गों पर यात्रा करते थे. उसने उन्हें पीटर दि ग्रेट के समय में आभिजात्य वर्ग के जीवन को समझने में सहायता की. वह एक ऎसा विषय था जो उन्हें विशेषरूप से परेशान कर रहा था. पुश्किन के प्रभाव में उन्होंने उस शाम लिखना प्रारंभ किया था. आज उन्होंने पुनः लिखना प्रारंभ किया और कहा कि वह अपने काम से संतुष्ट हैं.

अक्टूबर ४, १८७३

उपन्यास ’अन्ना कारेनिना’ प्रारंभ हो गया है . उसकी सम्पूर्ण रूपरेखा वसंत में बन चुकी थी. हम गर्मियों में समारा गुबेर्निया गये थे तब उन्होंने अधिक नहीं लिखा. अब वह उसे परिष्कृत कर रहे हैं, बदल रहे हैं और उपन्यास पर लगातार काम कर रहे हैं.

क्राम्स्कोई उनके दो पोट्रेट बना रहे हैं और उनके काम में कुछ व्यवधान उप्तन्न हो रहा है. कला के विषय में प्रतिदिन चर्चा और वाद-विवाद होता है.

नवम्बर २१, १८७६

कल मेरे पास आये और बोले, "लिखना कितना थकाऊ होता है !"

"क्या ?" मैंने चिल्लाकर पूछा.

"हूं, मैंने लिखा कि व्रोन्स्की और अन्ना ने होटल में एक कमरा लिया, लेकिन यह असंभव है. सेण्टपीटर्सबर्ग के किसी भी होटल में उन्हें अलग-अलग मंजिलों में ठहरना चाहिए था. तभी ऎसा होता कि वे अपने मित्रों से अलग-अलग मिलते, और इस प्रकार यह सब मुझे पुनः लिखना होगा.

मार्च १, १८७८

लेव निकोलायेविच निकोलस प्रथम के समय का अध्ययन कर रहे हैं. वह पूरी तरह दिसंबरवादियों की कहानी में तल्लीन हैं. वह मास्को गये थे और पुस्तकों का ढेर लादकर लाये. कभी-कभी वह पढ़कर रो पड़ते हैं.

जनवरी ३१, १८८१

लेव निकोलायेविच केवल शीत रितु में ही काम कर पाये. जब तक उन्होंने सामग्री का अध्ययन किया और दिसंबरवादियों के लिए कुछ रूपरेखा बनायी , गर्मी पुनः प्रारंभ हो चुकी थी और कुछ भी गंभीर नहीं लिखा गया. अपने स्वास्थ्य और लेखन को दृष्टिगत रखते हुए उन्होंने राजमार्ग (कीव क्षेत्र) पर लंबी दूरी तक टहलना प्रारंभ किया जो हमारे यहां से लगभग दो वर्स्ट है. गर्मियों में सम्पूर्ण रूस और साइबेरिया से कीव , वोरोनेझ, ट्रिनिटी-सेर्गेइस मठों और ऎसे ही अन्य स्थानों में पूजा-अर्चना करने के लिए आने वाले तीर्थयात्रियों के दलों से कोई भी मिल सकता है.

लेव निकोलायेविच अपने रूसी ज्ञान को सीमित और अपूर्ण मानते हैं और इसीलिए पिछली गर्मियों में उन्होंने लोगों की भाषा (लोक भाषा) का अध्ययन प्रारंभ किया था. उन्होंने तीर्थयात्रियों और पर्यटकों से बात की और लोक शब्दों , सूक्तियों, प्रतिबिंबों और भावाभिव्यक्तियों को दर्ज किया. लेकिन उस उद्देशय को जारी रखने के अनपेक्षित परिणाम निकले.

१८७७ तक लेव निकोलायेविच के धार्मिक विचार अपरिभाषित रहे थे. वह धर्म के प्रति उदासीन थे. वह कभी पूर्ण नास्तिक तो नहीं थे, लेकिन उन्होंने कभी किसी धार्मिक मत का समर्थन नहीं किया था.

लोगों, तीर्थयात्रियों, और धर्म-भिक्षुओं के निकट संपर्क में आने के बाद वह उनके दृढ़, स्पष्ट और अडिग आस्था से विस्मित हुए. उनका अपना संशयवाद उन्हें अकस्मात भयानक प्रतीत होने लगा और उन्होंने अपना हृदय और आत्मा लोगों और उनकी आस्था की ओर मोड़ दिया. उन्होंने न्यू टेस्टामेण्ट का अध्ययन, उसका अनुवाद और उसकी टीका लिखनी प्रारंभ कर दी. इस कार्य का दूसरा वर्ष है और मेरा विश्वास है कि लगभग आधा कार्य सम्पन्न हो चुका है. उनका कहना है कि इससे उन्हें आध्यात्मिक शांति प्राप्त हुई है. अपनी भावाभिव्यक्ति के लिए उन्हे ’प्रकाश’ दिखा, और उसने जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण को बदल दिया. लोगों के उस छोटे से समूह , जिनके साथ वह समय व्यतीत करते थे , और उन्हींके विषय में प्रयः सोचा करते थे (ऎसा ही उन्होंने कहा था ), लेकिन अब करोड़ों लोग उनके बन्धु हो गये हैं. पहले उनकी जागीर और धन निजी सम्पति थे, लेकिन अब वह उनके लिए केवल गरीबों और जरूरतमंदों को देने के लिए है.

प्रतिदिन वह पुस्तकों से घिरे हुए काम करने के लिए बैठते हैं और डिनर तक कार्य करते रहते हैं. स्वास्थ्य में वह बहुत कमजोर हो गये हैं और सिर दर्द की शिकायत करते रहते हैं. उनके बाल भूरे हो गये हैं और इस जाड़े में उनका वजन घटा है.

मैं जितना चाहती हूं, वह उतना प्रसन्न नहीं प्रतीत होते . वह शांत, चिन्तनशील और चिड़चिड़े हो गये हैं. विनोदी और जीवन्त स्वभाव, जो कभी हम सभी को प्रसन्नता प्रदान किया करता था अब मुश्किल से ही दीप्तिमान होता है. मेरा अनुमान है कि यह कठोर श्रम के परिणामस्वरूप है. ’वार एण्ड पीस’ जैसे दिन नहीं रहे, जब शिकार अथवा ’बालनृत्य’ का वर्णन करने के बाद उत्तेजित और प्रसन्नचित दिखते हुए वह हमारे पास आते थे, मानो वह स्वयं उस आमोद-प्रमोद में लिप्त रहे थे. उनकी आध्यात्मिक शुचिता और शांति प्रश्नातीत हैं, लेकिन दूसरों के दुर्भाग्य ----- गरीबी, कारावास, दुर्दम्यता, अन्याय को लेकर उनकी व्यथा उनकी अतिसंवेदनशील आत्मा को प्रभावित और उनके शरीर को क्षीण कर रही है.

13 comments:

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

रूपसिंह जी आपकी इस पुस्तक की मुझे प्रतीक्षा है। मैं इसे अपने पास रखना चाहूंगी।

nitesh २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

तोल्सतोय को उनकी जीवनी से या किसी पुस्तक से उतनी बारीकी से नहीं समझा जा सकता जिस बारीकी से रूपसिंह चंदेल जी नें अपने अनुवाद द्वारा हिन्दी पाठकों को यह सामग्री दी है।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

Nice Article. Thanks

Alok Kataria

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

बहुत अच्छा संकलन है, बधाई।

नंदन २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

पिछली कडी पढी थी तो प्यास जगी थी और अब प्यास बढ गयी है। निधि जी से सहमत हूँ कि यह किताब संग्रहणीय होगी।

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

रूपसिंह जी बहुत बहुत धन्यवाद डायरी के इन महत्व के अंशों को प्रस्तुत करने के लिये।

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

अनुवाद साहित्य की महत्ता इन अंशो को पढ कर ज्ञात हो जाती है।

सुषमा गर्ग २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

सोफिया अन्द्रेयेव्ना तोल्स्तोया जैसी पत्नी हों तो तोल्सतोय जैसे लेखक ही बनेंगे। अच्छा अनुवाद।

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

"जो कभी हम सभी को प्रसन्नता प्रदान किया करता था अब मुश्किल से ही दीप्तिमान होता है. मेरा अनुमान है कि यह कठोर श्रम के परिणामस्वरूप है. ’वार एण्ड पीस’ जैसे दिन नहीं रहे, जब शिकार अथवा ’बालनृत्य’ का वर्णन करने के बाद उत्तेजित और प्रसन्नचित दिखते हुए वह हमारे पास आते थे, मानो वह स्वयं उस आमोद-प्रमोद में लिप्त रहे थे. उनकी आध्यात्मिक शुचिता और शांति प्रश्नातीत हैं, लेकिन दूसरों के दुर्भाग्य ----- गरीबी, कारावास, दुर्दम्यता, अन्याय को लेकर उनकी व्यथा उनकी अतिसंवेदनशील आत्मा को प्रभावित और उनके शरीर को क्षीण कर रही है."


सचमुच महान थे तोल्सतोय। अन्द्रेयेव्ना अवश्य उनकी शक्ति रही होंगी।

दृष्टिकोण २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

साहित्य शिल्पी पर प्रस्तुतिकरण का नया तरीका प्रसंशनीय है।
अच्छे आर्टिकल तो इस मंच पर हमेशा ही प्रस्तुत होते हैं इसकी मिसाल यह कडी है।

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

अनुवाद की भाषा भी सरल है।

अनिल कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

रूप जी मेरे प्रिय लेखक इसी लिये हैं क्योंकि उनका काम विविधता लिये हुए है। जितने अच्छे वे कहानीकार है उतने ही अच्छा उपन्यास पर भी उनका काम है। अनुवाद भी एसा है कि इन प्रसंगों से लेखक की आत्मा तक पहुँचा जा सकता है और कहीं से भी भाषा की शिकायत नहीं।

अनुज २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

अच्छा अनुवाद अच्छी प्रस्तुति।

अनुज कुमार सिन्हा

भागलपुर

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

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नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
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अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
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अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
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