........साहित्य शिल्पी एक पूर्ण वेबसाईट में परिवर्तित हो चूका है। अब हमारी रचनाये यहाँ पढ़े... - www.sahityashilpi.in तथा कृपया हमें अपनी प्रतिक्रिया एवं सुझावों से अवश्य अवगत करायें जिससे हम आवश्यक सुधार कर सकें.....

शुक्रवार, १० जुलाई २००९

शोभना [लघुकथा] - प्राण शर्मा

Photobucket

क्या छोटा और क्या बड़ा, सबके लिए लता की चार साल की बेटी हद से ज़्यादा प्यारी थी। क्या भाव-भंगिमाएं थी उसके चेहरे की! सौम्य और निश्छल! जापानी गुडिया की तरह। उसका नाम भी कितना प्यारा था-- शोभना!

लता के घर से जो भी गुज़रता वो शोभना की मंद-मंद मुस्कराहट से अपनी झोली भर कर जाता। मोहल्ले की अधिकाँश महिलाएं अपने-अपने घर का काम निबटा कर लता के घर आ बैठती। वे शोभना से खूब लाड-प्यार करती। सामने वाली उमा तो उस पर लट्टू थी। कश्मीरी सेब जैसे उसके प्यारे-प्यारे और मीठे-मीठे गालों को चूमना उसका हर पल का काम था। मन ही मन में उसने शोभना को अपनी बहु बनाने की ठान ली थी। शोभना भी उमा से कुछ ज्यादा ही घुल-मिल गयी थी। अपनी प्यारी-प्यारी तुतली जबान में वो हमेशा ही कहती- "ऑंटी उमा, आप मुझे बौत अच्छी लगती हैं।" उमा भी चहक कर जवाब देती "तू भी तो मुझे बहुत-बहुत अच्छी लगती है। तू तो मेरे कलेजे का टुकडा है। मेरा बस चले तो मैं तुझे आठों पहर निहारती रहूँ।" उमा उसके हाथ-पैर चूमने लगती। शोभना भी अपनी छोटी -छोटी बांहों में उसे भरने की कोशिश करती।

आधी रात थी। शोभना को खांसी उठी। सुबह तक खांसी बढ़ती ही गयी. बाहर सर्दी की तेज हवा थी। पति घर में होते तो खांसी की दवाई केमिस्ट की दूकान से भाग कर ले आते। वे तीन दिनों के लिए अपने माता-पिता से मिलने के लिए अमृतसर गए हुए थे। इतनी ठंडी में शोभना को साथ लेकर केमिस्ट की दूकान पर जाना उसके लिए ख़तरा हो सकता था। बेचैन लता शोभना को घर में ही छोड़ गयी। केमिस्ट की दूकान पास ही थी। दस मिनटों का रास्ता था। यूँ गयी और यूँ आयी।

रचनाकार परिचय:-

प्राण शर्मा वरिष्ठ लेखक और प्रसिद्ध शायर हैं और इन दिनों ब्रिटेन में अवस्थित हैं।
आप ग़ज़ल के जाने मानें उस्तादों में गिने जाते हैं। आप के "गज़ल कहता हूँ' और 'सुराही' - दो काव्य संग्रह प्रकाशित हैं, साथ ही साथ अंतर्जाल पर भी आप सक्रिय हैं।

लता को गए पांच मिनट ही हुए थे कि उसके साथ वाले मकान में आग लग गयी। आग भयंकर थी। देखते ही देखते कई मकान लपटों की लपेट में आ गए। लता का मकान भी। हाराकार मच गया। रोने-चिल्लाने की आवाजें शुरू हो गयीं। अडोसी-पडोसी और सामने वाले बच्चों को लेकर बाहर निकल आये। उमा और उसका चार साल का बच्चा भी। जलती खिड़की से रोती-चिल्लाती शोभना ने बाहर झाँका। उमा ऑंटी नज़र आयी। उसमें हिम्मत बँधी। वो जोर से पुकार उठी- "उमा ऑंटी!" उमा ऑंटी को सुनाई नहीं दिया।

शोभना के मुंह से फिर पुकार उठी-- "उमा ऑंटी------!" तभी कमरे की छत से सुलगते सीमेंट के भारी-भारी टुकड़े शोभना के सर पर आ गिरे। उमा ऑंटी के कलेजे का टुकडा शोभना की प्यारी-प्यारी तुतली आवाज़ सदा के लिए खामोश हो गयी।

ऑंटी उमा कईयों की तरह अपने बच्चे को संभालने में लगी थी।

25 comments:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

इस कहानी को पढ़कर मन आहत हुआ।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

Nice Short Story.

Alok Kataria

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

बहुत अच्छा कथानक है, अपना पराया जैसे मनोभाव विश्लेषित करता है।

AlbelaKhatri.com २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

ant aansoo lata hai.........
kahaani umda !
bahut umda !
____________badhaai !

सुशील कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

अच्छी रचना। कहानी के अंत से मन व्यथित हो गया\

अविनाश वाचस्पति २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

एक सही संदेश देती
मन को संवेदित करती
मार्मिक रचना के लिए
प्राण जी को शुभकामनायें
रचना जितनी लघु है
संदेश उतना ही दीर्घ है।

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

अपनापन और अपना इन दोनों को लघुकथा बारीकी से प्रस्तुत करती है। विशेषज्ञ लेखक की लघुकथा एसी ही हो सकती थी।

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

अपनापन और अपना इन दोनों को लघुकथा बारीकी से प्रस्तुत करती है। विशेषज्ञ लेखक की लघुकथा एसी ही हो सकती थी।

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

कहानी पढ कर मन भारी हो गया। आदरणीय प्राण जी की रचनाधर्मिता को प्रणाम।

HARI SHARMA २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

आदरणीय प्राण जी, सच मे़ हम ऐसी कथाओ का अन्त ऐसे समझते आये थे कि उमा अपने बच्चे की चिन्ता छोड प्यारी शोभना को बचाने घर मे़ घुसती और उसे बचा के बाहर आती और देखती कि उसका अपना बच्चा आग से घिरा है और दम तोद रहा है.

लेकिन आपकी इस यथार्थवादी कहानी ने आन्ख खोल दी. जब लोग बद्ले हे़ तो कहानी भी बद्लेगी ही.

बहुत बढिया कहानी और दिल दहलाने बाला अन्त.

KK Yadav २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

Dil ko chhuti Laghu-katha.

महावीर २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

प्राण जी की लघु कथा एक बहुत ही मार्मिक कथा है. थोड़े से शब्दों में ही बहुत गहरी बात कह दी. यही प्राण जी की विशेषता है. साहित्यिक दृष्टि से भी साहित्य सोच और जीवनदृष्टि का विस्तार और गहराई बड़ी कुशलता से शब्दों में उतारे हैं. बड़े ही सुन्दर ढंग से कहानी का आरम्भ करते हुए चरम सीमा तक पहुँचती है जो सन्देश भी देती है.
कहानी के अंत में मैं तो स्तब्ध सा हो गया. आँखों में आंसू आ गए. प्राण जी आपकी लेखनी और लेखन कला को नमन!

Dr. Sudha Om Dhingra २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

लघु कथा बहुत अच्छी लगी. भावनात्मक सौन्दर्य ले कर शुरू हुई पर चरमसीमा पर पहुँच कर रुला दिया. कम शब्दों में बहुत कुछ कहती सशक्त कथा के लिए बधाई! भाई साहब, आप से तो रोज़ कुछ न कुछ सीखना को मिलता है.

mehek २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

kahani bahut marmik rahi,magar shobhana ka yu chale jana mann ko achha na laga.

रूपसिंह चन्देल २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

प्राण जी,

बहुत ही मार्मिक लघुकथा है. अंत कष्टदायी.

चन्देल

श्रद्धा जैन २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

Ye to achha nahi hua
insaani swabhav aisa hi hai ki apne ki parvah karta hai

magar pyaari bachhi ka balidaan man bhari ho gaya
bhagwan na kare kisi bhi maa ke saath aisa ho

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

मार्मिक लघुकथा...अपना और अपने जैसा होने का अंतर दर्शाती हुई...

राजीव तनेजा २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

कष्टदायी अंत लिए एक यथार्थवादी कहानी....

"अर्श" २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

AADARNIYA PRAAN JI,
IS LAGHU KATHAA ME AAPNE KITANI DIRGH BAAT KAHI HAI WO SOCH KE STABHDH KAR DENE WAALI BAAT HAI... AAKHIRI LINE .. UMAA AUNTI BHI SABHI KI TARAH APNE BACHHE KO SAMBHAALANE ME LAGI THI BAHOT HI BADI BAAT HAI... IS MARMIK LAGHU KATHAA KE LIYE DIL SE BAHOT BAHOT BADHAAYEE AAPKO...


ARSH

पंकज सुबीर २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

शहरों की आपाधापी भरी जिंदगी में हम कितने स्‍वार्थी होते जा रहे हैं इस बात को ये कहानी भलि भांति रेखांकित करती है । मैं और मेरा परिवार,
आजकल बस ये ही हो कर रह गया है । इस बात को बिना सीधे तौर पर कहे जिसे प्रकार से केवल इशारों में व्‍यक्‍त किया गया है वो श्रद्धेय प्राण साहब जैसा साहित्‍यकार ही कर सकता है । मेरे जैसे कहानी के अनाड़ी सिक्‍खाड़ों के लिये ये कहानी कई प्रकार से पठनीय है । कथा पूरी गति से गुजरती है । साहित्‍य शिल्‍पी को एक बहुत सुंदर लघु कथा पढ़वाने के लिये आभार ।

Nirmla Kapila २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

प्राणजी बहुत मार्मिक रचना है आपकी शैली और शिल्प ने इस मे चार चाँद लगा दिये हैं इस कहानी का अर्थ भी आज का यथार्थ है लोग बनावटी चेहरे सजाये रहते हैं जो खुशी मे तो खूब मुस्कुराते हैं मगर मुसीबत पडने पर आँखें फेरते देर नहीं लगाते ये अपने पराये की माया को एक सशक्त कथानक के जरिये कितने कम शब्दों मे कहना बहुत बडी बात है येही लघू कथा की विशेशता है बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

अरे राम ! :-(

अंत ,
कथा का हुआ और मन अशांत कर गया !

लघु कथा भी ग़ज़ल विधा की तरह सिध्ध हस्त लेखन का प्रमाण दे गयी -

प्राण भाई साहब,
आप का लिखा हमेशा ,
समाज का आइना सा
और मानसिक आंदोलनों को उभारता हुआ प्रयास होता है -
सराहनीय , सशक्त भी है ही ...
इसी कारण मन को छू जाता है --
लिखते रहें ,
साद`भाव सह:
- लावण्या

DARSHANIK २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

ऑंटी उमा कईयों की तरह अपने बच्चे को संभालने में लगी थी।
in antim panktiyon me hi puri kahani ka saar bhar diya hai lekhak ne

शोभना चौरे २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

svarthparta ko anjam deti manviyta ko pare dhkelti marmik laghukatha .
man ko udvelit kar gai.sach kha hai
sahity samaj ka drpan hai .
badhai

aakhar २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

lekhan jivan ke dard ko jita hai...aur koi pran sharma paida hoker us per itni marmik kahani likta hai...aage me kutch nahi kah sakta.....
chandrapal
www.aakhar.org

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:-
श्रद्धांजलि:-
साक्षात्कार:-
विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-
संस्मरण:-
वीडियो:-
बाल साहित्य:-
पुस्तक चर्चा:-
अनुवाद:-

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP