शोभना [लघुकथा] - प्राण शर्मा

क्या छोटा और क्या बड़ा, सबके लिए लता की चार साल की बेटी हद से ज़्यादा प्यारी थी। क्या भाव-भंगिमाएं थी उसके चेहरे की! सौम्य और निश्छल! जापानी गुडिया की तरह। उसका नाम भी कितना प्यारा था-- शोभना!
लता के घर से जो भी गुज़रता वो शोभना की मंद-मंद मुस्कराहट से अपनी झोली भर कर जाता। मोहल्ले की अधिकाँश महिलाएं अपने-अपने घर का काम निबटा कर लता के घर आ बैठती। वे शोभना से खूब लाड-प्यार करती। सामने वाली उमा तो उस पर लट्टू थी। कश्मीरी सेब जैसे उसके प्यारे-प्यारे और मीठे-मीठे गालों को चूमना उसका हर पल का काम था। मन ही मन में उसने शोभना को अपनी बहु बनाने की ठान ली थी। शोभना भी उमा से कुछ ज्यादा ही घुल-मिल गयी थी। अपनी प्यारी-प्यारी तुतली जबान में वो हमेशा ही कहती- "ऑंटी उमा, आप मुझे बौत अच्छी लगती हैं।" उमा भी चहक कर जवाब देती "तू भी तो मुझे बहुत-बहुत अच्छी लगती है। तू तो मेरे कलेजे का टुकडा है। मेरा बस चले तो मैं तुझे आठों पहर निहारती रहूँ।" उमा उसके हाथ-पैर चूमने लगती। शोभना भी अपनी छोटी -छोटी बांहों में उसे भरने की कोशिश करती।
आधी रात थी। शोभना को खांसी उठी। सुबह तक खांसी बढ़ती ही गयी. बाहर सर्दी की तेज हवा थी। पति घर में होते तो खांसी की दवाई केमिस्ट की दूकान से भाग कर ले आते। वे तीन दिनों के लिए अपने माता-पिता से मिलने के लिए अमृतसर गए हुए थे। इतनी ठंडी में शोभना को साथ लेकर केमिस्ट की दूकान पर जाना उसके लिए ख़तरा हो सकता था। बेचैन लता शोभना को घर में ही छोड़ गयी। केमिस्ट की दूकान पास ही थी। दस मिनटों का रास्ता था। यूँ गयी और यूँ आयी।
रचनाकार परिचय:-लता को गए पांच मिनट ही हुए थे कि उसके साथ वाले मकान में आग लग गयी। आग भयंकर थी। देखते ही देखते कई मकान लपटों की लपेट में आ गए। लता का मकान भी। हाराकार मच गया। रोने-चिल्लाने की आवाजें शुरू हो गयीं। अडोसी-पडोसी और सामने वाले बच्चों को लेकर बाहर निकल आये। उमा और उसका चार साल का बच्चा भी। जलती खिड़की से रोती-चिल्लाती शोभना ने बाहर झाँका। उमा ऑंटी नज़र आयी। उसमें हिम्मत बँधी। वो जोर से पुकार उठी- "उमा ऑंटी!" उमा ऑंटी को सुनाई नहीं दिया।
शोभना के मुंह से फिर पुकार उठी-- "उमा ऑंटी------!" तभी कमरे की छत से सुलगते सीमेंट के भारी-भारी टुकड़े शोभना के सर पर आ गिरे। उमा ऑंटी के कलेजे का टुकडा शोभना की प्यारी-प्यारी तुतली आवाज़ सदा के लिए खामोश हो गयी।
ऑंटी उमा कईयों की तरह अपने बच्चे को संभालने में लगी थी।










25 comments:
इस कहानी को पढ़कर मन आहत हुआ।
Nice Short Story.
Alok Kataria
बहुत अच्छा कथानक है, अपना पराया जैसे मनोभाव विश्लेषित करता है।
ant aansoo lata hai.........
kahaani umda !
bahut umda !
____________badhaai !
अच्छी रचना। कहानी के अंत से मन व्यथित हो गया\
एक सही संदेश देती
मन को संवेदित करती
मार्मिक रचना के लिए
प्राण जी को शुभकामनायें
रचना जितनी लघु है
संदेश उतना ही दीर्घ है।
अपनापन और अपना इन दोनों को लघुकथा बारीकी से प्रस्तुत करती है। विशेषज्ञ लेखक की लघुकथा एसी ही हो सकती थी।
अपनापन और अपना इन दोनों को लघुकथा बारीकी से प्रस्तुत करती है। विशेषज्ञ लेखक की लघुकथा एसी ही हो सकती थी।
कहानी पढ कर मन भारी हो गया। आदरणीय प्राण जी की रचनाधर्मिता को प्रणाम।
आदरणीय प्राण जी, सच मे़ हम ऐसी कथाओ का अन्त ऐसे समझते आये थे कि उमा अपने बच्चे की चिन्ता छोड प्यारी शोभना को बचाने घर मे़ घुसती और उसे बचा के बाहर आती और देखती कि उसका अपना बच्चा आग से घिरा है और दम तोद रहा है.
लेकिन आपकी इस यथार्थवादी कहानी ने आन्ख खोल दी. जब लोग बद्ले हे़ तो कहानी भी बद्लेगी ही.
बहुत बढिया कहानी और दिल दहलाने बाला अन्त.
Dil ko chhuti Laghu-katha.
प्राण जी की लघु कथा एक बहुत ही मार्मिक कथा है. थोड़े से शब्दों में ही बहुत गहरी बात कह दी. यही प्राण जी की विशेषता है. साहित्यिक दृष्टि से भी साहित्य सोच और जीवनदृष्टि का विस्तार और गहराई बड़ी कुशलता से शब्दों में उतारे हैं. बड़े ही सुन्दर ढंग से कहानी का आरम्भ करते हुए चरम सीमा तक पहुँचती है जो सन्देश भी देती है.
कहानी के अंत में मैं तो स्तब्ध सा हो गया. आँखों में आंसू आ गए. प्राण जी आपकी लेखनी और लेखन कला को नमन!
लघु कथा बहुत अच्छी लगी. भावनात्मक सौन्दर्य ले कर शुरू हुई पर चरमसीमा पर पहुँच कर रुला दिया. कम शब्दों में बहुत कुछ कहती सशक्त कथा के लिए बधाई! भाई साहब, आप से तो रोज़ कुछ न कुछ सीखना को मिलता है.
kahani bahut marmik rahi,magar shobhana ka yu chale jana mann ko achha na laga.
प्राण जी,
बहुत ही मार्मिक लघुकथा है. अंत कष्टदायी.
चन्देल
Ye to achha nahi hua
insaani swabhav aisa hi hai ki apne ki parvah karta hai
magar pyaari bachhi ka balidaan man bhari ho gaya
bhagwan na kare kisi bhi maa ke saath aisa ho
मार्मिक लघुकथा...अपना और अपने जैसा होने का अंतर दर्शाती हुई...
कष्टदायी अंत लिए एक यथार्थवादी कहानी....
AADARNIYA PRAAN JI,
IS LAGHU KATHAA ME AAPNE KITANI DIRGH BAAT KAHI HAI WO SOCH KE STABHDH KAR DENE WAALI BAAT HAI... AAKHIRI LINE .. UMAA AUNTI BHI SABHI KI TARAH APNE BACHHE KO SAMBHAALANE ME LAGI THI BAHOT HI BADI BAAT HAI... IS MARMIK LAGHU KATHAA KE LIYE DIL SE BAHOT BAHOT BADHAAYEE AAPKO...
ARSH
शहरों की आपाधापी भरी जिंदगी में हम कितने स्वार्थी होते जा रहे हैं इस बात को ये कहानी भलि भांति रेखांकित करती है । मैं और मेरा परिवार,
आजकल बस ये ही हो कर रह गया है । इस बात को बिना सीधे तौर पर कहे जिसे प्रकार से केवल इशारों में व्यक्त किया गया है वो श्रद्धेय प्राण साहब जैसा साहित्यकार ही कर सकता है । मेरे जैसे कहानी के अनाड़ी सिक्खाड़ों के लिये ये कहानी कई प्रकार से पठनीय है । कथा पूरी गति से गुजरती है । साहित्य शिल्पी को एक बहुत सुंदर लघु कथा पढ़वाने के लिये आभार ।
प्राणजी बहुत मार्मिक रचना है आपकी शैली और शिल्प ने इस मे चार चाँद लगा दिये हैं इस कहानी का अर्थ भी आज का यथार्थ है लोग बनावटी चेहरे सजाये रहते हैं जो खुशी मे तो खूब मुस्कुराते हैं मगर मुसीबत पडने पर आँखें फेरते देर नहीं लगाते ये अपने पराये की माया को एक सशक्त कथानक के जरिये कितने कम शब्दों मे कहना बहुत बडी बात है येही लघू कथा की विशेशता है बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें
अरे राम ! :-(
अंत ,
कथा का हुआ और मन अशांत कर गया !
लघु कथा भी ग़ज़ल विधा की तरह सिध्ध हस्त लेखन का प्रमाण दे गयी -
प्राण भाई साहब,
आप का लिखा हमेशा ,
समाज का आइना सा
और मानसिक आंदोलनों को उभारता हुआ प्रयास होता है -
सराहनीय , सशक्त भी है ही ...
इसी कारण मन को छू जाता है --
लिखते रहें ,
साद`भाव सह:
- लावण्या
ऑंटी उमा कईयों की तरह अपने बच्चे को संभालने में लगी थी।
in antim panktiyon me hi puri kahani ka saar bhar diya hai lekhak ne
svarthparta ko anjam deti manviyta ko pare dhkelti marmik laghukatha .
man ko udvelit kar gai.sach kha hai
sahity samaj ka drpan hai .
badhai
lekhan jivan ke dard ko jita hai...aur koi pran sharma paida hoker us per itni marmik kahani likta hai...aage me kutch nahi kah sakta.....
chandrapal
www.aakhar.org
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