पापा तुम क्यों तारा बन गए
हमसे दूर ईश्वर का सहारा बन गए
पार्क में बच्चे पापा के साथ खेलते हैं
कभी दौड़ते कभी कंधे पर चढ़ते हैं
मै दूर बैठा उनको देखा करता हूँ
बस तुम को ही सोचा करता हूँ
पहले से जीने के ढंग गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-


रचना श्रीवास्तव का जन्म लखनऊ (यू.पी.) में हुआ। आपनें डैलास तथा भारत में बहुत सी कवि गोष्ठियों में भाग लिया है। आपने रेडियो फन एशिया, रेडियो सलाम नमस्ते (डैलस), रेडियो मनोरंजन (फ्लोरिडा), रेडियो संगीत (हियूस्टन) में कविता पाठ प्रस्तुत किये हैं। आपकी रचनायें सभी प्रमुख वेब-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।

माँ काम करते करते थक जाती है
कहानी रात को कभी कभी ही सुनती है
ब्रश मे फस्ट आने का कॉम्पटीशन कोई करता नहीं
सच पापा अब तो ब्रश करने का ही मन करता नहीं
मेरे जीवन के तो सारे रंग गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए

मै अकेले स्कूल जाता हूँ
आप कि कही बातो को मन मे दोहराता हूँ
किनारे चलो ऊँगली पकडो मत दौडो
पर ऊँगली पकड़ने को जो हाथ बढ़ता हूँ
तुम को वहां नहीं पाता हूँ
मेरे तो सब सहारे गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए

रोज मै तुम से बात करता हूँ
तारों मे तुम को खोजा करता हूँ
जब छाते हैं बादल तो बहुत रोता हूँ
तुम को नहीं देख पाउँगा बस यही कहता हूँ
आंसूं अब मेरे साथी बनगए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

शाम आती है पर तुम आते नहीं
कैसे हो बेटे कह के गोद में उठाते नहीं
एक बार कहो
क्या मिला होमवर्क रहा कैसा स्कूल
दो हाई फाई लग रहे हो कितने कूल
मस्ती भरे सारे वो पल गए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

जब कहता हूँ चॉकलेट लाने को
बहला के मुझे दे देती है गुड खाने को
दो वक्त कि रोटी मिलजाए तू स्कूल जा पाए
बस इतना कमा पाती हूँ मै
इसी लिये तेरा कहा नहीं कर पाती हूँ
अब मेरी खाव्हिशों के दिन गए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

मै माँ से माँ मुझ से छुप के रोती है
अक्सर खाने की ३ प्लेट धरती है
मै उसके लिये हसीं कमाना चाहता हूँ
आप जैसा घर का ख्याल रखना चाहता हूँ
मै जल्दी से बड़ा होना चाहता हूँ
मेरे खेलने के दिन गए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

20 comments:

  1. मर्मस्पर्शी और रुला देने वाली कविता।

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  2. MARMSPARSHEE RACHNA KE LIYE RACHNA
    JEE KO BADHAAEE.

    उत्तर देंहटाएं
  3. शाम आती है पर तुम आते नहीं
    कैसे हो बेटे कह के गोद में उठाते नहीं
    एक बार कहो
    क्या मिला होमवर्क रहा कैसा स्कूल
    दो हाई फाई लग रहे हो कितने कूल
    मस्ती भरे सारे वो पल गए
    पापा तुम क्यों तारा बनगए

    आह मार्मिक कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  4. शीर्षक ही मन को भारी करने में पर्याप्त है। कविता को केवल बाल-रचना कहना अन्याय होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  5. इसको बाल कविता तो कतई नहीं कहा जा सकता, संवेदनाओं को इस कविता में जिस प्रकार से उतारा गया है, उससे यह कविता अपने आप में बहुत कुछ कहती है और पाठक के हृदय को न छुए, ऐसा हो ही नहीं सकता । भावनाओं के समंदर में बहा ले जाने वाली रचना के लिए रचना जी बधाई की पात्र हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. hats off to you for such a lovely KAVITA. this touched my heart after long time.

    उत्तर देंहटाएं
  7. marm k marm tak samvedna ka spandan de kar atyant karun drishya ko saakar karti is rachna k liye main aapki lekhni ko pranaam karta hoon.....

    jai ho
    badhaai !

    उत्तर देंहटाएं
  8. मन को गहरे तक छू गयी !!
    बहुत ही मर्मस्पर्शी कविता है !!

    योगेन्द्रसिंह

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  9. सच में आँखों से आँसू निकल पड़े। हरेक शब्द जैसे दिल में डूबोकर डाले गए हैं।

    काश ऐसा किसी के साथ न हो।
    आमीन!

    -विश्व दीपक

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  10. KAVITA KA VISHAY BAHUT MARMIK H.
    KAVITA MEIN DARD HI DARD H.
    AISA KISI KE SATH JAB HOTA H TO WAH DARD KA KAVI BAN JATA H.
    AISE HI DARD KO JANTE AUR MANTE H.

    SHABDO KA CHUNAV BAHUT ACHCHH LAGA.
    KAVITA KA KRAM ANSUR BADHNA BAHUT ACHCHA LAGA.

    AABHAR SAWINKAR KARE.
    RAMESH SACHDEVA
    hpsshergarh@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  11. आप जैसा घर का ख्याल रखना चाहता हूँ
    मै जल्दी से बड़ा होना चाहता हूँ
    मेरे खेलने के दिन गए
    पापा तुम क्यों तारा बनगए
    ...Behad marmsparshi kavita !!

    उत्तर देंहटाएं
  12. bahar gai thi aai to aap sab ke sneh shbdon ne man dravid kar diya .
    aap sabhi ka saath aur pyar sada isi tarah milta harega yahi asha hai .
    aap sabhi ka dil se dhnyavad
    rachana

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  13. बहुत भावपूर्ण कविता है. केवल बाल कविता तो नहीं कह सकते. आपकी इस कविता का पाठ आपके द्वारा मैंने रेडियो पे भी सुना था. आपकी मृदुल वाणी ने इसे और भी भावपूर्ण बना दिया था इस सुंदर रचना के लिए बधाई और धन्यवाद. अमिता

    उत्तर देंहटाएं

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