राजनांदगाँव में सत्ताईस सिपाही
खामोश किये गये
कि व्यवस्था के खिलाफ़
एक जंग लडी जा रही है
माओ के पैरोकार
फैलाते अपने सरोकार
खामोश वादियों को
सुनाते हैं राग-विस्फोट
और छाती पीटती विधवायें
सबूत हैं कि क्रांति हो रही है
क्रांति होगी।

रचनाकार परिचय:-

राजीव रंजन प्रसाद का जन्म बिहार के सुल्तानगंज में २७.०५.१९७२ में हुआ, किन्तु उनका बचपन व उनकी प्रारंभिक शिक्षा छत्तिसगढ राज्य के जिला बस्तर (बचेली-दंतेवाडा) में हुई। आप सूदूर संवेदन तकनीक में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से एम. टेक हैं। विद्यालय के दिनों में ही आपनें एक पत्रिका "प्रतिध्वनि" का संपादन भी किया। ईप्टा से जुड कर उनकी नाटक के क्षेत्र में रुचि बढी और नाटक लेखन व निर्देशन उनके स्नातक काल से ही अभिरुचि व जीवन का हिस्सा बने। आकाशवाणी जगदलपुर से नियमित उनकी कवितायें प्रसारित होती रही थी तथा वे समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुईं। वर्तमान में आप सरकारी उपक्रम "राष्ट्रीय जलविद्युत निगम" में सहायक प्रबंधक (पर्यावरण) के पद पर कार्यरत हैं। आप "साहित्य शिल्पी" के संचालक सदस्यों में हैं।

आपकी पुस्तक "टुकडे अस्तित्व के" प्रकाशनाधीन है।

लाल बाग
लाल स्याही से लिख रहा है
किसानों, मजदूरों और पीडितों के
परिवर्तन की इबारत
हो कर रहेगी शाम
और स्याह आसमान
चिंघाडेगा - लाल सलाम।

"बुद्धिजीवी" प्रदर्शन कर रहे हैं
कलम लिये, पेंटिंग लिये, पोस्टर लिये
कि मानव हैं नक्सली
उनके "अधिकार" हैं।

इधर देश भर में व्यस्तता है
जोरों से बहस जारी है
कि समलैंगिकता, कानूनन जायज हो
मैं भी मानता हूँ
कि "बुद्दिजीवी" और "माओवादी"
एक ही लिंग हैं।

हाँ जायज है माँग
समलैंगिकता वैसे भी
व्यवहार हो गयी है।

26 comments:

  1. "बुद्दिजीवी" और "माओवादी"
    एक ही लिंग हैं।

    रचना सर से पैर तक तीक्ष्ण है , सार्थक भी |
    बधाई |

    अवनीश तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  2. राजीव जी इतनी तीव्र वेदना पूर्ण कविता के लिए आप का बहुत बहुत आभार पूरी कविता बड़ी तीखी और सटीक है परन्तु राजीव जी आप को ये भी मानना पड़ेगा की उन्मूलन से उथान नहीं हो सकता
    है मारे गए सिपाहियों को मेरी श्रधांजलि है और ह्रदय वेदनाकुल भी है पर मर रही मानवता को हम नकार नहीं सकते क्रिया के प्रति प्रति क्रिया को हम दुत्कार नहीं सकते असमय मौत कंही भी हो दर्द और वेदना छोड़ती है साथ ही कुछ प्रश्न भी मैं क्यूँ हुई ??????/
    सादर
    प्रवीण पथिक
    ९९७१९६९०८४

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  3. तीखा व्यंग्य और आपकी वेदना को दिखाती कविता है। मैं मानती हूँ हमें अपने लोकतंत्र को सँवारने और सुधारने के लिये आंदोलित होना चाहिये। व्यवस्था परिवर्तन की नक्सलियों की कोशिश आतंकवाद ही है और वह एक अच्छी व्यवस्था के खिलाफ खराब विकल्प है।

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  4. और छाती पीटती विधवायें
    सबूत हैं कि क्रांति हो रही है
    क्रांति होगी।

    इस क्रांति की यही सच्चाई है। मावता हयीं मर रही है प्रवीण जी। आतंक न तो किसी समस्या का समाधान है न ही हजार-द्स हजार बंदूक धारी को बदलाव कर सकते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सटीक जगह पर चोट करती हुई बात है ... ऐसी कैसी क्रांति है जो आम आदमी के हक के लिए आम आदमी को बम से उड़ा देने में झिझकती नहीं ?
    और जो मर गए वो किस के लिए मर गए ? क्यूंकि जिस जन तंत्र की रक्षा के लिए वे मरने गए थे उसे भी उनका कुछ ख़ास ख्याल नहीं है ...
    असार्थक मौतों पर प्रश्न उठाती एक सार्थक रचना .....

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  6. जयराम दास.13 जुलाई 2009 को 2:24 pm

    इनकी समलैंगिकता तो माता के वात्सल्य पर भी भारी पड़ता है सर....तभी तो चीनी आक्रमण के समय बोल उठते हैं....चीन के चेयरमैन हमारे चेयरमैन हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  7. इधर देश भर में व्यस्तता है
    जोरों से बहस जारी है
    कि समलैंगिकता, कानूनन जायज हो
    मैं भी मानता हूँ
    कि "बुद्दिजीवी" और "माओवादी"
    एक ही लिंग हैं।

    हाँ जायज है माँग
    समलैंगिकता वैसे भी
    व्यवहार हो गयी है।

    समलैंगिकता पर सही बयान।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बिम्ब प्रहार करता है। सशक्त कविता है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. हाँ जायज है माँग
    समलैंगिकता वैसे भी
    व्यवहार हो गयी है।

    कविता का व्यंग्य प्रभावित करता है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. राजीव जी सामयिक विषयों पर आप हमेशा ही अच्छा लिखते रहे हैं। नक्सलवाद और बुद्धिजीवी वर्ग के अंतर्संबंध को आपका व्यंग्य सही मायनों में कटघरे में खडा करता है।

    उत्तर देंहटाएं
  11. समलैंगिता वाली बात अपने अनोखे तरीके से माओवादी और बुद्धिजीवी के बीच में डाल दी है। बिंब अच्छा लगा।

    बधाई स्वीकारें।

    -विश्व दीपक

    उत्तर देंहटाएं
  12. पंकज सक्सेना13 जुलाई 2009 को 4:41 pm

    कि "बुद्दिजीवी" और "माओवादी"
    एक ही लिंग हैं।

    बोल्ड स्टेटमेंट।

    उत्तर देंहटाएं
  13. कमाल की लाइनें हैं। सही है समलिंगिक संबंध नाजायज कभी नहीं थे।

    उत्तर देंहटाएं
  14. क्या कहा जाय.....मानवाधिकार तो केवल नक्सलियों या अपराधियों के ही हुआ करते हैं........आम जन का कोई अधिकार थोड़े न होता है.......

    और नेताओं को क्या पड़ी है चिंतित होने की........

    इतने सार्थक ढंग से इस त्रासद स्थिति की ओर ध्यानाकर्षण करने के लिए आपका कोटिशः आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  15. एक सशक्त, तीखी और बोल्ड रचना के लिए बधाई स्वीकार करें!
    रंजना जी ने सही कहा--क्या कहा जाय.....मानवाधिकार तो केवल
    नक्सलियों या अपराधियों के ही हुआ करते हैं........आम जन का
    कोई अधिकार थोड़े न होता है.......
    "बुद्दिजीवी" और "माओवादी"
    एक ही लिंग हैं।
    ऐसा लिखने के लिए दम और संवेदना चाहिए.

    उत्तर देंहटाएं
  16. पीड़ा और वेदना से भरपूर तीखी कविता ...


    बधाई स्वीकार करें

    उत्तर देंहटाएं
  17. PANKTI-PANKTI MEIN VYANGYA NIHIT
    HAI.BADHAAEE AAPKO.

    उत्तर देंहटाएं
  18. प्रवीण और अनन्या दोनों के बात महत्त्वपूर्ण है।
    हिन्दी ब्लॉग नेटवर्क पर अपना ब्लॉग बनायें और अपने उत्कृष्ट लेखों की कीमत वसूल करें। आप अपना मौजूदा ब्लॉग वहां इम्पोर्ट कर सकते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  19. bahut sach kaha,rajeev ji,visheshaadikaar ki maang karne waale ye bhool jaate hain ki wo hamare jeene ke maulik adhikaar ko bhi chheen rahe hain..............Hinsa ko bahut kareeb se dekha hai.....aur baar baar,har baar vaidhavya bhogti vidhvaaon ko bhi............sach hai ye kaun se kranti hai jo bhay aur avyavastha se janmi hai??
    iss rachna ke liye sadubaad..........kam se kam hum sab apne rachnakaar dharm ka palan to karen........shayad inn budhjiviyon aur mauvaadiyon ki samlengikta ko chunauti de saken............

    उत्तर देंहटाएं
  20. Juda andaj men likhi kavita...kai bar logon ko juda andaj men hi apni bat samjhani padti hai.

    उत्तर देंहटाएं
  21. व्‍यवस्‍था पर करारी चोट करते हुए आपने प्रशासन की आंखों को खोलने की सफल कोशिश की है, बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  22. नक्सलवाद वैचारिक रूप से पथ से भटके हिंसावादी हैं, जो किसी नीति-न्याय में विश्वास नहीं करते. शासन और प्रशासन को योजना बनाकर इन्हें समूल नष्ट कर देना चाहिए. ये न तो उत्पीडित हैं, न किन्ही सामाजिक अंतर्विरोधों का प्रतिफल. कुछ बुद्धिजीवी अपनी सहानुभूति देकर इन्हें पनपाते हैं.
    ये पौराणिक राक्षसों के आधुनिक रूप हैं जो अन्यों के मानवाधिकारों की रोज हत्या करते हैं और जब मरने लगते हैं तो खुद के मानवाधिकार की दुहाई देते हैं. आपनी साथी महिलाओं से बलात्कार करने में इन्हें संकोच नहीं होता. हिंसा पंथी कहीं भी, किसी भी रूप में हों, समूल नष्ट किये जाएँ. इनकी हर गोले का उत्तर सिर्फ और सिर्फ गोली से दिया जाना ज़ुरूरी है. सामान्य न्याय व्यवस्था नियम-कानून का सम्मान करनेवाले भद्रजनों के लिए है. आतंकवादियों को सामान्य कानून का लाभ नहीं देकर तत्काल ही गोली से मार दिया जाना चाहिए.

    उत्तर देंहटाएं
  23. अनकही अनसमझी जाने वाली बातों की गहराई में जा .. सागर मंथन सी करती हुई रचना... अपने आप में बहुत कुछ कहती और समझाती हुई.

    उत्तर देंहटाएं
  24. एक सही रचनाकार का काम सांप्रदायिकतावादी, पूंजीवादी, प्रतिक्रियावादी, अलगाववदी एवं यथास्थितिवादी शक्तियों के जाल में जकड़े समाज में छटपटाने की भावना और उस जाल को तोड़ने की शक्ति जागृत करना है। आपकी मान्यता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। जीवन की सच्चाई को सच साबित करती एक बेहतरीन रचना के लिए बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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