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एक बार फिर सम्पादक ने उसकी कहानी खेद प्रकट करते हुए लौटा दी थी। एक उभरता हुआ साहित्यकार.... न जाने कितने पन्ने और स्याही खर्च करने के बाद एक कहानी तैयार होती है, उस पर से तुर्रा ये कि रचनायें टाइप कराकर भेजी जानी चाहिये......... डाक खर्च बढ़ रहा है और उस पर से नाम-पता व टिकट लगा एक और लिफाफा भेजना ताकि सम्पादक महोदय स्वीकृति या अस्वीकृति की सूचना भेज सकें। कुछ सम्पादक तो सूचना देना भी उचित नहीं समझते और पता लिखे लिफाफे पर दूसरा पता चिपका उसे व्यक्तिगत उपयोग में लाने लगते है और अगर कहानी छप भी गयी तो जरूरी नहीं कि उसका मानदेय मिले ही। आत्मसन्तुष्टि ही सबसे बड़ी सन्तुष्टि है। इसी फार्मूले को अपनाकर अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक यह मान लेते हैं कि रचनाकार पत्रिका में अपना नाम देखकर ही धन्य हो जाएगा। न जाने क्या-क्या विचार उसके दिलो-दिमाग में कौंध रहे थे।


रचनाकार परिचय:-


कृष्ण कुमार यादव का जन्म 10 अगस्त 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ0 प्र0) में हुआ। आपनें इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नात्कोत्तर किया है। आपकी रचनायें देश की अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं साथ ही अनेकों काव्य संकलनों में आपकी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। आपकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं: अभिलाषा (काव्य संग्रह-2005), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह-2006), इण्डिया पोस्ट-150 ग्लोरियस इयर्स (अंग्रेजी-2006), अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह-2007), क्रान्ति यज्ञ :1857-1947 की गाथा (2007)।

आपको अनेकों सम्मान प्राप्त हैं जिनमें सोहनलाल द्विवेदी सम्मान, कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान, काव्य गौरव, राष्ट्रभाषा आचार्य, साहित्य-मनीषी सम्मान, साहित्यगौरव, काव्य मर्मज्ञ, अभिव्यक्ति सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, साहित्य श्री, साहित्य विद्यावाचस्पति, देवभूमि साहित्य रत्न, सृजनदीप सम्मान, ब्रज गौरव, सरस्वती पुत्र और भारती-रत्न से आप अलंकृत हैं। वर्तमान में आप भारतीय डाक सेवा में वरिष्ठ डाक अधीक्षक के पद पर कानपुर में कार्यरत हैं।

पिछले तीन सालों से वह प्रयास कर रहा है कि उसकी एक कहानी किसी पत्रिका में छप जाय। आखिरकार इस बेरोजगारी में भी वह अपना पेट काटकर कहानी की टाइपिंग और डाक खर्च के पैसे देता था, पर कहानी छपने का नाम ही नहीं ले रही थी। उस पर से बीबी रोज ताना देती कि अपना घर तो सम्हल नहीं रहा और चले हैं कहानियों से क्रान्ति पैदा करने व समाज सुधारने। वह यह सोचकर अपमान के घूंट चुपचाप पी जाता कि किसी न किसी दिन उसकी कहानी छपेगी और तब बीबी को उसकी रचनात्मकता का अहसास होगा। पर इस बार भी जब उसकी कहानी खेद सहित लौट आयी तो उसकी रचनात्मकता कुलबुला उठी। इस बार की कहानी में तो उसने ग्रामीण परिवेश की एक सच्ची घटना को पन्ने पर उतारा था। आखिर प्रेमचन्द भी तो ग्रामीण परिवेश और उसकी विसंगतियों पर कलम चलाकर ‘कथा-सम्राट’ बने थे, फिर वो क्यों नहीं?

इस बार शहर जाते समय उसने यह सुनिश्चित कर लिया कि पत्रिका के सम्पादक से मिलकर अवश्य पूछेगा कि उसकी कहानियों में कमी क्या है, जो बार-बार खेद के साथ लौटा दी जाती है। एक मैग्जीन-स्टाल पर जाकर उसने पूछा कि अमुक पत्रिका का कार्यालय कहाँ है, पर उसने कंधे उचकाकर कहा- नहीं पता। अपने झोले से उसने पत्रिका का तुड़ा-मुड़ा अंक निकालकर ध्यान से पता पढ़ा और उस मैग्जीन स्टाल पर खड़े व्यक्ति से फिर पूछा तो उसने बताया कि- “तीन चौराहे आगे जाकर दाहिने वाली गली में अन्तिम मकान”। उस व्यक्ति द्वारा बताए गए पते पर जब वो पहुँचा तो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में खड़ा एक दो-मंजिला मकान पाया जिसके गेट पर धूल-धूसरित अवस्था में पत्रिका और उसके सम्पादक का नाम लटका हुआ था, ऐसा लग रहा था मानो वर्षों से उसे किसी ने छुआ तक न हो।

उसने घर में प्रवेश के लिए काल बेल बजायी तो एक नवयुवती ने आकर गेट खोला और पूछा-किससे मिलना है? जवाब में उसने सम्पादक जी का नाम बताया तो उसने सीढ़ियों की तरफ इशारा कर दिया। लालटेन से भी मद्धमि रोशनी वाला बल्ब सीढ़ियों पर रास्ता दिखा रहा था अन्यथा वह जरूर लुढ़क गया होता। सीढ़ी के अन्तिम पायदान पर कदम रखते ही सामने कमरे में दाढ़ी बढ़ाए एक बुजुर्ग व्यक्ति किताबों के बीच विराजमान दिखे। उसे देखते ही उन्होंने पान की पीक बगल में रखी डस्टबिन में दे मारी और पूछा-कहिए जनाब! किससे मिलना है? जी, आपसे ही मिलना है और फिर सकुचाते हुए उसने दोनों हाथ जोड़ लिए। अच्छा बैठिए....... कहाँ से आये हैं....... जी, रामपुरवा से....... ठीक है, काम बतायें। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि बात की शुरूआत कहाँ से करे? उसने सम्पादक का खेद वाला पत्र मय कहानी निकालकर उनके सामने रख दिया। अच्छा....... तो आप भी कहानियाँ लिखते हैं पर इसे हम नहीं छाप सकते। आखिर क्यों? इससे पहले कि वे जवाब देते, पैण्ट-शर्ट पहने एक नवयुवक ने प्रवेश किया और सम्पादक जी उसके सम्मान में दोनों हाथ जोड़ कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए। क्या लेंगे ठण्डा या गरम? कुछ भी नहीं, आज जरा जल्दी में हूँ। मैडम ने ये विज्ञापन आपकी पत्रिका हेतु भिजवाया है, पर ध्यान रखिएगा कि पत्रिका का अगला अंक जल्दी आ जाय नहीं तो विज्ञापन का कोई मतलब नहीं रह जायेगा। और हाँ! मैडम की ये कहानी भी अगले अंक में प्रकाशित कर दीजिएगा। इस बार उन्होंने कहानी के साथ छापने के लिए नया फोटो दिया है, कह रही थीं कि पिछले फोटो में उनका व्यक्तित्व निखर कर सामने नहीं आया। देख लीजिएगा, कहीं कोई वाक्य नहीं जँच रहा हो तो अपने हिसाब से परिमार्जित कर लीजिएगा। अरे साहब! आप भी क्या मजाक करते हैं। मैडम तो अपनी कलम से न जाने कितनों का भविष्य रोज बनाती-बिगाड़ती हैं, फिर मेरी क्या औकात कि उनकी कलम में खोट निकालूँ। अच्छा अब चलता हूँ.... सम्पादक जी उस व्यक्ति को छोड़ने सीढ़ियों तक गए और जब तक वे लौटकर आए उसने अपने को सहज कर लिया था।

हाँ! तो आप कुछ कह रहे थे। जी, मैं अपनी कहानी के बारे में बात करना चाह रहा था कि बार-बार आप खेद सहित लौटा देते हैं। सम्पादक जी ने उसे घूरती हुई निगाहों से देखा और बोले- तो आप यह चाहते हैं कि हर अंक में मैं आपकी कहानियों को स्थान दिया करूँ। वह धीमे से बोला - हर अंक में तो नहीं, पर एकाध कहानी तो छाप ही सकते हैं। अभी-अभी प्राप्त विज्ञापन के प्रूफ पर से नजर उठाते हुए सम्पादक जी ने कहा- इससे मेरा क्या फायदा होगा। इस प्रश्न से वह किंकर्तव्यविमूढ़ रह गया। जी, मैं समझा नहीं। अरे इसमें समझना क्या है? पत्रिका तो फ्री में छपती नहीं है, उसके लिए हमें सरकारी विभागों से विज्ञापन लेने के लिए तरह-तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं। आप जानते ही हैं कि छपास की भूख सबमें होती है और हर अधिकारी घर बैठे-बैठे साहित्यकार बनना चाहता है। विज्ञापन पाने के लिए हमारी मजबूरी है कि उनकी रचनाओं को प्राथमिकता के आधार पर पत्रिका में स्थान दिया जाय। फिर अधिकारी ही क्यों आजकल तो नेताओं में भी अपने ऊपर साहित्यकार का तमगा लगाने की होड़ लगी हुयी है। बड़े-बडे शहरों में प्रतियोगिता परीक्षाओं में असफल अभ्यर्थी अपनी रचनात्मकता को लेखों के रूप में उतार कर सम्पादकों को बेच देते हैं और उसकी कीमत ले लेते हैं। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रचना किसके नाम से छपी? आम पाठक यह समझता है कि फलां नेता की ज्वलन्त मुद्दों पर कितनी अच्छी पकड़ है, जो आँकड़ों सहित भविष्य की रूप रेखा खींचते हुए इतना सार्थक लेख लिखता है..... सब गोरखधन्धा है। यहाँ रचनायें नहीं नाम बिकता है। एक आम आदमी कितनी भी अच्छी रचना कर ले, कोई प्रतिक्रिया नहीं होती पर कोई अधिकारी, नेता या चर्चित शख्सियत ऐसा करे तो उसकी समीक्षाएं छपती हैं, गोष्ठियाँ होती हैं, पुरस्कार मिलते हैं, पुस्तकालयों में उसकी किताबें धड़ल्ले से खरीदी जाती हैं और साहित्य-सेवा के नाम पर विदेश-यात्रा का मौका मिलता है।

उसने सम्पादक जी को टोकते हुए कहा- ‘‘पर आम आदमी तो पत्र-पत्रिकाओं में अच्छी रचनाएँ पढ़ना चाहता है। प्रेमचन्द अपनी रचनाओं के चलते ही ‘साहित्य-सम्राट’ कहलाए पर वे तो कोई अधिकारी या नेता नहीं थे!’’ सम्पादक जी ने उसे खा जाने वाली निगाहों से देखा और कहा- “आज के पढ़े-लिखे नौजवानों में तो यही कमी है कि बात-बात पर अतीत का राग अलापना शुरू कर देते हैं। वे वर्तमान और भविष्य का सामना करने का माद्दा ही नहीं रखते। किसी किताब में चार पंक्तियाँ पढ़ लीं तो उसी को दुनिया का सबसे बड़ा सत्य मान उसकी तलाश में निकल पड़े।” उसने उन्हें टोकना चाहा पर वे धारा प्रवाह बोले जा रहे थे- “बेटा! आज जमाना प्रेमचन्द का नहीं है। उनकी रचनायें सरेआम जलायी जा रही हैं, पर समाज में कोई सार्थक प्रतिक्रिया नहीं होती। ये लोग तो अब जन्म-तिथि व पुण्य-तिथि के दिनों के मेहमान बनकर रह गए हैं। चौराहों पर इनकी मूर्ति लगाकर हम एक ही झटके में साहित्य और समाज को दिए गए इनके योगदान का एहसान उतारना चाहते हैं। कुछ फूल-माला चढ़ाकर उस सुगन्ध में हम उनके साहित्यिक योगदान की सुगन्ध को विस्मृत करना चाहते हैं।”

कभी साहित्यिक रचनाओं पर धारावाहिक और फिल्में बनती थीं, पर अब तो हम पुरानी फिल्मों के री-मेक और विदेशी फिल्मों व धारावाहिकों के चरित्रों को भारतीय अन्दाज में ढालकर बाजार में उतार रहे हैं। देखा नहीं ‘देवदास’ फिल्म बनते ही कैसे ‘देवदास’ उपन्यास के पेपरबैक संस्करण की बाजार में धूम सी आ गयी। तुम्हें क्या लगता है, इन किताबों को लोग साहित्यिक रूचियों से प्रेरित होकर पढ़ने के लिए ले गये? नहीं.... नहीं... शाहरूख खान और ऐश्वर्या राय के आवरण चित्र से सजे ‘देवदास’ उपन्यास लोगों की व्यक्तिगत लाइब्रेरी का हिस्सा बनकर उनकी सामाजिक हैसियत में बढ़ोत्तरी करते हैं कि जिस उपन्यास के आधार पर वो फिल्म बनी है, वो तो उनकी लाइब्रेरी में मौजूद है।

सम्पादक जी का लम्बा भाषण सुनते-सुनते उसका गला सूखने लगा था। उसने पानी के गिलास की ओर इशारा किया तो पहले उन्होंने अपना गला तर किया और फिर उसी गिलास को धोकर उसे भी पानी पीने को दिया। सम्पादक जी अपना भाषण नहीं छोड़ रहे थे और उसे लग रहा था- काश! किसी भी तरह उसकी एक कहानी छप जाती। उसने सम्पादक जी की ओर याचना भरी निगाहों से देखा और पूछा- क्या आपने मेरी कहानी ध्यान से पढ़ी है? सम्पादक जी ने ना के लहजे में सिर हिलाते हुए कहा- कितनों की कहानियाँ पढूँ? एक दो हों तो पढूँ भी, पर यहाँ तो रोज दसियों कहानियाँ छपने के लिए आती हैं। अचानक सम्पादक जी को क्या सूझा कि उन्होंने उसकी कहानी पर सरसरी निगाह डालना शुरू कर दिया। कहानी तो अच्छी लिख लेते हो, पर समकालीन नहीं है। समकालीन शब्द उसने पहली बार सुना था सो उत्सुकतावश पूछ ही लिया कि ‘समकालीन’ मायने क्या होता है? सम्पादक जी ने उसकी तरफ नजरें उठायीं और कहा- “आज समाज में जो घटित हो रहा है, उस पर अपनी कलम चलाओ।” पर मैंने तो वही लिखा है जो मेरे गाँव में घटित हुआ था......लेकिन तुम्हारा गाँव पूरे समाज का प्रतिबिम्ब तो है नहीं। वैसे भी गाँव पर कहानियाँ लिखने का चलन पुराना हो गया है। कुछ शहरी संस्कृति पर भी नजर डालो- अधखुले वस्त्र, खुला यौनाचार, बलात्कार, गिव एण्ड टेक का नियम, सावन को फेल करती बाल लहराकर उन्मुक्त जी रही नवयौवनायें, काल गर्ल एवं जिगोलो कल्चर, एकल परिवार में अवसादग्रस्त मानवीय जीवन, पुरूष-स्त्री के बदलते सम्बन्ध और टूटती वर्जनाएँ, बिना विवाह के बच्चे पालने की ख्वाहिश, लिव-इन-रिलेशनशिप, होमोसैक्सुअल व लेस्बियन रिलेशनशिप... लेकिन फिर फिल्मों और साहित्य में अन्तर क्या रह जाएगा, वह बोल पड़ा। सम्पादक जी एक दार्शनिक की तरह उसकी समस्याओं का निराकरण कर रहे थे-‘‘बेटा! आज के समाज में जो बिकता है, वही बेचा जाता है। भूमण्डलीकरण, उदारीकरण एवम् पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से साहित्य अछूता नहीं रह सकता। आखिर उपभोक्तावाद का सबसे बड़ा बाजार शहरी वर्ग ही तो है और अगर वह यही सब साहित्य में भी देखना चाहता है तो हमारी मजबूरी है। जब हम उनके मनमाफिक लिखेंगे तभी तो वे पत्रिकायें खरीदेंगे। आखिर हमें भी तो अपनी पत्रिका चलानी है। यहाँ समाज-सेवा करने कोई नहीं आया है और तथाकथित समाज-सेवा के पीछे भी व्यक्ति का स्वार्थ निहित होता है।’’

उसके पल्ले बहुत कुछ पड़ा भी था और नहीं भी। वह अपना झोला सँभालते हुए उठ खड़ा हुआ और दोनों हाथ जोड़कर सम्पादक जी से विदा माँगी। रास्ते भर वह सोचता रहा कि आखिर किस तरह की कहानी लिखी जाए कि सम्पादक जी छापने को तैयार हो जायें। गाँव पहुँचते-पहुँचते कहानी का खाका उसके दिलो-दिमाग में तैयार हो चुका था। घर पहुँचकर उसने भोजन किया और फिर जुट गया एक अदद समकालीन कहानी लिखने के लिए। अपने बीबी के तानों से बेखबर उसके सामने स्कूल के दिनों में उमड़ी तमाम कल्पनायें शब्दों का रूप लेकर उतर रही थीं। जिन फन्तासियों को वह वास्तविक जीवन में नहीं जी सका था, उन्हें अपने को नायक रूप में ढाल पन्नों पर उतार रहा था.....वो टूटती यौन-वर्जनायें, दमित इच्छायें, पुरूष-नारी के बदलते सम्बन्ध- सब कुछ उसने ऐसा गढ़ा मानो कोई जीवन्त तस्वीर खींच रहा हो। एक कदम और आगे बढ़ते हुए किशोरावस्था में साथियों के साथ लिए गए मजे, जिसे सम्पादक जी ने होमोसैक्सुअलटी जैसा कुछ कहा था, को भी कहानी में विस्तार दे दिया।

अगली सुबह जब वह सोकर उठा तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने समकालीनता की कुंजी ढूँढ ली थी। उस दिन वह बिना समय गंवाये ही डाकखाने की ओर बढ़ गया। काउण्टर खुलते ही उसने दो लिफाफे खरीदे और एक लिफाफे पर अपना नाम-पता लिख कर कहानी के साथ संलग्न कर सम्पादक जी के पते पर भेज दिया। इस बार उसे ज्यादा दिन तक इन्तजार नहीं करना पड़ा। एक महीने बाद ही उसे सम्पादक जी का पत्र मिला कि- “आपकी रचना आगामी अंक हेतु स्वीकृत हो गयी है। अंक की प्रति समय से आपको प्रेषित की जाएगी।” उसने पत्र को भावावेश में आकर चूम लिया और इन्तजार करने लगा अपनी एक अदद कहानी के छप कर आने का।

26 comments:

  1. यथार्थ को तौलती रोचक रचना।

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  2. ek lambe samay bad ke. ke. ji ko sahityashilpi par padh raha hoon.wakai rochak kahani.

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  3. यह कहानी से ज्यादा एक सच्ची घटना है, जो हर नए कथाकार के साथ घटित होती है.

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  4. यह कहानी से ज्यादा एक सच्ची घटना है, जो हर नए कथाकार के साथ घटित होती है.

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  5. कृष्ण कुमार जी ने कहानी में सुन्दर रंग भरे हैं..बधाई.

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  6. एक बार फिर सम्पादक ने उसकी कहानी खेद प्रकट करते हुए लौटा दी थी। एक उभरता हुआ साहित्यकार..न जाने कितने पन्ने और स्याही खर्च करने के बाद एक कहानी तैयार होती है, उस पर से तुर्रा ये कि रचनायें टाइप कराकर भेजी जानी चाहिये.. सीधे व सपाट भाषा में सीधा कथ्य..रोचक शैली. के. के. जी को साधुवाद !!

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. जीवन का सच बखूबी सामने रखना कृष्ण कुमार जी की कहानियों की विशेषता है, जो इस कहानी में भी परिलक्षित होती है.

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  9. लेखक-संपादक के बदलते रिश्तों पर बढ़िया कटाक्ष. उम्दा कहानी

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  10. शाहरूख खान और ऐश्वर्या राय के आवरण चित्र से सजे ‘देवदास’ उपन्यास लोगों की व्यक्तिगत लाइब्रेरी का हिस्सा बनकर उनकी सामाजिक हैसियत में बढ़ोत्तरी करते हैं कि जिस उपन्यास के आधार पर वो फिल्म बनी है, वो तो उनकी लाइब्रेरी में मौजूद है।...bat to 100 feesadi sahi hai.

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  11. बदलते परिवेश पर रोचक कहानी. आज के दौर के जीवन-मूल्यों पर कड़ा कमेन्ट.

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  12. बदलते परिवेश पर रोचक कहानी. आज के दौर के जीवन-मूल्यों पर कड़ा कमेन्ट.

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  13. पुराने एवं नवीन जीवन-मूल्यों के टकराव को इस कथा में भली-भांति रेखांकित किया गया है...बहुत अच्छी प्रस्तुति है.

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  14. वाह! कहानी पढ़कर मजा आ गया. आज के संपादकों की तो पोल ही खोल कर रख दी.

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  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  16. अगली सुबह जब वह सोकर उठा तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने समकालीनता की कुंजी ढूँढ ली थी। ....Are bhai hamen bhi to raj batao.

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  17. एकदम कटु सत्‍य। के के जी ने ऐसा लिखा है कि संपादकों के कान गर्म हो जाने चाहिए।

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  18. रोचक शैली में लिखी गई सच्ची कहानी के लिए यादव जी को एवं साहित्य शिल्पी को बहुत-बहुत बधाई

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  19. अपनी बात को आप इतने विस्तार से कहानी मे ही कह सकते थे..अच्छी कहानी..

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  20. कुछ शहरी संस्कृति पर भी नजर डालो- अधखुले वस्त्र, खुला यौनाचार, बलात्कार, गिव एण्ड टेक का नियम, सावन को फेल करती बाल लहराकर उन्मुक्त जी रही नवयौवनायें, काल गर्ल एवं जिगोलो कल्चर, एकल परिवार में अवसादग्रस्त मानवीय जीवन, पुरूष-स्त्री के बदलते सम्बन्ध और टूटती वर्जनाएँ, बिना विवाह के बच्चे पालने की ख्वाहिश, लिव-इन-रिलेशनशिप, होमोसैक्सुअल व लेस्बियन रिलेशनशिप.. in panktiyon ne ek sach ujagar kar rakh diya hai aaj ki nayi pidhi ke badalte swaroop aur mansikta (andhadhoondh paschatya sanskriti ke pichhe bhagne ki)ko ujagar kar diya

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  21. कठोर सत्य, पर रोचकता बनी रही. बहुत बढ़िया कहानी.यादव जी को एवं साहित्य शिल्पी को बहुत-बहुत बधाई!

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  22. apne bakai ek bahut hi rochak kahani he badhai yadav ji

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