23 जनवरी 1960 को नगीना, मेवात में जन्मे भगवानदास मोरवाल नें हिन्दी कथा जगत में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। आपनें राजस्थान विश्वविद्यालय से एम.ए. किया साथ ही आपको पत्रकारिता में डिप्लोमा भी हासिल है। आपके प्रकाशित उपन्यास हैं - रेत, काला पहाड़ एवं बाबल तेरा देस में। आपके चार कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह और कई संपादित पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं। आपके लेखन में मेवात क्षेत्र की ग्रामीण समस्याएं उभर कर सामने आती हैं।

भगवानदास मोरवाल को उपन्यास रेत के लिये ही इस वर्ष के दो प्रमुख सम्मान प्राप्त हुए हैं। पहला है अंतरराष्ट्रीय इंदुशर्मा कथा सम्मान जो कि कथा. यू. के द्वारा लंदन में प्रदान किया गया। दूसरा है - जे. सी जोशी स्मृति शब्द साधक ज्यूरी सम्मान। इस सम्मान को घोषित करने के लिये ज्यूरी में डॉ. नामवर सिंह, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी तथा राजेन्द्र यादव थे। यह सम्मान श्री मोरवाल को 23 08 2009 को हिन्दी भवन में दिया जायेगा।

साहित्य शिल्पी के पाठकों के लिये प्रस्तुत है उपन्यास रेत से अंश:-

*****

सारी तैयारियाँ हो गईं महफ़िल की।

ऊपर खुली छत पर एक तरफ़ डी जे, तो ठीक उसके सामने दीवार के सहारे नीचे फ़र्श पर मुलायम गद्दे बिछा कतार में गाव-तकिए लगवा दिए गए। अपनी परिकल्पना के अनुसार बुआ ने मेहमानों के बैठने की ऐसी व्यवस्था करवाई कि आनेवाले को पहली नजर में लगे, वह सचमुच किसी महफिल में आया है।

शादी की ज़्यादातर रस्में शाम होते-होते पूरी कर ली गईं। रूक्मिणी, वंदना, पूनम सहित महफिल में जान डालने के लिए विशेष रूप से बुलाई गईं तारा, सलमा और ज्योति को पहले ही निर्देश दे दिए गए कि महफ़िल में ऐसा रंग जमना चाहिए कि आनेवाले मेहमान बरसों तक इसे याद रखें। बावजूद इसके बुआ का जी ठिकाने नहीं है। एक अनजानी आशंका से वे बेचैन हुई जा रही हैं। अपनी इसी आशंका से मुक्त होने की गरज से एक बार फिर चल दीं उन्हें याद दिलाने।

मगर इस बार कमला बुआ का कमरे में प्रवेश करना कठिन हो गया। गाजूकी की किशोरियों में एक-दुसरे को पीछे धकियाकर उनका सामीप्य पाने की जैसे होड़ मची हुई है। यह दृश्य बुआ को भीतर तक आश्वस्त कर गया। एक शीतलता से भीग गई वह कि जब इन किशोरियों का इन्हें देख-देखकर जी नहीं भर रहा है, तब उन मेहमानों का क्या होगा जब ये महफिल में आएँगी।

बमुश्किल घुस पाईं बुआ कमरे में।
"बुआ, सब ठीक तो है?" छोटे-से अन्तराल में कमला बुआ को फिर से अपने कमरे में देख तारा ने पूछा।
"वैसे तो सब ठीक है पर पता ना मरा मेरा जी बहुत घबरा रहा है। कहीं कोई कमीबेशी ना रह जाए।"
"तू बेफिकर रह। हम सब सँभाल लेंगी। हमने भी बड़े-बड़े इज़्ज़तदार देखे हैं...और फिर हम ऐसी आइटम तैयार करके लाईं हैं कि अगर तेरे ये मेहमान देखते ना रह जाएँ, तो नाम बदल देना हमारा...क्यों सलमा?" तारा ने बेफ़िक्र होते हुए बुआ को आश्वस्त किया।
"बस्स, यही कहने आई हूँ।" इतना कह बुआ फिर रूक्मिणी की ओर पलटीं, "रूक्मिणी, मरी इन्ने कुछ खिलाया-विलाया भी है, या ना?"
"बुआ, तुझे पता तो है कि खिलावड़ी रात को खाना नहीं खाती हैं।"
"पता है मरी, इसीलिए तो मैंने पहले ही बरेड, पनीर और अमरूद का जूस मँगवा दिया है।"
"ठीक कह रही है बुआ। डांस करते-करते तेरे किसी बिगड़ैल इज़्ज़तदार ने मुँह में जबरन दारू उँडेल दी, तो क्या हम मना कर देंगी, ना न।"
"इसीलिए तो...क्या पता महफ़िल कित्ती देर चले। कहीं तुम बहक ना जाओ इसीलिए अमरूद का जूस मँगाया है।"
"वैसे महफ़िल का टाईम क्या है बुआ?"
"टैम क्या, वैसे तो आठ बजे का दिया है पर असली महफिल दस से पहले क्या जमेगी।"
"ठीक है, हम फिर उसी हिसाब से तैयार होंगी।" ज्योति ने तैयार जूड़े में हेयर पिन ठूँसते हुए कहा।

कमला सदन में गहमागहमी, चिल्ल-पों अपने पूरे उफान पर है। बच्चों की उछल-कूद और धमा-चौकड़ी से बेख़बर कमला बुआ बाहर-भीतर कई चक्कर लगा चुकी हैं मगर वैद्यजी का कहीं अता-पता नहीं है। हालत यह हो गई कि दूर दूर तक पसरी रौशनी में भीगा हर साया उसे वैद्यजी होने का भ्रम देने लगा। आमन्त्रित अतिथि आ चुके है। रिटायर्ड एसएसपी राठौर, 'भारत' ईंट-भट्टे का मालिक रामपत यादव, ताउम्र समाजवाद की टोकरी ढोने के बाद हाल ही में एक तथाकथित उग्र राष्ट्रवादी पार्टी में शामिल हुए तिवारी जी, रीयल एस्टेट के नाम पर खाली पड़ी सरकारी ज़मीनों पर अवैध क़ब्ज़ा जमानेवाला 'गुप्ता प्रॉपर्टीज़' का मालिक गुप्ता, और शेयर दलाली में नया-नया हाथ डालनेवाला, राज्य सचिवालय कैंटीन का ठेकेदार आहूजा जैसी नामचीन हस्तियों का महफ़िल में आगमन हो चुका है। नंदजी और फ़ौजी सहित घर के अन्य विशिष्ट अतिथि भी आ चुके हैं। मगर इन सारे मेहमानों में एक मेहमान किसी की पहचान में नहीं आ रहा है। सुशीला, माया ही नहीं बुआ ने रूक्मिणी, वंदना, पूनम सबसे पूछा, और सबने अपनी नई-पुरानी स्मृतियों के टुकडों का आपस में मिलान करके, याद करने की बहुत कोशिश की परन्तु किसी को याद नहीं आया कि इस शक्ल और सूरत का कोई 'इज़्ज़तदार' कभी उनके सम्पर्क में आया हो। थोड़ी देर के लिए सदन में बेचैनी और घबराहट-सी व्याप गई।

हिम्मत कर रूक्मिणी ने ही उठाया इस बेचैनी और घबराहट से मुक्ति का बीड़ा।
"बाबू सा, नमस्ते!" ताउम्र समाजवाद की टोकरी ढोनेवाले तिवारी जी का रूक्मिणी ने अभिवादन किया।
"अरे आओ रूक्मिणी, कैसी हो?"
"सब मजे में है बाबू सा'।" संक्षिप्त-सा उत्तर दे रूक्मिणी ने तिवारी जी के बगल में बैठे मेहमान की ओर देखा।
"भई मुरली बाबू, ये रूक्मिणी जी है।" तिवारी जी पूरे परिचय के बजाय केवल नाम बताया।
अपनी ओर अपलक निहारते मुरली बाबू का इस बार रूक्मिणी ने अभिवादन किया।
"रूक्मिणी, अपने ये मुरली बाबू हमारे अनन्य मित्रों में से हैं। पार्टी के युवा नेता हैं। भविष्य में अपनी पार्टी को इनसे बहुत आशाएँ हैं। तुम्हारा निमन्त्रण मिला तो सोचा जरा इन्हें भी राष्ट्र के प्रति समर्पित होने का ज्ञान दिलाया जाए। बहुत हो गया ब्रह्मचर्य का पालन।" दाईं आँख दबाते हुए तिवारी जी जोर से खिखियाकर हँसे।
देखता रह गया रूक्मिणी को मुरली। लगा जैसे मोगरे का ताज़ा-ताज़ा फूल अपनी गमक के साथ खिला हुआ है।
रूक्मिणी ने जबरन मुस्कराने की कोशिश की।
इसी बीच बुआ को जैसे ही वैद्यजी के आने की सूचना मिली, वह तेज़ी से लपकी उसकी ओर।
"बैद्जी, मरे कहाँ मर गया था?" वैद्यजी को देखते ही एक आत्मीय डाँट मारते हुए पूछा बुआ ने।
"रास्ते में साइकिल पिंचर हो गई थी।"
"तू तो नहीं हुआ पिंचर। तेरे तो टैर ठीक हैं न!"
हँसी छूट गई वैद्यजी की।
"तेरा भी मरे वो किस्सा है कि शिकार के बखत कुतिया हँगाई मरे है। चल छोड़, सारे मेहमान आ चुके हैं। अब उनके पास जाके बैठ।" लगभग आदेश देती हुई यह कहते हुए आगे बढ़ गई, "आ जा, मैं लिए चलती हूँ!"
वैद्यजी बुआ के पीछे-पीछे हो लिया।
बुआ ने मेहमानों से वैद्यजी का परिचय घर के सदस्य के रूप में कराया। वैद्यजी ने सारे मेहमानों पर ऐसे नज़र मारी, जैसे उसकी आँखें किसी अतिथि विशेष को तलाश रही हैं।
"बैदजी, तू जरा इनके पास बैठ! मैं और काम देखती हूँ।"
इतना कहकर बुआ लौटने लगी कि पीछे से वैद्यजी ने धीरे-से आवाज़ दी, "बुआ!"
वापस पलटी कमला बुआ।
"वो नंदजी और फौजी कौन से हैं?" अपनी जिज्ञासा को नहीं रोक पाया वैद्यजी।
घूरकर देखा बुआ ने वैद्यजी की ओर। फिर थोड़ा रूककर बोली, "आ चल!"
कमला बुआ ने दूर से एक-एक कर सबका परिचय दिया।

परिचय के दौरान नंदजी को देखकर वैद्यजी ने ख़ुद से कहा, 'ग़लत नहीं कहा था वंदना ने कि फ़ौजी में उसकी जान बसती है और नंदजी...।' एकाएक उसे बुआ के शब्द याद आ गए कि एक आबरू ही तो होती है औरत के पास। अब यह मर्द के ऊपर है कि वह उसे ताकत से हासिल करता है, या औरत अपनी मरजी से उसे उसके हवाले करती है।
"बुआ, ये तो ठीक हैं पर वो कौन-सा है?"
"वो कौन-सा?" उलटा पूछा बुआ ने।"
"जो रू...रूक्मिणी।"
फिस्स से हँसी बुआ।
"मरे, यह बात तू उसी से पूछ।" एकाएक सामने से रूक्मिणी को एकदम पास आता देख बुआ वहाँ से जाने लगी।
"नानी, क्या पूछ रूक्मिणी से?" रूक्मिणी ने बुआ के शब्द सुन लिए थे शायद।
वैद्यजी परेशान।
"कैसे चुप हो गए बैद्जी?"
"चुप क्या, मैं बताती हूँ। मरा, पुच्छ रहा था कि तेरा वाला जमाई कौन-सा है।" कमला बुआ ने स्पष्ट कह दिया।
"अच्छा इसलिए परेशान है।" इतना कहने के बाद पहले रूक्मिणी का चेहरा थोड़ा सख़्त हुआ और फिर कुटिल मुस्कान उछालते हुए बोली, "बैद्जी, रूक्मिणी नहीं पड़ती है इस झमेले में। अपना तो साफ कहना है कि ग्राहक को ग्राहक ही समझना चाहिए। मैं नहीं पालती इस दामाद-जमाई का टंटा। जिसे शौक है पाले। अरे, यह क्या बात हुई कि एक बार मत्था ढकाई क्या करी, उमर भर उसकी गुलाम हो गई। जब गुलामी ही करनी थी, तो जरूरी था बुआ बनना...ब्याह रचा के भाभी ना बनती...और बैद्जी, अगर मत्था ढकाई की उसने रकम दी है, तो बदले में मैंने भी उसे अपनी आबरू उसके हवाले की है। किसी ने किसी पर एहसान नहीं किया है।"
वैद्यजी निरूत्तर। टकटकी लगाए कभी वह कमला बुआ को देखता, तो कभी रूक्मिणी को। उसे लगने लगा जैसे उसके पाँव किसी दलदल पर टिके हुए हैं। अपने-अपको उसने मेज़बान और मेहमान के बीच खिंची एक ऐसी स्याह लकीर पर खड़ा पाया, जहाँ उसे अपना होना-न-होना संदिग्ध दिखाई देने लगा। आँखों के आगे धुँधलका-सा छा गया। पलभर के लिए लगा जैसे पुतलियों पर धुँधली झिल्ली चढ़ गई है। यहाँ तक कि उसे यह भी पता नहीं चला कि रूक्मिणी वहाँ से कब चली गई।

खुली छत से आकाश में झूलती तारों की झीनी चादर से टिमटिमाते हुए तारे ऐसे दिखाई दे रहे है, मानो सितारों से जड़ी स्याह ओढ़नी पर ओस की बूँदें चमक रही हैं। बैशाख के शुक्ल पक्ष का महज तीसरा दिन होने के कारण नवजात शिशु-सा चन्द्रमा भी ज्यादा देर तक इन्तज़ार नहीं कर पाया।
आठ बजते-बजते पूरी छत भर गई।

पहले हारमोनियम और ढोलक की थाप पर जो धमाल मचा, वह देर तक नहीं थमा। सुशीला, माया, रूक्मिणी, वंदना, पूनम तो नाचीं ही, बीच-बीच में किसी-न-किसी के आग्रह पर बुआ भी एकाध ठुमका मार लेती। महफ़िल में शोख़ियाँ और शोख़ियों में गहराती रात का शबाब घुलने लगा। कमला बुआ की बग़ल में बैठे मंगल के सेहरे पर वार फेर में आनेवाले नोटों की बारिश-सी होने लगी। दस बजते-बजते बुआ सहित सुशीला और माया तो पस्त हो गईं परन्तु रूक्मिणी, वंदना तथा पूनम का जी नहीं भरा। भला भरे भी तो कैसे भरे। असली महफ़िल तो अब शुरू होनी है।

अचानक कुछ रंगीन बल्बों को छोड़कर, एक-एक कर सारी बत्तियाँ बुझा दी गईं, और जैसे ही डी जे पर शुरू हुआ भीगे होंठ तेरे गीत के बोल के साथ सलमा महफ़िल में दाख़िल हुई कि गद्दों पर अलसाए-से पड़े जिस्मों में ताकत लौट आई। सुप्त शिराओं में ख़ून दौडने लगा और गाव-तकियों के सहारे दीवार से पीठ लगाकर बैठे तथा अधलेटे ख़ास मेहमानों के ख़ाली हुए गिलास फिर से भर उठे तिवारी जी ने सामने बैठे वैद्यजी को इशारे से अपने पास बुलाया और लगभग फुसफुसाते हुए कहा, यार वैद्यजी, वो...वो पहला तोड़ कहाँ है?
वैद्यजी तुरन्त उठा और एक लड़के को साथ ले आया।
"ये हुई ना वैद्यजी बात।" पहले तोड़ से भरते जा रहे गिलास को देखकर तिवारी जी की बाँछें खिल उठीं।
सही कहा था तारा ने कि बुआ हम ऐसी आइटम तैयार करके लाई हैं कि तेरे ये इज़्ज़तदार देखते रह जाएँगे। इसके बाद एक के बाद एक तारा, सलमा, ज्योति तीनों ने डी जे पर जो डांस किया, उस पर रिटायर्ड एसएसपी राठौर, 'भ़ारत' ईंट-भट्टे का मालिक रामपत यादव, शेयर दलाल आहूजा, रीयल एस्टेट के नाम पर ख़ाली पड़ी ज़मीनों पर अवैध क़ब्ज़ा जमानेवाला 'गुप्ता प्रॉपर्टीज़' का मालिक गुप्ता और खाँटी समाजवादी तिवारी जी भी अपने-आपको नहीं रोक पाए। अब डी जे पर लरज़ती, बल खाती संगमरमरी देह से चिपके तिवारी जी ठुमके लगाएँ, ऐसे में उनके अनन्य मित्र और पार्टी का भविष्य कब तक अपने-आपको रोक पाता-यानी राष्ट्र के प्रति समर्पित होने का ज्ञान लेने आया मुरली भी इस नृत्य यज्ञ में कूद पड़ा। उसने भी ठुमकों के रूप में दो-चार चुटकी समिधा इसमें होम दी।
जैसे-जैसे रात बीतने लगी और हल्की ठंड के चलते आकाश से ओस गिरने लगी, वैसे-वैसे महफ़िल पर और रंग चढ़ने लगा। तारा, सलमा, ज्योति के साथ रूक्मिणी, वंदना, पूनम भी ऐसी नाचीं कि पूरी महफ़िल चढ़ाई में आए नोटों से ऐसे पट गई, मानो शिशिर ऋतु में वृक्षों से झड़े पत्तों से धरती पट जाती है। कमला बुआ ने आज क़सम खा ली कि जब तक महफ़िल में आए मेहमान ख़ुद नहीं कहेंगे, तब तक वह महफ़िल ख़त्म करने की पहल नहीं करेगी, चाहे दिन निकल आए।

सुबह के तीन कब बज गए पता ही नहीं चला।
हारकर एसएसपी राठौर को ही कहना पड़ा, "कमला मज़ा आ गया।"
"कप्तान साब, जी भरा या नहीं? "
"बस, एक कमी रह गई।"
"क...कौन-सी?" कलेजा धक्क-से रह गया कमला बुआ का। शब्द हलक़ में फँसकर रह गए।
"यही कि कमला के नँवासे की शादी की महफ़िल हो और कमला का ही कोई ठुमरी-टप्पा न हो।"
जाती हुईं साँस लौटी कमला बुआ की। उसने कल्पना भी नहीं की थी कि यह मरा कप्तान साब बरसों से धूल खाई, उदास पड़ी सारंगी के तारों को इतनी बेरहमी से छेड़ देगा। एक पल के लिए मन के ढीले पड़े तार कसते चले गए।
"कप्तान साब, अब कहाँ याद है ठुमरी-टप्पा।" टालते हुए बोली बुआ।
"कमला, ऐसे ना बनाओ।" एसएसपी राठौर ने छेड़ते हुए कहा।
"हाँ माँ, कप्तान साब सही कह रहे हैं। हमें भी मुद्दत हो गई है सुने हुए।" पास आकर सुशीला ने भी मनुहार किया।
रिटायर्ड एसएसपी राठौर और बेटी सुशीला ने जिस तरह आग्रह किया, उस पर बुआ से ना कहते नहीं बना।
बुआ पहले कुछ सोचने लगी और फिर बोली, "ठीक है याद करके देखती हूँ। तब तक ऐसा करो बैद्जी से सुन लो कुछ।"
"हाँ बैद्जी को तो भूल ही गए थे हम।" सुशीला को भी एकाएक याद आ गया।
"मैं...मैं क्या सुनाऊँ!" अकबका गया वैद्यजी अचानक सिर पर आ पड़ी इस बला को देख।
"यार, कोई भजन-वजन ही गा दो!" गुप्ता प्रॉपर्टीज़ का मालिक गुप्ता अधलेटी मुद्रा में ही बोला।
"मरे, किस दिन के लिए जमा कर रहा है इन्ने लिख-लिखके। चल, आज सुना ही दे एक गजल।" अपनत्व से भीगे इस आदेश में आग्रह के साथ-साथ एक आवाहन को स्वीकारने का हौंस भी था बुआ का।
ग़ज़ल का नाम सुनते ही एसएसपी राठौर के जिस्म में थोड़ी-सी हलचल हुई। तनकर बैठ गया इस बार। ख़ुमारी में डूबी पलकें अपने-आप खुलती चली गई। शिराओं में घुल चुके अल्कोहल से अचेत पड़े बाक़ी के जिस्मों में भी हल्की-हल्की जुम्बिश होने लगी। सलमा धीरे-से उठकर वैद्यजी के पास आ गई। बुआ, सुशीला और माया के कानों के परदे ढीले हो गए।

वैद्यजी ने हल्के-से पूरी महफ़िल पर नज़र मारी और पता नहीं कब पूरी महफ़िल से नज़रें बचा, रूक्मिणी को देख पहले उसने गहरा साँस लिया, और फिर कमला को सम्बोधित करते हुए बोला, "बुआ शे'र है कि :
हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता
वो चाँद खुलके लबे-बाम क्यों नहीं आता।
"
ग़ज़ल के मतले को सुनते ही लगा मानो शान्त पड़े ताल में कोई पत्थर उछाल दिया हो। जिन आँखों में भारीपन उतर आया था, वे भी अब पूरी तरह खुल गईं। कमला बुआ ने हुस्न बाग का पाऊच खच्च से दाँत से काटा और गप्प से मुँह में डाल गई।

"बैद्जी, जरा इस शेर को फिर से कहना!" मुँह में घुले किणकों के साथ अठखेलियाँ करती जीभ को विश्राम देते हुए आग्रह किया बुआ ने।

वैद्यजी ने उसी शेर को पुन: दोहराया और आगे बोला, "और शे'र अर्ज है बुआ कि :
ज़रा बताओ तो ये आप और तुम क्या है
तेरी ज़ुबाँ पै मेरा नाम क्यों नहीं आता
पढ़े तो कैसे पढ़े कोई कोरे काग़ज़ को
लिखा हुआ तेरा पैग़ाम क्यों नहीं आता

और :
वो सह रहे है गई रात आहटों का सितम
वो शख़्स घर पै सरे-शाम क्यों नहीं आता

और आख़िरी शेर है बुआ कि :
अजीब दर्दे-मुहब्बत भी शै है क्या 'कृष्ण'
दवाएँ लेता हूँ आराम क्यों नहीं आता
हमारे सामने अंजाम क्यों नहीं आता
वो चाँद खुलके लबे-बाम क्यों नहीं आता!
"
"वाह, जीता रह बेटा।" ग़ज़ल पूरी होते-होते बुआ की अधमुँदी आँखों के कोरों में बूँदें झिलमिलाने लगीं। एक झटके में कमला बुआ सदियों पीछे लौट गई।

कुछ देर पहले तक महफ़िल लूटनेवाले होंठों पर भी वैद्यजी यानी घनश्याम 'कृष्ण' की ग़ज़ल के अशआर ने क़ब्ज़ा कर लिया।
"भई मुद्दत हो गई थी अच्छी शायरी सुने। कान तरस गए थे रे बेटे तूने आज तबियत खुश कर दी। तूने आज बुआ की महफ़िल लूट ली। वैसे यह बता, यह शौक कैसे पाल लिया?" रिटायर्ड एसएसपी राठौर की सारी ख़ुमारी उतर गई।
"ओ यार, तू सक्ल से तो दीखता नईं कि तू ये धंधा भी करता होगा।" नए-नए शेयर दलाल और राज्य सचिवालय-कैंटीन के ठेकेदार आहूजा ने व्यंग्य से कहा। धंधा से उसका आशय वैद्यजी की शेर-ओ-शायरी से था।
वैद्यजी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।
"कमला, अब तो याद आ गया होगा, या अभी कुछ और सुनवाया जाए?" इससे पहले कि आहूजा की तरह कोई टिप्पणी करता एसएसपी राठौर ने महफ़िल को समापन की ओ धकियाते हुए कहा।
"कप्तान साब, ठुमरी-टप्पा तो ना, एक दादरा-से के बोल याद आ रहे हैं।"
"दादरा-से के नहीं, यह कह कि दादरा के।" एसएसपी राठौर अपनी जगह मुस्तैद होते हुए बोला।
इसके बाद बुआ ने आँखें मूँद सुर लगाते हुए गला ठीक किया, और एक खनकती महीन आवाज़ ब्रह्म मुहूर्त के ठंडे सन्नाटे में घुलने लगी :
ओ बेदर्दी सुपने में आ जा
कुछ तो बिपतिया कम होई जाए
हम ही ना जानियो साजन
नैना के मिलकै जुलुम होई जाए
चाँद गगन से झाँके मोहे
पापी दुनिया ताने देवे
खुलके कहूँ तो होए रूसवाइ
चुप माँ जियरा भसम होई जाए
ओ बेदर्दी सुपने में आ जा
कुछ तो बिपतिया कम....।

दादरा ख़त्म होते लगा जैसे आकाश में छितरे तारों का झुंड उतरकर कमला बुआ का दादरा सुनने के लिए छत की मुँडेर पर आ बैठा है। खुले आकाश से झरती ओस की बूँदें भी थोड़ी देर के लिए जहाँ थीं, वहीं ठहर गईं। बैशाख के शुक्ल पक्ष की तीसरी रात के थके-माँदे अन्तिम पहर का तिमिर तथा पौ फटने से पहले का कुनमुनाता उजास भी अपने-आपको दादरा की पंक्तियों को बुआ के संग-संग गुनगुनाने से नहीं रोक पाया।

मान गई पूरी गाजूकी कि कमला बुआ ने कितने ठसके से इज़्ज़तदारों का दिल जीत लिया। यहाँ तक कि तारा, सलमा और ज्योति को भी उम्मीद नहीं थी कि ऐसी महफ़िल जमेगी। इसलिए इनकी बिदाई के समय बुआ ने पूरा दिल खोल दिया। सब हतप्रभ रह गए थोड़ी देर के लिए। आख़िर सलमा ने अचकचाते हुए प्रतिवाद किया।
"यह क्या है बुआ? "
"छोटी-सी बिदाई है मेरी तरफ से।"
"बुआ, अगर महफ़िल में आई सारी चढ़ाई ऐसे ही बिदाई में बाँट देगी, तो बेटीवालों के लिए क्या बचेगा?" तारा ने सलमा का साथ देते हुए कहा।
"तुम इसकी चिन्ता मत करो। माना गुरू ने खूब दिया है।"
"पर बुआ हम तो बस-किराए की ठहर पर आई हैं।" सलमा ने याद दिलाते हुए कहा।
"सब पता है मुझे पर बेटी यह बिदाई मैं अपनी खुशी से दे रही हूँ। मेरी तरफ से मान है यह तुम्हारा।"
"यह ठीक है, पर मान भी तो मान की तरह होना चाहिए।" सलमा नाराज़गी जताते हुए बोली।
"और कैसा होता है मान?" काफ़ी देर से चुप सुशीला ने हस्तक्षेप करते हुए पूछा।
"ना मौसी, हम तो उतना ही लेंगी, जितनी ठहर हुई है।" ज्योति ने दृढ़ता के साथ कहा।
"चलो, तुम इसे तौहीन मानके ही रख लो!"
"बुआ, ऐसा ना होगा...चाहे बुरा मान, या भला मान।" तारा ने कमला बुआ द्वारा पकड़ी गई दस हजार की गड्डी को छूने तक क़सम खा ली जैसे।
"सलमा, तुझे मेरी कसम...तुम सब मेरी मरी का मुँह देखो जो...।"
सलमा लपककर कमला बुआ से लिपट गई, "बुआ, ऐसे कुबोल मत बोल। इस गड्डी की कीमत हमारी बुआ से ज्यादा थोड़े ही है।" बुआ के गले में सलमा की बाँहों का घेरा सख़्त हो गया।
सलमा को बुआ से गड्डी लेता देख, तारा और ज्योति तमतमा उठीं। देख लिया सलमा ने। बाँच गई उन दोनों के चेहरों पर लिखी नाराज़ इबारत को। वह उस गड्डी को ऐसे गिनने लगी मानो वह यह तसल्ली करना चाह रही है कि गड्डी में नोट पूरे भी हैं, या नहीं।
पूरी तसल्ली होने के बाद सलमा ने उसमें से पाँच नोट अलग किए और बाकी बचे नोटों को बुआ की ओर बढ़ा दिया। "मरी, यह क्या किया तूने?"
"बुआ, अब तू भी हमारा मान रख ले।" हँसते हुए जवाब दिया सलमा ने।
चेहरे खिल उठे तारा और ज्योति के। कमला बुआ से ही हुआ उन तीनों का प्रतिवाद।
"बुआ, एक बात बता सच्ची-सच्ची...तू महफ़िल से खुश तो है न?" तारा ने सहजता से पूछा।
"अगर अब भी ना होगी तो कब होगी। पता है पूरे तीस हजार की चढ़ाई आई है।" बुआ के बजाय हुलसते हुए जवाब सुशीला ने दिया।
"चलो, बेटीवाले भी खुश हो जाएँगे चढ़ाई में इतनी मोटी रकम पाकर।"
सलमा, जिसकी नीयत ही ठीक नाहो, वह क्या खुश होगा।" बुआ का इशारा मंगल की सगाई के समय हुए विवाद की ओर था।
"छोड़ बुआ, तुझे कौन-सा रोज-रोज जाना है...अच्छा, चलते हैं बुआ। अब तुम अपने जँवाइयों के बिदा करो।" तारा ने गाजूकी से जाने की इजाज़त लेते हुए कहा।
"ठीक है बेटी, माना गुरू तुम्हारे धंधे में ऐसी ही बरकत बनाए रक्खे।" कहते-कहते बुआ की आँखे भर आईं। कुछ क्षणों के लिए आत्मीयता का ठहरा हुआ पानी काँपकर रह गया।

10 comments:

  1. अच्छा उपन्यास अंश है। मोरवाल जी को रेत उपन्यास और इसके लिये मिले सम्मानों की बधाई।

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  2. Nice presentation. Congrats.

    Alok Kataria

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  3. उपन्यास अंश रोचक है। सम्मान के लिये बधाई।

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  4. गुणवत्ता को सम्मान मिलना स्वाभाविक है। बहुत अच्छी प्रस्तुति है।

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  5. प्रभावी उपन्यास अंश है, बधाई।

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  6. Rakesh Tyagi
    Morwal ka naam samkaalin katha sahitya mein aaj star upanyaskaron mein gina jata hai. Mewat (Haryana)ke is gorav ko lagatar mil rahe samman/puraskaro ne morwal ka nahi apana gorav badhaya hai.

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  7. मोरवाल जी रोचक अंश है और आपकी शैली पठनीय। समां बाँध दिया।

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  8. बधाई मोरवाल जी। आपके उपन्यास का चर्चा में रहना ही सिद्ध करता है कि आप अपनी बात कह पाने में सफल हुए हैं।

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साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
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