सुबह जैसे ही उसकी नींद खुलती थी वह सबसे पहले खिड़की खोल कर परदों को हटा देती थी.यह उसकी पुरानी आदत थी.सुबह की स्वच्छ हवा उसके अन्दर अद्भुत तरंग भर देती थी और सुनहरी धूप में तो वह नहा लेना चाहती थी. हाँ,वर्षा ऋतु में बादल और शरद ऋतु में कुहासा उसे प्रकृति की इस अमूल्य निधि से वंचित कर देते थे. वह हमेशा कहा करती -"ओह! यदि मेरा वश चलता तो सुबह के एक- एक पल को संचित कर के रख लेती".

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:- किरण सिन्धु, उत्तर प्रदेश की मूल निवासी हैं। आपकी शिक्षा झारखण्ड में तथा विवाह बिहार में हुआ। वर्तमान में आप मुंबई में अवस्थित हैं। आपको परिवार और परिवेश में बचपन से ही साहित्य प्रेम का भरपूर अवसर प्राप्त हुआ। श्रधेय गुरुजनों की कृपा से जो भी ज्ञानार्जन हुआ उसके सहारे अध्यापन के क्षेत्र में २५ वर्षों तक सुदृढ़ रूप से खड़ी रही। हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति किशोरावस्था से ही प्रेम रहा है.

अपने नए आवास में आये हुए उसे लगभग एक महीना हो चुका था. चारो तरफ ऊँची-ऊँची इमारतें और प्रत्येक इमारत को जोड़ती हुई एक सड़क. अपनी आदत के अनुसार वह सुबह-सुबह खिड़की के पास आकर खड़ी हो गयी. आज रविवार था और उसे कार्यालय जाने की भाग-दौड़ से फुर्सत थी. खिड़की के बाहर देखते-देखते उसकी नजर एक जगह जाकर ठहर गयी. उसके शयन-कक्ष के ठीक सामने कुछ दूरी पर एक बड़ा सा कूड़ा-दान रखवाया गया था.अभी दो दिन पहले सोसाइटी वालों ने वह कूड़ा-दान वहाँ रखवाया था. यद्यपि वह कूड़ा-दान सड़क के किनारे था और उसका फ्लैट तीसरी मंजिल पर, फिर भी कूड़े-दान पर दृष्टि पड़ते ही उसका मन विषाद से भर गया. स्नान करने के बाद वह बालकनी में आकर बैठ गयी. घर में बस दो ही सदस्य थे, एक वह और दूसरा उसका नौकर 'बंधु'. उसके पति सरकारी काम से दौरे पर गए थे और बच्चे हॉस्टल में रहते थे. खाली समय में या तो वह बालकनी में बैठती या अपने अध्ययन- कक्ष में. अभी बंधु उसके लिए कॉफी बना रहा था. बालकनी में बैठते ही उसकी नजर पुनः कूड़े-दान पर पडी. वहाँ उसे कुछ लोग खड़े दिखाई दिए. कुछ शंका, कुछ जिज्ञासावश वह पुकार उठी--

"बंधु, ओ बंधु"
" जी दीदी जी" हाथ में कॉफी का कप लिए बंधु बालकनी में आ गया.
"वहाँ देख तो भीड़ क्यों है?" उसने कूड़े - दान की तरफ इशारा करते हुए कहा.
"अरे दीदी जी भीड़ नहीं है, वे कचरा वाले लोग हैं"
"कचरा वाले लोग...क्या मतलब?"
"वे लोग कचरे में से अपने मतलब की चीजें छाँट कर निकाल लेते हैं."
"तेरा दिमाग तो ठीक है? कचरे में भला उनके मतलब की कौन सी चीजें होंगी?"
"दीदी जी होती हैं न,जैसे प्लास्टिक की थैलियाँ, फ्यूज बल्ब, काँच के टुकड़े, बैटरी, गत्ते वगैरह."
"इतने लोग क्या कर रहे हैं? और वे बच्चे इतनी गन्दगी में क्यों खड़े हैं?"
"दीदी जी, वे सभी एक ही परिवार के हैं, दो बजे दिन तक वहीं रहते हैं."

जिज्ञासावश वह पुनः उनको देखने लगी. एक औरत कूड़े - दान के अन्दर प्रवेश कर कचरे के ऊपर चहलकदमी कर रही थी. अपनी साड़ी को उसने घुटने तक उठा कर बाँध रखा था.

दोनों पैरों से बारी - बारी कर कचरे की ढेर को दबाने का प्रयास कर रही थी,जिससे कि उसमें और कचरा डाला जा सके. ना जाने कैसे- कैसे भाव उसके मन में उठने लगे. वह अपने अध्ययन- कक्ष में आकर बैठ गयी. यह दृश्य जैसे उसके होशो- हवास पर छा गया था.

अगले दिन उससे रहा नहीं गया. सुबह दस बजे वह उस कूड़े- दान के पास पहुँच गयी. आठ - दस लोग उस कूड़े- दान को घेरे हुए थे. सक्रिय लोगों में दो अधेड़ महिलायें, एक वृद्धा, तीन बच्चे और दो पुरुष थे. सभी के हाथों में एक- एक बोरियाँ थीं. आस- पास की बिल्डिंग के सफाई-कर्मी बारी- बारी से पहियों वाले कंटेनर में कचरा भर कर लाते और उस कूड़े - दान में उलट देते. उन्हें पास आता देख कूड़े- दान के पास खड़े लोगों की आँखों में चमक सी आ जाती. परिवार का प्रत्येक सदस्य हरकत में आ जाता. अपनी- अपनी बोरियों के साथ तैयार! पता नहीं किस कंटेनर में किसके हिस्से का धन मिल जाए.दोनों महिलायें कूडेदान में से "अपने मतलब का सामान" छाँट- छाँट कर नीचे फेंकती जाती और अलग - अलग बोरियों में वे सामान तीव्र गति से भरे जाने लगते. हाथों से कचरे को उलटती- पलटती दोनों महिलाओं के चहरे पर घृणा के कोई लक्षण नहीं थे. उससे रहा नहीं गया तो उसने पूछ ही लिया---
"ए सुनो, तुम लोगों को घिन्न नहीं आती?"

एक क्षण के लिए उसकी तरफ देख कर वे पुनः अपने काम में लग गयीं. उसने अपनी आवाज ऊँची कर के कहा----
"सुनो, मैं तुम्हीं लोगों से बात कर रही हूँ, इस कचरे को उलट- पलट करते हुए तुम्हें घिन्न नहीं आती?"
"क्या बोलती बाई? घिन्न करेगी तो खायेगी कहाँ से?"
"मतलब? इस कचरे का तुम्हारे खाने से क्या सम्बन्ध है?"
"देखती नहीं क्या? ये सारा सामान अपन लोग बाजार में बेचेगा तभी तो राशन आयेगा न?"
"लेकिन इस गन्दगी में रहने के कारण तुम लोगों को भयंकर बिमारियाँ हो सकती हैं."
हाथ पर रेंगते हुए कीडे को झाड़ कर उसने कहा ---"भूख से भी बढ़ कर कोई बिमारी होती है क्या?" अजीब सी मुस्कराहट के साथ उसने कुछ रुक कर कहा---"अपुन लोग का जिन्दगी इसी माफिक चलता है."

वह मन ही मन सोंचने लगी, शायद ऐसी ही स्थिति को मनीषियों ने "विषस्य विषौषधम्" कहा है. मनुष्य की जीजीविषा उससे क्या- क्या नहीं करवाती है!

9 comments:

  1. बेहद संवेदनशील लघुकथा है किरण जी। जिजीविषा शीर्षक भी सटीक है।

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  2. भूख से भी बढ़कर कोई बीमारी होती है क्या ...आपकी संवेदना मन को छू गयी...!! बहुत बढ़िया ..!!

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  3. मन भारी हो गया गहरी और सधी हुई लघुकथा है।

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  4. शायद ऐसी ही स्थिति को मनीषियों ने "विषस्य विषौषधम्" कहा है. मनुष्य की जीजीविषा उससे क्या- क्या नहीं करवाती है!

    सही कहा आपनें।

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