धम…धड़ाम…. आह….हाय…..राम……..


रचनाकार परिचय:-

30 जून, 1967 को रामपुर (उ०प्र०) में जन्मे और हाथरस में पले-बढ़े शक्ति प्रकाश वर्तमान में आगरा में रेलवे में अवर अभियंता के रूप में कार्यरत हैं। हास्य-व्यंग्य में आपकी विशेष रूचि है। दो व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित भी करा चुके हैं। इसके अतिरिक्त कहानियाँ, कवितायें और गज़लें भी लिखते हैं।

कुछ चीख पुकार, सहायता की आवाजें, शोरोगुल, धरती का हिलना; फिर धीरे धीरे सब शान्त हो गया। अर्धचैतन्य अवस्था में उसने महसूस किया कि वो शायद इमारतों के गिरने की आवाजें थीं, पर उसे विश्चास था कि उसका मकान नहीं गिर सकता। अध्यापक पिता ने बड़ी जीदारी से सीमेन्ट लगवाया था। अपने हाथों से तराई की थी। इंजीनियर भाई ने स्लैब बीम और कॉलम खुद डिजाइन किये थे जिसमें सेफटी फैक्टर सामान्य से दोगुना लिया था। उसका मकान, नहीं बॅगला; हॉ बॅगला, पिताजी के लिये बॅगला ही था। जिन्दगी भर किराये के मकान में रहने वाले रिटायर पिता के दो बेटे जब इंजीनियर हो गये तो उन्हें बॅगला बनाने की धुन सवार हो गई थी और उसके लिये बेटों पर जायज नाजायज दवाब भी डालते थे। ये दवाब इस हद तक था कि दोनों बड़े बेटे पिता के बीमार पड़ने की सूरत में उन्हें दवा खुद खरीदकर दे जाते थे क्योंकि उन्हें शक था कि अगर पिताजी को नकद रकम दे दी गई तो अपनी धुन के चलते दवा के पैसे भी बॅगले में लगा देंगे। इसके बावजूद भी बेटे पिता की इस धुन को नहीं रोक पाते थे और दूध पीने के लिये जो पैसे बड़ा बेटा देकर जाता उसका पेन्ट खरीद लाते भले ही उतने पेन्ट से किचन ही पुत पाये। बहरहाल उस मकान को अपना पेट और बेटों की गॉठ काटकर पिताजी ने बॅगला बना ही दिया था और इतना मजबूत बना दिया था कि बिना डायनामाइट के नहीं गिर सकता था।

अपना मकान नहीं गिर सकता और धरती तो भॉग खाने के बाद ऐसे भी हिलती है; उसने नींद में सोचा|

वो रूपेश था। एक पढ़ा लिखा बेरोजगार। बेरोजगारी हालॉकि उसकी भी परेशानी थी पर उससे ज्यादा उसके पिताजी और पड़ोसियों की भी, दोनों बड़े भाई इंजीनियर बस वही फिसडडी बेरोजगार। ऐसा नहीं था कि वो अपने भाइयों से दिमाग में बहुत कम था, दरअसल उसके अंदर वो नहीं था जो पिताजी चाहते थे। वो कविता लिखना चाहता था। कहानी लिखना चाहता था। क्रिकेट भी खेलना चाहता था। पर पिताजी उसे इंजीनियर बनाने पर तुले थे। नतीजतन वो न इंजीनियर बन पाया न कवि और न ही क्रिकेटर। भाइयों के इंजीनियर होने के गुमान में कम पैसों की प्राइवेट नौकरी उससे होती न थी। बहरहाल हालिया तौर पर वो बेरोजगार था तो था और पिताजी का टेन्शन कम करने के लिये उसने अच्छा तरीका खोजा था। वो पूरा दिन घर से गायब रहता और रात को जब पिताजी सो जाते तो करीब बारह बजे घर में घुसता। मॉ उसकी चारपाई बाहर बिछा देती। खूँटी से खाना लटका देती। वह आता और खा पीकर सो जाता। सुबह पिताजी को यही पता चलता कि बेटा उनके सोने के तुरन्त बाद ही आ गया था। बेरोजगारी के पिछले चार साल उसने इसी तरह काटे थे। इसमें उसका साथ दिया उसके जिगरी यार देवेश ने जो महीने में दस बारह दिन उसके लिये शराब का इंतजाम कर ही देता था। जिस दिन शराब न होती दोनों यार पचास पचास पैसे की भॉग खाते और मस्त हो कर कहकहे लगाते। उस रात भी यही हुआ था वह भॉग खाकर ही सोया था पर धूम धड़ाम की आवाजों ने उसे चौंका दिया। उसने करवट ली तो उसका हाथ किसी कड़ी चीज से टकराया। उसने टटोलकर आँखें खोलीं तो अपने पर कंक्रीट की मोटी आड़ी परत को ढॅका हुआ पाया। उसने खुद को संयत किया और नीचे से निकलने की कोशिश की। जैसे तैसे निकला तो पता चला कि वह बॅगले का डिजाइनदार पोर्च था जो पिताजी ने बड़ी हसरतों से बनवाया था ताकि उनका बॅगला कॉलौनी में सबसे अलग दिखे। उसने चारों ओर देखा सारे मकान गिरे पड़े थे। चारों ओर मलवा ही मलवा था। उसे मॉ पिताजी की चिन्ता हुई। उसने आवाज लगाई-
मॉ! पिताजी!”
कोई उत्तर नहीं मिला। कंक्रीट के मलवे में झॉक पाना उसके लिये संभव नहीं था। उसने सामने वाले मकान की ओर आवाज लगाई-
संजय! वकील साहब।
कोई आवाज नहीं आई। वह गिरी हुई बाउन्ड्री के मलवे को फॉदकर बाहर आया। कालौनी के हर घर पर उसने आवाज लगाई। कोई उत्तर नहीं मिला। वह वापस लौट आया और घर के बाहर पत्थर पर बैठ गया।
”इसका मतलब पूरी कालौनी या पूरा शहर या पूरा देश या पूरी दुनिया… नहीं ऐसा कैसे हो सकता है। पाकिस्तान से तनातनी तो है पर एकदम एटमबम… एटमबम से तो मैं भी नहीं बचता। नहीं वो नहीं है ये, ये कुछ और ही है।“ वह बड़बड़ाया
हू…हू… करके कॉलोनी के सारे कुत्ते उसके पास आकर रोये जो शायद जीवन को तलाशते हुए उस तक आये थे।
शुक्र है जीवन शेष है कॉलोनी में; चाहे वो कुत्ते हों। मतलब कहीं शहर में इंसान भी मेरी तरह जिन्दा हो सकते हैं। उसने सोचा।
उसने घर की ओर निगाह मारी। उसे मॉ याद आने लगी। कितनी अच्छी थी उसकी मॉ। बेरोजगारी के चार साल मॉ और देवेश ने ही कटवाये थे वरना पिताजी तो उसके पचासियों नामकरण कर चुके थे-‘परजीवी, आलसी, रिश्तेदार, पिताजी, फूफाजी, वगैरा वगैरा। बुरे वो भी नहीं थे, बस अपनी उम्मीदों को उसमें तलाशते थे। लेकिन मॉ वाकई उसी की मॉ थी। तीनों बेटों में उसी को सबसे ज्यादा चाहती थी। पिताजी जब उसे कुछ कहते तो बीच में आकर खुद चार गालियॉ सुनती और उसे फरार होने का मौका दे देती। और वो… वो हमेशा मॉ के साथ छोटों जैसा व्यवहार करता। मॉ जब उसे खाना खिलाती तो हाथ में रोटियॉ लेकर बैठी रहती और अंतिम टुकड़ा खत्म होने से पहले थाली में रोटी ऐसे रखती जैसे चोरी कर रही हो। पेट भर जाने पर मॉ रोटी रखती तो वह गुर्राता-
दानव समझ रखा है क्या?
खा ले बेटा पता नहीं कब लौटे। मॉ ऐसा महसूस करती जैसे रोटियॉ उसके पेट में जा रही हो।

सचमुच बहुत बुरा था मैं! काश मुझे एक मौका मिल पाता। मैंने बहुत सताया मेरी मॉ को। वह फूट फूटकर रोने लगा।
हू…हू….. पास में खड़े कुत्ते उसके साथ हमदर्दी जताते हुए सुर में सुर मिलाने लगे उसे लगा कुत्ते शायद उसका मजाक उड़ा रहे हैं। उसने पत्थर उठाकर फेंका -
चोप्प सालों……
कुत्ते भाग गये लेकिन उसकी भावुकता को भंग कर गये। वह समझने की कोशिश करने लगा कि ये हुआ क्या है। शायद सरकारी राहत आने पर पता चले और हॉ उसके भाई तो दूसरे शहरों में है। वे तो जरूर खबर लेंगे। पर वहॉ भी यही हुआ हो तब… नहीं ऐसा नहीं हो सकता। क्यों नहीं हो सकता, प्रलय ऐसी ही होती है। पिछली प्रलय के बाद संसार में सिर्फ मनु ही बचे थे। हो सकता है पूरी दुनिया में अकेला वही बचा हो यानी स्वयंभू मनु द्वितीय… द्वितीय क्यों, प्रथम और अंतिम। अब सभ्यता फिर से शुरू होगी। तब किसको पता कि मनु प्रथम भी थे, यानी अब वही मनु था, वही आदम, वही ईसा, वही मूसा, वही मुहम्मद, वही बुद्ध, वही महावीर, वही राम, वही श्याम। यानी दुनिया का इतिहास, परंपरा, नीति, संस्कृति सब उसके मुहताज थे। यानी अब सबसे बड़ी ताकत था वह। वो दुनिया जिसे पाने के लिये रूस और अमेरिका कुत्तों की तरह लड़ते थे, उस दुनिया का सारा साम्राज्य उसका था। लेकिन ये साम्राज्य भला अब उसके किस काम का। वह इतिहास लिखेगा तो पढ़ेगा कौन, नीति बनाये तो उस पर चलेगा कौन, शासन करे तो गली के इन पॉच कुत्तों पर। यानी अमेरिका और रूस तो वाकई बड़े वाले चूतिये थे।

क्या साला भॅग में भी क्या क्या सूझता है, मनु, आदम, ईसा, मुहम्मद, अमेरिका, रूस। पुराने मुहल्ले में शायद कोई बचा हो। लेकिन बीच में थाना पड़ता है। रात के दो से कम का वक्त नहीं है। पर अब साले थाने कोतवाली से क्या डरना। क्या गारंटी है वहॉ कोई बचा हो- वह बड़बड़ाया

वह चल दिया रास्ते में मलवे के ढेर ही दिख रहे थे। न इंसान न इंसान की जात। रोते हुए कुत्ते, गिरे हुए मकान, मैदान ही मैदान। वह बिटुमिन की दरार पड़ी काली सड़क से ही रास्तों को पहचान रहा था ।

यहॉ पंडित पनवाड़ी की दूकान थी- वह बुदबुदाया। उसका हाथ आदतन माथे तक गया और वापस नीचे आ गया। वह जब भी यहॉ से निकलता पंडित दूर से ही चिल्लाता,‘”रूपेश भइया राम राम!” वह इसी तरह माथे तक हाथ ले जाकर जवाब दिया करता।

वह आगे बढ़ा। पुलिस थाने का पोस्टकार्ड कलर का मलवा और सत्य मेव जयते का बोर्ड जता रहा था कि यहॉ कभी थाना था। रात के वक्त थाने के सामने से निकलना अक्सर ही खतरनाक होता है। कम से कम दो चार गालियॉ तो सुनना ही पड़ती हैं। एक बार उसे भी मुच्छड़ सिपाही ने गालियॉ दी थीं तबसे वह भी बदले की फिराक में था कि कभी अॅधेरे उजाले में वह मुच्छड़ मिले और वह उसका सर फोड़कर भाग जाये ।

कोई है….. उसने आवाज लगाई

कोई उत्तर नहीं मिला। उसने प्रतिशोध स्वरूप थाने के मलवे पर पेशाब किया और आगे चल दिया।
ये डिग्री कालेज, ये रेलवे क्रासिंग और ये शहर का दिल सेन्टर पाइन्ट। इसे कुछ लोग कनॉट प्लेस आफ सिटी भी बोलते थे। यहॉ हर समय भीड़ रहती थी, अधिकतर लड़कियों की। स्कूल कॉलेज जाने वाली, सौन्दर्य प्रसाधन खरीदने वाली, कपड़े खरीदने वाली। हालॉकि वह शोहदा नहीं था पर अक्सर किसी खूबसूरत लड़की को देख कर कहता-
अपना शहर कितना खूबसूरत है।
जवाब मिलता-
बदतमीज!
वह मुस्कराता और बढ़ लेता। उसका दिल बदतमीज सुनना चाहता था पर न वहॉ स्कूल था, ना कॉलेज, न दूकानें। मलवा और सिर्फ मलवा। रामलीला मैदान से होता हुआ वह घंटाघर तक आया। यहॉ रास्ते तंग होने के कारण बहुत भीड़ हो जाती थी और अक्सर उसकी साइकिल के आगे एकाध बच्चा आ जाता और वह देश की आबादी को जी भर कोसता।
'सिर्फ बच्चे ही पैदा होते हैं इस मुल्क में। यही उत्पादन है हिन्दुस्तान का।'
वह चाहता था कि कोई बच्चा उससे आकर टकराये और वो बजाय उसके पूर्वजों को कोसने के उसे गले से लगा ले, लेकिन वहॉ भी कोई बच्चा नहीं था। घंटाघर की मीनार गिरी पड़ी थी जिसकी घड़ी की सुई एक पैंतीस पर अटकी थीं। मतलब प्रलय या जो भी था, एक पैंतीस पर आया था। अगर कोई इंसान सामने होता तो घटना के वक्त को लेकर ही घंटे भर बहस हो सकती थी। पर अब इस आँकड़े को वह किसे बताये। वह आगे बढ़ा।

घास मंडी, चौबे की चाय की दूकान। यहीं रोजाना उसका जिगरी यार देवेश सुबह मिला करता था और दूर से रूपेश को आता देख चाय का आर्डर देता। रूपेश के नजदीक आने पर ही सायास उसे जूठी करता और रूपेश जबरन उससे छीनकर चाय पीता। कितना मजा आता था देवेश की जूठी चाय में-- उसने सोचा
सामने देवेश का घर था लेकिन अब वहॉ सिर्फ मलवा था। उसने आवाज लगाई-
देवेश…..!
कोई उत्तर नहीं मिला। मतलब देवेश भी नहीं। वह अपने पुराने मुहल्ले की ओर बढ़ा, जहॉ सालों अपने मास्टर पिता के साथ वो लोग किराये से रहे थे। गरीबों की बस्ती, बचपन की दोस्ती, लड़कपन की यादें सब कुछ था वहॉ।
यहॉ अपना कमरा था। ये बल्लोमल का। बल्लोमल की चुलबुली लड़कियॉ, पूरे मुहल्ले के लड़कों को नचाये रखने वाली। आज एक तो कल दूसरा, कल क्यों एक ही वक्त में तीन तीन अफेयर चलाने वालीं। रूपेश को कभी पसंद नहीं रहीं। ये बाबू दडि़यल का मकान था। रूपेश बाबू को फूटी आँख नहीं सुहाता था क्योंकि रूपेश होली पर उसके घर में कीचड़ फेंककर, दिवाली पर पटाखे फोड़कर परेशान करता था। बदले में दडि़यल रूपेश या उसके भाइयों के परीक्षा काल में लाउड स्पीकर पर भजन चलाता था। पर वहॉ कुछ न था। न बल्लोमल, न उसकी लड़कियॉ, न बाबू दडि़यल, न उसका लाउड स्पीकर।

यहॉ शोभा का मकान था। जिसके साथ उसका चक्कर दो तीन साल चला था। उसे याद आया कि जब भी वह शोभा के मॉ बाप की गैर मौजूदगी में रात को उससे मिलने जाता तो सिर्फ फुसफुसाने पर दरवाजा खुल जाता था। आदतन वह मलवे के पास जाकर फुसफुसाया-
श…श….शोभा!
उसे अपनी बेवकूफी पर आश्चर्य हुआ।
अब साला किसका डर। शोभा……. वह जोरों से चिल्लाया।
कोई उत्तर नहीं मिला।
मतलब वो भी नहीं। मॉ, पिताजी, भइया, दीदी, शोभा, देवेश कोई भी नहीं। ये क्या, कोई भी नहीं पंडित पनवाड़ी, मुच्छड़ सिपाही, बदतमीज कहने वाली लड़कियॉ, घंटाघर के सरप्लस बच्चे, बल्लोमल, उसकी लड़कियॉ, बाबू दडि़यल कोई भी तो नहीं।
हालॉकि अब उसे नौकरी नहीं ढॅूढना थी। कम्पटीशन की तैयारी नहीं करना थी। बेरोजगारी को शराब या भॉग में नहीं डुबोना था। उसे पाकिस्तान से दुश्मनी की फिक्र नहीं थी। अमेरिका ईराक युद्ध की आशंका नहीं रखना थी। वह बेरोक टोक कहीं भी जा सकता था। कुछ भी कह सकता था। कुछ भी कर सकता था। अपनी प्रशंसा में ग्रन्थ लिख सकता था। खुद को स्वयंभू मनु या बाबा आदम घोषित कर सकता था। दुनिया की सारी जमीन उसकी थी। हर चीज उसकी थी पर वह यह सब नहीं चाहता था। वह चाहता था कुछ अदद इंसान, जो उससे बात कर सकें; प्यार कर सकें; बहस कर सकें; मतभेद भी रख सकें; लड़ सकें; झगड़ सकें। कुछ अच्छाई, कुछ बुराई; यही तो जीवन है। जीवन इतना बुरा तो कभी नहीं होता कि एक साथ पूरी दुनिया से खत्म कर दिया जाय। मॉ, पिताजी, भइया, दीदी, शोभा, देवेश कोई तो हो। ये नहीं तो पंडित पनवाड़ी, मुच्छड़ सिपाही, बदतमीज कहने वाली लड़कियॉ, घंटाघर के सरप्लस बच्चे, बल्लोमल, उसकी लड़कियॉ, बाबू दडि़यल कोई तो हो। उसे इंसानों की कीमत पर दुनिया की बादशाहत मंजूर न थी। उसने दोनों हाथ आसमान की ओर फैलाये और चिल्लाया-
मुझे मनु की पदवी नहीं चाहिये। मुझे इंसान चाहिये, कुछ अदद इंसान।
तभी मॉ की आवाज आई-
क्या बड़बड़ाता है रे!
वह खुशी से चीखा-
मॉ……..
हॉ रे! मॉ ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा। उसने देखा सुबह हो चुकी थी। वह बिस्तर पर था। मॉ प्यार से उसे देख रही थी।
डर गया सपने में मेरा बच्चा! मॉ ने बुदबुदाते हुए चप्पल को सिर से पैर तक उसके चारों ओर घुमाया। दरवाजे के बाहर जाकर चप्पल पर थूका और जोर जोर से तीन चार बार जमीन में मारा।
रूपेश को अहसास हुआ कि ये सब रात की भॉग की तरंग थी। बहरहाल वह एक भयानक सपने से निकल चुका था। लेकिन सपने में ही सही, उसने जो सोचा वो इंसानियत के लिये वाजिब था। ये सपने सभी देशों के हुक्मरानों को क्यों नहीं आते। क्यों लड़ते हैं लोग ताकत के लिये; क्यों लड़ते हैं देश जमीनों के लिये? इंसानों की कीमत पर लोग क्यों जमीन पाना चाहते हैं, ताकत पाना चाहते हैं? क्यों गरीब की रोटी को बारूद पर खर्च करते हैं देश? - उसने सोचा।
वह तैयार हुआ। मॉ के हाथ से खाना खाया और अतिरिक्त रोटी खिलाने पर आज उसने मॉ को टोका भी नहीं तो मॉ की हिम्मत बढ़ गई-
एक बात कहूँ, बुरा तो नहीं मानेगा।
हॉ मॉ बोल। -वह मुस्कराकर बोला।
अब काम नहीं होता। बहू ला दे।
मॉ पहले नौकरी…..
भाड़ में गई नौकरी। तीन बेटे पैदा किये। एक भी पास न रहेगा क्या? यहीं कोई दूकान खोल ले।
मगर दूकान के लिये पैसा…
तेरे बाप इस ताजमहल के लिये लड़कों से मॉग सकते हैं तो मैं तेरी दुकान के लिये मॉगू तो तेरे भाई मना करेंगे क्या?
तेरी मर्जी! अब चलूँ। -उसने मॉ के झुर्रीदार गाल को सहलाया।
वह साइकिल लेकर निकला। आज पंडित पनवाड़ी के बोलने से पहले ही उसने कहा-
पंडित जी राम राम!
राम राम रूपेश भइया! -पंडित दूनी ताकत से चिल्लाया।
वह मुस्कराकर आगे बढ़ा। थाने के सामने निकलते हुए निगाहों से उसने उस जगह को तलाशने की कोशिश की जहॉ सपने में उसने मूता था। उसे मुच्छड़ सिपाही दिखाई दिया जिसे देखकर वह मन ही मन गाली देता निकलता था। उसी की ओर देखकर वह मुस्कराया और बोला-
दीवान जी राम राम!
सिपाही ने भी हाथ हिलाया।
राम राम!
कितना आसान है दुश्मनी खत्म करना - उसने सोचा
वह सेन्टर पाइन्ट से गुजरा। एक खूबसूरत लड़की को देखकर उसने कहा-
अपना शहर कितना खूबसूरत है!
और लड़के कितने बदमाश हैं! हाजिर जवाब लड़की ने भी मुस्कराकर कहा।
मजा आ गया। वह हॅसा और आगे चल दिया।

घंटाघर के रास्ते में उसके सामने एक बच्चा आ गया और गिर पड़ा। उसने साइकिल रोकी, बच्चे को उठाकर खड़ा किया, उसका गाल चूमा और साइकिल लेकर आगे चल दिया।
वह घास की मंडी में चौबे की दूकान पर पहुँचा। देवेश ने उसे देखकर चाय की चुस्की ली।
छोड़ बे पूरी पी जायेगा क्या? उसने चाय का गिलास छीना।
देवेश ने चाय छोड़ दी।
आज चाय कुछ अच्छी है। - रूपेश बोला।
चाय तो वैसी ही है, जैसी रोज होती है।
शायद, पर आज मैं अलग हूँ। ये दुनिया अलग है। इसलिये चाय भी अलग है।
आज वैलेन्टाइन डे भी नहीं, हुआ क्या आज?
बताता हूँ। जरा शोभा को देख आऊँ।
शोभा! वो चक्कर तो साल भर पहले खत्म हो गया था ना!
हॉ, पर कल रात से फिर शुरू हो गया।
अबे कल रात पौने बारह बजे तक तो तू मेरे साथ था।
‘लौटकर….लौटकर….. उसने चाय का गिलास रखा, मुस्कराया और शोभा की ओर चल दिया।

13 comments:

  1. शक्तिप्रकाश जी आपकी कहानी मन को मंथन करने पर मजबूर कर देती है। हाल में इतनी कहानियाँ पढीं कुछ मन में उतरी कुछ दिमाग को झकझोर गयीं लेकिन यह कहानी याद रह गयी।

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  2. पात्र के मनोविज्ञान को पकड कर शक्ति जी चले हैं और कहानी का अंत सबसे प्रभावित करने वाला पहलु है।

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  3. प्रलय का बिम्ब बहुत अच्छा पब पडा है इससे कहानी का सकारात्मक अंत जिस तरह जोडा गया है वही कहानी की सबसे बडी विशेषता है।

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  4. जब भी अगली बार आगरा आयेंगे
    तो आपसे अवश्‍य मिलना चाहेंगे
    avinashvachaspati@gmail.com

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  5. मर्मस्पर्शी कहानी। स्वप्न के माध्यम से बहुत कुछ कह दिया आपनें।

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  6. प्रलय के बाद हमेशा सृजन होता है। कहानी इसी ओर जाती है।

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  7. एक सांस में पढी जाने वाली कहानी।

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  8. पंकज सक्सेना2 सितंबर 2009 को 1:53 pm

    कहाने में बात है।

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  9. कहानी ने बाँध दिया. याद रहेगी.

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  10. आपकी कहानी मन को झकझोर देती है।

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