रचनाकार परिचय:-

हिंदी और संस्कृत में स्नातकोत्तर शशि पाधा १९६८ में जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय की सर्वश्रेष्ठ महिला स्नातक रहीं हैं। इसके अतिरिक्त सर्वश्रेष्ठ सितार वादन के लिये भी आप सम्मानित हो चुकीं हैं। २००२ में अमेरिका जाने से पूर्व आप भारत में एक रेडियो कलाकार के रूप में कई नाटकों और विचार-गोष्ठियों में भी सम्मिलित रहीं हैं। आपकी रचनायें भी समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। अमेरिका में आप नार्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन से जुड़ गईं।
अब तक आपके दो काव्य-संकलन “पहली किरण” और “मानस-मन्थन” प्रकाशित हो चुके हैं और एक अन्य प्रकाशनाधीन है। पिछले पाँच वर्षों से आप विभिन्न जाल-पत्रिकाओं से भी प्रकाशित हो रहीं हैं।

हिन्दी प्रचारिणी सभा कैनेडा की त्रैमासिक पत्रिका "हिन्दी चेतना" का जुलाई विशेषाँक हिन्दी भाषा एवं साहित्य के महान साधक फ़ादर कामिल बुल्के जैसे विशिष्ट साहित्यकार को उनकी जन्मशती के अवसर पर समर्पित किया गया है। बेल्जियम मूल के फ़ादर बुल्के ने विदेशी धरती पर हिन्दी भाषा तथा साहित्य के उत्थान एवं प्रचार-प्रसार के लिये एक कर्मठ योद्धाकी तरह जो अविस्मरणीय योग दान दिया है, वह अतुलनीय है। "हिन्दी चेतना" के इस विशेषांक में प्रस्तुत सामग्री में उनके कृतित्व तथा व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला गया है|

इस विशेषांक की प्रमुख विशेषता यह है कि डॉ. बुल्के के जन्म, जीवन, कार्यक्षेत्र, धर्मक्षेत्र, जीवन दर्शन तथा उनके द्वारा रचे विविध साहित्य से जुड़े आलेखों को समाहित करके इस अंक को न केवल पठनीय अपितु संग्रहणीय बनाया गया है। डॉ. दिनेश्वर प्रसाद के आलेख " डॉ. कामिल बुल्के--जीवन रेखाएँ" के साथ संलग्न चित्रों के द्वारा पाठकों को इस महान संत के जन्म, परिवार, परिवेष, अध्ययन एवं धर्म की और उन्मुख होने की परिस्थितियों का बहुत ही रोचक वर्णन मिलता है। डॉ. पूर्णिमा केडिया के संस्मरण "बीसवीं शताब्दि का ऋषि" में फ़ादर बुल्के के द्वारा समय-समय पर अपने शिष्यों का मार्गदर्शन कराते हुए उनके अनमोल विचार समाहित हैं। जैसे वे कहते हैं "जन्म और मृत्यु के बीच सत्कर्म ही तो जीवन की सार्थकता तय करते हैं"। उन्होंने परोपकार करना और पुस्तक धन जोड़ना ही जीवन का पुरुषार्थ माना। पूर्णिमा जी के अनुसार राँची का डॉ. कामिल बुल्के शोध संस्थान आज भी हिन्दी जगत के लिये कामधेनु बना हुआ है|


संत तुलसी दास के अनन्य भक्त फ़ादर बुल्के के विषय में अपने आलेख में श्रीनाथ प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं" बाबा बुल्के के रोम -रोम में राम और साँस-साँस में तुलसी बस गये और यह कहा जाए कि वे तुलसी मय हो गए तो कोई अतिरेक नहीं"। उनके अनुसार "वास्तव में तुलसी के प्रति उनकी निष्ठा तथा प्रतिबद्धता ने उन्हें न केवल हिन्दी भाषा का अपितु रामचरित मानस का अधिकारी विद्वान बना दिया"।

इसी विशेषांक में फ़ादर बुल्के के प्रिय कवि ग़ज़ेले की कवितायों का हिन्दी अनुवाद भी मिलता है जिससे पाठक उनके कवि हृदय से परिचित होते हैं। प्रो० हरिशंकर आदेश के लेख "एक महान हिन्दी प्रेमी" में फ़ादर के साथ उनकी भेंट के संस्मरणों का समावेश एक आधुनिक युग के महाकवि के द्वारा बाबा के प्रति हार्दिक श्रद्धाँजलि है। इसी प्रकार श्री आत्मा राम तथा श्री महेन्द्र पाल जैन के आलेखों में हमें बाबा के व्यक्तित्व एवं प्रतिभा के दर्शन होते हैं।

हिन्दी भाषा के उत्थान एवं प्रचार -प्रसार के विषय में बाबा के विचार उन के स्वयं के लिखे लेख में मिलते हैं। एक सम्मेलन में अपने भाषण में उन्होंने कहा"हमें प्राचीन एवं नवीन का समावेश करना चाहिए। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि हमारे साहित्यकार अपने पाठकों को देश की कीर्त्ति एवं गौरव पूर्ण अतीत का स्मरण दिला कर उनमें आत्म सम्मान का भाव संचारित करें"। उनके ये शब्द देश और विदेश में रहने वाले हिन्दी भाषा एवं संस्कृति प्रेमियों के लिये सदैव मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे।

"हिन्दी चेतना" के मुख्य सम्पादक श्री श्याम त्रिपाठी ने अपने सम्पादकीय में लिखा है "फ़ादर बुल्के के सम्मान में यह अंक विश्व के लिये एक अदभुत उपहार होगा, विशेषकर उन हिन्दी साहित्यकारों के लिये जो सुदूर विदेशी धरती पर बसे हुए हैं"। ऐसे अनमोल उपहार को ग्रहण करते हुए हम सभी हिन्दी प्रेमी सम्पादक मंडल के मुख सदस्य डॉ. सुधा ओम ढींगरा तथा डॉ. इला प्रसाद को कोटिश: धन्यवाद देना चाहते हैं जिन्होंने इतनी विविध सामग्री के द्वारा एक महान विभूति के बहु आयामिक व्यक्तित्व से परिचित करवा कर हम पाठकों को भी इस संत की जन्मशती पर श्रद्धा सुमन चढ़ाने का अवसर दिया। यह विशेषांक "सागर में बूंद नहीं" अपितु एक दीप स्तम्भ की तरह हिन्दी भाषा तथा साहित्य प्रेमियों का सदैव पथ प्रदर्शन करता रहेगा। उल्लेखनीय बात यह है कि विदेशी धरती पर इस अंक के लिये इतनी प्रचुर मात्रा में सामग्री एकत्रित करके आप सब ने हिन्दी के प्रति अपनी निष्ठा, लग्न एवं अगाध प्रेम की भावना से हम सब को अभिभूत किया है। एक बार पुन: बधाई एवं धन्यवाद।

8 comments:

  1. वाकई हमें प्राचीन और नवीन का समावेश करना होगा ,तभी आने वाली पीढी को सही रास्ता दिखेगा ,फादर कामिल को मेरा शत-शत नमन ,और आपको धन्यवाद

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  2. हिन्दी चेतना का यह अंक एक बडा कार्य है। बधाई।

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  3. फादर कामिल बुल्के पर आधारित इस अंक को पढने की इच्छा बलवति हो उठी है। एसे अंक संग्रहणीय होते हैं और प्रयास सराहनीय।

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  4. जानकारी का धन्यवाद, यदि कुछ आलेखों के अंश भी साथ प्रस्तुत होते तो सामग्री और पठनीय हो जाती। इस महति कार्य की शुभकामनायें।

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  5. आदरणीय शशि जी, फादर कामिल बुल्के पर जितना कहा लिखा जाये कम है। हिन्दी चेतना के इस प्रयास की भूरि-भूरि प्रसंशा की जानी चाहिये। आपका प्रस्तुत आलेख के लिये आभार।

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  6. राजीव जी आलेख छापने का बहुत -बहुत धन्यवाद--
    अगर कोई हिन्दी चेतना पढ़ना चाहे तो इस लिंक पर पढ़ सकता है---
    http://hindi-chetna.blogspot.com/

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  7. धन्यवाद आलेख के लिये। साहित्य शिल्पी पर भी हिन्दी चेतना का लिंक लगा दीजिये जिससे पत्रिका को यहाँ से पढा जा सके।

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  8. फ़ादर कामिल बुल्के हिन्दी भाषा एवं साहित्य के ऐसे व्यक्तित्व हैं जो किन्हीं परोक्ष कारणों से हाशिये में खड़े हैं। हिन्दी चेतना ने एक पूरा अंक उन पर केंद्रित करके संपादक मंडल ने महत्वपूर्ण काम किया है। कथा यू.के. परिवार के ओर से आप सब को बधाई।

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