रचनाकार परिचय:-

11 मार्च 1959 को (बीकानेर, राजस्‍थान) में जन्मे मुकेश पोपली ने एम.कॉम., एम.ए. (हिंदी) और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्‍नातकोत्‍तर किया है और वर्तमान में भारतीय स्‍टेट बैंक, दिल्‍ली में राजभाषा अधिकारी के पद पर कार्यरत है|

अनेक पुरुस्कारों से सम्मानित मुकेश जी की रचनायें कई प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं| आपका एक कहानी संग्रह "कहीं ज़रा सा..." भी प्रकाशित है। आकाशवाणी, बीकानेर से भी आपकी कई रचनाओं का प्राय: प्रसारण होता रहा है।

आप अंतर्जाल पर भी सक्रिय हैं और अपना एक ब्लाग "स्वरांगन" चलाते हैं।

‘यह बहुत गलत बात है कि इतने सालों तक कल्‍पतरु जी को मान्‍यता ही नहीं दी गई, वह तो ईश्‍वर के घर के वो अवतार हैं जो पृथ्‍वी पर केवल कविता रचने के लिए ही आए हैं, मगर हम सबकी आंखों पर मोह-माया का पर्दा इस तरह पड़ा हुआ था कि हम अपने बीच में उपस्थित इस अवतार द्वारा रची गई लीला को पहचान ही नहीं पाए। आज इस समारोह में इनकी कविता के सम्‍मान के यह क्षण इतिहास रच रहे हैं और आज का दिन साहित्‍यकारों के लिए स्‍वर्णिम दिन कहलाया जाएगा, मेरी ओर से इन्‍हें बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं।’ तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मुख्‍य अतिथि मेहता जी द्वारा कल्‍पतरु जी को श्रीफल और एक लाख रुपए का चैक शॉल ओढ़ाकर प्रदान किया गया ।

कल तक कल्‍पतरु के घोर विरोधी और बात-बात पर उनका अपमान करने वाले मेहता जी द्वारा तारीफों के पुल बांधे जाने से कल्‍पतरु के अन्‍य विरोधियों के साथ-साथ उनकी खास मित्र-मंडली भी हैरान थी ।

‘प्‍यारे साथियो, पुरस्‍कार कब्‍जे में बर लेने के बाद इस मेहता को मैंने दस हजार रुपए में खरीद लिया और मनचाहा भाषण उसके सामने रख दिया,’ कल्‍पतरु जी बंद कमरे में अपने खास दोस्‍तों की जिज्ञासा शांत कर रहे थे, ‘इसके अतिरिक्‍त हमारी समिति के सभी लेखकों की किताबों की खरीद के लिए भी उससे अनुशंसा प्राप्‍त कर ली है, जिससे पिछले तीन वर्षों में छपी हम सबकी किताबें खरीद ली जाएंगी और प्रकाशक द्वारा रॉयल्‍टी के तौर पर हम लोग तीस प्रतिशत कमीशन पाने के अधिकारी होंगे ।’

‘वाह-वाह’, ‘बहुत बढि़या’, जैसे जुमलों के बीच पुरस्‍कार हथियाने और मेहता को खरीदे जाने की खुशी में जाम आपस में टकराने लगे थे ।’
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9 comments:

  1. पुरस्‍कार कब्‍जे-वाह वाह!! बहुत बढ़िया.


    -आनन्द आया पढ़कर.

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  2. साहित्य समाज में व्याप्त दावपेंच को बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत किया गया है।

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  3. हर जगह राजनीति...
    बढ़िया प्रसंग..बधाई!!

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  4. मुकेश जी !

    कथा भले ही लघु है किन्तु आज के तथाकथित साहित्यिक जगत पर छायी धुंध का साम्राज्य बहुत ही दीर्घ है....

    प्रस्तुति के लिये आभार

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