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पिछले दिनों संचार माध्यमों में यह खबर उबाल पर थी जिसमें एक ग्रामीण बच्ची नें स्वयं को "कल्पना चावला का पुनर्जन्म" होने का दावा किया था। प्रस्तुत कविता इसी पृष्ठभूमि पर है। - राजीव रंजन प्रसाद
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वह कल्पना इस जन्म में, मैं कल्पना करता रहा
यह सोच कोंपल की नये, सोचा किया जलता रहा॥
यह सत्य, मेरे देश में, सपनों पे बरगद है तना
सावन में आँखें छिन गयी, बच्चे हरे-अंधार में
राकेट कागज़ के उडाते, मार खाते, नाक बहती
रात कहती, डूब जायेंगे दिये मझधार में..

मन के सच्चे, कितने कच्चे, एसे बच्चे
कह के झरना, आस की घाटी में हँस झरता रहा।
वह कल्पना इस जन्म में, मैं कल्पना करता रहा॥

कब तक जपोगे तुम कि पूरब में सुबह पहले हुई
रोना रहा जीरो का और अटके दश्मलव पर रहे,
दुनियाँ पहुँचती चाँद पर, सागर के तल को नापती
हैं पूछते बच्चे मेरे, रावण के कितने सर रहे,

नेकर सरकती थाम, टूटी चप्पलें घिसता हुआ
सपना हरी सी बेंत से, सहमा रहा, डरता रहा।
वह कल्पना इस जन्म में, मैं कल्पना करता रहा॥
क्योंकर न एसे ख्वाब हों, क्योंकर न वह विक्षिप्त हो,
भूखा भजन करता रहे, सरकार जब निर्लिप्त हो,
उँचा सिंसेक्स, गर्वित टेक्स-चूसक, नीतिनिर्देशक,
बढे हम किस तरफ, बतलाये मुझको कोई पथदर्शक,

अब भी हजारो बाल का ईस्कूल से नाता नहीं
उसका मजूरा लाडला, भूख से मरता रहा।
वह कल्पना इस जन्म में, मैं कल्पना करता रहा॥

यह जन्म की, या धर्म की, गीता की कोई दास्ता
हर्गिज नहीं, लेकिन मरी उम्मीद फिर पैदा हुई
अम्बर में उडना चाहती, बेटी हमारे गाँव की,
यह बात मामूली किसी भी कोण से हर्गिज नहीं

उसको अगर मन के किसी विज्ञान की दिक्कत भी है
तो भी मेरा उम्मीद से मन, आँख ही भरता रहा।
वह कल्पना इस जन्म में, मैं कल्पना करता रहा॥


रचनाकार परिचय:-


राजीव रंजन प्रसाद का जन्म बिहार के सुल्तानगंज में २७.०५.१९७२ में हुआ, किन्तु उनका बचपन व उनकी प्रारंभिक शिक्षा छत्तिसगढ राज्य के जिला बस्तर (बचेली-दंतेवाडा) में हुई। आप सूदूर संवेदन तकनीक में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से एम. टेक हैं। विद्यालय के दिनों में ही आपनें एक पत्रिका "प्रतिध्वनि" का संपादन भी किया। ईप्टा से जुड कर उनकी नाटक के क्षेत्र में रुचि बढी और नाटक लेखन व निर्देशन उनके स्नातक काल से ही अभिरुचि व जीवन का हिस्सा बने। आकाशवाणी जगदलपुर से नियमित उनकी कवितायें प्रसारित होती रही थी तथा वे समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुईं। वर्तमान में आप सरकारी उपक्रम "राष्ट्रीय जलविद्युत निगम" में सहायक प्रबंधक (पर्यावरण) के पद पर कार्यरत हैं। आप "साहित्य शिल्पी" के संचालक सदस्यों में हैं।

आपकी पुस्तक "टुकडे अस्तित्व के" प्रकाशनाधीन है।

16 comments:

  1. "कब तक जपोगे तुम कि पूरब में सुबह पहले हुई
    रोना रहा जीरो का और अटके दश्मलव पर रहे,
    दुनियाँ पहुँचती चाँद पर, सागर के तल को नापती
    हैं पूछते बच्चे मेरे, रावण के कितने सर रहे,"
    बेहद उम्दा ...
    अपनी संकृति अपने इतिहास पर गर्व करना अच्छा है .. पर उसी में अटक कर रह जाना पिछडापन ..
    देश के बच्चों को आज भी स्कूल बुलाने के लिए मिड डे मील की ज़रुरत पड़ती है ..
    कविता के अंत में आशावादिता की किरण प्रशंसनीय है ...
    "अम्बर में उडना चाहती, बेटी हमारे गाँव की,
    यह बात मामूली किसी भी कोण से हर्गिज नहीं"
    राजीव भाई की , हमेशा की तरह आक्रामक और सही जगह चोट करने वाली रचना ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. कविता सज़ा कर आपने,सुंदर बचन जो गये,
    इस देश की रफ़्तार मे कुछ है,जो पीछे रह गये,

    अच्छी कविता बधाई!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. अभिभूत कर दिया आपकी इस रचना ने.....वाह !!! प्रशंशा को शब्द नहीं मेरे पास....

    ऐसे ही सुन्दर लेखन के लिए अनंत शुभकामनायें...

    उत्तर देंहटाएं
  4. यह जन्म की, या धर्म की, गीता की कोई दास्ता
    हर्गिज नहीं, लेकिन मरी उम्मीद फिर पैदा हुई
    अम्बर में उडना चाहती, बेटी हमारे गाँव की,
    यह बात मामूली किसी भी कोण से हर्गिज नहीं

    उसको अगर मन के किसी विज्ञान की दिक्कत भी है
    तो भी मेरा उम्मीद से मन, आँख ही भरता रहा।
    वह कल्पना इस जन्म में, मैं कल्पना करता रहा॥

    राजीव जी नमन आपको। महान रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  5. क्योंकर न एसे ख्वाब हों, क्योंकर न वह विक्षिप्त हो,
    भूखा भजन करता रहे, सरकार जब निर्लिप्त हो,
    उँचा सिंसेक्स, गर्वित टेक्स-चूसक, नीतिनिर्देशक,
    बढे हम किस तरफ, बतलाये मुझको कोई पथदर्शक,

    एसे शब्दों के बावजूद कविता में रवानी देखते ही बनती है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. राजीव जी .......... बहुत अच्छा लगा फरीदाबाद आपके घर आपसे मिल कर .......... आपने समय निउकाला आपका बहुत आभार.
    साहित्य शिल्पी के वार्षिक उत्सव पर मेरी शुभ कामनाएं ..........

    राजीव जी .... बहुत ही शसक्त और सार्थक रचना है .......... सच कहा कब तक पुरानी संस्कृति, पुराने गौरव का गान करते रहेंगे और आने वाले अपने सत्य को नहीं स्वीकारेंगे .......... आपकी लाजवाब और सुन्दर रचना है ..........

    उत्तर देंहटाएं
  7. कब तक जपोगे तुम कि पूरब में सुबह पहले हुई
    रोना रहा जीरो का और अटके दश्मलव पर रहे,
    दुनियाँ पहुँचती चाँद पर, सागर के तल को नापती
    हैं पूछते बच्चे मेरे, रावण के कितने सर रहे,

    गहरा व्यंग्य और मार्मिक कविता, बधाई राजीव जी।

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपके दृष्टिकोण की प्रसंशा करनी होगी।

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  9. प्रभावी कविता। समय का सत्य।

    उत्तर देंहटाएं
  10. rajeev ji

    sach hai yadi aaj hamare desh ke bachche kuchh achchha sochen aap ne bahut sunder likha hai jahan itni unchi baten hai vahin bachchon ka ye puchhna ki ravan ke kitne sar
    sahi hai kitna virodha bhas hai pr yahi desh hi
    bahut sunder likha hai
    badhai
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  11. आशा का एक पल भी जो जीने के लियें मिल जाता है,
    जीवन का सारा सार सिमटकर उस पल में आ जाता है


    उम्मीद बनी रहे.....आपकी लेखनी खूब चली..


    राजीब जी !
    बधाई......

    उत्तर देंहटाएं
  12. नेकर सरकती थाम, टूटी चप्पलें घिसता हुआ
    सपना हरी सी बेंत से, सहमा रहा, डरता रहा।
    वह कल्पना इस जन्म में, मैं कल्पना करता रहा॥

    सशक्त।

    उत्तर देंहटाएं
  13. राजीव जी,
    क्षोभ और दर्द से भरी आपकी कविता जिस संवेदनशीलता के धरातल पर रची गयी है वह निःसंदेह नमनीय है.विषय के चयन एवं अभिव्यक्ति ने आपको आम आदमी से ऊपर
    उठा दिया है. ऐसा लगा जैसे आप के अन्दर एक ग्रामीण बालक जी रहा है.
    --किरण सिन्धु .

    उत्तर देंहटाएं

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