‘आधुनिक हिंदी कविता में दिविक रमेश का एक पृथक चेहरा है। यह चेहरा-विहीन कवि नहीं है बल्कि भीड़ में भी पहचाना जाने वाला कवि है। यह संकलन परिपक्व कवि का परिपक्व संकलन है और इसमें कम से कम 15-20 ऐसी कविताएँ हैं जिनसे हिंदी कविता समृद्ध होती है। इनकी कविताओं का हरियाणवी रंग एकदम अपना और विषश्ट है। शमशर और त्रिलोचन पर लिखी कविताएँ विलक्षण हैं। दिविक रमेश मेरे आत्मीय और पसन्द के कवि हैं।’ ये उद्गार प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने किताबघर प्रकाशन से सद्य प्रकाशत कवि दिविक रमेश के कविता-संग्रह ‘गेहूँ घर आया है’ के लोकार्पण के अवसर पर कहे। विषिश्ट अतिथि केदारनाथ सिंह ने इस संग्रह को रेखांकित करने और याद करने योग्य माना। कविताओं की भाशा को महत्वपूर्ण मानते हुए उन्होंने कहा कि दिविक ने कितने ही ऐसे शब्द हिंदी को दिए हैं जो हिंदी में पहली बार प्रयोग हुए हैं। उन्होंने अपनी बहुत ही प्रिय कविताओं में से ‘पंख’ और ‘पुण्य के काम आए’ का पाठ भी किया।

इस संग्रह का लोकर्पण प्रोफेसर नामवर सिंह, प्रोफेसर केदारनाथ सिंह और प्रोफेसर निर्मला जैन ने समवेत रूप से किया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि निर्मला जैन को यह संग्रह विविधता से भरपूर लगा और स्थानीयता के सहज पुट के कारण विषिश्ट एवं महत्वपूर्ण भी लगा। उन्होंने माना कि इस महत्वपूर्ण कवि की ओर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था उतना नहीं दिया गया। स्वयं मैं नहीं दे पाई थी। उन्होंने ध्यान दिलाया कि केवल ‘गेहूँ घर आया है’ ही में नहीं बल्कि जगह जगह इनकी कविताओं में ‘दाने’ आए हैं। दिविक रमेश के पास एक सार्थक और सकारात्मक दृश्टि है साथ ही वे सहज मानुश से जुड़े हैं। ऐसा नहीं लगता कि इस संग्रह में उनकी आरंभिक कविताएँ भी हैं। सभी कविताएँ एक प्रौढ़ कवि की सक्षम कविताएँ हैं। एक ऊँचा स्तर है। न यहाँ तिकड़म है और न ही कोई पेच। दिविक रमेश किसी बिन्दू पर ठहरे नहीं बल्कि निरन्तर परिपक्वता की ओर बढ़ते चले गए हैं।


कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रोफेसर नामवर सिंह ने कहा कि वे किसी बात को दोहराना नहीं चाहते और उन्हें कवि केदारनाथ सिंह के विचार सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगे। उन्होंने यह भी कहा कि वे केदारनाथ सिंह के मत पर हस्ताक्षर करते हैं। उनके अनुसार एक कवि की दूसरे कवि को जो प्रशसा मिली है उससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। संग्रह की ‘तीसरा हाथ’ कविता का पाठ करने के बाद उन्होंने कहा कि दिविक की ऐसी कविताएँ उसकी और हिन्दी कविता की ताकत है और यही दिविक रमेष है। ऐसी कविता दिविक रमेष ही लिख सकते थे और दूसरा कोई नहीं। इनकी शली अनूठी है। उन्होंने माना कि इस संग्रह की ओर अवष्य ध्यान जाएगा।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रेम जनमेजय ने आरंभ में दिविक रमेश को उनके जन्मदिन की पूर्व-संध्या पर सबकी ओर से बधाई दी। उन्होंने कहा कि दिविक उन्हें इसलिए पसंद हैं कि उनमें विसंगतियों को इंगित करने और उन पर सार्थक प्रहार करने की ताकत है। उनकी कविताओं में घर-पड़ोस के चित्र, गाँव की गंध है तो शहर की विसंगतियाँ भी हैं। दिविक की सोच व्यापक है।

अपने आलेख पाठ में दिनेश मिश्र ने कहा कि जिन राहों से दिविक गुजरे हैं वो अटपटी हैं। कवि कहीं भी उपदेषक के मुद्रा में नहीं दिखाई देता है।

प्रोफेसर गोपेष्वर ने इन कविताओं को बहुत ही प्रभावषाली मानते हुए कहा कि ये कविताएँ खुलती हुई और संबोधित करती हुई हैं। अकेलेपन या एकान्त की नहीं हैं। दिविक रमेश ने काव्य-भाशा में एक नई परंपरा डाली है। उसे रेखांकित किया जाना चाहिए। उन्हें ये कविताएँ बहुत ही अलग और अनूठी लगी। उन्होंने इस बात का अफसोस जाहिर किया कि इस समर्थ एवं महत्वपूर्ण कवि की ओर इसलिए भी अपेक्षित ध्यान नहीं गया क्योंकि साहित्य जगत के उठाने-गिराने वाले मान्य आलोचकों ने इनकी ओर ध्यान नहीं दिया था। सार्वजनिक जीवन की ये कविताएँ निष्चित रूप से अपना प्रभाव छोड़ती हैं। उन्होंने अपनी अत्यंत प्रिय कविताओं में से एक ‘पंख से लिखा खत’ का पाठ भी किया। प्रताप सहगल के अनुसार दिविक कभी पिछलग्गू कवि नहीं रहा और उनके काव्य ने निरंतर ‘ग्रो’ किया है। ये कविताएँ बहुत ही सशक्त हैं। प्रणव कुमार बंदोपाध्याय ने संग्रह की तारीफ करते हुए बताया कि वे इन कविताओं को कम से कम 15 बार पढ़ चुके हैं। उनके अनुसार इन कविताओं में समय के संक्रमण का विस्तार मिलता है। संग्रह को उन्होंने हिन्दी कविता की उपलब्धि माना।

यह आयोजन भारतीय सांस्कृति संबंध परिशद् और व्यंग्य-यात्रा के संयुक्त तत्वावधान में आजाद भवन के हाॅल में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर अनेक सुप्रसिद्ध साहित्यकार और गणमान्य पाठक उपस्थित थे। प्रारंभ में भारतीय सांस्कृति संबंध परिशद् के श्री अजय गुप्ता ने सबका स्वागत किया।

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