हमारे नाम से वो इस तरह मशहूर हो जाए [ग़ज़ल] - प्रकाश "अर्श"
रचनाकार परिचय:-प्रकाश कुमार सिंह "अर्श" मूलत: बिहार के भोजपुर जिले के निवासी हैं और दिल्ली से एम.बी.ए. करने के उपरांत वर्तमान में वरिष्ठ प्रबंधक के तौर पर एक संस्थान में कार्यरत हैं।
आप पिछले लगभग दस सालों से हिंदी में गज़लें कह रहे हैं जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होती रही हैं।
अपने ब्लाग "अर्श" के माध्यम से आप अंतर्जाल पर भी सक्रिय हैं।
आप पिछले लगभग दस सालों से हिंदी में गज़लें कह रहे हैं जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होती रही हैं।
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के रिश्ता जो भी जाए घर वो ना-मंजूर हो जाए॥ /
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हिकारत से यूँ रस्ते में मुझे जालिम ना देखा कर /
मुहब्बत इस कदर ना कर कोई मगरूर हो जाए॥ /
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जली होंगी कई लाशें दफ़न होंगे कई किस्से /
संभलना शहर फ़िर कोई ना भागलपूर हो जाए॥ /
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कोई शिकवा हो तो कह दे इसे ना दिल में रक्खा कर /
ज़रा सा जख्म है बढ़कर न ये नासूर हो जाए॥ /
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जिसे भी देखिये वो बेदिली से देखता है अब /
मुहब्बत करने वालों का न ये दस्तूर हो जाए॥ /
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वो रोती है सुबकती है अकेले घर के कोने में /
कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए॥ /
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है पीना कुफ्र ये जो "अर्श" से कहता रहा कल तक /
वही प्याला लबों को दे तो फ़िर मंजूर हो जाए॥ /
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बहरे-हजज मुसमन सालिम (१२२२*४)

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बहुत अच्छी ग़ज़ल है, बधाई।
नंदन says
हमारे नाम से वो इस तरह मशहूर हो जाए।
के रिश्ता जो भी जाए घर वो ना-मंजूर हो जाए॥
:)
अनिल कुमार says
जली होंगी कई लाशें दफ़न होंगे कई किस्से
संभलना शहर फ़िर कोई ना भागलपूर हो जाए॥
वाह, बहुत खूब।
निधि अग्रवाल says
वो रोती है सुबकती है अकेले घर के कोने में
कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए॥
बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है।
सुषमा गर्ग says
अर्श जी आपकी ग़ज़ल के शेर कुछ तो रोचक हैं तो कुछ गरे और प्रभावोत्पादक।
M VERMA says
वो रोती है सुबकती है अकेले घर के कोने में
कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए॥
बहुत अच्छी गज़ल. हर शेर छूकर जाता है.
वाह
दिव्यांशु शर्मा says
मतला बेहद खूबसूरत और शरारती था ... मज़ा आ गया .. :-)
वो रोती है सुबकती है अकेले घर के कोने में
कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए॥
ग़ज़ल का भाव पक्ष भी गहरा है .. बधाई
gita pandit says
जिसे भी देखिये वो बेदिली से देखता है अब
मुहब्बत करने वालों का न ये दस्तूर हो जाए॥
बहुत अच्छी ग़ज़ल....
बधाई
बेनामी says
Very Nice.
Alok Kataria
श्रद्धा जैन says
कोई शिकवा हो तो कह दे इसे ना दिल में रक्खा कर
ज़रा सा जख्म है बढ़कर न ये नासूर हो जाए॥
मन जीत लिया इस शेर ने
हमारे नाम से वो इस तरह मशहूर हो जाए।
के रिश्ता जो भी जाए घर वो ना-मंजूर हो जाए
क्या बात है प्यार हो तो ऐसा हो
वो रोती है सुबकती है अकेले घर के कोने में
कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए॥
अजीब विडम्बना है
इतनी शानदार और दिल को छूती हुई ग़ज़ल के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें
boss bolbachan says
बहुत अच्छी ग़ज़ल है, बधाई।