यदा - कदा विचित्र हो जाता है,
भीतर का असुर जग जाता है,
कामना से पोषित, लोभ में प्रेरित,
सतत बलिष्ठ होते जाता है।

होता आरम्भ तब,
चरित्र - हीनता का तांडव,
जीतते क्रोध के कौरव,
हारते संस्कार के पांडव।

मन पर अनियंत्रण,
कामेच्छा का प्रवाह,
विवेक का पतन,
वही, दुर्विचार - दुर्भाव |

राग - द्वेष का प्रहार,
चरित्र का क्षणिक हार,
कामनायों के मेघ सघन,
होते मर्यादाओं के उल्लंघन।

जब मद में वह हुंकारता,
अहम अहम अहम,
भीतर योगी - मुनि विलापता,
शिवोहम शिवोहम शिवोहम।

11 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना है अवनीश जी\ पुरातन से सशक्त बिम्ब ले कर आप आये हैं।

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  2. जब मद में वह हुंकारता,
    अहम अहम अहम,
    भीतर योगी - मुनि विलापता,
    शिवोहम शिवोहम शिवोहम।

    दर्शन और आध्यात्म भी यही है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. मन की स्थिति और संघर्ष को कविता खूबी से प्रस्तुत करती है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. जब मद में वह हुंकारता,
    अहम अहम अहम,
    भीतर योगी - मुनि विलापता,
    शिवोहम शिवोहम शिवोहम।

    वाह ! वाह ! वाह ! क्या बात कही आपने........

    मोह और विवेक के चिरंतन संघर्ष में आत्मा के विषाद की आपकी यह व्याख्या मन मुग्ध कर गयी......

    बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  5. अच्छे शब्द व भाव प्रवाह मेँ लिखी गयी कविता है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आत्म विश्लेषक विचार
    नियमित संतुलित आहार
    मन की नाव सधि हो पतवार
    मनाओ दशहरा त्योंहार्

    उत्तर देंहटाएं
  7. शिव है तो विष है, शिव है तो तांडव है, शिव है तो क्रोध है, शिव है तो शांत है, दूसरों का दु:ख हरने वाले शिव की महिमा को आपने बखूबी उभारा है, बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  8. डा.रमा द्विवेदी

    भावपूर्ण एवं अर्थपूर्ण कविता के लिए बधाई एवं शुभकामनाएँ....

    उत्तर देंहटाएं

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