चलो बरसो पहले हुई क़यामत को देखते है
खोफजदा रात की दोर-ए-शिकायत को देखते है

मुत्फरिक अशर तो यु है तकरीर हमारी यारो
परदेह में छिपी उसी नफरत को देखते है

वीरान-ओ-उजाड़ यहाँ आब-ओ-हवा हुई है ऐसी
लुटी हुई जिन्दगी में उस मुहब्बत को देखते है

यु तो ना जाएगे गंज-ए-शहीदान वतन से परे
गाहे - बा - गाहे दुश्मन की जराफत को देखते है

महफ़िल महबूब की होती आब-ए-रवां जैसी अल्हा
इसमें डूब कर "बेदिल" अपनी सूरत को देखते है

शब्द----
1-मुत्फरिक अशर = फूटकर दोहा
2-तकरीर = बात, भाषण
3-गंज-ए-शहीदान = शहीदों के दफन होने वाली जगह
4-जराफत = कला
5-आब-ए-रवां = बहता पानी

4 comments:

  1. यु तो ना जाएगे गंज-ए-शहीदान वतन से परे
    गाहे - बा - गाहे दुश्मन की जराफत को देखते है.

    bahut sundar gazal..badhayi..

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. उर्दू शब्दों के अर्थ देना अच्छा रहा। इससे समझने में आसानी हुई।

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