आज भी प्रासंगिक हैं महात्मा गाँधी के विचार


विश्व पटल पर महात्मा गाँधी सि्र्फ़ एक नाम नहीं अपितु शान्ति और अहिंसा का प्रतीक है। महात्मा गाँधी के पूर्व भी शान्ति और अहिंसा की अवधारणा फलित थी, परन्तु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह एवं शान्ति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुये अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। तभी तो प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि –‘‘हजार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़–मांस से बना ऐसा कोई इन्सान धरती पर कभी आया था।’’ संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वर्ष 2007 से गाँधी जयन्ती को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाये जाने की घोषणा की तो अमेरिकी कांग्रेस में बापू को दुनिया भर में स्वतंत्रता और न्याय का प्रतीक बताते हुए प्रतिनिधि सभा में उनकी 140वीं जयंती मनाने संबंधी प्रस्ताव पेश किया गया। दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के मुखिया ओबामा तो गाँधी जी के कायल हैं। उनकी माने तो अगर भारत में अहिंसात्मक आंदोलन नहीं होता तो अमेरिका में नागरिक अधिकारों के लिए वैसा ही अहिंसात्मक आंदोलन देखने को नहीं मिलता। निश्चितता दुनिया का यह दृष्टिकोण आज के दौर में शान्ति व अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता को सिद्ध करता है।

2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबन्दर में जन्मे मोहनदास करमचंद गाँधी ने 1891 में इंग्लैंण्ड से बैरिस्टरी पास की और पहले राजकोट व फिर बम्बई में वकालत करने लगे। 1893 में अब्दुल्ला सेठ नामक एक व्यापारी के मुकदमें में वे दक्षिण अफ्रीका गये और वहाँ पहली बार उन्हें अंग्रेजों की भारतीयों व अफ्रीकियों के प्रति रंगभेद नीति का कटु अनुभव हुआ। एक तरफ उन्हें प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद रेलवे के डिब्बे से बाहर निकाल दिया गया तो दूसरी तरफ भारतीय होने के कारण तीन पौण्ड की लाइसेंस फीस देने को कहा गया। यही नहीं उनकी वेशभूशा का भी मजाक उड़ाया गया। ऐसे में गाँधी जी ने इस रंगभेद नीति का विरोध किया और 1903 में ‘इण्डियन ओपिनियन’ अखबार की शुरुआत की। 11 सितम्बर 1906 को युवा बैरिस्टर गाँधी जी ने भारतीय मूल के लगभग 3000 लोगों को दक्षिण अफ्रीका में जोहान्सबर्ग के एंपायर थियेटर में इकट्ठा किया और अध्यादेष के खिलाफ, जिसके तहत एशियाई लोगों को अपनी अंगुलियों के निशान रजिस्टर कराने व अपने साथ सदैव पहचान पत्र रखना अनिवार्य बना दिया गया था, के विरूद्ध यह प्रस्ताव पास किया कि– ‘‘वे अपना दमन करने वाले श्वेत औपनिवेषक अत्याचारों का प्रतिरोध उन पर हाथ उठाए बिना करेंगे और उनके किसी भी जुल्म के सामने सिर नहीं झुकाएंगे।’’ यहीं पर गाँधी जी ने लोगों को सम्बोधित करते हुये प्रथम बार ‘सत्याग्रह’ विचारधारा का सूत्रपात किया। विरोध के इस नए हथियार को दक्षिण अफ्रीका की अंग्रेज सरकार सहन न कर सकी और गाँधी जी सहित 27 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया और उन्हें देश छोड़ने का आदेश दिया। परन्तु गाँधी जी ने उस आदेश का भी उल्लंघन किया और उन्हें जेल भेज दिया गया। इस प्रतिरोध के चलते दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने अन्तत: झुकते हुये 1914 में भारतीयों के विरुद्ध अधिकतर विभेदकारी कानून खत्म कर दिया। यह गाँधी जी की एक बड़ी जीत थी और इसी के साथ 18 जुलाई 1914 को इंग्लैण्ड होते हुये वे भारत रवाना हो गये तथा 1915 में भारत पहुँचे। इस बीच 4 अगस्त 1914 को प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ हो चुका था और गाँधी जी ब्रिट्श सरकार के बिना शर्त के सहयोगी रूप में सामने आये। वस्तुत: उन्हें लगा कि अंग्रेज इस विश्व युद्ध में उच्च सिद्धान्तों की रक्षार्थ लड़ रहे हैं और युद्ध पश्चात भारत की स्वाधीनता की दिशा में काम करेंगे। अंग्रेजी हुकूमत ने इसके बदले में गाँधी जी को ‘केसर–ए–हिन्द’ उपाधि से नवाजा। परन्तु गाँधी जी की सोच अन्तत: स्वप्नभंग ही साबित हुई और असहयोग आन्दोलन के दौरान अंग्रेजी नीतियों के विरोध में उन्होंने यह उपाधि लौटा दी।

जब गाँधी जी भारत लौटे तो वे इंग्लैड से बैरिस्टरी पास कर लौटे ऐसे धनी व्यक्ति थे, जिसकी सालाना आय करीब 5,000 पाउण्ड थी। भारत की धरती पर प्रवेश करते ही उन्हें लगा कि अंग्रेजों के दमन का शिकार भारतीयों को काला कोट पहने फर्राटे से कोर्ट में अंग्रेजी बोलने वाले मोहनदास करमचंद गाँधी की नहीं वरन् एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो उन्हीं के पहनावे में, उन्हीं की बोली में, उन्हीं के बीच रहकर, उनके लिए संघर्ष कर सके। ऐसे में गाँधी जी ने अपनी पहली उपस्थिति अप्रैल 1917 में चम्पारन, बिहार में नील के खेतों में काम करने वाले किसानों हेतु सत्याग्रह करके दर्ज करायी पर अखिल भारतीय स्तर पर उनका उद्भव 1919 के खिलाफत आन्दोलन व फिर असहयोग आन्दोलन से हुआ। 1919 से आरम्भ इस दौर को भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन में ‘गाँधी युग’ के नाम से जाना जाता है। गाँधी जी ने न केवल उस समय चल रही उदार व उग्र विचारधाराओं के उत्तम भागों का समन्वय किया बल्कि दोनों को एक अधिक गतिशील और व्यावहारिक मोड़ दिया। 5 फरवरी 1922 को चौरीचौरा काण्ड के बाद बीच में ही असहयोग आन्दोलन वापस लेकर गाँधी जी ने यह जता दिया कि वे हिंसा की बजाय अहिंसक तरीकों से भारत की आजादी चाहते हैं। असहयोग आन्दोलन से जहाँ जनमानस में अंग्रेजी हुकूमत का खौफ खत्म हो गया वहीं जनसमूह गाँधी जी के पीछे उमड़ पड़ा। इसके बाद तो सिलसिला चल निकल पड़ा, आगे–आगे गाँधी जी और उनके पीछे पूरा कारवां। जाति–धर्म–भाषा–क्षेत्र से परे इस कारवां में पुरुष व महिलायें एक स्वर से जुड़ते गये। 1920–22 के असहयोग आन्दोलन, 1930–34 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन, 1940–41 के व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आन्दोलन और 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन द्वारा गाँधी जी ने अंग्रेजी हुकूमत को जता दिया कि भारत की स्वतंत्रता न्यायपूर्ण है और भारत में अंग्रेजी राज्य की समाप्ति आवश्यक है। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन ने तो अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दीं। उस दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल से वार्ता पश्चात सम्राट जार्ज सष्ट्म ने अपनी डायरी में दर्ज किया था कि–‘‘ विन्स्टन चर्चिल ने मुझे यह कहकर आश्चरचकित कर दिया है कि उनके सभी सहयोगी और संसद के तीनों दल युद्ध के पश्चात भारत को भारतीयों के हाथों में छोड़ने को उद्यत हैं। क्रिप्स, समाचार पत्र और अमरीकी लोकमत– सभी ने उनके मन में यह भावना भर दी है कि हमारा भारत पर राज्य करना गलत है और सदैव से भारत के लिए भी गलत रहा है।’’ इस प्रकार 15 अगस्त 1947 को आजादी प्राप्त कर गाँधी जी ने समूचे विश्व को दिखा दिया कि हिंसा जो सभ्य समाज के अस्तित्व को नष्ट करने का खतरा उत्पन्न करती है, का विकल्प ढूँढ़ने के लिए स्वयं की पड़ताल करने का भी एक प्रयास होना चाहिए।

गांधी जी सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, स्वराज्य व रचनात्मक कार्यक्रमों के कायल थे। इन सभी सिद्धान्तों को उन्होंने न सिर्फ़ वैचारिक धरातल पर उतारा बल्कि उनमें अन्तर्सम्बन्ध भी स्थापित किया। गाँधी जी को ‘महात्मा’ की उपाधि से सर्वप्रथम विभूषित करने वाले रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था कि– ‘‘गाँधी जी एक राजनीतिज्ञ, संगठनकर्ता, जनमानस के नेता और नैतिक सुधारक के रूप में महान हैं, परन्तु वह मनुष्य के रूप में उससे भी अधिक महान हैं। यद्यपि वह असाध्य रूप से आदर्शवादी थे और अपने निश्चित मापदण्डों द्वारा प्रत्येक कार्य को मापते थे, फिर भी वह मानव प्रेमी हैं न कि खोखले विचारों के प्रेमी।’’ गाँधी जी सत्य के बहुत बड़े प्रणेता थे और इसके लिये अहिंसा के तरीकों के पक्षपाती थे। सत्याग्रह उनके लिए मात्र नीति नहीं, सिद्धान्त था। वस्तुत: सत्याग्रह के माध्यम से गाँधीजी ने महात्मा बुद्ध, महावीर व तमाम महापुरूषों द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सिद्धान्त को सामाजिक व राष्ट्रीय शक्ति में तब्दील कर दिया। पाश्चातय विचारक थोरो की व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा की अवधारणा को सामाजिक शक्ति में बदलकर ऐसा बेमिसाल जनजागरण पैदा किया जो दीर्घकाल तक अवश्य चलता है, पर असफल नहीं होता। स्वयं गाँधी जी का मानना था कि– ‘‘सत्याग्रह एक ऐसा आध्यात्मिक सिद्धान्त है जो मानव मात्र के प्रेम पर आधारित है। इसमें विरोधियों के प्रति घृणा की भावना नहीं है।’’ अहिंसा गाँधी जी का प्रमुख सत्याग्रही हथियार था। गाँधी जी के लिये अहिंसा, हिंसा का निषेध मात्र नहीं थी बल्कि एक जीवन पद्धति थी। वे अक्सर कहा करते थे कि आज की दुनिया में जितने लोग जीवित हैं, वे बताते हैं कि दुनिया का आधार हथियार बल नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि दुनिया इतने हंगामों के बाद भी टिकी हुई है। गाँधी जी की अहिंसा कायरता का प्रतीक नहीं बल्कि अनतर्चेतना व आत्मा में विश्वास करने वाली वीरता का परिचायक है। उन्होंने इसे व्याख्यायित करते हुये लिखा कि –‘‘यद्यपि अहिंसा का अर्थ क्रियात्मक रूप से जानबूझकर कष्ट उठाना है, तथापि यह सिद्धान्त दुराचारियों के सामने हथियार डालने का समर्थन नहीं करता। इसके विपरीत यह दुराचारी का पूर्ण आत्मबल से सामना करने की प्रेरणा देता है। इस सिद्धान्त को मानने वाला व्यक्ति अपनी इज्जत, धर्म और आत्मा की रक्षा के लिए एक अन्यायपूर्ण साम्राज्य सहित समस्त शक्तियों को भी चुनौती दे सकता है और अपने पराक्रम द्वारा उसके पतन के बीज भी बो सकता है।’’ बताते हैं कि जब इटली के तानाशाह मुसोलिनी के आग्रह पर गाँधी जी उससे मिलने गये, तो कईयों ने उन्हें समझाया कि एक अहिंसक व्यक्ति का हिंसक व्यक्ति से मिलना उचित नहीं। पर गाँधी जी ने जवाब दिया कि हिंसक व्यक्ति से हिंसा ज्यादा खतरनाक है और हमारा उद्देश्य सत्य व अहिंसा के माध्यम से अहिंसा को खत्म करना है। गाँधी जी तीन लोगों के साथ मुसोलिनी से मिलने गये, जब कि वहाँ कुर्सियाँ सिर्फ़ दो थीं। जब मुसोलिनी ने गाँधी जी से बैठने का आग्रह किया तो गाँधी जी ने अपने साथ आये तीनों लोगों को कुर्सी की तरफ इशारा करते हुये बैठने को कहा। मुसोलिनी का सोचना था कि कुर्सी पर सिर्फ़ गाँधी जी और वो बैठेगा, पर गाँधी जी अपने साथ के तीन अन्य मेहमानों की खातिर कुर्सी पर बैठने को राजी नहीं हुये और अन्तत: मुसोलिनी को तीन अन्य कुर्सियाँ मँगवानी पड़ी। वाकई यह रोचक घटनाक्रम दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह और एक अहिंसक सत्याग्रही के बीच घटा था, जिसने तानाशाह को एक सत्याग्रही की बात मानने पर मजबूर कर दिया।

गांधी जी स्वदे्शी के प्रबल समर्थक थे। वे जानते थे कि असली भारत गाँवों में बसता है, जिसके आर्थिक स्वावलम्बन की रीढ़ कुटीर व लघु उद्योगों पर टिकी हुयी है। गाँधी जी का चरखा कातना प्रतीकात्मक रूप में स्वदेशी व स्वावलम्बन का ही प्रतीक था। स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए ही वे विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आवाहन करते थे। गाँधी जी सि्र्फ़ राजनैतिक व्यक्ति नहीं बल्कि एक रचनात्मक समाज सुधारक भी थे। अस्पर्शयता सुधार, हिन्दू–मुस्लिम एकता इत्यादि के लिए उन्होंने बहुत कार्य किये। अस्पर्शयता को मानवता पर कलंक बताते हुये उन्होंने इसके उन्मूलन पर जोर दिया व तद्नुसार अछूतों को सम्मानजनक ‘हरिजन’ नाम देने, हरिजन सेवक संघ की स्थापना, विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में अस्पृष्यता के विरुद्ध लिखना एवं देषव्यापी भ्रमणों के दौरान अछूतों की बस्तियों में जाकर उनको गले लगाकर अस्पर्शयता को अवैज्ञानिक व अमानवीय सिद्ध करने जैसे अप्रतिम कदम उठाये। गाँधी जी के मन में नारी के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। वे नारी को पर्दा–प्रथा, बाल–विवाह व बहु–विवाह जैसी मान्यताओं से बाहर निकालना चाहते थे और उनके आवान पर न सिफर् तमाम नारियों ने पर्दा–प्रथा से बाहर निकल कर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया बल्कि औरों को भी जागृत किया। नारी उत्थान हेतु गाँधी जी ने शिक्षा, अन्तर्जातीय विवाह व विधवा विवाह पर जोर दिया। उनका मानना था कि जब तक नारी अपने अधिकारों हेतु स्वयं आगे नहीं आयेगी, तब तक उसकी स्थित में परिवर्तन नहीं होगा।

गांधी जी धर्म व सम्प्रदाय में भेद करते थे। धर्म उनके लिये कर्मकाण्डों से नहीं अपितु मानवीय व नैतिक गुणों से निर्मित था। वे राजनीति व धर्म के सहअस्तित्व को स्वीकार करते हुये दोनों के लिए सत्य, अहिंसा, त्याग, विष्वबन्धुत्व, आत्मविश्वास व नैतिकता को जरूरी मानते थे। साधन और साध्य दोनों की पवित्रता पर जोर देते हुये वे किसी भी प्रकार के छल कपट या अनुचित तरीकों को पसन्द नहीं करते थे। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति के विपरीत गाँधी जी हिन्दू–मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। 1919 में खिलाफत आन्दोलन के दौरान उन्होंने इसे हिन्दुओं व मुसलमानों के मध्य एकता स्थापित करने का ऐसा सुअवसर बताया जो कि आगे सौ वर्षों तक नहीं मिलेगा। हिन्दू–मुस्लिम एकता के प्रति गाँधी जी का आग्रह इसी से समझा जा सकता है कि जब 15 अगस्त 1947 को सारा देश आजादी के जश्न में डूबा था तो गाँधी जी साम्प्रदायिक दंगों को खत्म करने के लिए नोआखली में पद यात्रा कर रहे थे। वस्तुत: गाँधी जी के लिए स्वतंत्रता का स्वरूप सिफर् राजनैतिक नहीं था, अपितु यह लोगों की सामाजिक, आर्थिक व आत्मिक उन्नति भी थी, जिसे वे ‘राम–राज्य’ कहा करते थे।

आज गाँधी जी सिर्फ़ भारत की भूमि तक ही सीमित नहीं बल्कि समग्र विश्व–धारा में व्याप्त हैं। उनके दिखाये गये रास्ते पर चलकर न जाने कितने राष्ट्रों ने अपनी स्वाधीनता पायी है। यह अनायास ही नहीं है कि गाँधी जी को पाँच बार 1937, 1938, 1939, 1947 व 1948 में नोबेल शान्ति पुरस्कार के लिये नामित किया गया। यह एक अलग बहस का विषय है कि किन कारणों से उन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया पर कालान्तर में गाँधी जी के सिद्धान्तों पर चलकर उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानने वाले कई लोगों को नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1989 में नोबेल शान्ति सम्मान के लिए दलाई लामा के नाम की घोषणा करते हुये नोबेल कमेटी के सदस्यों ने गाँधी जी को नोबेल सम्मान नहीं देने पर अफसोस जताया और कमेटी के अध्यक्ष ने कहा कि दलाई लामा को यह सम्मान दिया जाना गाँधी जी की स्मृति को श्रद्धांजलि देने का प्रयास है। इसी प्रकार 1984 व 1993 में क्रमष: डेसमण्ड टूटू व नेल्सन मण्डेला को नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिन्होंने गाँधी जी को प्रेरणास्रोत मानते हुये दक्षिण अफ्रीका में वर्णभेद व रंगभेद की खिलाफत की थी।

आज गाँधी जी के विचार पूरे विश्व में सर्वग्राय हैं। कभी आर्नल्ड टॉयनबी ने कहा था – ‘‘मैं जिस पीढ़ी में पैदा हुआ, वह पीढ़ी पश्चिम में केवल हिटलर अथवा स्तालिन की ही पीढ़ी नहीं थी अपितु भारत में गाँधी जी की भी पीढ़ी थी। हम निष्चयपूर्वक यह भविष्यवाणी कर सकते हैं कि मानव इतिहास पर गाँधी जी का प्रभाव हिटलर और स्तालिन के प्रभाव से अधिक होगा।’’ आज की नयी पीढ़ी गाँधी जी को एक नए रूप में देखना चाहती है। वह उन्हें एक सन्त के रूप में नहीं वरन् व्यवहारिक आदर्शवादी के रूप में प्रस्तुत कर रही है। ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ जैसी फिल्मों की सफलता कहीं–न–कहीं युवाओं का उनसे लगाव प्रतिबिम्बित करती है। आज भी दुनिया भर के सर्वेक्षणों में गाँधी जी को शीर्ष पुरूष घोशित किया जाता है। हाल ही में हिन्दू–सी0 एन0 एन0– आई0 वी0 एन0 द्वारा 30 वर्श से कम आयु के भारतीय युवाओं के बीच कराए गए एक सर्वेक्षण में 76 प्रतिशत लोगों ने गाँधी जी को अपना सर्वोच्च रोल मॉडल बताया। बी0बी0सी0 द्वारा भारत की स्वतंत्रता के 60 वर्श पूरे होने पर किये गये एक सर्वेक्षण के मुताबिक आज भी पाश्चात्य दे्शों में भारत की एक प्रमुख पहचान गाँधी जी हैं। यही नहीं तमाम पा्श्चात्य दे्शों में गाँधीवाद पर विस्तृत अध्ययन हो रहे हैं, तो भारत में सुन्दरलाल बहुगुणा, मेघा पाटेकर, अरूणा राय से लेकर संदीप पाण्डे तक तमाम ऐसे समाजसेवियों की प्रतिष्ठा कायम है, जिन्होंने गाँधीवादी मूल्यों द्वारा सामाजिक आन्दोलन खड़ा करने की कोशिशें कीं। आँकड़े गवाह हैं कि विश्व भर में हर साल गाँधी जी व उनके विचारों पर आधारित लगभग दो हजार पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है एवम् हाल के वर्षो में गाँधी जी की कृतियों का अधिकार हासिल करने के लिये प्रकाशकों व लेखकों के आवेदनों की संख्या दो गुनी हो गई है। वस्तुत: आज जरूरत गाँधीवाद को समझने की है न कि उसे आदर्श मानकर पिटारे में बन्द कर देने की। स्वयं गाँधी जी का मानना था कि आदर्श एक ऐसी स्थिति है जिसे कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता बल्कि उसके लिए मात्र प्रयासरत रहा जा सकता है।


वस्तुत: सत्य, प्रेम व सहिश्णुता पर आधारित गाँधी जी के सत्याग्रह, अहिंसा व रचनात्मक कार्यक्रम के अचूक मार्गों पर चलकर ही विश्व में व्याप्त असमानता, शोषण, अन्याय, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, दुराचार, नक्सलवाद, पर्यावरण असन्तुलन व दिनों-दिन बढ़ते सामाजिक अपराध को नियंत्रित किया जा सकता है। गाँधी जी द्वारा रचनात्मक कार्यक्रम के जरिए विकल्प का निर्माण आज पूर्वोत्तर भारत व जम्मू–काश्मीर जैसे क्षेत्रों की समस्याओं, नक्सलवाद व घरेलू आतंकवाद से निपटने में जितने कारगार हो सकते हैं उतना बल–प्रयोग नहीं हो सकता। गाँधी जी दुनिया के एकमात्र लोकप्रिय व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वयं को लेकर अभिनव प्रयोग किए और आज भी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, आर्थिक मुद्दों पर उनकी नैतिक सोच व धर्म–सम्प्रदाय पर उनके विचार प्रासंगिक हैं। तभी तो भारत के अन्तिम वायसराय लार्ड माउण्टबेन ने कहा था – ‘‘गाँधी जी का जीवन खतरों से भरी इस दुनिया को हमेशा शान्ति और अहिंसा के माध्यम से अपना बचाव करने की राह दिखाता रहेगा।’’

17 comments:

  1. देश के दो लाल...एक सत्य का सिपाही...दूसरा ईमानदारी का पुतला...लेकिन अगर आज गांधी जी होते तो देश की हालत देखकर बस यही कहते...हे राम...दूसरी ओर जय जवान, जय किसान का नारा देने वाले शास्त्री जी भी आज होते तो उन्हें अपना नारा इस रूप मे नज़र आता...सौ मे से 95 बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान...

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  2. वर्तमान परिवेश में गाँधी एक व्यक्ति नहीं बल्कि मूल्य बन गए हैं. ये मूल्य भारत ही नहीं पूरे विश्व की पूंजी हैं....गाँधी जयंती की बधाई व के.के. जी को इस अनुपम प्रस्तुति के लिए साधुवाद.

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. बेहद सुन्दर आलेख.

    गाँधी जयंती की बधाई.

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  5. गाँधी जी दुनिया के एकमात्र लोकप्रिय व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वयं को लेकर अभिनव प्रयोग किए और आज भी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, आर्थिक मुद्दों पर उनकी नैतिक सोच व धर्म-सम्प्रदाय पर उनके विचार प्रासंगिक हैं ...पर दुर्भाग्य से गाँधी जी के नाम पर राजनीती करने वालों ने ही उनके विचारों को तिलांजलि दे दी.

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  6. गाँधी जयंती की शुभकामनायें.
    बहुत सुंदर लिखा आपने. आपके विचारबिल्कुल सही है.

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  7. बहुत खूब के.के. जी, आपने तो गाँधी जी को वर्तमान दौर में बखूबी प्रस्तुत किया है. गाँधी व शास्त्री जयंती की सभी को बधाइयाँ.

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  8. गाँधी जी इस धरती पर मानवता के अवतार थे..उन पर आपने उम्दा लिखा है.गाँधी जयंती की बधाई.

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  9. Gandhi ji ke vicharon par bahut sundar post...aj bhi unke vichar utne hi prasangik hain !!

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  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  11. गाँधी जयंती की शुभकामनायें.
    गाँधी एक विचार के रूप में सदैव जिन्दा रहेंगें. ओबामा तक उन्हें अपना प्रेरणा-स्रोत मानते हैं.

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  12. आज के दिन महात्मा गाँधी पर एक उम्दा एवं प्रासंगिक लेख. आज जरुरत गाँधी जी के विचारों को समझने की है...आखिर यूँ ही मुन्ना भाई जैसी फिल्में हिट नहीं होती हैं.

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  13. मैं तो आज भी गाँधी बाबा का दीवाना हूँ. साहित्यशिल्पी पर कृष्ण कुमार जी का लाजवाब आलेख देखकर टिपण्णी करने से रोक नहीं पाया....गाँधी बाबा की जय हो !!

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  14. gandhji apane aap men ek yug purush the kafi kahane ke baad bhi adhura hi rahega

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