विजेन्द्र जी नें जब से फोन पर अपने गुडगाँव पहुँचने की सूचना दी थी, उनसे मिलने को आतुरता हो चली थी। रविवार 11 तारीख की सुबह उन्हे मैनें फोन किया, विजेन्द्र जी का अपने डॉक्टर के साथ अपायंटमेंट था तथापि उन्होंने अपरान्ह मिलने का समय दे दिया। साहित्य शिल्पी से मेरे साथ अजय यादव और अभिषेक सागर भी थे।
चौहत्तर वय के कवि विजेन्द्र उर्जा से भरे हुए हैं। हिन्दी कविता का एक युग देखने वाले विजेन्द्र स्वयं भी कविता का एक युग हैं। उनसे मिलने के पूर्व मेरे मन में उनके लिये “एक कट्टर मार्क्सवादी” की छवि थी और मेरी तैयारी भी उसी दिशा में थी कि उनसे कविता और उसमें विचारधारा की अनिवार्यता, कविता में जनपक्षधरता आदि आदि आयामों पर ही चर्चा करनी है।
विजेन्द्र जी के निवास पर प्रविष्ठ होते ही हमारे मन के कुछ मिथक टूटने आरंभ हुए, विजेन्द्र शुष्क कवि नहीं है वे भावनाओं से आकंठ भरे सर्जक हैं और सतरंगे भी हैं। दीवारों पर उनकी अनेकों पेंटिंग लगी हुई थी, सभी बोलते बात करते चित्र। सभी चित्र अपने आप में पूरी कविता और फिर हमें ज्ञात हुआ कि अपनी कितनी ही कविताओं को उन्होने कूची से निरंतर साकार भी किया है।
हमारे पास प्रश्नों की कमी नहीं थी। हम जानना चाहते थे कि विजेन्द्र जी की रचनाधर्मिता की क्या परिभाषा है? उनका जीवन और उससे जुड़े संघर्षों हमारी जिज्ञासा थे। हमें उत्कंठा थी कि उनकी परिपाटी में समकालीन साहित्य क्या है? मुख्यधारा को वे किस प्रकार देखते हैं? हम जानना चाहते थे कि जिस आम आदमी के लिये कविता कही जाती है वही उसकी सामान्य समझे से बेहद परे लिखी जाती है। आम आदमी से दूर कविता, कवियों और समालोचकों की वाह वाही पा कर ही क्या जनपक्षधरता की सही नुमायत करती है? और यह भी कि कविता को विचारधारा की कितनी आवश्यकता है? अलग अलग विचारधाराओं के संघर्ष में पिसती हिन्दी कविता का क्या भविष्य़ होगा?

प्रश्न अनेकों थे कुछ विजेन्द्र जी की कविताओं पर तो कुछ उनकी भाषा और शैली को ले कर। हमें उनसे यह कारण जानना था कि अन्य भाषाओं की पुस्तकें न केवल बडे पाठक वर्ग तक पहुचती हैं बल्कि उनके हिन्दी अनुवाद भी हाँथो हाथ लिये जाते हैं, वहीं हिन्दी के लेखक/ कवि जमीन तलाशते रह जाते हैं? साथ ही साथ यह भी कि लघु पत्रिका “कृति ओर” के सम्पादक के रूप में उनके क्या अनुभव रहे? लघुपत्रिकायें सिमटती जा रही हैं? इसके क्या कारण हो सकते हैं? हमें उत्कंठा थी कि विजेन्द्र जी जो कि 1960 से निरंतर डायरी लेखन कर रहे हैं इस जीवंत इतिहास को किस तरह प्रस्तुत करना चाहते हैं?
विजेन्द्र जी नें स्मित मुस्कान के साथ हमारे प्रश्नों का स्वागत किया और फिर प्रश्नावली को अपने पास ही रख लिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक प्रश्न चिंतन माँगता है और मैं इनके लिखित उत्तर देना चाहूंगा। इसके साथ ही हमारी बातचीत तकनीक और उसमें हिन्दी की उपस्थ्ति की ओर बढ गयी। साहित्य शिल्पी को उन्होंने न केवल सराहा बल्कि हिन्दी को तकनीक से जोडे जाने की आवश्यकता पर विस्तृत बातचीत की। साहित्य शिल्पी पर प्रकाशित अपनी रचनाओं/संस्मरणों/ आलेखों साथ ही कविताकोष पर अपने पृष्ठ को देख कर उन्हें प्रसन्नता हुई। यद्यपि पत्रिकाओं की महत्ता पर उन्होंने जोर देते हुए कहा कि तकनीक के युग में भी प्रकाशित रचनाओं का महत्व कम नहीं होता।
बात चीत के बीच बीच में वे सधी हुई अंग्रेजी में वार्तालाप करने लगते। अंग्रेजी का प्राध्यापक और हिन्दी का कवि यह सुयोग ही है। विजेन्द्र जी किसी विषय पर बिना चिंतन के नहीं बोलते साथ ही उनके मुख से निकले एक एक वाक्य पर गहन चिंतन संभव है। विजेन्द्र परंपरा के समर्थक प्रतीत होते हैं तथा गिरते हुए सामाजिक मूल्यों के प्रति चिंतित हैं। वे कवि होने की अनिवार्य शर्त मानते हैं अपनी संस्कृति और पुरातनता का ज्ञान, शायद इसी लिये उनके नाटक और कुछ रचनायें अतीत से आती हैं यहाँ तक कि महाभारत और पुराण-उपनिषदों के पृष्ठ भी उलटती है।
विजेन्द्र अपनी विचारधारा के प्रति व्यापक दृष्टिकोण रखते हैं उन्होंने कहा - विचारधारा कविता में एसी ही है जैसे कृष्ण, मीरा की विचारधारा थी और राम, तुलसी की।

वे मार्क्सवाद का सही अर्थ समझे जाने की वकालत करते हुए साहित्य में उसकी उपादेयता समझाते हैं। उनसे बातचीत यह दर्शाती है कि वे लोक को समर्पित कवि हैं और रहेंगे। लोक और लोकधर्मी कविता परंपरा निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, और केदारनाथ अग्रवाल से होती हुई विजेन्द्र जी की लेखनी की धारा बनी रही है। उनके विचार युग-प्रवर्तक हैं और युगों युगों तक समय का सत्य रहेंगे। यह मुलाकात अविस्मरणीय रही।

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साहित्य शिल्पी पर विजेन्द्र जी का साक्षात्कार शीघ्र प्रस्तुत होगा। साहित्य शिल्पी के लिये उहोंने अपने स्वर में कुछ कवितायें प्रस्तुत की हैं जिन्हें हम समय समय पर प्रस्तुत करते रहेंगे। बहुत शीघ्र हम पेंटिंग-कविता श्रंखला के अंतर्गत विजेन्द्र जी की कवितायें और उनपर उनकी ही पेंटिंग प्रस्तुत करने जा रहे हैं - साहित्य शिल्पी

18 comments:

  1. कवि विजेन्द्र से मुलाकात का धन्यवाद। लिविंग लिजेंड्स से मुलाकात है यह।

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  2. बहुत अच्छी मुलाकात है सचित्र होने के कारण सजीव भी है। साक्षात्कार के इंतजार में -

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  3. पंकज सक्सेना14 अक्तूबर 2009 को 7:13 am

    चित्र अच्छे हैं कविवर से मुलाकात भी अच्छी रही जिसे आपने रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया है।

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  4. प्रस्तुति का आभार। विजेन्द्र जी को साहित्य शिल्पी पर पढने की प्रतीक्षा रहेगी।

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  5. मुलाकात का विवरण पसंद आया...साक्षात्कार का इन्तजार है.

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  6. इस मुलाकात के लिये आभार। अपने समय के स्थापित रचनाकारों से मिल कर बहुत कुछ सीखने को मिल जाता है।

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  7. अच्‍छा लगा पढकर .. साक्षात्‍कार का इंतजार रहेगा !!

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  8. मुलाकात पढ कर अच्छा लगा। विजेन्द्र जी को करीब से जानने की यह प्रसंशायोग्य कोशिश है। साहित्य शिल्पी बहुत अच्छा काम कर रही है।

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  9. विजेन्द्र जी से मुलाकात मेरे लिये एक बडा अनुभव रहा।

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  10. कथ्य की बात है कि - लोक और लोकधर्मी कविता परंपरा निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, और केदारनाथ अग्रवाल से होती हुई विजेन्द्र जी की लेखनी की धारा बनी रही है। उनके विचार युग-प्रवर्तक हैं और युगों युगों तक समय का सत्य रहेंगे।

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  11. रोचक भाषा में मुलाकात प्रस्तुत हुआ है। आम तौर पर इस तरह के लेख नीरस होते हैं लेकिन राजीव जी आपनें इसे आमने सामने की मुलाकात बना दिया।

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  12. हिन्दी-हिन्दु-हिन्दुस्तान14 अक्तूबर 2009 को 12:09 pm

    विजेन्द्र जी के साक्षात्कार की प्रतीक्षा है।

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  13. रू-ब-रू कराने के लिये आभार।

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  14. विजेन्द्र जी को साहित्य शिल्पी पर लाने की बधाई स्वीकार करें।

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  15. विजेन्द्र जी से मुलाकात का सुन्दर चित्रण... राजीव जी व्यक्तिगत व्यस्तता के कारण मैं इस मुलाकात से वंचित रह गया... इसका अफ़सोस रहेगा.

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  16. SHRI VIJENDRA SE AAPKEE MULAKAAT
    MUN KO BHAA GAYEE HAI.CHITRON SE
    SITE KHIL UTHEE HAI.BADHAAEE.

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  17. व्यस्त रहने के कारण मैं पहले नहीं देख पाया।आज इतने दिन बाद यह प्रस्तुति देख पाया हूँ। वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी पर कुछ कहना सूरज को दीया दिखाने के बराबर ही है। वे लोक-चित्त के बहुत बड़े कवि हैं और मुझे उनका सान्निध्य भी प्राप्त रहा है,इसलिये भाग्यशाली भी हूं। राजीव रंजन जी ने उनके साथ एक दिन का अनुभव बताकार बहुत सृजनात्मक कार्य किया है। आभारी हूँ।

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