भारतीय उत्सवों को लोकरस और लोकानंद का मेल कहा गया है। भूमण्डलीकरण एवं उपभोक्तावाद के बढ़ते दायरों के बीच इस रस और आनंद में डूबा भारतीय जन-मानस आज भी न तो बड़े-बड़े माल और क्लबों में मनने वाले फेस्ट से चहकार भरता है और न ही किसी कम्पनी के सेल आफर को लेकर आन्तरिक उल्लास से भरता है। त्यौहार सामाजिक सदाशयता के परिचायक हैं न कि हैसियत दर्शाने के। त्यौहार हमें जीवन के राग-द्वेष से ऊपर उठाकर एक आदर्श समाज की स्थापना में मदद करते हैं।

रचनाकार परिचय:-
कृष्ण कुमार यादव का जन्म 10 अगस्त 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ0 प्र0) में हुआ। आपनें इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नात्कोत्तर किया है। आपकी रचनायें देश की अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं साथ ही अनेकों काव्य संकलनों में आपकी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। आपकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं: अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह), इण्डिया पोस्ट-150 ग्लोरियस इयर्स (अंग्रेजी), अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह), क्रान्ति यज्ञ:1857-1947 की गाथा।
आपको अनेकों सम्मान प्राप्त हैं जिनमें सोहनलाल द्विवेदी सम्मान, कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान, काव्य गौरव, राष्ट्रभाषा आचार्य, साहित्य-मनीषी सम्मान, साहित्यगौरव, काव्य मर्मज्ञ, अभिव्यक्ति सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, साहित्य श्री, साहित्य विद्यावाचस्पति, देवभूमि साहित्य रत्न, सृजनदीप सम्मान, ब्रज गौरव, सरस्वती पुत्र और भारती-रत्न से आप अलंकृत हैं। वर्तमान में आप भारतीय डाक सेवा में वरिष्ठ डाक अधीक्षक के पद पर कानपुर में कार्यरत हैं।

दीपावली भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्यौहार है जिसका बेसब्री से इंतजार किया जाता है। दीपावली माने दीपकों की पंक्ति। दीपावली पर्व के पीछे मान्यता है कि रावण-वध के बीस दिन पश्चात भगवान राम अनुज लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ चौदह वर्षों के वनवास पश्चात अयोध्या वापस लौटे थे। जिस दिन श्री राम अयोध्या लौटे, उस रात्रि कार्तिक मास की अमावस्या थी अर्थात आकाश में चाँद बिल्कुल नहीं दिखाई देता था। ऐसे माहौल में नगरवासियों ने भगवान राम के स्वागत में पूरी अयोध्या को दीपों के प्रकाश से जगमग करके मानो धरती पर ही सितारों को उतार दिया। तभी से दीपावली का त्यौहार मनाने की परम्परा चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आज भी दीपावली के दिन भगवान राम, लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ अपनी वनवास स्थली चित्रकूट में विचरण कर श्रद्धालुओं की मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। यही कारण है कि दीपावली के दिन लाखों श्रद्धालु चित्रकूट में मंदाकिनी नदी में डुबकी लगाकर कामाद्गि की परिक्रमा करते हैं और दीप दान करते हैं। दीपावली के संबंध में एक प्रसिद्ध मान्यतानुसार मूलत: यह यक्षों का उत्सव है। दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते। दीपावली पर रंग-बिरंगी आतिशबाजी, लजीज पकवान एवं मनोरंजन के जो विविध कार्यक्रम होते हैं; वे यक्षों की ही देन हैं।


सभ्यता के विकास के साथ यह त्यौहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मी जी की देव तथा मानव जातियों में। कई जगहों पर अभी भी दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ कुबेर की भी पूजा होती है। गणेश जी को दीपावली पूजा में मंचासीन करने में शैव-सम्प्रदाय का काफी योगदान है। ऋद्धि-सिद्धि के दाता के रूप में उन्होंने गणेश जी को प्रतिष्ठित किया। यदि तार्किक आधार पर देखें तो कुबेर जी मात्र धन के अधिपति हैं जबकि गणेश जी संपूर्ण ऋद्धि-सिद्धि के दाता माने जाते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी जी मात्र धन की स्वामिनी नहीं वरन् ऐश्वर्य एवं सुख-समृद्धि की भी स्वामिनी मानी जाती हैं। अत: कालांतर में लक्ष्मी-गणेश का संबध लक्ष्मी-कुबेर की बजाय अधिक निकट प्रतीत होने लगा। दीपावली के साथ लक्ष्मी पूजन के जुड़ने का कारण लक्ष्मी और विष्णु जी का इसी दिन विवाह सम्पन्न होना भी माना गया है। दीपावली से जुड़ी एक अन्य मान्यतानुसार राजा बलि ने देवताओं के साथ देवी लक्ष्मी को भी बन्दी बना लिया। देवी लक्ष्मी को मुक्त कराने भगवान विष्णु ने वामन का रूप धरा और देवी को मुक्त कराया। इस अवसर पर राजा बलि ने भगवान विष्णु से वरदान लिया था कि जो व्यक्ति धनतेरस, नरक-चतुर्दशी व अमावस्या को दीपक जलाएगा; उस पर लक्ष्मी की कृपा होगी। तभी से इन तीनों पर्वों पर दीपक जलाया जाता है और दीपावली के दिन ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी एवं विवेक के देवता व विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। धनतेरस के दिन धन एवं ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी की दीपक जलाकर पूजा की जाती है और प्रतीकात्मक रूप में लोग सोने-चांदी व बर्तन खरीदते हैं। धनतेरस के अगले दिन अर्थात कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाने की परंपरा है। पुराणों के अनुसार इसी दिन भगवान कृष्ण ने राक्षस नरकासुर का वध किया था। नरक चतुर्दशी पर घरों की धुलाई-सफाई करने के बाद दीपक जलाकर दरिद्रता की विदाई की जाती है। वस्तुत: इस दिन दस महाविद्या में से एक अलक्ष्मी धूमावती की जयंती होती है। अलक्ष्मी दरिद्रता की प्रतीक हैं, इसीलिए चतुर्दशी को उनकी विदाई कर अगले दिन अमावस्या को दस महाविद्या की देवी कमलासीन माँ लक्ष्मी देवी कमला की पूजा की जाती है। नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली भी कहा जाता है। दीपावली के दिन लोग लइया, खील, गट्टा, लड्डू इत्यादि प्रसाद के लिए खरीदते हैं और शाम होते ही वंदनवार व रंगोली सजाकर लक्ष्मी-गणेश की पूजा करते हैं और फिर पूरे घर में दीप जलाकर माँ लक्ष्मी का आवाह्न करते हैं। व्यापारी वर्ग पारंपरिक रूप से दीपावली के दिन ही नई हिसाब-बही बनाता है और किसान अपने खेतों पर दीपक जलाकर अच्छी फसल होने की कामना करते हैं। इसके बाद खुशियों के पटाखों के बीच एक-दूसरे से मिलने और उपहार व मिठाइयों की सौगात देने का सिलसिला चलता है।

दीपावली का त्यौहार इस बात का प्रतीक है कि हम इन दीपों से निकलने वाली ज्योति से सिर्फ अपना घर ही रोशन न करें वरन् इस रोशनी में अपने हृदय को भी आलोकित करें और समाज को राह दिखाएं। दीपक सिर्फ दीपावली का ही प्रतीक नही वरन् भारतीय सभ्यता में इसके प्रकाश को इतना पवित्र माना गया है कि मांगलिक कार्यों से लेकर भगवान की आरती तक इसका प्रयोग अनिवार्य है। यहाँ तक कि परिवार में किसी की गंभीर अस्वस्थता अथवा मरणासन्न स्थिति होने पर दीपक बुझ जाने को अपशकुन भी माना जाता है। अगर हम इतिहास के गर्भ में झाँककर देखें तो सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे व मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की श्रृंखला थी। इसमें कोई शक नहीं कि दीपकों का आविर्भाव सभ्यता के साथ ही हो चुका था पर दीपावली का जन-जीवन में पर्व रूप में आरम्भ श्री राम के अयोध्या आगमन से ही हुआ।

भारत के विभिन्न राज्यों में इस त्यौहार को विभिन्न रूपों मे मनाया जाता है। वनवास पश्चात श्री राम के अयोध्या आगमन को उनका दूसरा जन्म मान केरल में कुछ अदिवासी जातियाँ दीपावली को राम के जन्म-दिवस के रूप में मनाती हैं। गुजरात में नमक को साक्षात् लक्ष्मी का प्रतीक मान दीपावली के दिन नमक खरीदना व बेचना शुभ माना जाता है तो राजस्थान में दीपावली के दिन घर में एक कमरे को सजाकर व रेशम के गद्दे बिछाकर मेहमानों की तरह बिल्ली का स्वागत किया जाता है। बिल्ली के समक्ष खाने हेतु तमाम मिठाइयाँ व खीर इत्यादि रख दी जाती हैं। यदि इस दिन बिल्ली सारी खीर खा जाये तो इसे वर्ष भर के लिए शुभ व साक्षात् लक्ष्मी का आगमन माना जाता है। उत्तरांचल के थारू आदिवासी अपने मृत पूर्वजों के साथ दीपावली मनाते हैं तो हिमाचल प्रदेश में कुछ आदिवासी जातियाँ इस दिन यक्ष पूजा करती हैं। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में दीपावली को काली पूजा के रूप में मनाया जाता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस को आज ही के दिन माँ काली ने दर्शन दिए थे, अत: इस दिन बंगाली समाज में काली पूजा का विधान है। यहाँ पर यह तथ्य गौर करने लायक है कि दशहरा-दीपावली के दौरान पूर्वी भारत के क्षेत्रों में देवी के रौद्र रूपों को पूजा जाता है; वहीं उत्तरी व दक्षिण भारत में देवी के सौम्य रूपों अर्थात लक्ष्मी, सरस्वती व दुर्गा माँ की पूजा की जाती है।

ऐसा नहीं है कि दीपावली का सम्बन्ध सिर्फ हिन्दुओं से ही रहा है वरन् दीपावली के दिन ही भगवान महावीर के निर्वाण प्राप्ति के चलते जैन समाज दीपावली को निर्वाण दिवस के रूप में मनाता है तो सिक्खों के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर की स्थापना एवं गुरू हरगोविंद सिंह की रिहाई दीपावली के दिन होने के कारण इसका महत्व सिक्खों के लिए भी बढ़ जाता है। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी वर्ष 1833 में दीपावली के दिन ही प्राण त्यागे थे। देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी दीपावली का त्यौहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। वर्ष 2005 में ब्रिटिश संसद में दीपावली-पर्व के उत्सव पर भारतीय नृत्य, संगीत, रंगोली, संस्कृत मंत्रों के उच्चारण व हिन्दू देवी-देवताओं की उपासना का आयोजन किया गया। ब्रिटेन के करीब सात लाख हिंदू इस पर्व को उत्साह से मनाते हैं। सन् 2004 में तो ब्रिटेन ने इस पर्व पर डाक-टिकट भी जारी किया था। अमेरिका के व्हाइट हाउस में भी दीपावली का त्यौहार औपचारिक रूप से आयोजित करने की माँग उठ रही है।

भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी धनदेवी लक्ष्मी के कई नाम और रूप मिलते हैं। धनतेरस को लक्ष्मी का समुद्र मंथन से प्राकट्य का दिन माना जाता है। भारतीय परम्परा उल्लू को लक्ष्मी जी का वाहन मानती है पर तमाम भारतीय ग्रन्थों में कुछ अन्य वाहनों का भी उल्लेख है। महालक्ष्मी स्त्रोत में गरूड़ तो अथर्ववेद के वैवर्त में हाथी को लक्ष्मी जी का वाहन बताया गया है। प्राचीन यूनान की महालक्ष्मी एथेना का वाहन भी उल्लू है। लेकिन प्राचीन यूनान में धन सम्पदा की देवी के तौर पर पूजी जाने वाली‘हेरा का वाहन मयूर है। तमाम देशों में लक्ष्मी पूजन के पुरातात्विक प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं। कम्बोडिया में मिली एक मूर्ति में शेषनाग पर आराम कर रहे विष्णुजी के पैर एक महिला दबा रही है, जो लक्ष्मी है। कम्बोडिया में ही लक्ष्मी की कांस्य प्रतिमा भी मिली है। प्राचानी यूनानी सिक्कों पर लक्ष्मी की आकृति उत्कीर्ण है। रोम के लम्पकश से प्राप्त एक चाँदी की थाली पर भी लक्ष्मी की आकृति है। इसी प्रकार श्रीलंका के पोलेरूमा में पुरातात्विक खनन के दौरान अन्य भारतीय देवी-देवताओं के साथ-साथ लक्ष्मी की मूर्ति प्राप्त हुई थी। नेपाल, थाइलैण्ड, जावा, सुमात्रा, मारीशस, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका, जापान इत्यादि देशों में धन की देवी की पूजा की जाती है। यूनान में आइरीन, रोम में डिआ लुक्री, प्राचीन रोम में देवी फार्चूना, तो ग्रीक परम्परा में दमित्री को धन की देवी रूप में पूजा जाता है। जिस तरह भारतीय संस्कृति में लक्ष्मी-काली-सरस्वती का धार्मिक महत्व है, उसी प्रकार यूरोप में एथेना-मिनर्वा-एलोरा का महत्व है।

दीपवाली के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा की जाती है। इस पर्व पर गाय के गोबर से गोवर्धन की मानव आकृति बना उसके चारों तरफ गाय, बछडे और अन्य पशुओं के साथ बीच में भगवान कृष्ण की आकृति बनाई जाती है। इसी दिन छप्पन प्रकार की सब्जियों द्वारा निर्मित अन्नकूट एवं दही-बेसन की कढ़ी द्वारा गोवर्धन का पूजन एवं भोग लगाया जाता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत में यह पर्व हमें पशुओं मुख्यत: गाय, पहाड़, पेड़-पौधों, ऊर्जा के रूप में गोबर व अन्न की महत्ता बताता है। गाय को देवी लक्ष्मी का प्रतीक मानकर लक्ष्मी पूजा के बाद गौ-पूजा की भी अपने देश में परम्परा रही है। पौराणिक मान्यतानुसार द्वापर युग में अपने बाल्य काल में श्री कृष्ण ने नन्दबाबा, यशोदा मैया व अन्य ब्रजवासियों को बादलों के स्वामी इन्द्र की पूजा करते हुए देखा ताकि इंद्र देवता वर्षा करें और उनकी फसलें लहलहायें व वे सुख-समृद्धि की ओर अग्रसर हों। श्रीकृष्ण ने ग्रामवासियों को समझाया कि वर्षा का जल हमें गोवर्धन पर्वत से प्राप्त होता है न कि इंद्र की कृपा से। इससे सहमत होकर ग्रामवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा आरम्भ कर दी। श्रीकृष्ण ब्रजवासियों को इस बात का विश्वास दिलाने के लिए कि गोवर्धन जी उनकी पूजा से प्रसन्न हैं, पर्वत के अंदर प्रवेश कर गए व सारी सामग्रियों को ग्रहण कर लिया और अपने दूसरे स्वरूप में ब्रजवासियों के साथ खडे+ होकर कहा- देखो! गोवर्धन देवता प्रसन्न होकर भोग लगा रहे हैं। अत: उन्हें और सामग्री लाकर चढ़ाएं। इंद्र को जब अपनी पूजा बंद होने की बात पता चली तो उन्होंने अपने संवर्तक मेघों को आदेश दिया कि वे ब्रज को पूरा डुबो दें। भारी वर्षा से घबराकर जब ब्रजवासी श्रीकृष्ण के पास पहुँचे तो उन्होंने उनके दुखों का निवारण करने हेतु अपनी तर्जनी पर पूरे गोवर्धन पर्वत को ही उठा लिया। पूरे सात दिनों तक वर्षा होती रही पर ब्रजवासी गोवर्धन पर्वत के नीचे सुरक्षित रहे। सुदर्शन चक्र ने संवर्तक मेघों के जल को सुखा दिया। अंतत: पराजित होकर इंद्र श्रीकृष्ण के पास आए और क्षमा माँगी। उस समय सुरभि गाय ने श्रीकृष्ण का दुग्धाभिषेक किया और इस अवसर पर छप्पन भोग का भी आयोजन किया गया। तब से भारतीय संस्कृति में गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की परम्परा चली आ रही है।

कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी वाले भारतीय समाज में एक ही त्यौहार को मनाने के अन्दाज में स्थान परिवर्तन के साथ कुछ न कुछ परिवर्तन दिख ही जाता है। वक्त के साथ दीपावली का स्वरूप भी बदला है। पारम्परिक सरसों के तेल की दीपमालायें न सिर्फ प्रकाश व उल्लास का प्रतीक होती हैं बल्कि उनकी टिमटिमाती रोशनी के मोह में घरों के आसपास के तमाम कीट-पतंगे भी मर जाते हैं जिससे बीमारियों पर अंकुश लगता है। इसके अलावा देसी घी और सरसों के तेल के दीपकों का जलाया जाना वातावरण के लिए वैसे ही उत्तम है जैसे जड़ी-बूटियों युक्त हवन सामग्री से किया गया हवन। पर वर्तमान में जिस प्रकार बल्बों और झालरों का प्रचलन बढ़ रहा है, वह दीपावली के परम्परागत स्वरूप के ठीक उलटा है। एक ओर कोई व्यक्ति बीमार है तो दूसरी ओर अन्य लोग बिना उसके स्वास्थ्य की परवाह किए लाउडस्पीकर बजाए जा रहे हैं। एक व्यक्ति समाज में अपनी हैसियत दिखाने हेतु हजारों रुपये के पटाखे फोड़ रहा है तो दूसरी ओर न जाने कितने लोग सिर्फ एक समय का खाना खाकर पूरा दिन बिता देते हैं। एक अनुमान के अनुसार हर साल दीपावली की रात पूरे देश में करीब तीन हजार करोड़ रूपये के पटाखे जला दिए जाते हैं और करोड़ों रूपये जुए में लुटा दिए जाते हैं। क्या हमारी अंत:चेतना यह नहीं कहती कि करोड़ों रुपये के पटाखे छोड़ने के बजाय भूखे-नंगे लोगों हेतु कुछ प्रबन्ध किए जायें? क्या पटाखे फोड़कर व जोर से लाउडस्पीकर बजाकर हम पर्यावरण को प्रदूषित नहीं कर रहे हैं? त्यौहार के नाम पर सब छूट है के बहाने अपने को शराब के नशे में डुबोकर मारपीट व अभद्रता करना कहाँ तक जायज है? निश्चितत: इन सभी प्रश्नों का जवाब अगर समय रहते नहीं दिया गया तो अगली पीढ़ियाँ शायद त्यौहारों की वास्तविक परिभाषा ही भूल जायें।

14 comments:

  1. लेखनी प्रशस्त है, बांधती है, भाषा पठनीय है। रचना को पूरी पढ़ने की रुचि जगाती है। दीपावली की सुबह इस पर्व पर विशेष और विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करने के लिए आपको साधुवाद। शुभ दीपावली।

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  2. बहुत जानकारी मिली.

    सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
    दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
    खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
    दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

    -समीर लाल 'समीर'

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  3. दीपवली की शुभकामनाएन

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  4. दीपावली के रूपों से परिचित कराने का धन्यवाद। आपको व साहित्य शिल्पी परिवार को दीपवली की शुभकामनायें।

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  5. बहुत अच्छा आलेख है, दीपावली की मंगल कामनायें।

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  6. बढिया आलेख है !!
    पल पल सुनहरे फूल खिले , कभी न हो कांटों का सामना !
    जिंदगी आपकी खुशियों से भरी रहे , दीपावली पर हमारी यही शुभकामना !!

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  7. बहुत बढिया विचारणीय आलेख लिखा है।
    शुभ दीपावली।

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  8. दीपावली के शुभ अवसर पर शिल्पी परिवार की ओर से सभी को सुख शांति और आतंकरहित समय की शुभकामनायें

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  9. दीपावली के विभिन्न रूपों पर सुन्दर लेख....दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें.

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  10. आज के दिन के.के. जी की सुन्दर प्रस्तुति. दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें . आप सभी के जीवन में ये उजाला सदैव बना रहे.

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  11. आज के दिन के.के. जी की सुन्दर प्रस्तुति. दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें . आप सभी के जीवन में ये उजाला सदैव बना रहे.

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  12. दिवाली पर सविस्तार जानकारी देने के लिए कृष्ण जी को धन्यवाद!

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  13. कृष्ण कुमार जी,
    वर्षों से दीपावली मनाती आ रही थी परन्तु इस पर्व पर इतनी विस्तृत जानकारी पहली बार मिली. एक सारगर्भित,विषय - प्रधान बहुआयामी ज्ञानवर्धक आलेख के लिए धन्यवाद.
    सहज भाषा के माध्यम से विषय का व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण लेखक की क्षमता का द्योतक है.
    __किरण सिन्धु.

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