कारों पर लूट और गाय पर नहीं है अब दिल्‍ली में घूमने की भी छूट। आप जानते ही हैं कि दीपावली आ रही है, एक ही बात है कि हम दीपावली की ओर भागे जा रहे हैं। कार कंपनियां विज्ञापन छाप छाप कर और टी वी पर दिखा दिखाकर छाप छोड़ रही हैं कि हमें खरीद लो। हमारे उपर हजारों रूपये की छूट दी जा रही है। इस छूट को लूटने के लिए बैंको से भी लोन मिलने आसान हो गए हैं। माल नहीं है फिर भी कार से मालामाल हो जाइये। लोन लेकर कार ले आइये पर कोई चैनल या अखबार यह नहीं कह रहा है कि गाय ले आइये या कोई बैंक कह रहा हो कि गाय खरीदने के लिए बिना ब्‍याज के लोन ले जाइये।

आप सोचेंगे कि अभी तो कार की बात चल रही थी और आपने गाय चलानी शुरू कर दी। कॉमनवेल्‍थ खेलों के मद्देनजर मामला गर्म है दिल्‍ली नगर निगम नहीं चाहता कि दिल्‍ली में गाय रहें। कार रह सकती हैं। निगम ने जगह जगह पर कारों के लिए पार्किंग स्‍थल चालू कर रखे हैं जिनसे रोजाना हजारों रूपयों की कमाई हो रही है। जैसे नियम बनाये जाने वाले हैं उनके अनुसार दिल्‍ली शहर में अब गाय नहीं रहेगी।

गाय दुधारू तो हो सकती है परन्‍तु एक लिमिट तक ही दूध देगी और कार की पार्किंग की जगह में एक दिन में आधा आधा घंटे के अंतराल पर 12 घंटे में ही 24 कारें पार्क होंगी और 15 रुपये की दर से 360 रुपये की कमाई निगम को हो जाएगी। पार्किंग वाले ने हेराफेरी भी कर ली तो 300 तो कहीं नहीं गये। कार बिना ड्राइवर के अकेले कहीं घूमने नहीं जा सकती है जबकि गाय को मालिक की जरूरत ही नहीं है। वो तो जहां दिल आयेगा मुंह उठायेगी और ट्रैफिक कंट्रोल करने चल देगी। बीच यातायात में खड़ी हो जाएगी, शहर की गति को एकाएक ब्रेक लग जायेंगे क्‍योंकि अगर ब्रेक नहीं लगाये तो गाय में ठुक जायेंगे और गाय में ठुकने के बाद ... पता नहीं कौन कहां कहां पर ठोक दे।

गाय से तो बचकर चलना पड़ता है। अब यह गेम तो है नहीं, गाय रेस तो होती नहीं है कार रेस की तरह। अगर रेस हो रही होती तो जैसे घोड़े पालने पर रोक नहीं लगाई गई है उसी तरह से गाय पालने पर रोक नहीं लगाई जाती। कार पालने पर रोक लगाते सुना है आपने। चाहे कितना ही ट्रैफिक बढ़ जाये। चलने की जगह रेंगने लगे और जब रेंगते रेंगते भी थक जाए तो थम जाए पर कारों की बिक्री नहीं थमनी चाहिए। इससे देश की प्रगति का पैमाना तय होता है। जितनी कारें बिकती हैं उतना देश की तरक्‍की का जायजा विश्‍व को मिलता है।

तो जो गाय प्रेमी चाहते हैं कि गाय शहर में रहे, दिल्‍ली में रहे तो कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स शुरू होने से पहले ही गाय रेस का प्रस्‍ताव सरकार के पास मंजूरी के लिए भेज दें जिससे गाय शहर में ठहर सके। इस मामले पर अभी तक मेनका गांधी जी ने भी अपनी टिप्‍पणी नहीं दी है क्‍योंकि गाय को शहर से बाहर करना किसी अत्‍याचार की श्रेणी में नहीं आता है।

जिस प्रकार घोड़ों की रेस के चलते घोड़ों को शहर से बाहर नहीं किया जा रहा है। गधा मासूम है वो तो पहले भी न तो घर का है और न घाट का इसलिए उसे भी नये नियमों में छेड़ा नहीं गया है। आफत तो कुत्‍तों की भी आने वाली है पर वे गाय की तरह सीधे सादे नहीं होते हैं और गाय की तरह अल्‍पसंख्‍यक भी नहीं हैं, चाहे गाय को बहुसंख्‍यकों की सहानुभूति हासिल है पर गाय का शहर से बाहर जाना लगभग तय हो चुका है। कुत्‍तों के काटने के डर से डर सभी को लगता है। बंदरों को बाहर करने के लिए बहुत कोशिशें की गई हैं पर बंदर तो आखिर बंदर हैं, वे गांधीजी के भी तो लाडले हैं। सूअरों से वैसे भी स्‍वाइन फ्लू के चलते सरकार भी भीतर से भयभीत है, उन्‍हें खदेड़ना नहीं चाहती।

आखिर ले देकर गाय ही रह जाती है जिसको दिल्‍ली से बाहर करने की मुहिम चालू हो चुकी है। इनको बचाने के लिए भला कौन आयेगा ? एक बार माननीया मुख्‍यमंत्री जी ने बिहारियों को बाहर करने की कोशिश की थी, वो भी परवान नहीं चढ़ सकी। मेनका जी की ओर अपलक मासूम भीगे नयनों से गाय निहार रही है पर लगता है उन्‍होंने भी मुंह फेर लिया है। नेताओं से तो गाय को उम्‍मीद भी नहीं है।

गाय पर अभी तक बचपन में कक्षाओं में निबंध लिखे जाते थे जिसमें उसका नख शिख वर्णन किया जाता था परंतु अब विषय बदलकर गाय के शहर से बाहर किए जाने के कारणों पर प्रकाश डालने के लिए विद्यार्थियों से कहा जाया करेगा। वैसे आपकी क्‍या राय है दिल्‍ली में कार रहनी चाहिए या गाय ? जल्‍दी बतलायें कहीं देर न हो जाये और गाय का शहर में होना अतीत की स्‍टोरी बन जाये।

15 comments:

  1. सही सवाल उठाया है अविनाश जी नें।

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  2. विषय भी अच्छा चुना है और कटाक्ष भी गहरा है।

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  3. अविनाश जी व्यंग की गेन्द से क्लीनबोल्ड कर दिया हमें।

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  4. गहरा व्यंग्य है।
    अविनाश जी इस विधा के वरदहस्त हैं। दीप-पर्व की शुभकामनायें।

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  5. अविनाश भाई हम तो गाय पे निबन्ध इस लिये भी याद रखते थे कि किसी और विषय पर लिखने को कहा जाय वहा भी गाय के निबन्ध को काम मे ले लो
    क्योकि भारत मे जहा जाओ गाय तो होती ही थोडा सा इधर उधर क लिखके गाय पे शुरु हो जाओ.

    बिषय बहुत सामयिक है लेकिन लगता है बहुत देर हो चुकी है शहरो मे़ अब गाय बूचड्खाने के अलावा कही नज़र नही आती.

    मेरे बहुत आदरणीय मित्र श्री एस के मित्तल जी इस बिषय पर बहुत सन्जीदगी और तन मन धन के साथ काम कर रहे है
    http://gaumata.blogspot.com
    http://gaumata.blogspot.com/?zx=829f78c6c4c6a4a1

    http://www.orkut.co.in/Main#AlbumZoom?uid=654144504913307508&pid=1251047880472&aid=1251022199$pid=1251047880472

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  6. बहुत गहरा व्यंग्य है अविनाशजी लेकिन गायों के शहर में आने से तकलीफ इंसानों को भी होगी और गायों को भी ,और पशु प्रेमियों के लिए तो यह एक मुद्दा बन जाएगा.हर रोज़ विभिन्न चानेलों पर सिर्फ गाये ही दिखेंगी .भाई गायों का सही स्थान तो गाँव और गौशाला में ही है.

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  7. GOVARDHAN POOJA KE AWSAR PAR GAU MATA KEE OR DHYAN KHINCHA AAPNE... EAK AUR UMDA VYANG KE LIYE BADHAI !

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  8. सार्थक और समसामयिक व्यंग्य रचना।

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  9. आक्रामक सच को कहने का आपका अंदाजे बयां कुछ और है।

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  10. बेहतरीन व्यंग्य है ....आनंद आ गया

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  11. आपकी टिप्‍पणियां गाय माता के प्रति स्‍नेह की मिसाल हैं।

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