आज छ्ठ पूजा और उससे जुड़ा महात्म्य किसी से छुपा हुआ नहीं है। “सूर्य” - हमारी समस्त शक्ति और उर्जा के स्त्रोत; इस महान पूजन के आराध्य हैं। सूर्य षष्ठी या छठ पर्व दीपावली के छ: दिनों बाद मनाया जाता है। इस पर्व में मुख्यत: सूर्याराधना होती है। इस पर्व शुरूवात नहाय-खाय और खरना से शुरू होती है। नहाय-खाय के दौरान व्रतियों द्वारा स्नान कर कद्दू की सब्जी व अरवा चावल का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। खरना के अवसर पर दूध और गुड़ से बने खीर प्रसाद (तस्मई) का काफी महत्व होता है व्रती इसे ही ग्रहण करतें हैं, इसके साथ ही शुरू हो जाता है 36 घंटे का निराहार व्रत। नवनिर्मित चूल्हे पर आम की लकड़ी के द्वारा प्रसाद बनाए जाते हैं। इस महापर्व के तीसरे दिन व्रतधरी अस्ताचलगामी सूर्य को; नदी या तलाब में खड़े होकर प्रथम अर्घ्य अर्पित करते हैं। छठ पर्व के चौथे और अन्तिम दिन पुनः उदीयमान सूर्य को दूसरा अर्घ्य देने के साथ ही यह पर्व समाप्त हो जाता है।

उत्तर-भारत विशेष कर बिहार तथा उत्तर प्रदेश में इस व्रत को मुख्य रूप से मनाया जाता है। यद्यपि अब यह संपूर्ण भारत में मनाया जाने वाला पर्व हो गया है। इस पर्व में लोकगीतों का अत्यंत महत्व है। छठ त्यौहार के लोकगीतों को ध्यान से सुना जाये तो वे समस्त प्राणियों की मंगलकामना के गीत हैं। छठ वैसे भी जागृत पर्व कहा जाता है एसी मान्यता है कि व्रती खाली हाँथ नहीं रहता। कुछ लोग गीतों का उदाहरण लीजिये:-

नरियवा जे फरेला घवद से
ओ पर सुगा मेड़राय
सुगवा के मरबो धनुष से
सुगा गिरे मुरझाय
रोवें सुगा के सुगनिया
सुगा काहे मारल जाए
रखियों हम छठ के बरतिया
आदित होइहें सहाय
दीनानाथ होइहें सहाय
सूरूज बाबा होइहें सहाय

केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मंडाराय
जे खबरी जनइबो आदित से सुगा देले जुठियाए
जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरछाय,
जे सुगनी जे रोवे ले वियोग से आदित होइ न सहाय।

हाजीपूर लागल है बजरिया
ओमे नारियर बेचाय
चलले ..... सैइयाँ
देसहि ओसहि जब अइले
दिहले धनिया के हाथ धनि
ओके रखेली जतन से
बालक दिहले जुठिआये
ओजे तिवही जे रोयेली
वियोग से अरग कैसे दियाये
छठी माई जे हसे ली ठेठाई के
अरग लेब हम जरूर
जे हमरो देहलका बलकवा
बालक हउए हमार

कोसी भरे चलले .... सैइया
घुटी भर धोती भीजे
धोती मोरा भीजता त भीजे देही
कोसी मोरा जानी भीजे

पटु के पसारी भिक्षा
मांगी ते ..... सैईया हमरा के
अन्न धन देही हे छठी मईया हमरा के
अचरा दसाई भिक्षा
मांगी ले ... बबी हमरा के
पुत्र भिक्षा दीही हे छठी मईया हमरा के

हम त मगनी पीयर सूटवा
साडिया काहे ले अईल हो
सब फलवा त लइल बलम जी
नारियरवा काहे न लइल जी

चार दिवसीय इस महापर्व के दूसरे दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आस-पास के नदी, तालाब या सरोवरों में स्नान कर खीर-पूड़ी का प्रसाद भगवान सूर्य को अर्पण करतें हैं। छठ समाजिक सौहाद्र का भी प्रतीक है। इन दिनों सभी धर्मो के लोग इस पर्व को करते देखे गये हैं। छठ पूजा बहुत ही सावधानी व शुद्धि के साथ की जाती है कहते हैं कि इसमे कोई भी गलती होने पर तुरंत इसका फल मिलता है। छठ के नये स्वरूप भी अब देखे जा रहे हैं, महानगरों में यह उत्सव का स्वरूप लेनें लगा है। मुम्बई मे छठ पर्व अत्यंत उत्साह से मनाया जाता है जहाँ सभी धर्म व जाति के लोग नदी या समुद्र के किनारे आ जाते है और राष्ट्रीय एकता दिखायी पड़ती है।

6 comments:

  1. छठ पर बहुत सुंदर आलेख .. आपको छठ व्रत की शुभकामनाएं !!

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  2. 36 घंटे का निराहार व्रत।

    ऐसी श्रद्धा और कहाँ!!

    छठ पर्व के शुभ-अवसर पर मेरी तरफ़ से सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ!

    -विश्व दीपक

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  3. छठ पर्व की ढेरो बधाईयाँ और शुभकामनाएं...

    अर्श

    उत्तर देंहटाएं
  4. अच्छे लोकगीत पढवाके का धन्यवाद, छठ पूजा की बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. thanks jo aap ne ish parv ke bare me or vistar se likha app ka ye kam sarahniye hai

    उत्तर देंहटाएं

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