खरौद, महानदी के किनारे बिलासपुर से 64 कि. मी., जांजगीर-चांपा जिला मुख्यालय से 55 कि. मी., कोरबा से 105 कि. मी., राजधानी रायपुर से बलौदाबाजार होकर 120 कि. मी. और रायगढ़ से सारंगढ़ होकर 108 कि. मी. और शिवरीनारायण से मात्र 02 कि. मी. की दूरी पर बसा एक नगर है। शैव परम्परा यहाँ स्थित लक्ष्मणेश्वर महादेव और शैव मठ से स्पष्ट परिलक्षित होती है। जबकि शिवरीनारायण वैष्णव मठ, नारायण मंदिर और चतुर्भुजी मूर्तियों के कारण वैष्णव परम्परा का द्योतक है। संभवत: इसी कारण खरौद और शिवरीनारायण को क्रमश: शिवाकांक्षी और विष्णुकांक्षी कहा जाता है और इसकी तुलना भुवनेश्वर के लिंगराज और पुरी के जगन्नाथ मंदिर से की जाती है। प्राचीन काल में ज्रगन्नाथ पुरी जाने का रास्ता खरौद और शिवरीनारायण से होकर जाता था। भगवान जगन्नाथ को शिवरीनारायण से ही पुरी ले जाने की बात कही जाती है। इसी प्रकार यहाँ सतयुग और त्रेतायुग में मतंग ऋषि के गुरूकुल आश्रम होने की जानकारी मिलती है। शबरी ने यहीं रहकर निर्वासित जीवन व्यतीत किया और उनके जूठे बेर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण यहीं खाये थे...उनका उद्धार करके उनकी मंशानुरूप शबरीनारायण नगर बसाकर उनकी स्मृति को चिरस्थायी बना गए थे।
रचनाकार परिचय:-भारतेन्दु कालीन साहित्यकार श्री गोविं‍द साव के छठवी पीढी के वंशज के रूप में १८ अगस्त, १९५८ को सांस्कृतिक तीर्थ शिवरीनारायण में जन्मे अश्विनी केशरवानी वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, चांपा (छत्तीसगढ़) में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं।
वे देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तीन दशक से निबंध, रिपोर्ताज, संस्मरण एवं समीक्षा आदि लिख रहे हैं एवं आकाशवाणी के रायपुर एवं लासपुर केन्द्रों से उनकी अन्यान्य वार्ताओं का प्रसारण भी हुआ है। वे कई पत्रिकाओं के संपादन से भी सम्बद्ध हैं।
अब तक उनकी "पीथमपुर के कालेश्वरनाथ" तथा "शिवरीनारायण: देवालय एवं परम्पराएं" नामक पुस्तकें प्रकाशित हैं और कुछ अन्य शीघ्र प्रकाश्य हैं।

ऐसे पतित पावन नगर में पिकनिक जाने का पिछले दिनों प्रोग्राम बना। कालेज के छात्र-छात्राओं का विशेष आग्रह था कि मैं उनके साथ अवश्य चलूँ। वे सब मेरे लेखकीय दृष्टिकोण का लाभ उठाना चाहते थे। मैं भी खुश था, पिकनिक का पिकनिक और तीर्थयात्रा भी, यानी एक पंथ दो काज..। खरौद, चांपा से 65 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। हमने वहाँ बस से जाने का निर्णय किया। सबका मन बड़ा प्रसन्न था। निर्धारित तिथि में हम खरौद के लिए रवाना हुए।

रास्ता बहुत खराब होने के कारण हमारी बस हिचकोले खाती हुई धीरे धीरे चल रही थी..दूर से सेंचुरी सीमेंट और रेमंड सीमेंट (अब लाफार्ज सीमेंट) फैक्टरी से धुआँ उगलती चिमनियाँ दिखाई दे रही थी। मैंने विद्यार्थियों को बताया कि राजगांगपुर (उड़ीसा) से राजनांदगांव तक चूने की खान हैं और सीमेंट उद्योग के लिए उपयुक्त हैं। अब तक कई सीमेंट फैक्टरियां लग चुकी हैं और आगे भी लगने की संभावनाएं हैं। फिर भी सीमेंट यहाँ महँगी मिलती है। चिमनियों के धुएं से वायुमंडल प्रदूषित होता है और धुआँ जब नीचे आकर पेड़ों की पत्तियों और खेतों में गिरकर परत जमा लेता है तो पेड़-पौधे मर जाते हैं और खेत बंजर हो जाते हैं। इसकी किसे चिंता है ? औद्यौगिक क्रांति आयेगी तो अपने साथ कुछ बुराइयाँ तो लायेगी ही।


खैर, थोड़ी देर में हम पामगढ़ पहुँचे। सड़क से ही लगा गढ़ का अवशेष दिखाई देता है- तीन तरफ खाई और उसमें पानी भरा था। विद्यार्थियों की उत्सुकता गढ़ देखकर ही शांत हुई। रास्ते में मेंहदी के सिद्ध बीर बजरंगबली के दर्शन किये। रास्ते में ही राहौद और धरदेई की तालाबनुमा प्राचीन खाइयों को देखते हुए खरौद के मुहाने पर पहुँचे। दूर से महानदी का चौड़ा पाट देखकर विद्यार्थी खुशी से चिल्ला उठे- सर, देखिये नदी। मैंने उन्हें बताया कि हम खरौद की सीमा में प्रवेश कर रहे हैं। देखो, इस नदी में शिवनाथ और जोंक नदी आकर मिलती हैं और त्रिधारा संगम बनाती है। विद्यार्थी बड़े प्रसन्न थे। तभी हमारी बस सड़क किनारे स्थित जल संसाधन विभाग के निरीक्षण-गृह में झटके के साथ रूकी।

सभी ने वहाँ हाथ-मुँह धोकर नाश्ता किया और मंदिर-दर्शन करने निकल पड़े। एक-डेढ़ कि. मी. की दूरी पर अत्यंत प्राचीन शबरी मंदिर है। ईटों से बने इस पूर्वाभिमुख मंदिर को ‘‘सौराइन दाई‘‘ का मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर के गर्भगृह में श्रीराम और लक्ष्मण धनुष-बाण लिये विराजमान हैं। पुजारी ने बताया कि श्रीराम और लक्ष्मण जी ने शबरी के जूठे बेर यहीं खाये थे। द्वार पर एक अर्धनारीश्वर की टूटी मूर्ति रखी है। मूर्ति के चेहरे पर सिंदूर मल दिया गया है जिससे अर्धनारीश्वर का स्वरूप स्पष्ट दिखाई नहीं देता। लोग श्रद्धावश किसी भी मूर्ति पर जल चढ़ाने लगते हैं जिससे उसका क्षरण होने लगता है। इस मूर्ति की भी यही स्थिति है। मंदिर से लगा मिट्टी से बना एक गढ़ है जिसमें दशहरे के दिन प्रदर्शन होता है, जिसे गढ़ भेदन कहा जाता है। पुरातत्व विभाग द्वारा पूरे मंदिर परिसर को घेर दिया गया है। पास में ही हरिशंकर तालाब और उसमें बैरागियों की समाधि है।

स्कंद पुराण के उत्कल खंड में वर्णन मिलता है कि पुरी में वहाँ के राजा ने एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। तब उसमें मूर्ति स्थापना की समस्या आयी। देव संयोग से आकाशवाणी हुई कि दक्षिण पश्चिम दिशा में चित्रोत्पला-गंगा के तट पर सिंदूरगिरि में रोहिणी कुंड के निकट स्थित मूर्ति को लाकर यहाँ स्थापित करो। उस काल में खरौद क्षेत्र में शबरों का अधिपत्य था। जरा नाम के शबर का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। शबरी इसी कुल की थी जिसके जूठे बेर श्रीराम और लक्ष्मण ने खाये थे। द्वापर युग के उत्तरार्ध में श्रीकृष्ण की मृत्यु जरा नाम के शबर के तीर से हो जाती है। तब वह उनके अधजले मृत शरीर को इसी क्षेत्र में लाकर रोहिणी कुंड के किनारे रखकर नित्य उसकी पूजा-अर्चना करने लगा। आगे चलकर उसे अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हुईं। प्राचीन काल में इस क्षेत्र में तांत्रिकों के प्रभाव का पता चलता है और ऐसा प्रतीत होता है कि जरा भी तंत्र मंत्र की सिद्धि इस मूर्ति के सामने बैठकर करता था।

स्कंद पुराण के अनुसार पुरी के राजपुरोहित विद्यापति ने छल से इस मूर्ति को पुरी ले जाकर उस मंदिर में स्थापित करा दिया था। लेकिन डा. जे. पी. सिंहदेव ने ‘‘कल्ट आफ जगन्नाथ‘‘ में लिखा है कि ‘सिंदूरगिरि से मूर्ति को पुरी ले जानेवाले विद्यापति नहीं थे बल्कि उसे ले जाने वाले प्रसिद्ध तांत्रिक इंद्रभूति थे। उन्होंने इस मूर्ति को ले जाकर संबलपुर की पहाड़ी में स्थित संभल गुफा में रखकर तंत्र-मंत्र की सिद्धि की। यहीं उन्होंने अनेक तांत्रिक पुस्तकों का लेखन किया। उन्होंने तिब्बत में लामा सम्प्रदाय की स्थापना भी की। प्राप्त जानकारी के अनुसार इंद्रभूति की तीन पीढ़ियों ने यहाँ तंत्र-मंत्र की सिद्धि की और चौथी पीढ़ी के वंशजों ने उसे पुरी ले जाकर उस मंदिर में भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित कर दिया। जगन्नाथ पुरी और खरौद-शिवरीनारायण क्षेत्र में तांत्रिकों के प्रभाव का उल्लेख मिलता है। शिवरीनारायण में तांत्रिकों के गुरू नगफड़ा और कनफड़ा की मूर्ति तथा नगर के बाहर कनफड़ा गुफा की उपस्थिति इस तथ्य की पुष्टि करती है। खरौद के दक्षिण द्वार पर स्थित ‘शबरी मंदिर‘ और सौंरापारा इसके प्रमाण माने जा सकते हैं। सौंरा जाति अपने को शबरों का वंशज मानती है। प्राचीन साहित्य में ‘‘रोहिणी कुंड‘‘ को एक धाम बताया गया है :-
रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर
बंदरी से नारी भई, कंचन होत शरीर।
जो कोई नर जाइके, दरशन करे वहि धाम
बटु सिंह दरशन करि, पाये पद निर्वाण।।

इस मंदिर को देखकर हमें बहुत अच्छा लगा। अब हम नगर के पश्चिम दिशा में स्थित लक्ष्मणेश्वर महादेव के मंदिर की ओर बढ़े। मंदिर भव्य और आकर्षक है। मंदिर के द्वार पर पुरातत्व विभाग का एक बोर्ड लगा है जिसमें मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी मंध इंद्रबल के पुत्र ईशानदेव के द्वारा कराये जाने का उल्लेख है। यहां स्थित शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का जीर्णोद्धार रत्नपुर के कलचुरि राजा खड्गदेव ने कराया था। इस मंदिर में भगवान महावीर की मूर्ति देखने को मिली। मंदिर के प्रवेश द्वार के उभय पार्श्व में कलाकृति से सुसज्जित दो पाषाण स्तंभ है। इनमें से एक स्तंभ में रावण द्वारा कैलासोत्तोलन तथा अर्धनारीश्वर के दृश्य अंकित है। इसी प्रकार दूसरे स्तंभ में श्रीराम चरित्र से सम्बंधित दृश्य जैसे बाली वध, श्रीराम सुग्रीव मित्रता के अलावा शिव तांडव और सामान्य जन जीवन से सम्बंधित एक बालक के साथ स्त्री-पुरूष और एक दंडधारी पुरूष की मूर्ति है। उसके पार्श्व में नारी प्रतिमा है।

गर्भगृह में लक्ष्मण के द्वारा स्थापित ‘‘लक्ष्मणेश्वर महादेव‘‘ का पार्थिव लिंग है। इस अद्भूत लिंग के बारे में पता चलता है कि लंका विजय के उपरांत लक्ष्मण के उपर ब्रह्महत्या का पाप लगाया गया और इसकी मुक्ति के लिए उन्हें चारोंधाम की यात्रा करने और वहां के अभिमंत्रति जल से शिवलिंग की स्थापना करने की सलाह दी गयी। लक्ष्मण ने चारों धाम की यात्रा की। जगन्नाथ पुरी से लौटकर उन्होंने गुप्तधाम शिवरीनारायण की यात्रा की। यहाँ चित्रोत्पला गंगा में स्नान कर आगे बढ़ते ही उन्हें क्षय रोग हो गया। आकाशवाणी हुई कि शिव आराधना से उन्हें क्षय रोग से मुक्ति मिल सकती है। उनकी आराधना से शिवजी प्रसन्न हुये और उन्हें दर्शन देकर पार्थिव लिंग स्थापित करने को कहा। तब उन्होंने यहाँ इस अद्भुत शिवलिंग की स्थापना की और क्षयरोग से मुक्ति पायी। इस शिवलिंग को ‘‘लक्ष्मणेश्वर महादेव‘‘ कहा गया। आज भी “क्षयरोग निवारणाय लक्ष्मणेश्वर दर्शनम्” प्रसिद्ध है। उनके दर्शन करके हमें लगा कि हमारा जीवन कृतार्थ हो गया। पुजारी ने हमें बताया कि यहाँ लखेसर (एक लाख साबूत चावल) चढ़ाने का रिवाज है। इससे मनौतियाँ पूरी होती हैं।

पवित्र मन लिए जब हम मंदिर से बाहर आये तब हमें प्राचीन गढ़ के अवशेष देखने को मिले जिसका अंतिम छोर माझापारा तक जाता है। यहाँ पर ईटों से बना अति प्राचीन पश्चिमाभिमुख इंदलदेव का मंदिर है। उत्कृष्ट मूर्तिकला से सुसज्जित इस मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है। मंदिर की दीवारों में पेड़ पौधे उग आये हैं। यह मंदिर केंद्रीय पुरातत्व संस्थान के संरक्षण में है लेकिन उचित देखरेख के अभाव में मंदिर जीर्ण-शीर्ण हो गया है।

दोपहर होने को आयी और हमारे पेट में चूहे दौड़ने लगे। सभी ने पुन: निरीक्षण गृह में आकर खाना खाया। लक्ष्मणेश्वर मंदिर से लौटते समय संस्कृति प्रचार केंद्र में विक्रम संवत् 2042, ज्येष्ठ शुक्ल 10 गंगा दशहरा के पावन पर्व के दिन शिव के आठ तत्वों के समिष्ट रूप ‘‘अष्टमुख शिव‘‘ और पांच मुख वाले अनुमान की प्रतिमा के दर्शन हुए। भारत में मंदसौर के बाद खरौद में स्थापित अष्टमुख शिव की यह प्रतिमा अद्वितीय, अनुपम और दर्शनीय है। संस्कृति प्रचार केंद्र के संचालक डा. नन्हेप्रसाद द्विवेदी हैं। पूरे छत्तीसगढ़ में संस्कृत भाषा के प्रचार प्रसार में यह संस्था लगी है। डा. द्विवेदी के द्वारा लिखित ‘‘खरौद परिचय‘‘ में खरौद नामकरण के बारे में लक्ष्मणेश्वर मंदिर के शिलालेख के 30 वें लाइन में लिखा है। इसके अनुसार महाराजा खड्गदेव ने भूतभर्ता शिव के इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया जो केवल मंडप मात्र था। यह घटना इस ग्राम के लिए ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। खड्गदेव शब्द में खड्ग का अपभ्रंश खरग तथा देव का अपभ्रंश औद बना प्रतीत होता है। ‘‘ग‘‘ वर्ण के लोप हो जाने तथा ‘खर‘ और ‘ओद‘ के मिलने से ‘‘खरौद‘‘ शब्द की सिद्धि होती है। इस प्रकार खड्गदेव का बिगड़ा रूप खरौद हुआ ऐसा प्रतीत होता है।

खरौद, छत्तीसगढ़ का एक गढ़ भी रहा है। इसे ‘‘खरौदराज‘‘ भी कहा जाता था। यहाँ के गढ़ाधीश के रूप में पंडित ज्वालाप्रसाद मिश्र का उल्लेख मिलता है जो कोटगढ़ के भी गढ़ाधीश थे। हमें बताया गया कि सन् 1835 में सोनाखान के जमींदार वीर नारायण सिंह ने उनके परिवार को समूल नष्ट करने का प्रयास किया था। मगर उस कुल के बीज को अपने गर्भ में लिए एक महिला किसी तरह बचकर कोटगढ़ आ गयी और मिसिर परिवार का वंश नष्ट होने से बच गया। आगे चलकर उनका परिवार कसडोल में निवास करने लगा।

खरौद, कलचुरी कालीन गढ़ था। कलचुरी वंश के पतन के बाद मराठा वंश के शासकों ने इसे ‘‘परगना‘‘ बना दिया। उस समय इस परगना में अकलतरा, खोखरा, नवागढ़, जांजगीर और किकिरदा के 459 गाँव सम्मिलित थे। ब्रिटिश काल में तहसील मुख्यालय सन् 1861 से 1891 तक शिवरीनारायण में था और फिर जांजगीर ले जाया गया। इसके बाद खरौद उपेक्षित होता चला गया। हमें लोगों ने बताया कि यहाँ के श्री परसराम भारद्वाज ने सारंगढ़ लोकसभा क्षेत्र का पाँच बार प्रतिनिधित्व किया है। लेकिन हमारी उनसे भेंट नहीं हो सकी।

संध्या होने को आयी और मेरा लेखक मन जैसे सबको समेट लेना चाहता था। मैंने सबको समझाया कि दो-ढाई कि.मी. पर सुप्रसिद्ध सांस्कृतिक नगर शिवरीनारायण है, वहाँ वोटिंग का भी मजा लिया जाये उसके बाद वहाँ भगवान नारायण, श्रीराम लक्ष्मण जानकी, माँ अन्नपूर्णा और चंद्रचूढ़ तथा महेश्वर महादेव के दर्शन भी कर लिये जायें। मेरी बात मानकर सभी शिवरीनारायण रवाना हो गये। वहाँ महानदी का मुहाना और बोटिंग का मजा लेकर सभी ने प्रसन्न मन से भगवान के दर्शन किये और वापसी के लिए तैयार हो गये। मेरा लेखक मन भूतभर्ता भगवान लक्ष्मणेश्वर का आभारी रहेगा जिनके बुलावे पर खरौद जाने का संयोग बना और यहाँ के बारे में लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया। मुझे पंडित मालिकराम भोगहा कृत ‘‘श्री शबरीनारायण माहात्म्य‘‘ पढ़ने को मिला जिसके पाँचवें अध्याय के 95-96 श्लोक में लक्ष्मण जी श्रीरामचंद्रजी से कहते हैं, “ हे नाथ ! मेरी एक इच्छा है। उसे आप पूरी करें तो बड़ी कृपा होगी। यहाँ रावण के वध हेतु ‘‘लक्ष्मणेश्वर महादेव‘‘ की स्थापना आप अपने हाथ से कर देते तो उत्तम होता।“ -
रावण के वध हेतु करि चहे चलन रघुनाथ
वीर लखन बोले भई मैं चलिहौं तुव साथ।।
वह रावण के मारन कारन किये प्रयोग यथाविधि हम।
सो अब इहां थापि लखनेश्वर करें जाइ वध दुष्ट अधम।।

यह सुन श्रीरामचंद्रजी ने बड़े-बड़े मुनियों को बुलवाकर शबरीनारायण के ईशान कोण में वेद विहित संस्कार कर लक्ष्मणेश्वर महादेव की स्थापना की-
यह सुनि रामचंद्रजी बड़े-बड़े मुनि लिये बुलाय।
लखनेश्वर ईशान कोण में वेद विहित थापे तँह जाय।। 97 ।।

....और
अनंतर अपर लिंग रघुनाथ। थापना किये अपने हाथ।
पाइके मुनिगण के आदेश। चले लक्ष्मण ले दूसर देश।।

अर्थात एक दूसरा लिंग श्रीरामचंद्रजी अपने नाम से अपने ही हाथ स्थापित किया जो अब तक गर्भगृह के बाहर पूजित हैं। आंचलिक कवि श्री तुलाराम गोपाल ने अपनी पुस्तक ‘‘शिवरीनारायण और सात देवालय‘‘ में इस मंदिर की महिमा का बखान किया है:-
सदा आज की तिथि में आकर यहाँ जो मुझे गाये।
लाख बेल के पत्र, लाख चावल जो मुझे चढ़ाये।।
एवमस्तु! तेरे कृतित्व के क्रम को रखे जारी।
दूर करूँगा उनके दुख, भय, क्लेश, शोक संसारी।।

अन्यान्य दुर्लभ मूर्तियों से युक्त मंदिरों, तालाबों और प्राचीन गढ़ी के अलावा धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता के बावजूद यह नगर उपेक्षित है। महाशिवरात्रि और सावन में यहाँ दर्शनार्थियों की भीड़ होती है मगर प्रदेश के पर्यटन नक्शे में यह नगर अभी तक नहीं आ सका है। इतनी जानकारी के बाद हमारा मन प्रफुल्लित था। हमारी बस वापसी के चल पड़ी और मेरा मन बटुकसिंह चौहान के गीत को गुनगुनाने लगा :-
जो जाये स्नान करि, महानदी गंग के तीर।
लखनेश्वर दर्शन करि, कंचन होत शरीर।
सिंदूरगिरि के बीच में, लखनेश्वर भगवान
दर्शन तिनको जो करे, पावे परम पद धाम।।

5 comments:

  1. Informative and interesting article.

    Alok Kataria

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  2. यात्रावृतांत द्वारा नये स्थल की जानकारी हुई। चित्रों का अभाव खला।

    उत्तर देंहटाएं
  3. विवरण इस क्षेत्र की ओर आकर्षित कर रहा है, मेरी भी शिकायत है कि एसे विवरण तस्वीर के बिना अधूरे लगते हैं।

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