जब काली रात बहुत गहराती है,
तब सच कहूँ, याद तुम्हारी आती है !
जब काले मेघों के ताँडव से,सृष्टि डर डर जाती है,
तब नन्हीं बूँदों में, सारे,अंतर की प्यास छलकाती है.
जब थक कर, विहंगों की टोली, साँध्य गगन मे खो जाती है,
तब नीड में दुबके पंछी -सी, याद, मुझे अक्स्रर अकुलाती है!
जब भीनी रजनीगंधा की लता, खुद-ब- खुद बिछ जाती है,
तब रात भर, माटी के दामन से, मिलकर, याद, मुझे तडपाती है !
जब हौलेसे सागर पर , माँझी की कश्ती गाती है,
तब पतवार के सँग कोई, याद दिल चीर जाती है!
जब पर्बत के मँदिर पर, घंटियाँ नाद गुँजातीं हैं
तब मनके दर्पण पर पावन माँ की छवि दीख जाती है!
जब कोहरे से लदी घाटीयाँ, कुछ पल ओझल हो जाती हैं
तब तुम्हें खोजते मेरे नयनों के किरन पाखी में समातीं हैं
वह याद रहा,यह याद रहा, कुछ भी तो ना भूला मन!
मेघ मल्हार गाते झरनों से जीत गया बैरी सावन!
हर याद सँजो कर रख ली हैं मन में,
याद रह गईं, दूर चला मन! ये कैसा प्यारा बँधन!
रचनाकार परिचय:-

लावण्या शाह सुप्रसिद्ध कवि स्व० श्री नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं और वर्तमान में अमेरिका में रह कर अपने पिता से प्राप्त काव्य-परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

समाजशा्स्त्र और मनोविज्ञान में बी.ए.(आनर्स) की उपाधि प्राप्त लावण्या जी प्रसिद्ध पौराणिक धारावाहिक "महाभारत" के लिये कुछ दोहे भी लिख चुकी हैं। इनकी कुछ रचनायें और स्व० नरेन्द्र शर्मा और स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेसकर से जुड़े संस्मरण रेडियो से भी प्रसारित हो चुके हैं।

इनकी एक पुस्तक "फिर गा उठा प्रवासी" प्रकाशित हो चुकी है जो इन्होंने अपने पिता जी की प्रसिद्ध कृति "प्रवासी के गीत" को श्रद्धांजलि देते हुये लिखी है।

25 comments:

  1. जब पर्बत के मँदिर पर, घंटियाँ नाद गुँजातीं हैं
    तब मनके दर्पण पर पावन माँ की छवि दीख जाती है!
    जब कोहरे से लदी घाटीयाँ, कुछ पल ओझल हो जाती हैं
    तब तुम्हें खोजते मेरे नयनों के किरन पाखी में समातीं हैं

    बहुत प्रभावी कविता।

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  2. लावण्या जी की कविता मधुरता और सौष्ठव का मनोरम प्रयाग होती हैं। उन्हे पढना हमेशा ही अच्छा लगा है।

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  3. सुबह सुबह इतनी सुन्दर रचना पढ कर मन हरा हो गया। नरेन्द्र शर्मा जी की झलक मिलती है लवण्या जी की कविताओं में|

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  4. Bahut hi prabhavkari rachna.. shayad main chhoti juban chhoti baat kah raha hoon, ye rachna baut prabhavi se badh ke kuchh hai jo main vyakt nahin kar sakta...
    jai Hind

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  5. यादों को समेटे हुए प्रेम की सुंदर अभिव्यक्ति..बढ़िया गीत..बधाई

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  6. बहुत सशक्‍त रचना। एकदम से दिल के अन्‍दर उतरती हुई। गुनगुनाने को मन करता है। बहुत श्रेष्‍ठ रचना को हमें पढाने के लिए बधाई।

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  7. आपको याद रहा वहां रह्ते, अच्छा लगा..

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  8. vstu prignn saili ki is rchna men geet ka nirvhn krne ki koshis ki gi hai sbdob ka chyn sundr hai ydi is pr thodi mehnt aur hoti to mere vichar menachchha rhta jaise boodon ke sthan pr booden ho jatin or men hta diya jat to arth v ly dono sntulit ho jate isi trh kuchh any sthanbhi hai ise anytha n lene ki kripa kren kyon ki yh rchna mujhe achhilgi is liye yh khne ka dussahs kiya hai kshma gypn ke sath
    dr.ved vyathit

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  9. एक सुन्दर रचना के लिए बधाई |


    अवनीश तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  10. विद्वान लेखकों की कविताओं में शब्‍दों का जो संयोजन होता है उसका लास्‍य आनंद दायक होता है । लावण्‍य दीदी साहब की कविताओं में भी जो शब्‍द आते हैं वो मन की उंगली पकड़ कर सुधियों की वादियों की सैर करा देते हैं । इस कविता में भी किरन पाखी जैसे शब्‍द कविता के आनंद को कई कई गुना बढ़ा रहे हैं । साहित्‍य शिल्‍पी को आभार एक सुंदर रचना के लिये ।

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  11. बहुत सुन्दर व बढिया रचना है। शुरू से अंत तक बाँधे रही।

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  12. लावण्या दी की इस रचना को पढ़ कर टिपण्णी नहीं की जाती सिर्फ खड़े हो कर सम्मान में ताली ही बजाई जा सकती है...वोही कर रहा हूँ...अद्भुत रचना...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  13. वह याद रहा,यह याद रहा, कुछ भी तो ना भूला मन!
    मेघ मल्हार गाते झरनों से जीत गया बैरी सावन!
    हर याद सँजो कर रख ली हैं मन में,
    याद रह गईं, दूर चला मन! ये कैसा प्यारा बँधन!

    याद रहने वाली कविता। आभार।

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  14. तब तुम्हें खोजते मेरे नयनों के किरन पाखी में समातीं हैं
    वह याद रहा,यह याद रहा, कुछ भी तो ना भूला मन!
    मेघ मल्हार गाते झरनों से जीत गया बैरी सावन!
    हर याद सँजो कर रख ली हैं मन में,
    याद रह गईं, दूर चला मन! ये कैसा प्यारा बँधन!

    in panktiyon ne dil chhoo liya........

    adbhut aur prabhaavshali kavita.....

    उत्तर देंहटाएं
  15. लावण्या जी, अनुपम कविता.
    भावाभिव्यक्ति के साथ उत्तम शब्दावली..
    बधाई..बहुत - बहुत बधाई..

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  16. अद्भुत। मधुर, सौम्य और सरल।

    सादर,
    पंकज शुक्ल

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  17. हर याद सँजो कर रख ली हैं मन में,
    याद रह गईं, दूर चला मन! ये कैसा प्यारा बँधन!
    बहुत सुन्दर ढंग से एहसासों को करीने से संजोया है. सुखद लगा पढना

    उत्तर देंहटाएं
  18. वह याद रहा,यह याद रहा, कुछ भी तो ना भूला मन!
    मेघ मल्हार गाते झरनों से जीत गया बैरी सावन!
    हर याद सँजो कर रख ली हैं मन में,
    याद रह गईं, दूर चला मन! ये कैसा प्यारा बँधन!

    दिल को छू लेने वाली मधुर और प्रभावी पंक्तियाँ! बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  19. गजब की रचना है .. मुझे बहुत अच्‍छी लगी !!

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  20. आदरणीय लावण्या जी!

    आपकी ही तरह आपकी रचना भी लावण्यमयी, , शालीन, सरल ,सहज, शुची और मनोरम है. साधुवाद.

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  21. उपमान और उपमेय, प्रकृति और पीड़ा दोनों परस्पर कभी गूँथे हुए से लगते है. दोनों के विलीनीकरण का और अंतस के समीकरण को उभारती हुई एक मन को छूती हुई रचना है.
    ' जब हौले से सागर पर
    मांझी की कश्ती गाती है.'
    यह पंक्ति बहुत ही मनोहारी है.
    मृदुल कीर्ति
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    परम विदुषी डाक्टर मृदुल कीर्ति जी ने
    इस कविता के लिए, मुझे ,
    ये टिप्पणी , मेरे पते पर भेजी है
    उनका स्नेह व प्रोत्साहन ,
    मुझे वास्तव में,
    नई ऊर्जा देता है
    अत: उसे भी प्रेषित कर रही हूँ -

    आप सभी के स्नेह पूर्ण कमेंट्स पढ़कर ,
    मैं, अभिभूत हूँ ...
    कृपया , ऐसा ही स्नेह बनाए रखियेगा
    आप सभी सुधि पाठकों के उदार ह्रदय को
    मेरे विनम्रता पूर्वक , सादर नमन

    तथा साहित्य - शिल्पी मंच पर
    मुझे स्थान दिया गया है उस हेतु,
    सम्पादक मंडल का
    आभार भी प्रकट कर रही हूँ
    विनीत,
    - लावण्या

    उत्तर देंहटाएं
  22. kya sunder bhav hai.bahut hi achchhi kavita hai
    badhai
    saader
    rachana

    उत्तर देंहटाएं

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