प्रतिष्ठित पत्रिका हंस में प्रकाशित अजित राय का लेख प्रवासी हिन्दी का अन्धकार युग बहुत से प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने ब्रिटेन, अमरीका, हंगरी आदि कई देशों की यात्रा की है। ज़ाहिर है उनके अपने अनुभव भी होंगे - चाहे मीठे, खट्टे या फिर कड़वे रहे हों। किन्तु मुझे लगता है कि उनका यह लेख जल्दबाज़ी में लिखा गया है। मुझे नहीं लगता कि उन्होंने लिखने से पहले तथ्यों की तह तक जाने का प्रयास किया है या स्थितियों को समझा है।

सबसे पहले उनके लेख का शीर्षक ही लिया जाए - प्रवासी हिन्दी का अन्धकार युग । यदि हम आज के प्रवासी परिदृश्य पर निगाह डालें तो हम पाएंगे कि यह प्रवासी साहित्य और प्रवासी हिन्दी का स्वर्ण युग कहा जा सकता है। पहली बात तो यह कि विदेशों में हिन्दी का अर्थ केवल साहित्य ही नहीं है। हिन्दी का अर्थ बोलने और समझने में भी निहित है। आज मुंबई की हिन्दी फ़िल्में भारत से अधिक व्यापार विदेशों में कर रही हैं। भारत के नाटककार अपने नाटक ले कर ब्रिटेन और अमरीका जा रहे हैं। हमारे हिन्दी टीवी चैनल विदेशों में भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि भारत में। यानि हिन्दी बोलने और समझने वाले भारतीय हिन्दी भाषा को एक विश्व भाषा बनाने में लगभग सफल हैं।

फिर बात आती है साहित्य की। इस समय ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा, युरोप एवं खाड़ी देशों में स्तरीय हिन्दी साहित्य रचा जा रहा है। कहानी, कविता, रेडियो नाटक, लेख, उपन्यास सभी विधाओं में बेहतरीन रचनाएं सामने आ रही है। पहली बार प्रवासी हिन्दी साहित्य को मुख्यधारा के हिन्दी साहित्य का हिस्सा समझा जाने लगा है। राजेन्द्र यादव ने स्वयं कुछ प्रवासी लेखकों के नाम ले कर उन्हें मुख्यधारा के लेखकों के समकक्ष माना है। इन देशों के लेखकों के संकलन एवं अन्य पुस्तकें लगातार प्रकाशित हो रही हैं। निश्चित है कि ऐसे काल को अंधकार युग तो नहीं ही कहा जा सकता। आज केवल ब्रिटेन में सत्तर से अस्सी हिन्दी लेखक अलग अलग विधाओं में लिख रहे हैं और उनकी पुस्तकें भारत के प्रकाशक प्रकाशित कर रहे हैं।

जहां तक हिन्दी गतिविधियों का प्रश्न है ब्रिटेन में यू.के. हिन्दी समिति, गीतांजलि बहुभाषीय समुदाय, भारतीय भाषां संगम, वातायन एवं कथा यू.के. भिन्न कार्यक्रम साल भर आयोजित करते हैं। यहां कवि सम्मेलन, कथा गोष्ठियां, साहित्यिक संवाद, पुस्तक लोकार्पण, सिनेमा एवं नाटक पर आधारित गंभीर कार्यक्रम तो आयोजित होते हैं। ब्रिटेन की संसद में हर साल हिन्दी के एकमात्र साहित्यिक सम्मान का आयोजन होता है जिसमें ब्रिटेन के सांसद और मंत्री भाग लेते हैं। इन कार्यक्रमों के आयोजन में भारतीय उच्चायोग, नेहरू सेंटर एवं आई.सी.सी.आर. का सहयोग सभी स्थानीय संस्थाओं को मिलता है।

अजित राय ने आई.सी.सी.आर. की कवि चयन प्रक्रिया के विषय में बात की है। दरअसल मुझे इस प्रक्रिया का ज्ञान नहीं है और न ही मैं इस पर कोई टिप्पणी करने में सक्षम हूं। किन्तु ब्रिटेन की स्थितियों को मैं अवश्य समझता हूं और यहां के हिन्दी के हालात से वाक़िफ़ हूं। ब्रिटेन के प्रमुख शहरों में हिन्दी कवि सम्मेलन हिन्दी समाज के इकठ्ठे होने का एक माध्यम भी बनते हैं। एक संवाद स्थापित होता है। जब कवि सम्मेलन के लिये कवियों का चयन किया जाएगा ज़ाहिर है उन्हीं कवियों की ओर ध्यान जाएगा जो कि भारत में कवि सम्मेलनों में जाते हैं। जो कवि भारत में कवि सम्मेलनों को हेय दृष्टि से देखते हैं, भला वे लंदन या अमरीका के कवि सम्मेलनों में कैसे शामिल हो सकते हैं। एक ज़िम्मेदार पत्रकार होने के नाते उन्हें किसी भी सरकारी संस्था पर उंगली उठाने से पहले तथ्यों की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करनी चाहिये।

क्या ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कुंवर नारायण लंदन के कवि सम्मेलन में भाग लेंगे? जब इन कवियों ने भारत में ही मंच जैसे शक्तिशाली औज़ार को दूसरे तरह के कवियों के हवाले कर दिया है, तो शिकायत किस बात की है। हिन्दी कविता पर गंभीर गोष्ठियां लंदन या अमरीका में क्यों करवाई जाएं? इसका औचित्य क्या है? गंभीर गोष्ठियों में आम जनता शामिल नहीं होती। और, कवि सम्मेलन में ये महान् कवि शामिल नहीं होते। तो ऐसे में जो भी कवि आते हैं या बुलाए जाते हैं वही सही हैं।

अजित राय ने 31 अगस्त 2009 के कवि सम्मेलन पर खासी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और भारतीय उच्चायोग के मंत्री (समन्वय) श्री आसिफ़ इब्राहिम एवं नेहरू सेन्टर की निदेशक श्रीमती मोनिका मोहता पर अवांछित टिप्पणी की है। सीधा सादा प्रश्न है कि यदि मोनिका जी के बड़े अधिकारी भारत से चुन कर कवियों को लंदन भेजते हैं तो मोनिका जी की ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वे उनकी आवभगत यहां करें उनके आराम का ध्यान रखें। मोनिका जी यदि अपनी ड्यूटी अच्छे ढंग से निभाती हैं तो किसी भी पत्रकार को इसमें क्या आपत्ति हो सकती है? वे भारत से पधारे अतिथियों की देखभाल ही तो कर रही हैं। अब वो अतिथि कौन हैं, उनकी राजनीतिक विचारधारा कैसी है, वे कैसी कविता करते हैं, यह सब देखना तो मोनिका जी का काम नहीं है। जिनका यह काम है अजित जी को उनसे सवाल पूछने चाहियें। यदि मोनिका जी अतिथियों की आवभगत में कमी रखेंगी तो भी पत्रकारिता जगत उनको नहीं बख़्शेगा।

इस लेख में भारतीय उच्चायोग एवं मंत्री समन्वय को फ़िज़ूल में घसीटा गया है। वर्तमान कार्यप्रणाली के आधार पर हिन्दी से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन भारतीय उच्चायोग के कार्यक्षेत्र से बाहर है। किन्तु भारतीय उच्चायोग वर्षों से हिन्दी भाषा और साहित्य के लिये सहयोग करता रहा है। पिछले तीन वर्षों से भारतीय उच्चायोग, लंदन हिन्दी को लोकप्रिय बनाने के लिये साहित्य, पत्रकारिता, अध्यापन एवं संस्था के क्षेत्रों के लिये सम्मान भी दे रहा है। हमारे वर्तमान मंत्री समन्वय श्री आसिफ़ इब्राहिम अपने पद से जुड़ी ज़िम्मेदारी से बहुत आगे बढ़ कर हिन्दी गतिविधियों को संरक्षण देते हैं और कार्यक्रमों में शामिल भी होते हैं। वे सभी कार्यक्रमों में हिन्दी में ही अपना भाषण भी देते हैं, वे कार्यक्रम चाहे साहित्य से जुड़े हों या फिर भारतीय समुदाय की अन्य गतिविधियों से । उनकी जिस काम के लिये उनकी तारीफ़ होनी चाहिये, लेख में उसीके लिये उनकी आलोचना की गई है। भारतीय उच्चायोग के हिन्दी अधिकारी हमेशा से ही हिन्दी की गतिविधियों के लिये खुले दिल से सहायता उपलब्ध करवाते रहे हैं।

आई.सी.सी. आर. ने इस वर्ष तीन ग़ज़लकार दीक्षित दिनकौरी, पवन दीक्षित एवं प्रीता श्रीवास्तव और एक गीतकार विष्णु सक्सेना को लंदन भेजा। हम सब जानते हैं कि मंच से तुकांत कविता का पाठ सफल माना जाता है। अतुकांत कविता गोष्ठियों में अधिक सार्थक साबित होती है। अजित राय जी को ग़ज़ल और गीत विधा से क्या नाराज़गी है। दोहे की तरह ग़ज़ल की दो पंक्तियों का एक शेर भी किसी तीन पृष्ठों की अतुकांत कविता पर भारी पड़ सकता है। इस वर्ष भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार ने स्वयं पूरे देश में इन आयोजनों की कमान संभाली और उनके पास इस बार श्रोताओं की सकारात्मक प्रतिक्रिया के बहुत से पत्र पहुंचे हैं। इनमें विभिन्न क्षेत्रों के मेयर एवं अन्य प्रतिष्ठित लोग भी शामिल हैं। मंच पर इन कवियों का एक रुतबा है और यह बहुत से देशों में हिन्दी का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

अजित राय ने लिखा है, क्या दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, ज़कीया ज़ुबैरी, आनंद कुमार, तेजेन्द्र शर्मा, सत्येंद्र नाथ श्रीवास्तव, मोहन राणा भी यही मानते हैं? यदि नहीं तो कोई क्यों नहीं कहता कि हिन्दी कविता का असली चेहरा दूसरा है जिसमें पांच पीढ़ियों के सैंकड़ों कवि सक्रिय हैं? हमारे पत्रकार भाई इस बात को भूल जाते हैं कि हमारे देश (ब्रिटेन) में वो कविता नहीं लिखी गई है जिसकी वे बुराई कर रहे हैं। यह कविता कुंवर नारायण, एम.टी. वासुदेवन नायर, महाश्वेता देवी आदि के देश में ही लिखी गई है और हम लोगों के आगे परोसी गई है। इसमें हम ग़रीब प्रवासियों का क्या दोष है। जब भारत के पचास करोड़ हिन्द भाषियों में से पांच हज़ार से अधिक पाठक उस दूसरी कविता को न तो समझते हैं और न ही पढ़ते हैं तो फिर प्रवासियों पर यह तानाशाही फ़रमान क्यों कि हम उस कविता के लिये सम्मेलन करें।

अंत में एक बात और, मैनें कभी भी पुरवाई को हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथी पत्रिका नहीं कहा है। दरअसल मैं स्वयं दो वर्ष तक पुरवाई का संपादक रहा हूं और मेरे कार्यकाल में उसमे कमलेश्वर पर पूरा विशेषांक निकला था और उदय प्रकाश जैसे कहानीकारों की कहानियां भी प्रकाशित हुई थीं।
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अजित राय जी का वह आलेख "नुक्कड" पर भी प्रकाशित हुआ है तथा उसपर भी विमर्श चल रहा है। साहित्य शिल्पी पाठकों की सुविधा के लिये आलेख का लिंक भी प्रस्तुत कर रहा है जिससे विमर्श सिक्के के दोनो पहलुओ पर हो सके - http://nukkadh.blogspot.com/2009/09/blog-post_7078.html

27 comments:

  1. Self explanatory, no comments.

    Alok Kataria

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  2. जो लोग हिंदी का भविष्‍य अंधकारमय देख रहे हैं चाहे देश में या विदेश में वे यह समझ लें कि उनका खुद का भविष्‍य अंधकार में है।

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  3. तेजेन्द्र जी आपकी बात से मैं सहमत हूँ। हंस जैसी पत्रिका पर "कुछ भी छाप देते हैं" जैसा आरोप लगाते हुए दुख तो होता है पर सच्चाई यही है। आज भारतीय लेखकों में जो कीचड लीपापोती का खेल चल रहा है वह भी जाहिर है प्रवासी लेखन पर उंगली उठाना सिद्ध करता है कि उनकी अपनी बौखलाहट है, अकर्मण्या है और धृश्टता है। आपने सही कहा कि मंच पर तो "जाने माने" आने को तैयार नहीं (जानते हैं कि पोल खुल जायेगी) और जिन्होंने मंच हथिया लिया वो विदूषक ही सही लोग उन्हे सुन तो रहे हैं। जो हिदुस्तानी लेखक लिख रहे हैं उन्हे पढ कितने रहे है?

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  4. hindi ko koi kaise kah sakata hai ki astitva khatare men hai jissee karono logo ki smbednayeen prakat hoti hain

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  5. अपने अपने विचार है अपना अपना मंतव्य है मगर दुःख की बात ये है के जब हिंदी साहित्य भी राजनीति से दूर नहीं पा रही ... और इसका नतीजा आप सभी के सामने है ...
    सादर
    अर्श

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  6. मधु, मुंबई।3 अक्तूबर 2009 को 3:51 pm

    मैंने दो दिन पहले अजित राय का प्रवासी हिन्‍दी का अन्‍धकार युग लेख पढ़ा। प्रतिक्रियास्‍वरूप तेजेन्‍द्र शर्मा का लेख यह प्रवासी हिन्‍दी का स्‍वर्ण युग है पढ़ा।

    अजित राय के अनुसार यदि उन्‍हें प्रवासी हिन्‍दी में अन्‍धकार युग दिखता है तो क्‍या कारण है कि वे वहां बार बार जाने के लिये लालायित रहते हैं। वहां एक सप्‍ताह नहीं बल्कि एक एक महीना रहते हैं। अपने संबंध बनाते हैं और उन्‍हें भुनाते हैं। अभी हाल में भी जाकर आये हैं।

    यदि भारत से कूड़ा भेजा जाता है तो यह हम भारतीयों के लिये शर्म की बात है। इसमें प्रवासी भारतीयों या वहां के उच्चायोग क भला क्या कुसूर हो सकता है।

    कथा यूके की सदस्‍य होने के नाते मैं दो बार सम्‍मान के सिलसिलें में लन्‍दन गई हूं। गत वर्ष हाई कमीशन में आसिफ इब्राहिम जी से मुलाकात हुई थी, उनके विनम्र व्‍यवहार, हिन्‍दी के प्रति उनका स्‍नेह देखकर अभिभूत थी।

    श्रीमती मोनिका मेहता से इस वर्ष मिली। अपने पद के अनुरूप गरिमापूर्ण व्‍यक्तित्‍व। कथा यू के के मेहमानों से स्‍नेहपूर्वक मिलना और हिन्‍दी के प्रचार के लिये चिन्‍तन मनन, उनकी कर्तव्‍यनिष्‍ठा को ही दर्शाता है। आनन्‍द कुमार ने कम समय में ही हिन्‍दी के लिये किये गये अपने काम से जो साख बनाई है वह भी मैं देख और सुन आई हूं।

    तेजेन्‍द्र शर्मा ने अपने लेख में जो लिखा है, पूरी तरह सही है। वहां के हिन्‍दी लेखक, लेखिकाएं लगातार लिख रहे हैं और भारत के प्रकाशक छाप रहे हैं और वे बिक रहे हैं। और फिर ये सब हमारे अपने लोग हैं, भारत से गये हैं और वहां हिन्‍दी की मशाल को जलाया है और जलाये रखने के प्रयासों को सलाम है। तेजेन्‍द्र शर्मा अकेले सारे काम करते हैं, मैं उसकी चश्‍मदीद गवाह हूं। यही कारण है कि वे सभीके चहेते हैं। वे सबकी मदद के लिये हमेशा तत्‍पर रहते हैं और यदि काम हिन्‍दी से जुड़ा है तो उसे पूरा करने में कोई कोताही नहीं बरतते।
    आखिरी बात, हिन्‍दी अपने प्रचार के लिये किसीकी मोहताज नहीं है, वह अपने आप में बेताज बादशाह है। इस भाषा ने अपनी अस्मिता का झंडा लंदन के हाउस आफ लाडर्स और हाउस आफ कामन्‍स में लहराया है, यह कथा यू के की मेहनत का नतीजा है जिस पर भारत को नाज़ है। हमें किसी भी वस्‍तु का आकलन संपूर्ण परिप्रेक्ष्‍य में करना चाहिये न कि एकल पक्ष से।

    मधु, मुंबई।

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  7. आश्चर्य का विषय है कि हम हिन्दी के लिये भारत में तो सतही काम कर रहे हैं और प्रवासी लेखकों की निष्ठा और कार्य को कटघरे में खडा कर रहे हैं। इतनी अपेक्षा जैसे वहीं से साहित्य का दिशा निर्धारण होता है। हमारे लेखक कितने पानी में है यह कौन नही जानता। आरोप प्रत्यारोप से निकल कर काम करने की जरूरत है वर्ना पत्रिकाये छ्पती रहेंगी और उनपर भजिये बिकते रहेंगे।

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  8. हिन्दी लेखकों को बटे रहने की लाईलाज बीमारी है। हिन्दी का लेखक केवल हिन्दी का लेखक क्यों नहीं है? चर्चा उसके काम पर हो उसकी "केटेगरी" पर क्यों? लंदन में हिन्दी क्या रोमन लिपी में लिखी जाती है? प्रवासी लेखक कैसा दिखाई देता है।

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  9. लेखक हो तो लेखक जैसा बर्ताव भी हो। हिन्दी में कालिख पोत-जूतामार टाईप लेखक और उन्ही की प्रायोजित पत्रिकायें रह गयी हैं। साहित्य के भविष्य को कुछ नहीं हुआ वर्तमान पर झाडू लगाईये सब ठीक हो जायेगा।

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  10. बहुत बड़ी बड़ी बातें है..सब अपने अपने जगह पर सही है फिर पता नही समस्या कहाँ पर है..
    मैने लेख पड़ा सब कुछ समझ में आया बस एक ही बात कहना चाहूँगा की चाहे तुकांत ही या अतुकान्त सफलता तो हमारी हिन्दी की हो रही है..बस हिन्दी को आगे बढ़ाना है सभी मतभेदों को दूर करके..हम हिंदुस्तानियों का यही कर्तव्य है और हिन्दी को बहस में उलझा कर मामले को तूल नही देना चाहिए..

    बढ़िया आलेख..चर्चा के लिए बधाई!!

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  11. मैं तेजेंद्र जी से सहमत हूँ और विनोद जी की बात भी सही है की जब हर तरफ से हिंदी की प्रगति हो रही है तो ये गुटबंदी क्यों और साहित्य में राजनीति क्यों .. क्यों न हम सभी इस बात पर सहमत हो जाए एकमत हो जाए की हमारे सारे प्रयत्न और मार्ग यदि हिंदी की भलाई के लिए है तो फिर आपस में ये बैर क्यों .. ये विरोधाभास क्यों .. मैंने पिछले दिनों श्री हिमांशु जोशी जी से बात की थी , वे प्रवासी हिंदी लेखको की कहानियो का एक संकलन निकाल रहे है .. ये इज्जत है हिंदी की और हिंदी का कार्य करनेवाले प्रावासी भारतीयों की , तेजेंद्र जी , प्राण जी , महावीर जी , दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, ज़कीया ज़ुबैरी, आनंद कुमार, मोहन राणा , लावण्या दीदी तथा अन्य सारे प्रवासी जो अपने देश की ज्योत हिंदी के रूप में सारी दुनिया के आकाश में फैला रहे है , मैं उन सबको अपना सलाम भेजता हूँ ... रही बात तुकांत की या आतुकांत की , तो मैं ये कहना चाहूँगा , की चाहे वो कविता वो या कथा या कोई और format ,लेकिन अगर हिंदी का बेहतर इस्तेमाल हुआ है तो मैं उस कवी को /लेखक को सलाम करना चाहूँगा .... मैं तो आप सभी से यही कहना चाहूँगा की ये वाकई हिंदी प्रवासी का स्वर्णयुग है और हमें अपने ही प्रवासी भाई-बहनों का अभिनन्दन करना चाहिए की , कम से कम यहाँ की गन्दी साहित्यिक राजनीति से वो परे है और बेहतर काम कर रहे है हिंदी के लिए ... हम सब सार्थक बहस करे और वो बहस की कोशिश यही रहे की हर हाल में हिंदी की जय हो !!

    धन्यवाद
    विजय

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  12. इस बहस को आरंभ करना ही निरर्थक था। प्रवासी लेखन को निरंतर पढ रही हूँ और वे कहीं से भी कमतर साहित्य नजर नहीं आते। विषय अलग हो सकते हैं परिवेश अलग हैं लेकिन हिन्दी तो है न इस समय काम भी अधिक हो रहा है और उनकी बनती हुई पहचान भी नजर आती है। यह सुखद है।

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  13. tejendra ji i agree with ur statement that जब इन कवियों ने भारत में ही मंच जैसे शक्तिशाली औज़ार को दूसरे तरह के कवियों के हवाले कर दिया है, तो शिकायत किस बात की है। हिन्दी कविता पर गंभीर गोष्ठियां लंदन या अमरीका में क्यों करवाई जाएं? इसका औचित्य क्या है? गंभीर गोष्ठियों में आम जनता शामिल नहीं होती। और, कवि सम्मेलन में ये महान् कवि शामिल नहीं होते। तो ऐसे में जो भी कवि आते हैं या बुलाए जाते हैं वही सही हैं। rest all if ajit toy is just nonsence.

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  14. खिलाने- पिलाने में कमी रह गयी होगी एसे लेख तो तभी लिखे जाते हैं।

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  15. aap nedakshin path aur hindu vaadee hone pr chuchh kaha hai mitr kya hindu vaadee hona apraadh hai apitu hindu hona hi manav hona hai any koi bhi vad smrstavadee nahee hai yh pamaanik hai kuch logo ke aankh band karne se suraj thodi chhup jata hai
    dr ved vyathit

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  16. प्रवासी भारतीयों के हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रचार और प्रसार में किये गए योगदान सराहनीय है |
    समूहवाद या गुटबंदी हो जाती है, लेकिन इससे दूषण ना होकर स्वस्थ्य प्रतियोगिता होनी चाहिए |

    साहित्यिक विकास और संवर्धन को प्रमुखता पर रख कर सृजन किये जाने चाहिए |
    सम्पादक और प्रकाशकों की इसमें अहम् भूमिका होगी | साहित्यिक व्यापारीकरण और साहित्यिक विकास दोनों में संतुलन चाहिए |

    इस प्रकार के विषय पर बहस के लिए धन्यवाद |


    अवनीश तिवारी

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  17. सबसे पहले तो मुझे इस पोस्‍ट और साथ ही अजित राय के हंस में छपे लेख के शीर्षक से ही एतराज़ है। वक्‍त हमें इस बात की इजाज़त नहीं देता कि अपने ही वक्‍त को अंधकारमय या स्‍वर्ण युग घोषित कर दें। भला हम अपने ही वक्‍त के प्रवक्‍ता कब से होने लग गये।
    पहले कुछ बातें हंस में छपे अजित राय के लेख पर। (राजीव जी बेहतर होता आपने तेजेन्‍द्र के लेख के साथ हंस में छपे अजित राय के लेख का लिंक भी दिया होता। ये लेख कई ब्‍लागों पर मौजू़द है। पाठकों की सुविधा के लिए मैं यहां उसका एक लिंक दे रहा हूं। http://nukkadh.blogspot.com/2009/09/blog-post_7078.html
    अजित जी ने एक ही लाठी से सबको हांका है और लेख के आखिर तक पता नहीं चलता कि उनकी खुंदक आखिर है किसके प्रति। ये तय है कि वे अपने इस लेख में किसी एक मुद्दे पर बात न करके हवा में लट्ठ चला रहे हैं और अपनी ही जंग हंसाई करवा रहे हैं।
    उन्‍होंने केन्‍द्र सरकार और राज्‍य सरकारों में कार्यरत हिन्‍दी अधिकारी (उनकी जानकारी के लिए राज्‍य सरकारों में हिन्‍दी अधिकारी नहीं होते) से ले कर राजनयिक और विदेशों में तैनात सभी को शिकार बनाया है। वे पहले हिन्‍दी अधिकारियों को लतियाते हुए आगे चल चल कर पूरी जमात को ही पीटते चले गये हैं। आखिरी लाठी उन्‍होंने प्रवासी हिन्‍दी पर चलायी है।
    माना हिन्‍दी अधिकारियों की कौम खराब है हरामखोर है, मौज मज़ा करती है और पता नहीं हिन्‍दी के विकास के अलावा क्‍या क्‍या करती है लेकिन वे साहित्‍य की जिस मुख्‍य धारा की बात कर रहे हैं वह क्‍या कर रही है। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि अजित जी की ये मुख्‍य धारा है क्‍या। वे कहते हैं कि जिस अखबार को, कहानी को, किताब को और कविता को वे लोग (मैं यहां जानबूझ कर उन कुछ का नाम दे कर विषय से भटकना नहीं चाहता) पढ़ते हैं या पढ़ने की सलाह दी जाती है उनके लिये तो वही मुख्‍य धारा। आपको मुख्‍य धारा में आना है तो उन्‍हीं की पसंद का लिखना होगा वरना आप भी कूड़ा कचरा। उनके हिसाब से जो कुछ इन महानुभावों द्वारा नहीं पढ़ा जा रहा वह सब कूड़ा कबाड़ा। अब उनके हिसाब से विदेशों को छोड़ भी दें तो यहां पूरे देश में भी कूड़ा कबाड़ा ही लिखा जा रहा है। क्‍योंकि उसे इन महानुभावों द्वारा पढ़ा नहीं जाता। बलिहारी है आपकी मुख्‍य धारा की जिसने साहित्‍य से पाठक को तो बिलकुल गायब ही कर दिया है। अब सारा लेखन, सारे अखबार, किताबें, लेखक, सब गया पानी में मुख्‍य धारा के चक्‍कर में।
    अजित राय ने बीस बरस के दौरान मेरा लिखा कुछ भी नहीं पढ़ा होगा लेकिन वे मुझे लेखक ही नहीं मानते, क्‍योंकि मैं मुख्‍य धारा में आने के लिए कभी छटपटाया नहीं या किसी द्वारे पर मैंने मत्‍था नहीं टेका। बेचारा सूरज और उसका लेखन।
    ये बात अलग है कि अजित जी स्‍वयं अपने अर्थ पक्ष के लिए यत्र तत्र सर्वत्र नजर आयेंगे।
    दूसरी बात कि यह आने वाला लम्‍बा समय तय करता है कि फलां युग अंधकारमय था या स्‍वर्णयुग। हम में से कोई भी कम से कम अपने वर्तमान काल का प्रवक्‍ता नहीं होता। अगर होता है तो बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में होता है।
    तीसरी बात वे बार बार विदेशों में भेजे जाने वाले कूड़े कचरे की बात करते हैं लेकिन ये नहीं बताते कि ये कचरा आखिर है क्‍या। जहां तक मेरी जानकारी है वे भी अब तक जितनी बार विदेश हो आये हैं किसी न किसी कचरा कोटे से ही जुगाड़ करके गये हैं।
    पूरे के पूरे वक्‍त को नकार देना बेहद घातक सोच है। जो लोग व्‍यक्तिगत स्‍तर पर या संस्‍थाओं के ज़रिये विदेशों में सचमुच काम कर रहे हैं और अकेले के बल पर हिन्‍दी के चिराग़ जलाये हुए हैं यह उनकी सरासर तौहीन है।
    तो मेरे हे पत्रकार मित्र, इस तरह से कभी भी सबको लपेटे में लेते हुए हवा में लाठियां न भांजें। काम करने वाले अपना काम करते रहते हैं और उन्‍हें आपके किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं।
    ये वक्‍त अपने आप तय कर लेगा कि कचरा किधर था।

    अब कुछ बातें तेजेन्‍द्र के लेख पर। तेजेन्‍द्र को भी हड़बड़ी में प्रवासी साहित्‍य का स्‍वर्ण युग जैसे जुमलों से बचना चाहिये था। हमें ये मानने में कोई हिचक नहीं है कि विदेशों में इस समय जो साहित्‍य लिखा जा रहा है वह ध्‍यान मांगता है और उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती और कोई उसे कमतर आंक भी नहीं रहा। कई प‍त्रिकाओं ने इधर प्रवासी साहित्‍य अंक निकाले हैं और इंटरनेट के ज़रिये इस समय विदेशों से स्‍तरीय पत्रिकाएं और साहित्‍य हम तक पहुंच रहा है।

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  18. पिछली टिप्‍पणी से जारी


    बाहर लोग अपनी सीमाओं, सामर्थ्‍य और हैसियत के अनुसार काम कर ही रहे हैं और कई मायनों में बेहतर कर रहे हैं।
    पाठक देखना चाहें तो hi.wikipedia.org पर जा कर देखें जहां रामचरित मानस से ले कर हनुमान चालीसा और कम्‍ब रामायण से ले कर जयशंकर प्रसाद का सारा साहित्‍य आपको एक क्लिक पर मिल जायेगा या प्रेमचंद की सारी रचनाएं मिल जायेंगी। bhagavad-gita.org पर आपको संस्‍कृत सहित सोलह भाषाओं में भगवद गीता के सभी 702 श्‍लोकों के अत्‍यंत मनोरम स्‍वर में किये गये पाठ मिल जायेंगे। इंटरनेट पर आपको सभी भारतीय भाषाओं के शब्‍दकोश मिल जायेंगे।
    इतने बड़े पैमाने पर ये सब कार्य विदेशों में बैठे हमारे भाई बंधु ही कर रहे हैं। उनके जुनून को मेरा विनम्र प्रणाम है।
    लेकिन इस बात से भी हमें इनकार नहीं करना चाहिये कि विदेश में रचा जा रहा साहित्‍य और साहित्‍यकार इस समय अपने काम की तरफ उतना ध्‍यान न दे कर पहचान के प्रति ज्‍यादा उत्‍सुक है और कोशिश भी करता दीखता है। इसके लिए उनके मन में एक तरह की छटपटाहट है।
    मैं विदेशों में रहने और काम करने वाले कई रचनाकारों को जानता हूं। वे जब भी भारत आते हैं तो इस बात का पुख्‍ता इंतज़ाम करके चलते हैं कि महीने दो महीने के उनके दौरे में अलग अलग शहरों में उनके दो चार रचना पाठ, पुस्‍तकों के लोकार्पण, व्‍याख्‍यान और सम्‍मान ज़रूर हों। चर्चा तो हो ही और तथाकथित मुख्‍य धारा के साथ मुलाकात भी। ये बात भी कई बार तकलीफ़ देती ही है।
    मैं इस बात को दोहराना चाहता हूं और इससे किसी को भी इनकार नहीं है कि इधर के बरसों में विदेशों में रचे जा रहे विपुल साहित्‍य ने हमारा ध्‍यान अपनी ओर खींचा है और अपनी उपस्थिति दर्ज़ करायी है। हम वहां लिखे जा रहे साहित्‍य के प्रति आश्‍वस्‍त हैं लेकिन एक बात जो मुझे हमेशा परेशान करती है कि जिस विदेशी ज़मीं पर हमारी ही मिट्टी के अंग्रेज़ी लेखक सलमान रश्‍दी, झुम्‍पा लाहिरी, विक्रम सेठ, वी एस नायपॉल और इतर रचनाकार विश्‍व स्‍तरीय साहित्‍य दे रहे हैं, हिन्‍दी में एक भी रचनाकार उस स्‍तर की सोच का क्‍यों नहीं दिखायी देता।
    और आखि़र में एक बात और। बीए में अर्थशास्‍त्र पढ़ते हुए एक सिद्धांत हमें पढ़ाया गया था कि बुरी मुद्रा अच्‍छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। मतलब ये कि अगर आपके जेब में दस रुपये का पुराना नोट हो और आपके हाथ में दस रुपये का नया नोट आये तो आप जेब में रखे पुराने नोट की जगह नया नोट रख लेंगे और जेब वाला पुराना नोट सर्कुलेशलन में डाल देंगे। आज जीवन के हर क्षेत्र में यही हो रहा है। सब कुछ जो अच्‍छा है, स्‍तरीय है, मननीय है, वह चलन से बाहर है। कभी स्‍वेच्‍छा से, कभी मजबूरी में और कभी हालात के चलते। आज हमारे आस पास जो कुछ भी चलन में है, वह औसत है, बुरा है और कचरा है। हम उसे ढो रहे हैं क्‍योंकि बेहतर के विकल्‍प हमने खुद ही चलन से बाहर कर दिये हैं।
    हम देखें कि ऐसा क्‍यों हो रहा है और कब तक हम ऐसा होने देंगे।
    सूरज प्रकाश

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  19. MAIN SABHEE SE GUZAARISH KARUNGA KI
    VE " HINDI KAA ANDHKAR YUG" YAA
    " YAH PRAVASEE HINDI KAA SWARN YUG
    HAI" KE SANDHRABH MEIN SAU SAAL SE BHEE PAHLE KAHE GAYE IS SHER PAR
    GAUR FARMAAYEN---
    DIL KE FAFOLE JAL UTHE
    SEENE KE DAAG SE
    IS GHAR KO AAG LAG GAYEE
    GHAR KE CHIRAAG SE

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  20. एक खुले डब्बे में भारतीय केकडे एक्स्पोर्ट हो रहे थे। एक दूसरे की टांग खींचते हमारे लेखक उफ...अजित जी काम करने वालों को काम करने दें और खुद भी कुछ रचनात्मक काम कर सकें तो हिन्दी खुल कर सांस ले सकेगी। खेमेबाजी से बाज आईये तो साहित्य खुद अपनी मुख्यधारा बना लेगा।

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  21. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  24. श्रीमान आदित्य महोदय

    साहित्य शिल्पी न केवल अपने लेखकों बल्कि पाठकों का भी सम्मान करता है लेकिन टिप्पणीकर्ताओं को यह अधिकार नहीं देता कि वे अभद्र और गाली-गलौच की भाषा का इस्तेमाल करें। आप सकारात्मक चर्चा करें, सार्थक टिप्पणी करें तो आपका स्वागत है। आपकी टिप्पणी का वह अंश जहाँ तक साहित्य शिल्पी को कोई आपत्ति नहीं है नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है तथा वह अंश जहाँ आपने अभद्रतापूर्ण टिप्प्णी की है हटाई जा रही है और यह पूरी तरह साहित्य शिल्पी के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसके लिये हमारी विवरणिका पढी जा सकती है। आप किसी भी माननीय लेखक की हमारे मंच पर मानहानी करने का अधिकार नहीं रखते।

    दूसरी बात बिना प्रोफाईल के बेनामी टिप्पणी कर आप साहित्य शिल्पी को जिस तरह धमकी दे रहे है इससे आपकी मंशा स्पष्ट नहीं होती। कृपया सामने आयें और सार्वजनिक नहीं होना चाहते तो हमारे ई-पते पर अपना फोन नं भेज दें। हम आपसे स्वयं सम्पर्क कर लेंगे। सम्पादित होने के पश्चात आपकी टिप्पणी इस प्रकार है -

    Hello
    I am Aditya. I posted my comments on the article and the same was deleted by you. Is it justice ? A reader has right to post a comment . Until and unless the view explained by a reader is not true the comments should not be deleted. In fact you are under influence of both of them and has no courage. It will be better to stop your blog.

    I repeat - repeat again that Shri Tejinder Sharma and so called journalist Ajit Rai are oportunist and used each other. {टिप्पणी का वह अंश जिसे डिलीट किया गया} If the comments will be deleted again I shall go to public court against your blog.

    Aditya

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  25. प्रवासी व् अप्रवासी की बात ही निरथक है जो भी हिंदी में लिख रहा है उस के प्रति आभार है वः साधू वाद का पात्र है यह तो बाद में आलोचकों का कम है की वे देखें की रचना क्या है यदि सम्मेलन बहर हो रहे हैं तो आपत्ति क्या हैआप यहाँ करेंजो वे क्र हरे हैं करें जिन लोगों को कोई काम नही है वे बेठे ठालेअसे विभाजन करते रहते है राजेन्द्र यादव का चस्मा उन्ही के पास ज्यदा अच्छारहेगा एपी के हमारे कम का नही है
    डॉ वेद व्यथित

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  26. मैनें अजित राय जी एवं तेजेन्द्र शर्मा जी दोनों के लेख पढ़े हैं। एक फ़ुज़ूल का विवाद खड़ा कर दिया गया है जिसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। हमलोग यहां भारत से हज़ारों मील दूर, हिन्दी को आगे बढ़ाने के काम में जुटे हैं। उस पर ग़ैरज़िम्मेदाराना टिप्पणियों से बचा जाना चाहिये।

    लंदन में भारतीय उच्चायोग एवं नेहरू केन्द्र हिन्दी की तमाम संस्थाओं की सहायता करते हैं और ख़ास तौर पर आसिफ़ इब्राहिम साहब और मोनिका जी तो हिन्दी के काम को अपना ख़सूसी काम मान कर करते हैं।

    यह समझ में बिल्कुल नहीं आया कि अजित जी को ऐतराज़ तो भारत से भेजे जाने वाले कवियों पर है, मगर कहते हैं कि यह प्रवासी हिन्दी का काला युग है। अब यह बात तो हमारी समझ से बिल्कुल बाहर की बात है। यहां ब्रिटेन में डा. कृष्ण कुमार, पद्मेश गुप्त, उषा राजे सक्सेना, तेजेन्द्र शर्मा, दिव्या माथुर, महेन्द्र वर्मा जैसे लोग हिन्दी के लिये कड़ी मेहनत कर रहे हैं। साल भर लगातार कार्यक्रम चलते हैं। फिर भला किसी को किस बात की शिकायत हो सकती है।

    अजित जी पिछले तीन सालों से ब्रिटेन आ रहे हैं। लंदन, बरमिंघम और वेल्स जैसे शहरों में घूम कर हिन्दी के कार्यक्रमों का आनंद उठा चुके हैं। उन्हें यदि किसी प्रकार की शिक़ायत आई.सी.सी.आर. से है तो उनसे सीधे राबता बनाएं। इस तरह मीडिया के माध्यम से चर्चा करके किसी समस्या का हल नहीं निकलता।

    काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी
    एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स
    लंदन

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  27. mai tejendra ji se sahamat hote hua bhi ajit ji ko unke nakaratmak chintan ke liye doshi nahin thahara sakata .koi vichar kisi karan ke bina janm nahi leta .jaruri nahi ki pravasi hindi ke prati unki chinta jayaj ho .parantu hamen hindi ke utthan ke liye ye to dekhana hi chahiye ki hindi se juda koi vyakti is tarah ke chintan ki or kyon muda .bhai aditya ji sahitya shilpi kisi ki jagir nahi jo aap dhamaki ki bhasa prayog karate hai .yadi aap kuch maryada ke viparit bolenge to hataya hi jayega sath hi apaki galat taur tarike ka samyak virodh bhi hoga.

    उत्तर देंहटाएं

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