अब धूप नही आती
सूरज को उलहना है
उस को वह सताती है
रचनाकार परिचय:-
9 अप्रैल, 1956 को जन्मे डॉ. वेद 'व्यथित' (डॉ. वेदप्रकाश शर्मा) हिन्दी में एम.ए., पी.एच.डी. हैं और वर्तमान में फरीदाबाद में अवस्थित हैं। आप अनेक कवि-सम्मेलनों में काव्य-पाठ कर चुके हैं जिनमें हिन्दी-जापानी कवि सम्मेलन भी शामिल है। कई पुस्तकें प्रकाशित करा चुके डॉ. वेद 'व्यथित' अनेक साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़े हुए हैं।

क्या वो अनजानी है
ये हो ही नही सकता
सर्दी तो रानी है

ये आग तो धीमी है
दिल और जलाओ तो
ये धूप ही सीली है

वो महल अटारी से
क्यों नीचे नही आती
सूरज की थाली से

कुछ भी तो नही दिखता
मन छुप छुप जाता है
है कोहरा घना इतना

कपडों के खान जाती
ये ठिठुरन इतनी है
वह आग लगा जाती

सरसों अब फूली है
देखो तो जरा इस को
किन बाँहों में झूली है

ये बर्फ जमीन ऐसी
वो मन को जमाएगी
अपना सा बनाएगी

मक्के की दो रोटी
और साथ में हो मठ्ठा
और थोडी डली गुड की

क्यों धूप नही बनते
सर्दी की दुपहरी में
सूरज से नही लगते

रिश्ते न जम जाएँ
दिल को कुछ जलने दो
वे गर्माहट पायें

रोके नही रूकती हैं
ये सर्द हवाएं हैं
ये आग सी लगती हैं

मीठी सी बातें थीं
गन्ने का रस जैसी
वे ऐसी बातें थीं

लम्बी सी रातें हैं
ये कहाँ खत्म होतीं
ये बातें ऐसी हैं

13 comments:

  1. शरद के आगमन का अहसास कराती है ये त्रिपदियाँ। बहुत खूब।

    उत्तर देंहटाएं
  2. ये आग तो धीमी है
    दिल और जलाओ तो
    ये धूप ही सीली है

    मन को छूती हैं ये त्रिपदियाँ

    उत्तर देंहटाएं
  3. रिश्ते न जम जाएँ
    दिल को कुछ जलने दो
    वे गर्माहट पायें
    सभी अच्छी हैं व्यथित जी बधाई स्वीकार करें।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सर्दी और धूप के रिश्ते को बयाँ करती सुंदर कविता...बढ़िया लगी..धन्यवाद वेद जी!!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर !
    दिल और जलाओ
    आग तो धीमी है धूप ही सीली है
    वाह! बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  6. jin 2 mitron ne meri in tuchh si tri pdiyon kopdha hai ttha bde sneh poorvk tippni dene ki kripa ki hai main un sb ke prti hrdy se aabhari hon kripya mera aabhar swikar kren mujhe prsnnta hogi yh sneh bnaye rhken
    dr ved vyathit

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह ! शिल्प भी अच्छा है और अर्थ भी |

    आपको इस रचना के लिए बधाई |


    अवनीश तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  8. मक्के की दो रोटी
    और साथ में हो मठ्ठा
    और थोडी डली गुड की

    क्यों धूप नही बनते
    सर्दी की दुपहरी में
    सूरज से नही लगते

    रिश्ते न जम जाएँ
    दिल को कुछ जलने दो
    वे गर्माहट पायें
    rachna badi sundar hai

    उत्तर देंहटाएं
  9. वेद भाई जी
    आपकी रचनाएँ पढीं . बहुत अच्छा लगा आपको यहाँ देखकर !
    कविता की पंक्तियाँ गुनगुनाने को मन चाहता है
    अजीब कसक है /शिकायत है ज़माने से
    'ये आग तो धीमी है
    दिल और जलाओ तो
    ये धूप ही सीली है !
    काश !जज्बात इतने ठंडे न हुए होते !
    सुधा भार्गव

    उत्तर देंहटाएं
  10. वेद भाई जी
    आपकी रचनाएँ पढीं . बहुत अच्छा लगा आपको यहाँ देखकर !
    कविता की पंक्तियाँ गुनगुनाने को मन चाहता है
    अजीब कसक है /शिकायत है ज़माने से
    'ये आग तो धीमी है
    दिल और जलाओ तो
    ये धूप ही सीली है !
    काश !जज्बात इतने ठंडे न हुए होते !
    सुधा भार्गव

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