क्या हम भारतीय स्वार्थी बनते जा रहे हैं या हम लोगो की सहन शीलता बढ़ गई है या हम लोग कायर हो गए हैं. हमे मिलकर इस बात का निर्णय लेना ही होगा की हम क्या हैं? क्यों हम लोग किसी भी बात को जो हमारे परिवार से सम्बन्ध नहीं रखती उस पर प्रतिक्रिया नहीं देते? क्यों हम लोग समाज को बदलते देखते रहते है बिना किसी भी हस्तक्षेप कीये चाहे वो नकारात्मक दिशा मे ही हो रहा हो . "यह देश कहाँ जा रहा है? इस समाज का क्या हो रहा है? कोई कुछ करता क्यों नहीं? बस इसी तरह के कुछ आदतन जुमले कह कर अपना काम कर देते हैं या कहें कि अपने दायित्व कि इतिश्री कर देते हैं. बहुत ही पीड़ा दायक है यह सब . हकीकतन देखा जाए तो हम लोग कायर हो रहे हैं . हम लोग सत्ता और शक्ति के गुलाम हो रहे हैं. कहीं हम किसी परेशानी मे न पड़ जाएँ और जीवन जो सुचारू रूप से चल रहा है वो कहीं बाधित न हो जाए इस कारण मौन रहना और कंधे उचकाकर कह देना "हमे क्या " हमारा स्वभाव बनता जा रहा है.

रचनाकार परिचय:- २२ अप्रैल. १९७० को चंदौसी (उत्तर प्रदेश) में जन्मे दीपक शर्मा लोकप्रिय कवि हैं। "फलकदीप्ति" और "मंज़र" नाम से आपके दो काव्य-संग्रह प्रकाशित हैं। आप विभिन्न मंचों और टी०वी० चैनलों से अपनी रचनाओं का पाठ कर चुके हैं।
बात अगर यह आदत बन जाती तो ठीक था इसे सुधार जा सकता था पर यह तो अपनी सहूलियत के हिसाब से बदल जाता है. घर मे एक रूप और बाहर दूसरा रूप . मतलब परिवार और देश के लिए अलग अलग मापदंड. जब कोई भी परिवार पर विपदा आती है तो हम उसे शासन और समाज से जोड़कर देखते हैं परन्तु जब समाज पर विपदा आती है तो उसे घर से जोड़कर कर क्यों नहीं देखते ? कहने पर असभ्य लगता है पर सच मे हम लोग दोहरे हैं.

हम लोगों को अपने बचपन से लेकर आज उम्र तक कि सब बातें चाहे वो बहुत अच्छी हो या बहुत बुरी पूरी पूरी याद रहती हैं और हम सब उसका उत्तर ढूँढने कि कोशिश हर लम्हा करते रहते है कि वो बात कैसे ठीक कि जाए , वो बात किस तरह से सही हो सकती है ? फलां परेशानी का क्या सबब था और क्या हासिल था . किसी ने अगर गलती कि थी तो उसे किस तरह से मुजरिम करार कराया था और अपने लिए सही रास्ता बनाया था . अगर कभी घर मे कोई हादसा हुआ था तो कैसे हुआ और कौन जिम्मेदार था और क्या परिणाम हुआ? सब कुछ याद रहता है . लेकिन बात जब समाज या देश की आती है तो हम लोगो की दिमागी हालत पतली हो जाती है , हम भूल जाते है या भूल जाना चाहते हैं , हम लोगो को किसी चीज़ से सरोकार नहीं रहता क्योंकि यह देश या समाज का मसला है . हमारे परिवार या घर का नहीं .

इस देश मे कितने ही काण्ड हुए और हो रहे हैं. रोज़ अखवार मे पड़ते हैं . किसी ने बलात्कार क्या, औरत जला दी गई , मुंह पर तेज़ाब फेंक दिया , करोड़ो रूपये घोटाले मे राजनेता डकार गए. छोटी बच्चो के ज़िस्म्फरोश पकडे गए. आदमी मे आदमी का गोश्त खा लिया.यहाँ फर्जीवाडा ,वहां घोटाला ,यहाँ तस्करी ,वहां भुखमरी . कभी जेसिका लाल हत्या काण्ड, कहीं चारा घोटाला, कहीं मुंबई बोम्ब ब्लास्ट , सरोजनी नगर दिल्ली बोम्ब ब्लास्ट, नीतिश कटारा हत्या काण्ड, निठारी हत्या काण्ड , तंदूर काण्ड , ज़मा निधि घोटाला , हथियार की संदेहास्पद खरीद फ़रोख्त, सड़क निर्माण घोटाला , भूमि पर अवैध कब्ज़ा , ..और न जाने कितने की अपराध. पर हमारी भी दाद देनी होगी की ५-६ दिन ख़ूब शोर करते है और बाद मे चुप , जैसे सांप सूंघ गया . कोई भी प्रश्न नहीं और न ही कोई जिज्ञाषा कि क्या हुआ और अपराधी का क्या हश्र हुआ हमने अपराधी को सज़ा दिलवाने कि कोई कोशिश नहीं की और न ही अपना दायित्व समझा कि कभी किसी भी माध्यम से समाज के करनधारो से पूछ सके कि फलां अपराध का क्या कर रहे हैं आप ? हमारी तो सहन शीलता का जवाब नहीं हैं ना . हम चुप रहेंगे . कसम खाकर बैठे है कि बोलेंगे नहीं क्योंकि यह हमारा मसला थोड़े ही हैं . समाज का है , किसी और का है , अपने आप निपटेगा . भाड़ मे जाये सब हमे क्या लेना ? मगर यही बात अगर घर पर आ जाये तो हम लोग क्या करेंगे ? ज़रा सोचो

तब हम सरकार को , समाज को गाली देंगे , शासन को कोसेंगे और अपनी पूरी कोशिश करेंगे कि हमे न्याय मिले और इससे कहलवा , उससे कहलवा, हाथ जोड़के, प्यार से, पैसे से , दवाब से , यानी हर तरह से चाहेंगे कि मसला काबू मे आ जाये . अथार्थ जी तोड़ कोशिश और प्रयत्न .

हम लोग अपने हित के लिए लम्बे लम्बे , बड़े बड़े जुलूस निकाल लेते हैं . बस तोड़ो , रेल रोको, दुकाने जलाओ, शहर बंद करो, चक्का जाम . यह सब इसलिए कि इसमें व्यक्तिगत फायदा है और राजनेता बनने का अवसर भी. परन्तु कभी हम लोगो ने कसी भी घोटाले या हत्या काण्ड या नरसंहार के लिए जुलुस निकाला हैं, क्या सालो-साल या महीनो या कहो कुछ सप्ताह तक भी मुहीम चलाई है? जवाब है नहीं बिलकुल नहीं . क्योंकि यह बात हमारी नहीं है किसी और की है वो अपने आप निपट लेगा .

आजकल खून में पहली सी रवानी न रही
बचपन बचपन न रहा , जवानी जवानी न रही
क्या लिबास क्या त्यौहार,क्या रिवाजों की कहें
अपने तमद्दुन की कोई निशानी न रही

बदलते दौर में हालत हो गए कुछ यूँ
हकीक़त हकीकत न रही , कहानी कहानी न रही
इस कदर छा गए हम पर अजनबी साए
अपनी जुबान तक हिन्दुस्तानी न रही

अपनों में भी गैरों का अहसास है इमरोज़
अब पहली सी खुशहाल जिंदगानी न रही
मुझको तो हर मंज़र एक सा दीखता है "दीपक "
रौनक रौनक न रही , वीरानी वीरानी न रही

मैं आप लोगो की या कहूँ हम सब की कमियाँ नहीं निकाल रहा हूँ . आप सब मैं से एक हूँ और आत्म विश्लेषण कर रहा हूँ और पता हूँ की देश को हम लोग ही बदल सकते हैं . कहीं सड़क निर्माण हो रहा हो और मिलाबत लगे तो शासन को, मीडिया के द्वारा या किसी भी माध्यम से , जनचेतना का हिस्सा बनकर सूचित कर सकते है और जवाब मांग सकते है की हमारे म्हणत के धन का दुरूपयोग क्यों किया जा रहा है . अपराधी को सज़ा मिलने तक शांत नहीं रहना हैं . किसी भी घोटाले के लिए नहीं हैं हमारा धन . बहुत मेहनत और परिश्रम से कमाई गई रोटी का एक हिस्सा हम लोग सरकार को कर के रूप मे देते है ताकि समाज का सर्वागीण विकास को . हर घर मे रोटी पहुंचे, रोज़गार पहुँचे. अगर उसका दुरूपयोग होता है तो हम सब को अपने धन का हिसाब मागने मे दर और हिचकिचाहट या घबराहट क्यों ?

समाज मे हिंसा होती है तो असर मेरे घर तक भी आएगा बस ये ही भावना मन मे आ जाये और हम मुजरिम का अंजाम होने तक प्रश्न सूचक नजरो से और बुलंद आवाज़ से अपने हाकिमो से पूछे तो मुझे नहीं लगता की न्याय नहीं मिलेगा. ज़रूर मिलेगा या कहिये कि देना ही होगा. एक बात याद रखो मेरे दोस्त "जब तक प्रजा हैं तभी तक राजा है" बिना प्रजा के राजा भी कभी राजा होता है और यह प्रजातंत्र है यहाँ प्रजा ही राजा है. इसीलिए आज से ही अपने राजाधिकार का प्रोयोग करो और इस देश से रिश्वत , ग़रीबी, अशिक्षा, बीमारी, भुखमरी , लाचारी , मजबूरी, कमजोरी, अनैतिक राज सब कुछ मिटा दो. दुनिया को भी लग्न चाहिए कि इस देश का नाम भारत यूं ही नहीं पड़ गया .बालक भरत ने शेर के दांत गिन लिए थे और हम लोग तो बड़े है . हमे आदम खोर शेरों के पेट मे हाथ डाल कर अपना हक लेना हैं ......शुभस्य शीघ्रम ..

10 comments:

  1. विचारणीय आलेख है और सत्यता है कि हम भारतीय संवेदन शून्य और स्वार्थी हो गये हैं।

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  2. बहुत ही विचारणीय आलेख लिखा है आपने .. अपनी या अपने परिवार के लोगों से मोह के मामले में मनुष्‍य सदा से स्‍वार्थी रहा ही है .. पर इससे दूसरों की उपेक्षा नहीं हो जाती .. इसका सीधा दोष आज की हमारी व्‍यवस्‍था को दी जा सकती है .. जिसके कारण हम अपनी या अपने परिवार के लोगों प्रति हुए अन्‍याय के विरूद्ध भी आवाज नहीं उठा पाते .. तो और लोगों के लिए आवाज उठाने का सवाल ही नहीं पैदा होता ??

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  3. पूरा लेख तो नहीं पढा आपका मगर शीर्षक और सामग्री के आधार पर यही कहूंगा कि हम स्वार्थे कब न थे ! युग, युगांतर से हम लोग स्वार्थी ही तो थे, है और रहेंगे ! तीन तीन गुलामियाँ ऐसे थोड़े ही गले पडी !

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  4. भाषण की शैली में लिखा गया आलेख विचार के लिये अच्छा है लेकिन साहित्यिक कसावट की कमी है।

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  5. हमारी इसी आदत ने तो देश का बंटाधार किया है..आप ने सही कहा हमारी यह प्रवृति की इस से हमे क्या सरोकार ?? हमे बहुत गलत दिसा की ओर ले जा रहा है...हम सरकारे भी इसी लिए ऐसी चुन लेतें हैं जो वास्तव में चुनने लायक नही होती। पिछली बातों को भूलने की आदत फैसला लेनें मे बहुत नुकसान देह साबित होती है।
    आपने बहुत ही बढ़िया व सामयिक आलेख लिखा है।बहुत बहुत बधाई ।

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  6. यह सही है कि हम लोग सामाजिक दायित्व पर ध्यान नहीं दे रहे हैं |
    आपके विचारों से सहमती है |

    समस्या उजागर के साथ साथ समस्या समाधान के रास्ते बताना बात को पूर्ण करती है |
    समस्या समाधान के विषय में सोचना और करना हमारी जिम्मेदारी है |

    सामाजिक सुधार के लिए मंगल कामना के साथ

    अवनीश तिवारी

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  7. aakhir is ka smadhan kya hai prshn to smadhan chahta hai indriyan nimn gami hai prntu dhrm ke pkhnd aur virodh dono ne ise aprbhavi bna diya hai swarth ke pichhe bhi jo karn kam krte hain ve vyvstha se jude hain ds bar apradh krne ke bad hbhi apradhi jmant pr chhot jata hai aap kya kr loge dusre mnushy ki virtiyan kaise niyntirt hon bada prshn yh bhi hai dusra gandhi aaj paida nhi huaa hai pr hme smadhan to sujhana hi hoga tbhi prshn ki sarthkta hai
    dr.ved vyathit

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