180 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आनेवाला वह तूफान कितना भी भयानक क्यों न था, भले ही उसने मानचित्र से कई गॉवों या शहरो का अंत कर डाला था, उस क्षेत्र के आधे से अधिक लोगों की जानें ले ली थी, सारी संपत्ति को तहस-नहस कर डाला था, परंतु उससे मेरा क्या बिगड़ा था? अंग्रेजी की एक कहावत के अनुसार जो गिरा पड़ा है, उसे गिरने का क्या डर ? मेरे जीवन के लिए सच्चा साबित हुआ। मै अनाथ थी ही, अनाथाश्रम में ही लायी गयी।वास्तव में, तूफान से पहले ही मेरे जीवन में कौन सा सुख था। जन्म के वर्षभर के अंदर ही माता-पिता को खो देने के कारण करमजली सुनाने के लिए मुझे होश संभालने का भी मौका नहीं दिया गया था। दिनभर उम्र से अधिक काम करने के बावजूद भी रात में रूखा-सूखा या आधे पेट खाकर जमीन पर सोना मेरी दिनचर्या बना दी गयी थी। बचपन से ही चाची की डॉट-फटकार सुनते-सुनते मेरे कान पक गए थे।

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

संगीता पुरी का जन्म 19 दिसम्‍बर 1963 को झारखंड के बोकारो जिला अंतर्गत ग्राम - पेटरवार में हुआ। रांची विश्‍वविद्यालय से अर्थशास्‍त्र में 1984 में स्‍नातकोत्‍तर की डिग्री ली।

उसके बाद झुकाव अपने पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा विकसित की गयी ज्‍योतिष की एक नई शाखा गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की ओर हुआ और सब कुछ छोडकर इसी के अध्‍ययन मनन में अपना जीवन समर्पित कर दिया। गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर आधारित अपना साफ्टवेयर भी वे बना चुकी हैं।

सितम्‍बर 2007 से ही ज्‍योतिष पर आधारित अपने अनुभवों के साथ ब्‍लागिंग की दुनिया में हैं। अनेक पत्र पत्रिकाओं के लिए लेखन करती आ रही हैं। ज्‍योतिष पर आधारित एक पुस्‍तक 'गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति: ग्रहों का प्रभाव' 1996 में प्रकाशित हो चुकी है।

मेरे पक्ष में चाचाजी के मुहं से निकला एक सहानुभूतिपूर्ण वाक्य मेरे लिए सप्ताह भर की त्रासदी बन जाता था। किसी को माता-पिता का प्यार पाते देख आहें भरना तो मेरा भाग्य था ही , मार खाकर दिनभर काम करते रहना भी मेरी नियति बना दी गयी थी। चाचीजी न सिर्फ मुझे, वरन् मेरे स्वर्गवासी माता-पिता को भी गाली देने में बाज न आती। यही कारण था कि जहॉ अनाथाश्रम में लाए गए सभी बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल था, वहीं मै बिल्कुल सामान्य थी।

पर बाद में तूफान ने मुझे कहॉ से कहॉ लाकर रख कर दिया था, मुझे छोड़कर इस बात को कौन महसूस कर सकता था। तूफान में फंसी बेहोशी की हालत में ही मै स्वयंसेवी संगठनों द्वारा अस्पताल में लायी गयी थी, मैने जब ऑखे खोली, तो स्वयं को अस्पताल में ही पाया था। अस्पताल से ही महिला, पुरूष और बच्चों को अलग-अलग केन्द्रों में ले जाया गया था। मुझे भी पहले महिला केन्द्र में ही रखा गया, पर उस अनाथाश्रम की मुख्य संचालिका मिसेज माथुर की विशेष कृपादृष्‍िट मुझे उनके घर तक ले आयी।वहॉ सुख-सुविधा के सब साधन इकटठे थे।

उस विशाल भव्य भवन में संचालिका अकेले ही क्यों रहती थी, इसकी मुझे न ही जिज्ञासा थी और न उत्सुकता। मै तो अपने भाग्य पर इठला रही थी। मै मिसेज माथुर का थोड़ा भी काम कर देती,तो वह खुश होकर मुझे ढेर सारी शाबाशी देतीं। साथ ही अच्छे ढंग से हर प्रकार के कार्य को करने का तरीका और बातचीत का सलीका सिखातीं। उसने रंग-बिरंगे कपड़े और सौंदर्य-प्रसाधन लाकर रख दिए थे। सुबह से शाम तक मेरे खाने-पीने, तैयार रहने और हर प्रकार की सुख-सुविधा के लिए एक दासी मेरी सेवा में लगी होती। वास्तव में मिसेज माथुर के ही पैसे से यह सब व्यवस्था हो रही है, इस बात को समझने में मुझे देर न लगी। मै उनकी उदारता, सहानुभूति और प्यार देखकर तो दंग ही रह गयी थी। कभी-कभी तूफान के उस भयानक रात को याद कर भले ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हों, पर मै अपनी जीवनशैली में आए परिवर्तन को देखकर तूफान के भयानक और विनाशकारी स्वभाव को भी स्वीकार करने से कतराने लगी थी।

मिसेज माथुर के घर दिनभर लोगों का आना-जाना लगा रहता। लोगों के उंचे स्तर की पहचान गेट पर ठहरी बड़ी-बड़ी गाड़ियों से होती थी। पूछने पर मालूम होता, अनाथाश्रम के लिए चंदे और अन्य प्रकार की व्यवस्था के लिए लोग आते जाते हैं। सुनकर ऑखे नम हो जाती, दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है, अनाथों का कितना ख्याल रखा जाता है। महीने भर मिसेज माथुर के घर आराम से रहने के बाद मै खुद को ही पहचान नहीं पा रही थी। मेरे चेहरे के साथ साथ हाथ-पावं सबकुछ खूबसूरत हो गया था, आत्मविश्वास काफी बढ़ गया था। अब मै मिसेज माथुर से भी काफी खुलकर बातें करने लगी थी। मेरे मुहं से निकली हर इच्छा को पूरी करने में वे कोई कसर न छोड़ती, मेरा सर श्रद्धा से झुक जाता। बातचीत के क्रम में मैने नृत्य के प्रति अपनी रूचि जाहिर की, दूसरे ही दिन नृत्य-प्रिशक्षिका हाजिर, मुझे तो अपने भाग्य पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। मैं पूरे लगन और निष्‍ठा से नृत्य सीखने का प्रयास करने लगी।

एक दिन पुलिस की गाड़ी गेट पर रूकी। तीन-चार पुलिसकर्मियों को अंदर आते देख मेरी उत्सुकता तो बनीं, पर मै अपने कमरे से कुछ समझ न पायी। थोड़ी देर बाद वे मेरे कमरे में मिसेज माथुर के साथ ही पहुंचे। उनसे पहले ही मिसेज माथुर पूछ बैठी-'बेटी, बोलो तो, इस घर में तुम्हें कोई तकलीफ है।

तुम्हारे साथ कोई बुरा व्यवहार करता है।' 'नही , ये किसने कहा' , मै तो अप्रत्याशित रूप से उपस्थित हुए इस प्रश्न के लिए तैयार ही नहीं थी। तभी पुलिसवाले ने कहा 'हमें खबर मिली है कि तुम्हारे साथ किसी प्रकार की जबर्दस्ती की जा रही है।''नहीं, नहीं, ऐसा मत कहिए, ये तो देवी हैं, इन्होनें मुझे शरण दिया है। मैने तो इनसे इतना प्यार पाया है कि वर्णन भी नहीं कर सकती।'भावुकता में मेरे ऑख से ऑसू बह निकले थे।'तो ठीक है, लेकिन कभी कोई बात हो तो रामपुर मार्ग के थानाचौकी पर चले आना।'यह कहकर वे चले गए। बाद में मिसेज माथुर ने मुझे समझाया कि उसकी लोकप्रियता से कुछ लोगों को ईर्ष्‍या है और वे ही कभी-कभी पुलिस में उसके खिलाफ रिपोर्ट कर दिया करते हैं।

दो महीने के नृत्य प्रशिक्षण के बाद तो मेरा कायापलट ही हो गयी। प्रशिक्षिका और मिसेज जोशी की शाबाशी से मेरी मेहनत में वृद्वि होती और फिर मेरी मेहनत एक अलग रंग लाती। फिर एक दिन मेरे स्टेज प्रोग्राम की घोषणा हुई। एक महिला निकेतन में ही मेरा प्रोग्राम रखा गया। शहर के गणमान्य लोगों को निमंत्रित किया गया। शाम पॉच बजे ही मुझे महिला निकेतन में ले जाया गया। मेरे तो हर्ष का ठिकाना ही न था। मै मिसेज माथुर के साथ ही कार से उतरकर निकेतन के अंदर मेक-अप रूम में चली आयी। नृत्य के लिए तैयार कपड़ों गहनों से मेरा पूरा श्रृंगार किया गया। धीरे-धीरे सभी आमंत्रित पहुंचने लगे। गुरू का प्रशिक्षण, मेरी योग्यता और एकाग्रता को रंग लाना ही था ,मेरे द्वारा किया गया कार्यक्रम काफी सफल रहा। तालियों की गड़गड़ाहट से आसमान गूंज उठा।

परिस्थितियों से बेखबर अपने भाग्य पर इठलाती मै अपने कमरे में आ गयी, इस बात से बेखबर कि मेरी जिंदगी में असली तूफान तो आज आनेवाला है, तभी तो रात्रि अपने कमरे में एक पुरूष को पाकर मै चीख ही पड़ी थी। उसने निकट आकर मेरे मुहं को बंद कर दिया था, वेश-भूशा से अमीर दिखाई पड़नेवाले इस व्यक्ति के हाव-भाव एवं चाल-ढ़ाल बिल्कुल ही अच्छे नहीं लग रहे थे। उसके मुहं से निकल रही शराब की गंध से मुझे उबकाई आ रही थी। मैं उछलकर खड़ी हो गयी और दरवाजे की ओर दौड़ पड़ी, परंतु दरवाजा बाहर से बंद था। मैने काफी हाथ-पैर चलाया, पर पुरूष-शक्ति के आगे मेरी एक न चली। मैं समझ गयी कि मै किसी के वासना का शिकार बन रही हूं, पर फिर भी मै जोर-जोर से चिल्लाती ही रही। मेरी चिल्लाहट सुन मिसेज माथुर कमरे में आयी। उन्हें देखते ही मैं जाकर उनसे लिपट गयी, जोर-जोर से रोना शुरू किया, पर मेरी रूलाई से उनका दिल नहीं पसीजा, वरन् क्रोध बढ़ गया। उसने गुस्से से मेरे बालों को खींचा और मुझे जमीन पर गिराकर तड़ातड़ थप्पड़ मारना आरंभ कर दिया। मै समझ गयी, इतने दिनों तक मुझे दिए गए प्यार का उन्हें पूरा मूल्य वसूलना था। शीघ्र ही मेरी सारी शक्ति क्षीण हो गयी और मुझे अपना सर्वस्व लुटा देने को बाध्य होना पड़ा। उसके बाद तो रो-रोकर मेरा बुरा हाल था, पर मै कर भी क्या सकती थी। मै कमरे में ही कैद रहती, दिनभर अकेले और रात्रि किसी पुरूष के साथ। कुछ दिनों तक यह सिलसिला चलता ही रहा। तूफान के इन लहरो में डूबती-उतराती मै तो टूटती ही जा रही थी और शायद कुछ दिनों में मर ही गयी होती, यदि एक नन्ही जान को अपने शरीर में फलते-फूलते न पाया होता।

मेरे गर्भवती होने की सूचना से मिसेज माथुर की खुशी का ठिकाना न था। उसने फिर मेरा ख्याल रखना शुरू किया। पुन: अपने घर में रखकर पौष्टिक खाना, हर तरह का आराम, सेवा के लिए एक दासी--इतनी सुविधा तो लोगों को अपने घर में भी नहीं मिलती है। मिसेज माथुर पुन: मुझपर क्यों मेहरबान है, मेरी समझ से परे था, पर मुझे तत्काल नरक जैसी जिंदगी से मुक्ति मिल गयी थी। धीरे-धीरे पुराने जीवन को एक भयानक स्वप्न की तरह भूलने का प्रयास भी कर रही थी और समय आने पर गुड़िया जैसी एक कन्या को जन्म भी दे दिया था। मातृत्व के सुखद अहसास ने मेरे सारे तकलीफों को छूमंतर कर दिया था। उधर मिसेज माथुर तो बच्ची के लिए बाजार करने में ही व्यस्त थी। हर प्रकार के कपड़े, खिलौने, झूले, पालने --- पूरा एक कमरा बच्ची के लिए सजा दिया गया था। मिसेज माथुर ने ही बच्ची का नाम रोज रखा था। एक महीनें में ही वह सचमुच गुलाब हो गयी थी। पर रोज के भाग्य के बारे में सोंचकर मै अक्सर सशंकित हो जाती। उसके भविष्‍य की कोई कल्पना कर पाने में भी मैं असमर्थ थी।

एक दिन रोज का रूदन सुनकर मै उसके कमरे की ओर दौड़ी तो दरवाजे का ताला बंद पाया। नौकरानी से मालूम हुआ कि चाबी मिसेज माथुर के पास है। मै मिसेज माथुर के पास चाबी लेने पहुंची, पर मिसेज माथुर मुझे चाबी न देने का पूरा निर्णय कर चुकी थी। भूख से रो-रोकर रोज का बुरा हाल था, पर मिसेज माथुर का दिल तो पत्थर का था। उन्होनें दृढ़तापूर्वक अपना निर्णय सुना दिया। रोज को दूध तभी मिलेगा, जब मै अपने ग्राहकों से अच्छी तरह पेश आउंगी, साथ ही मिसेज माथुर के बारे में किसी से एक शब्द न कहूंगी। एक महीने की बच्ची का भूख से गला सूख रहा था, मै भला इंकार कैसे करती। किन्तु स्वीकार करने के बाद भी मुझे बच्ची को अपना दूध पिलाने की अनुमति नहीं मिली। उसके लिए बोतल में डब्बाबंद दूध की व्यवस्था की गयी और मै लाचार सबकुछ देखती रही। मेरी सारी शंका नष्‍ट हो चुकी थी। मिसेज माथुर के बनावटी प्यार का अर्थ स्पष्‍ट हो चुका था। अब मै अपनी बच्ची के भविष्‍य के लिए सबकुछ स्वीकार करने को विवश थी।

शीघ्र ही मुझे अनाथाश्रम में वापस ले जाया गया। दिन-भर अनाथाश्रम दिखाई पड़ने वाला वह भवन रात्रि में देह-व्यापार का वीभत्स केन्द्र बन जाता। वहॉ की सभी महिलाएं मेरी तरह किसी न किसी विवशता के कारण मुहं खोलने को लाचार थी, यह बात अब मेरी समझ में आ गयी थी। प्रोग्राम वाले दिन भी मैनें अन्य महिलाओं की ऑखों में मिसेज माथुर के प्रति श्रद्धा का भाव नहीं देखा था, इसका कारण मेरी समझ में अब आया था। अनाथाश्रम के नाम पर चंदे इकट्ठा करना और अनाथ महिलाओं से देह-व्यापार करवाकर पैसे बटोरना-- मिसेज माथूर के दोनों हाथों में लड्डू थे। बहुत मुश्किल से मै अपने को उस जीवनशैली में ढाल पाने में समर्थ हो सकी। हर महीने में मुझे बच्ची के साथ पूरे दिन व्यतीत करने को मिलता। सुख देनेवाले हर साधन से रोज को युक्त पाकर मुझे आत्मिक संतुष्टि मिलती और मै अपनी उस नरक-तुल्य जीवन में ही खुशी ढूंढ़ने लगती। आखिर इस शरणस्थली में कम-से-कम रोज की जिंदगी तो सुरक्षित है। मेरा क्या है, मैने तो इसी तरह कैसे बीस वर्ष व्यतीत कर लिए, पता भी न चला।

रोज की ग्रेज्युएशन भी पूरी हो गयी। रोज को अबतक खुद भी मालूम नहीं हुआ कि उसकी मॉ किस दलदल में फंसी हुई है। वह तो मात्र इतना जानती है कि वह एक अनाथ महिला की पुत्री है, जिसे मिसेज माथुर ने गोद लिया है। उसे दोनों ही मॉ से बराबर का लगाव है।

आज फिर अनाथाश्रम में उत्सव है। किसी नई नृत्यांगना का नृत्य। इस अनाथाश्रम से जुड़े हर लोग आमंत्रित हैं। बैठने-उठने की व्यवस्था और स्टेज का निर्माण कार्य चल रहा है। मिसेज माथुर के उत्साह की कोई सीमा नहीं, पर मुझे ऐसे मौके पर बड़ा भय होता रहा है। किसके जीवन में पुन: तूफान आनेवाला है, इसकी जिज्ञासा है, पर लाख कोशिश के बाद भी इस बात की गोपनीयता खत्म नहीं होती है। खैर, देखते ही देखते शाम हो गयी और नृत्यांगना स्टेज पर आयी। इस खास अवसर पर मुझे भी कुछ काम दिए गए थे, जिन्हें पूरा करने में मैं इधर-उधर थी, अचानक स्टेज की ओर नजर गयी, तो अपनी नन्हीं सी कली रोज को नृत्यांगना के रूप में देखकर मेरे मुंह से चीख ही निकल गयी। मुझे सहज में विश्वास भी न हो सका कि मिसेज माथुर इतनी नीच हरकत कर सकती है, मैं तेजी से स्टेज के निकट गयी, वह नर्तकी रोज ही थी, यह वहम् नहीं , हकीकत था। रोज नृत्य में डूबी हुई थी और लोग तालियों की गड़गड़ाहट से उसे उत्साहित कर रहे थे। बेचारी रोज को क्या मालूम था कि तालियॉ बजाने वाले ये इंसान कला के नहीं वरन् वासना के पुजारी थे और इन तालियों का उसे कितना बड़ा मूल्य देना होगा। दिल के जिस टुकड़े को बचाने के लिए मैंने सारे दिल को ही पत्थर बना दिया था , उसका विनाश मैं कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती थी।

मेरी बेटी रोज के जिंदगी को बचाने में मात्र दो-चार घंटे ही बचे थे। मैं क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मुझे अब देर नहीं करना चाहिए था लेकिन मै कर भी क्या सकती थी। इस शहर में मेरा परिचित न कोई व्यक्ति था और न ही कोई स्थान । लेकिन इन 20 वर्षों में दिमाग में रामपुर मार्ग का थाना सुसुप्त पड़ा था, जो कभी-कभी दिमाग में कौंधता अवश्य था, पर वहॉ जाने की न तो हिम्मत थी और न ही उपाय। अपने लिए जहॉ जाने को अभी तक मैं हिम्मत नहीं जुटा पाई थी, बेटी के लिए जाने को हिम्मत जुटाते ही उपाय भी नजर आ गया था। अपनी जिंदगी के बीस वर्षों का एक-एक दिन जिस नरकतुल्य आश्रम में व्यतीत किया था, उसके चप्पे-चप्पे की जानकारी मुझे हो गयी थी। बाहर निकलने के एक दो गुप्त रास्ते भी मुझे मालूम हो गए थे। मैने उसी रास्ते पर अपने कदम बढ़ाए। बाहर निकल आयी और ऑटोवाले को रामपुर मार्ग का थाना ले चलने को कहा। वहॉ जाकर मैने नाइट-ड्यूटी कर रहे कर्मचारियों को सारी बाते बतायी। घंटे भर के अंदर ही पूरे शहर के पुलिस डिपार्टमेंट को खबर पहुंची और अनाथाश्रम को चारो ओर से घेर लिया गया। मिसेज माथुर और उनके सहयोगियों का भांडा फोड़ने के लिए कई अनाथ महिलाएं गवाह बनने को तैयार हुईं।

कितनी ही जिंदगियों में आया तूफान आज एक साथ थम चुका था। कचहरी में जज साहब ने फैसला सुनाया। मिसेज माथुर सहित सभी सहयोगियों को आजीवन कारावास की सजा मिल गयी। मेरी ऑखों से निरंतर ऑसू बह रहे थे। कुछ खुशी के तो कुछ गम के। खुशी इस बात की कि अपनी रोज को खिलने से पहले ही मुरझाने से मैने बचा लिया, पर गम इस बात की कि यही कदम मैने 20 वर्ष पहले उठाया होता तो और कितनी रोजें कुम्हलाने से बच गयी होतीं।

19 comments:

  1. तो संगीता जी की एक प्रतिभा यह भी है ! वाह क्या कहने ! कहानी सायास सुखांत की गयी है मगर उचित यही है !

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  2. हकीकत के बहुत करीब लगी आपकी कहानी, बधाई.

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. यथार्थ परक कहानी को पूरी रोचकता बनाये रख कर संगीता जी नें कहा है। बहुत बधाई एक सशक्त कहानी के लिये।

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  5. सचमुच आज फॉण्‍ट इतनी छोटी क्‍यूं रखी गयी है .. वैसे पाठक ctrl और + बटन को एक साथ दबाकर बडा फॉण्‍ट प्राप्‍त कर सकते हैं!!

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  6. कहानी का सुखाँत ही सही लगता है जीवन मे तो दुखाँत झेलते ही हैं कम से कम कहानियों मे तो इसका आनन्द ले ही सकते हैं आपका ये रूप भी बहुत अच्छा लगा बधाई

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  7. दिल को छू लेने वाली कहानी।
    घुघूती बासूती

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  8. yeh kahaani haquqt se sarobaar hai sangeetaji aapne to kahaani likhi hai par west bengaal me mahila sudhar grahon ki yahi halat hai!!!! bahut hi dayniya hai!! apne kahaani ke jariye saty ko bataayaa hai!!!

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  9. " bahut hi badhiya aur marmik kahani "

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

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  10. कभी कभी जीवन में कोई निर्णय समय पर लेना कितना कठिन होता है इसका परोक्ष रूप में साक्षात्कार करवाने में कहानी सफ़ल रही है. देर से ही सही परन्तु निर्णय लेकर आने वाले समय को तो सफ़ल किया ही जा सकता है...

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  11. नमश्कार!
    बहुत ही अच्छा लिखा है आपने.
    हम आपके साफ़्टवेयर के बारे मे कुछ जानना चाहते हैं, वो हमको कैसे प्राप्त हो सकता है, बताने का कष्ट करें

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  12. sangitaji abhinandan. kahani chitrapat par dekhne ka aabhas karati hai. aap to chupa rustam nikali.

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  13. ytharth se prichy krate huye jivn ke anays aaye mod ko sukhant tk phunchna achchha lga .khani apne pichhe bhi ek khani si chhodti prtit hoti hai jo us se ekaek dhyan nhi htne deti .bdhai
    dr.ved vyathit

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