गोधूली बीत गयी थी और अंधेरा शनै:-शनै: परिवेश को अपने आगोश में लिये, अपने साम्राज्य की घोषणा कर रहा था। किले के भीतर वह भग्नावशेष; जो कभी महल रहा होगा; और भी डरावना लगने लगा। भीतर से आती अजीब अजीब सी आवाजें दिल को बैठनें पर मजबूर करती लेकिन हौसला मजबूत था। रौशनी के नाम पर हमारे हाँथों में केवल एक टॉर्च थी। आसमान पर पूरा चाँद खूबसूरत तो लगना ही चाहिये था लेकिन आज जैसे भीतर के भय को उकेरने की कोशिश में था और भयावह लग रहा था।
भानगढ के भूतिया-किले में हम इस वक्त भग्न महल की प्राचीर पर थे। महल के अग्र भाग पर संभवत: जहाँ से कभी राजे महाराजे अपनी नगरी को उँचाई से निहारा करते रहे होंगे वहाँ एक कुत्ता हमारी उपस्थिति को नजरंदाज किये इस तरह खडा था मानों भवन का अधिपति हो। काला-भूरा मिश्रित वह कुत्ता विशिष्ठ तरह से चमकती अपनी आँखों के कारण डरावना प्रतीत होता था।

राजस्थान के अलवर शहर से लगभग 86 कि. मी. की दूरी पर स्थित भानगढ, सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान से लग कर अवस्थित है। पर्यटन की दृष्टि से सरिस्का आने वालों के लिये भानगढ को भी सम्मिलित कर लेना अपनी यात्रा को यादगार बना लेना है। अक्टूबर का पहला दिन था, राष्ट्रीय उद्यान आज ही तीन माह के बाद जन-सामान्य के लिये खोला गया था। सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान कभी बाघों के लिये ही जाना जाता था किंतु अब केवल एक विस्थापित बाघ और दो बाघिनियों के साथ अपनी पुरानी साख की ओर लौटने की कोशिश में लगा है। पर्यटकों के लिये बाघ देख पाना उनकी किस्मत पर निर्भर करता है लेकिन घने जंगल के भीतर प्रविष्ठ होते ही झुंड के झुंड मोर, सांभर, नीलगाय, हिरण, जंगली सुअर यहाँ तक कि नेवले, मगरमच्छ और साँप भी हमने देखे। वन्यजीवों को प्रकृति के बीच स्वच्छंद और सानंद देखने का आनंद ही कुछ और है।
घने जंगलों से हो कर ही पांडुपोल के लिये रास्ता जाता है। इस स्थल की कहानी दिलचस्प है। हनुमान जी नें इसी स्थल पर भीम का अपने बल पर अहं तोडा था, एसी मान्यता है। पाण्डुपोल में हनूमान जी का सुन्दर मंदिर है जहाँ उनकी लेटी हुई मनोहर मूर्ति स्थापित है।
पाण्डुपोल से लगभग 50 कि.मी की दूरी पर है - भानगढ। हमारी अभिरुचि इस स्थल पर पहुँचने की अधिक थी। इसका पहला कारण था इस स्थल के बारे में फैली हुई अनेक कहानियाँ और अफवाहें। जितने मुँह उतनी बाते प्रसारित हैं। भानगढ, भारत के उन स्थलों में से एक है जिन्हे भूतिया कहा जाता है।
कुछ दिनों पूर्व चर्चा के दौरान एक मित्र नें इस स्थल का जिक्र किया था और अपने अनुभव सुनायें थे। रात देर तक रुकने के दौरान उन्हे अजीब अजीब सी आवाजे, चीख-चिल्लाहट के स्वर सुनाई दिये थे। उन्होंने पायल की आवाज सुनी थी और फिर महल से अपने मित्रों के साथ उन्होंने भागना ही उचित समझा था। कहानी सुनने के दौरान भी मैं हँस पडा था और उसे कोरी गप्प करार दे कर हटा था। तथापि अवचेतन में इस स्थल को देखने की इच्छा तो हो ही गयी थी। एसा नहीं है कि केवल भानगढ ही वीराना है, हमारी गाडी जैसे जैसे उस ओर बढ़ने लगी वनाच्छादित अरावली के नयनाभिराम नजारे ही बिखरे हुए थे यदा कदा ही आबादी दिखायी पड़ती। यकीन करना मुश्किल है कि किसी समय शक्तिशाली शासकों की राजधानियाँ इन वीरानों को आबाद किया करती थीं।
इतिहास के पन्नों को पलटे तो कुछ बिखरी हुई जानकारियों में भानगढ नजर आता है। यह नगर 1573 ई. में राजा भगवंत दास द्वारा अस्तित्व में लाया गया किंतु इसकी प्रतिष्ठा अथवा सही मायनों में स्थापना राजा माधो सिंह के साथ अधिक जुडी है। राजा माधो सिंह महाराजा मानसिंह –प्रथम {मुगल सम्राट अकबर के प्रमुख दरबारी तथा आम्बेर के महाराजा} के द्वतिय एवं कनिष्ठ पुत्र थे। माधोसिंह नें अपने पिता और भाई के साथ अनेक महान युद्धों में हिस्सा लिया था। भानगढ के अगले शासक राजा माधो सिंह के पुत्र छत्र सिंह थे। उनकी हिंसक मौत के बाद यह नगर धीरे धीरे गुमनाम और वीरान होता चला गया। विवरण यह भी मिलता है कि मुगल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु के बाद से ही मुगल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया था। इसी का लाभ उठा कर जय सिंह द्वितीय नें 1720 में भानगढ पर आक्रमण किया और उसे अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। इसके पश्चात तो इस नगर पर जैसे किसी की बुरी नजर लग गयी थी। नगर खाली होता गया, 1783 में भीषण अकाल पड़ा और उसके पश्चात वीरान हुआ नगर फिर कभी नहीं बसाया जा सका।
लेकिन इतिहास के पन्ने हमेशा पूरा सच नहीं होते। अगर एसा होता तो खुद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को भानगढ की सीमा के बाहर यह सूचनापट्ट नहीं लगाना पड़ता जिसपर स्पष्ट लिखा है – भानगढ की सीमा में सूर्योदय के पहले तथा सूर्यास्त के पश्चात प्रवेश करना वर्जित है। वस्तुत: भानगढ अपने भीतर इतिहास से निकला जो डर सजोये है वह एक भरे पूरे शहर की तबाही से उपजा है।
सरिस्का से भानगढ की ओर बढते हुए हम दूर से ही पहाड़ पर पत्थरों से बनी छतरी देख पा रहे थे और गाईड उसी उँचाई की ओर इशारा कर रहा था जिसकी तलहटी में यह शहर बसा रहा होगा।
हमारी जिज्ञासा को पंख मिले हुए थे और हम मानो उड कर पहुँचना चाहते थे। श्रीमति जी का गंभीर चेहरा देख कर मैने मजाक भी किया कि “तुम्हे कैसा डर भला मायके से भी कोई घबराता है?” हमने शाम चार बजे भानगढ पहुँचने की योजना बनायी थी। इसका कारण था ढलती हुई शाम में भानगढ के माहौल का अनुभव लेना। हम मुख्यद्वार से भीतर प्रवेश करते ही ठिठक गये – आह! भग्न किंतु भव्य नगर। अवशेषों में किसी समय रहे बेहद सुनियोजित साम्राज्य की परछाई है जिसका अहसास भी है भानगढ की हवाओं में। यत्र तत्र बिखरे अर्धभग्न भवन और स्तंभावशेष यह जाहिर करते हैं कि एक समय यह अत्यंत विस्तृत परिसर रहा होगा।
मुख्यद्वार से पीछे मुड कर देखा तो एक विशाल छतरी नुमा संरचना दीख पडी। गाईड नें उस ओर इशारा कर बताया कि नगर के गणमान्य कभी वहाँ नर्तकियों की पदथाप पर मदहोश हुआ करते थे; आज बस एक चुप्पी है जो नाचती है।...।
हम नगर के भीतर प्रविष्ठ हो गये थे। प्रतीत होता है कि नगर, मैदान से दोस्तरीय किलेबंदी द्वारा सुरक्षित किया गया था। परकोटे पर पाँच प्रवेश द्वार निर्मित हैं। टीलों पर खडी कुछ मीनारे और मंडप अब भी पूर्ववत हैं। सडक के दोनों ओर बाजार और मुख्य मार्ग से पृथक कुछ हवेलियाँ समझी जा सकती हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग सक्रिय है तथा देखने पर प्रतीत होता है कि नगर के कुछ हिस्से और बाजार को संरक्षित रखने का प्रयास किया गया है। नव-निर्माण बारीकी से किया जा रहा है जिससे प्राचीनता अपने स्वरूप में ही सुरक्षित रह सके।
बरगद के अनेकों वृक्षों नें यहाँ की रहस्यमयता को बढ़ा दिया है। पूरे के पूरे मकान को अपनी गुंजलिका में लपेटे बिलकुल मौन उस बदगद के पास खडे हो कर वह पीडा महसूस की जा सकती है जब अनायास इस नगर पर सन्नाटे की जीत हुई होगी।
कैसे लोग थे जिनके लिये कत्ल उन्माद था? कैसा समय था कि केवल राजाओं की साम्राज्यवादिता के लिये आबादियाँ बलि हो जाया करती थीं? सभ्यता लहू की ईटों पर खडी होती है, इन खंडहरों को देख कर तो यही प्रतीत होता है।
बरगद शायद इस इतिहास पर शांति की इबारत लिखने को आतुर हैं, मानो अवशेष मिटा डालना चाहते हों। बदगद की शाखाओं और जडों नें जगह जगह से किलेबंदी की है, मजबूत पत्थरों की दीवारों को चरमरा दिया है।
बाजार से महल की ओर बढते हुए ही सोमेश्वर मंदिर पर नजर जाती है।
मंदिर की दीवारों पर की गयी नक्काशी दूर से ही दिखाई पड़ती है जो सुरक्षित है और सुन्दर भी। संभवत: डर के मनोविज्ञान नें इस नगर को बडा नुकसान नहीं होने दिया। मंदिर के साथ ही नगर के लिये पानी की व्यवस्था का प्राचीन तंत्र भी दिखायी पड़्ता है, परिसर में ही एक कूँआ भी हमारी निगाह से गुजरा। गोपीनाथ मंदिर अपने नक्काशीदार स्तंभों और तराशे हुए गुम्बद के कारण आकर्षक है। यही नहीं अवशेषों में कुछ मंदिर जिनमें गोपीनाथ, मंगला देवी तथा केशव राय प्रमुख हैं बहुत हद तक सुरक्षित हैं।
बाजार से आगे बढते ही बड़ा सा घास का मैदान है जहाँ से कुछ पुरानी हवेलियाँ, दो भव्य मंदिर, एक मस्जिद और एक महल दिखायी पड़ते हैं।


सूर्यास्त निकट था और परछाईया लम्बी होती जा रही थीं। मंदिरों नें बाँध लिया था और एक एक बारीकी को कैमरे में कैद करने की ललक नें शाम गहरा दी थी।


अभी तो मुख्य महल देखना शेष रह गया था। हम अंधकार से पहले वहाँ पहुँचना चाहते थे और उत्कंठा थी अंधकार होने तक वहाँ रुकने की।
पीछे मुड़ कर देखा तो कोई पर्यटक नहीं था, कामगर भी शाम होते ही जा चुके थे और अब केवल हम दो परिवार तथा एक गाईड। बच्चे बडी हिम्मत दिखा रहे थे और कमरे-दर-कमरे उनकी भूत की तलश जारी थी। मैदान पर खड़े रह कर ही मैने महल का गंभीरता से परीक्षण किया। दूर से नजर आते एक कक्ष पर कुछ संदिग्ध लगा। गाईड नें बताया कि यहाँ यदा-कदा तांत्रिक अनुष्ठान होते हैं और इसी लिये सामने की दीवारों पर लाल रंग और कुछ चिपका हुआ सा दिखाई पड रहा है। इस विवरण नें भय को कल्पना मानने की हमारी धारणा पर सीधे चोट की थी और पहली बार एक सिहरन उठी। हम फिर भी भीतर जाना चाहते थे। शाम अपना रंग गहरा करने लगी थी। महल की ओर बढते हुए एक बार फिर मैने पूरे परिवेश का जायजा लिया। भानगढ का अधिकतम अब केवल अवशेष ही है।
महल की ओर जाती पथरीली सडक से उपर चढते हुए मैं हाँफ गया था। ठहर कर मैं दीवार टेक कर खड़ा हो गया नज़र सामनें सूरज डूबने के बाद बची हुई हल्की लाली पर जा टिकी। साथ ही आसमान पर चाँद भी था। मैं उन अवधारणाओं में खो गया जो इस महल को ले कर जनश्रुतियाँ बन गयी हैं। गाईड नें रास्ते पर से ही गुरु बालूनाथ की समाधि दिखा कर इस नगर के अंत की दास्तान सुनायी थी। कैसे अहं से भरे गुरु होंगे बालूनाथ और कितना उँचा उडने की चाहत राजे-मजाराजाओं को होती थी कि वे अपना या कि रिआया का हित भी महत्वाकांक्षाओं के लिये तौल दिया करते थे। यह किंवदंती है कि बालूनाथ नें नगर के निर्माण के समय ही राजा से कहा था कि जिस दिन तुम्हारे महल की परछाई इतनी लम्बी हो जायी कि मेरे आश्रमस्थल को छू ले, यह नगर नहीं रहेगा। ..... एक दिन महल की परछाई निषिद्ध आश्रम तक पहुँच ही गयी और फिर अभिशाप कारगर हो गया। एक ही रात में नगर वीरान हो गया था। मुझे अपने भीतर कड्वाहट सी महसूस हुई। अहं लोक-हित से बडे होते हैं क्या?
सामने ही महल के कमरे नजर आने लगे थे टॉर्च से रोशनी डालने पर भी अंधकार ही दिखा। हजारो दीपक भी एसे अंधेरे निगल नहीं पाते। सड्क पर आगे बढते हुए इस बहुमंजिली इमारत से परिचित होने का प्रयास जारी रहा। महल की मध्य मंजिल बहुत हद तक सुरक्षित है। साथ ही पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग नें भी इस मंजिल का जीर्णोद्धार का कार्य पूरा कर लिया है।
बड़ी बड़ी खिड़कियों से भीतर आती रोशनी नें उस कक्ष में घुसने का मुझे साहस दिया ही था कि कमरे के भीतर से आती अजीब अजीब सी आवाजों नें धड़कन बढा दी। कमरे के भीतर घुसते ही एक चमगादड़ बिलकुल मेरे सर के उपर से शोर मचाता हुआ उड़ा। मैं संभलने की प्रकृया में लड़खड़ा गया। संभल कर आगे बढ उस स्थल पर पहुँचा जहाँ तांत्रिक अनुष्ठान अब भी किये जाते थे। अजीब सी गंध उस माहौल में थी। कोई भी घबरा सकता था, कमजोर दिल बैठ सकते थे। दीवाल को नारंगी रंग के सिंदूर से यत्र तत्र रंगा गया था, फर्श पर जौ फैली हुई थी।...। माहौल का जायजा ले कर मैं दूसरे कमरों की ओर बढ गया। एकाएक लगा जैसे पायल की आवाज....मन खामोश हो गया। पायल की आवाज और इस वीरान महल में, जिस पर वैसे भी भुतहा होने का चस्पा लगा है? मैं उस दिशा की ओर सहमता हुआ बढा जहाँ से आवाज़ आ रही आवाज के निकट पहुचने तक मेरी शंका का समाधान हो गया था। उस अंधेरे कमरे के बिलकुल कोने में छन कर आ रही रोशनी से बहुत सी छोटी छोटी काली चिडिया बेचैनी से उड़्ती और चहचहाती दिखाई पड़ीं। वे एक साथ उस लय में चहचहा रही थी कि पायल की आवाज का भ्रम स्वाभाविक था। मैने राहत की साँस ली और चेहरे पर मुस्कुराहट उभर आयी।

तंत्र-मंत्र, सिद्ध-सिद्धियों के इस माहौल नें इस भवन से जुड़ी दूसरी किंवदंती की ओर मेरा ध्यान खींचा। गाईड नें रास्ते में बहुत गंभीर हो कर यह कहानी सुनायी थी।
भानगढ की राजकुमारी रत्नावती का सौन्दर्य अद्वतीय था। अट्ठारह वर्ष की होते ही राजकुमारी से विवाह के लिये बडे साम्राज्य के राजकुमारो और राजाओं के रिश्ते आने लगे थे। नगर में एक तांत्रिक “सिंघिया” भी रहता था जिसे जादू और काली विद्या में सिद्धियाँ प्राप्त थीं। तांत्रिक राजकुमारी पर मोहित हो गया और उसे पाने के यत्न में जुट गया। तांत्रिक सिंघिया जानता था कि वह सामान्य स्थिति मे राजकुमरी को पाना तो दूर उससे बात भी नहीं कर सकता था। वह निरंतर मौके की तलाश में था। एक दिन उसनें देखा कि राजकुमारी की सेविका नगर के बाजार में सुगंधित तेल खरीद रही है। यह तेल राजकुमारी के वदन में सौन्दर्य वर्धन के लिये लगाया जाता था। यह देखते ही उसे राजकुमारी से मिलने और अपनी दमित यौनेच्छा की पूर्ति की युक्ति मिल गयी। अपनी तंत्र क्रिया तथा काले जादू का प्रयोग तांत्रिक नें उस सुगंधित तेल पर किया; तेल के छू लेने मात्र से राजकुमारी सम्मोहित हो उठती और स्वयं को उस तांत्रिक की वासना के सम्मुख समर्पित कर देती।.....। यह योजना धरी रह गयी, वस्तुत: राजकुमारी नें तांत्रिक को यह सब करते हुए देख लिया था और वह उसकी नीयत से भी वाकिफ थी। राजकुमारी नें सेविका से तेल से भरी सुराही को छीन कर गुस्से से जमीन में पटक दिया। सुराही एक बडे से पत्थर पर गिरी और फूट गयी। तेल उस पत्थर पर बिखर गया और काले जादू के प्रभाव से वह पत्थर उस क्रूर तांत्रिक की ओर बढ चला। कुचले जाने से तांत्रिक की तो मौत हो गयी लेकिन मरते मरते ही वह अपनी तंत्र क्रियाओं द्वारा नगर को अभिषप्त कर गया कि वहाँ रहने वालों की न केवल मौत हो जायेगी बल्कि वे नियति अनुसार पुनर्जन्म भी नहीं ले सकेंगे। अगले ही वर्ष अजबगढ का हमला हो गया और फिर कोई भी नहीं बचा। एक एक नागरिक मारा गया यहाँ तक कि राजकुमारी रत्नावती भी...। कहते हैं यहाँ वही अभिशप्त रूहें भटकती रहती हैं।
इसी उधेड़बुन में मैं महल की छत पर पहुँच गया था। छत वस्तुत: एक मंजिल और उपर होनी चाहिये थी लेकिन पूर्णत: ध्वस्त थी। यत्र तत्र बिखरे हुए स्तंभ जिन पर उकेरे गये देवता, अश्व और गज अब धराशायी थे। चाँदनी नें वातावरण को स्निग्ध किया और वक्त ठहरा हुआ प्रतीत होने लगा।
मैने आँखें बंद की और अतीत में डूबने की कोशिश की। हजारों घोड़ो की टाप का कोलाहल, हाथियों के चिंघाडने की आवाज, तोपों से उगली जाती आग के धमाके...शोर शोर और शोर। बाजार लूट लिये गये हैं व्यापारी अपनी दूकान को ही पथरायी आखों से देख रहा है आम आदमी बदहवास है लूटा जा रह है, पीटा जा रहा है, हकाला जा रहा है उसकी औरते नोची जा रही हैं...आग जल उठी है चीखें उठ रही हैं, जौहर हो रहा है...तबाह बस तबाह...घबरा कर अपने कानों पर हाँथ रख लेता हूँ। खामोशी छा जाती है बिखरा नगर आखों के आगे पसरा पड़ा है।
भारी मन लिये महल से नीचे उतरने लगा। अब हमारे साथ एक कुत्ता भी था। बड़ा रहस्यमयी था यह कुत्ता भी, लगभग घंटे भर से इसे मैं देख रहा हूँ, महल की सबसे उँची प्राचीर पर यह मूर्ति की तरह खड़ा था, इसनें हमारी उपस्थ्ति को तवज्जो भी नहीं दी थी किंतु लौटते हुए हमारे साथ हो लिया, वह भी इस तरह मानों हमारा रक्षक हो, मार्गदर्शक हो।....।
माहौल में अजीब सी गंध थी जिसकी परिभाषा मुश्किल है अन्यास ही विचित्र घुटन महसूस होने लगी थी शायद मेरे भीतर की सोच का मनोवैज्ञानिक असर हो। रात हो गयी थी, चमगादड सक्रिय हो गये थे महल के भीतर से उनकी सक्रियता विचित्र तरह का शोर बन रही थी; आवाज के गूंजने से कल्पना रह रह कर सजीव हो जाती। महल की एक खिड़की से काली रंग की पचासो छोटी चिडिया एक साथ बाहर निकलती फिर एक साथ उसमें ही चली जाती; यह आवृति इतनी तेज थी कि कुछ संदिग्ध सूंघा जा सकता था। हम अपनी कल्पनाओं, अनुमानों और अनुभवों के साथ महल से नीचे उतर आये थे।
हम मंदिरों, मस्जिद और राह में मिले भग्नावशेषों का निरीक्षण करते हुए लौटने लगे।
वह कुत्ता हमारे साथ लगा ही रहा। समूह में जो व्यक्ति आगे चलता, कुत्ता उसके साथ हो लेता।एकाएक बीस-पच्चीस बंदरों के झुंड नें हमें मानो घेर सा लिया। यह विकट परिस्थिति थी। लेकिन उस कुत्ते के भय से बंदर हमसे दूर ही रहे, जो बंदर हमारे निकट आने का यत्न करता उसके पीछे कुत्ता दौड़ लगा देता...और फिर हमारे साथ हो लेता।
महल से भानगढ अवशेषों के बाहर आने के बीच तीन दरवाजे हैं जिन्हे साथ फाँद कर वह कुत्ता हमारे साथ ही रहा लेकिन आखिरी दरवाजे से पहले रुक गया। उसने एक क्षण हमारी ओर इस निगाह से देखा मानो कह रहा हो हमारा साथ यहीं तक, फिर वह पलटा और महल की ओर लौट गया। हम उसे सन्नाटे के शहर की ओर जाता देखते रहे...।

23 comments:

  1. बहुत रोचक यात्रा वृतांत है राजीव जी, साथ में इस जगह के इतिहास और मिथक से परिचय से भानगढ पर जाने की इच्छा हो गयी है। तस्वीरे बहुत अच्छी हैं।

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  2. कवियों से भूत भी घबराते हैं राजीव जी इस लिये नहीं मिले।

    यात्रा वृतांत की शैली रोचक है। चित्रों में बात है।

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  3. bahut hi romanchak anubhav, khaskar us kutte ke sath...chitron ne sajeev kar diya...
    Jai Hind...

    उत्तर देंहटाएं
  4. पंकज सक्सेना12 नवंबर 2009 को 8:18 am

    रोचक बहुत रोचक।

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  5. पर्यटन के लिये भारत में कितनी ही जगहे हैं लेकिन उनके विषय में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती। भानगढ को आपने सजीव कर दिया है। इस यात्रा वृतांत को पढने के बाद भानगढ को देखने की इच्छा किसे नहीं होगी।

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  6. चित्रों और विवरण के द्वारा आपका यात्रा वृतांत सजीव हो गया है .. वैसे भूत को देखने के लिए एक अलग दृष्टि की जरूरत होती है !!

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  7. बहुत अच्छा यात्रा वृतांत है, बधाई।

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  8. विवरण पूरी कहानी की तरह गढा गया है इसे पूरा पढ कर ही रुका गया। इतिहास में भुत कुछ छुपा हुआ है। जानकारी देने के लिये धन्यवाद।

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  9. Excellent Rajive.

    Thanks for this post.

    Tejendra Sharma
    General Secretary
    Katha UK
    London

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  10. राजीव जी,

    एक पंथ दो काज... आपने भ्रमण के साथ साथ रोचक यात्रा अनुभव को हमेशा के लिये सहेजने और पाठकों तक पहुंचाने का बहुत बढिया काम किया है. तस्वीरों नें इसमें चार चांद लगा दिये हैं

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  11. बहुत शानदार वृत्तांत सुनाया आपने. इतने सारे चित्रों ने मन मोह लिया.

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  12. भानगढ के भूतों के इंटरनेट तक पहुँचाने का धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  13. साहित्य शिल्पी से मेरी नाराजगी दूरकरने के लिए आभार I मेरी नारजगी शायद बिलकुल ठीक थी क्यों कि इसी रचनाएँ कहाँ पड़ने को मिलती हैं और इस साहित्यिक सौष्ठव कि रचना से अपने पाठको को वंचित किया हुआ था I खैर I
    अंतर्राष्ट्रीय पुनर्जन्म एवं मृत्यु उपरांत जीवन शोध केद्र मैं शोध सहायक होने के नाते काफी कुछ सुनने को मिला I वहाँ उस का वैज्ञानिक अध्ययन हो रहा है वह जो भी हो परन्तु भानगढ़ का जो वृतांत राजीव रंजन प्रसाद ने साहित्यिक दृष्टि से प्रस्तुत किया है अदिव्तीय है I अदिव्तीय कहने के मेरे पास तर्क और प्रमाण हैं इस लिए ख रहा हूँ I
    एक तो यात्रा वृतांत अक्सर चित्रों से वंचित होते हैं परन्तु यह वृतांत इन चित्रों के कारण जीवन्त हो उठा है इएसा प्रतीत होता है जैसे पाठक स्वयं ही भान गढ़ कि यात्रा कर रहा है I
    केवल मात्र चित्र ही उसे सजीवता प्रदान नही कर रहे अपितु वृतांत का एक एक शब्द अपनी अपनी उपस्थिति दे रहाहै I वह अनायस नही हुआ है उस के लिए बडा श्रम किया गया है इत्ल्हस मैं मानवीय सम्वेदनाओं को सजीव कर के प्रस्तुत करना बडा कम है I
    लेखक इतिहासकर नही है इस लिए मिथक का निर्वहन करना कोई हंसी खेल नही है अधिकांश लेखक या तो अपनी मान्यताएं आरोपित करते हैं या एक डीएम मूल को सिरे से नकार देते हैं परन्तु यहाँ लेखक ने बडी सिद्ध हस्त रीति से इस का निर्वहन किया है I
    लेखक कि सम्वेदनाएँ इस मैं इतनी साकार दिखी देतीं है कि उस पर कहीं कोई भूता भी स्वर नही है और यही लेखकीय दायित्व है लेखक कि एक और खूबी है कि वह ऐसे माहोल मैं भी परिहास को नही भोला है जो लेखक कि शिर्द्यता को उजागर करता है I
    वृतांत एक जीव कि उपस्थिति बहुआयामी दृष्टिकोण लिए हुए है यह पांडवों कि हिमालय यात्रा का स्मरण भी करता है यह जीव मात्र कुत्ता नही है अपितु वृतांत का मुख्य केंद्र बिदु भी है जो प्रश्न उठता है उन का उत्तर देता है तहत फिर भी प्रश्नों को वहीं वहीं छोड़ जाता है I
    लेखक के इस लेखकीय वैचित्र्य के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनायें !
    डॉ. वेद व्यथित

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  14. kya baat hai mujhe laga me bhi ghoom rahi hoon pura padh ke viram diya .aap ne bahut rochak tarike se likha hai.photo bhi bahut sunder hai .
    aap ko badhai
    saader
    rachana

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  15. yatra vritant ke sath chitra prastut kar lekhak hum naujwano ki jigyasa bhangar ke bhutiya mahal ki or jaga di sath hi hume jankari bhi mil gayi ek picnik spot ki

    उत्तर देंहटाएं
  16. अमेरिका में बैठे हुए मैं आप के साथ घूम ली,
    रोचक तरीके से लिखा है आपने..चित्रों ने और
    भी सुन्दर बना दिया. बधाई.

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  17. बहुत रोचक लगा आपका ये सफ्र्र........काफी बडिया जानकारी मिली ये सब पडकर................ध्न्यवाद आपका राजीव जी.........अमित सिह भाटी......(admin:- rajasthan culture).

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  18. ye vratant pad kar or jigyasa gagi. pahale ke logo ne inte akarshak shilp ka nirman kiya. vratant ke sath photo ne adhik akarshit kiya.

    उत्तर देंहटाएं
  19. ho sakta h kuuta, koi devta ho,jo tumhari raksha kar raha ho, tabhi to wo sahi salamat tumhe gate tak chodne aaya...waise kuch b ho sakta h, sb viswas ki baat h

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  20. इसे मैंने आपके नाम से प्रकाशित किया है अपने भुतिया कहानी के सेक्शन में .. http://www.myemsg.com/bhoot/

    उत्तर देंहटाएं
  21. आपने जिस प्रकार से भानगढ़ का इतिहास प्रदर्शित किया है वो सराहनीय है।

    आपने अपने लेखन द्वारा यात्रा को जीवन्त कर दिया है।

    मनमोहक तस्वीरें और इसका रोचक इतिहास मानो अब मजबूर सा कर रहा है की भानगढ़ को एक बार देखा जाये।

    उत्तर देंहटाएं

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