बात तब की रही होगी जब मैं कक्षा ६ में पढता था | हिन्दी की पुस्तक का नाम बाल भारती से किशोर भारती हो गया था | एक कक्षा ६ के बालक के लिए इस बदलाव का महत्व, पुस्तक के नाम तक ही सीमित होता है जो कि मेरे साथ भी होता अगर मैं उस कविता पर उतना ध्यान न देता जितना मैंने दिया | कविता थी श्री मुक्तिबोध की , "कल और आज "| उस वय में मन सामजिक विचारधाराओं से परे होता है | प्रगतिवाद , प्रयोगवाद , छायावाद , आन्दोलन नया पुराना जैसी दीवारें आप कि कल्पना पर हावी नहीं होती और मन में उठने वाले प्रश्न , सटीक एवं कान्सेप्शुअल होते हैं |

हाँ तो कविता एक दम सीधी साधी थी , वर्षा ऋतु के आगमन के बारे में | पर जिस तरह उस कविता में ग्रीष्म को दर्शाया गया था वो नया था | वर्षा का वर्णन कविता के अंत में आया और कविता में ग्रीष्म का जाना वर्षा के आगमन पर हावी था | अंतिम पंक्तियाँ थीं ,

और आज
विदा हुआ चुपचाप ग्रीष्म
समेट कर अपने लाव-लश्कर ।

ये पंक्तियाँ महज़ ऋतुओं के बदलाव को नहीं दर्शा रहीं थीं, ये एक द्वंद की द्योतक थी | जैसे ऋतु बस बदली ही ना हो अपितु वर्षा ने ग्रीष्म को कहीं दूर खदेड़ दिया हो | इस द्वंद , इस टकराहट ने मेरे मन पर एक अलग छाप छोडी और मैं कभी इस कविता को भूल नहीं पाया और उस कोमल वय में अनजाने ही मुक्तिबोध से जुड़ गया | और यही है शक्ति , गजानन माधव मुक्तिबोध के साहित्य की | अंतर्द्वंद को कभी बहुत सामान्य और कभी बहुत दुर्गम आब्जेक्ट्स में परिलक्षित करने की शक्ति | दुर्गम मैं इसलिए प्रयोग कर रहा हूँ क्यूंकि मुक्तिबोध साहित्य का उत्कर्ष, कभी कभी दुर्गम भी हो जाता है |मुक्तिबोध का साहित्य उनके अंतर्द्वंदों का अभिलेख है |

१३ नवम्बर १९१७ को श्योंपुर, ग्वालियर मध्य प्रदेश में जन्मे मुक्तिबोध ने साहित्यिक विधाओं के सभी पहलुओं को छुआ| वे एक कवि, कहानीकार, आलोचक, निबंधकार सभी थे| पत्रिका सम्पादन में भी उनका खासा नाम रहा (वसुधा एवं नया खून)|
मुक्तिबोध को नयी कविता के स्तंभों में से एक गिना जाता है | ये मुक्तिबोध का ही साहित्य था जिसने कि हिन्दी साहित्य के प्रयोगवादी आन्दोलन के चरमोत्कर्ष को चिन्हित किया , जो कि आगे चल कर नयी कविता और नई कहानी के रूप में उपजा | उन की उपस्थिति , हिन्दी साहित्य में उस समय आकार ग्रहण कर रही , नयी आलोचना में भी अति महत्व की है |

मुक्तिबोध की शुरुआत एक महत्त्वपूर्ण कवि के रूप में हुई | उन की आरंभिक रचनाएँ अज्ञेय द्वारा संपादित "तार सप्तक" के पहले ३ संस्करणों में प्रकाशित हुईं जो कि हिन्दी साहित्य के छायावाद से प्रयोगवाद की ओर परावर्तन को चिन्हित करता है | प्रयोग वाद , प्रगतिवाद के साथ विकसित होते हुए आगे "नयी कहानी" के आन्दोलन का जनक बना |

मुक्तिबोध की जानी मानी काव्य रचनाएँ , चाँद का मुंह टेड़ा है(कविता संग्रह) , भूरी भूरी ख़ाक धूल (कविता संग्रह),अँधेरे में (लम्बी कविता ) , एक अंतर्कथा (लम्बी कविता ) इत्यादि प्रमुख हैं | मुक्तिबोध की कहानियां "काठ का सपना " में संकलित हैं | वसुधा और नया खून में प्रकाशित उनकी साहित्यिक एवं राजनैतिक आलोचनाएं , "एक साहित्यिक की डायरी" में संकलित हुईं | यह आलेख माला "तीसरा क्षण" नामक आलेख के लिए विख्यात है , जिस में मुक्तिबोध ने सृजनात्मक प्रक्रिया के तीन अनुक्रमिक चरणों , प्रेरणा , सामान्यीकरण और अभिव्यक्ति , की अवधारणा की पैरवी की है |

छठी कक्षा के बाद मुक्तिबोध की कविताओं से पुनः मिलने में मुझे काफी समय लगा | गए वर्ष अंतरजाल पर हो रही एक बहस में पाश और मुक्तिबोध का नाम आया तो मैं मुक्तिबोध के नाम से बड़ा प्रभावित हुआ | हिन्दी विकिपीडिया पर उन की तस्वीर देखी(बीडी जलाते हुए, उन की एक मात्र तस्वीर जो की अंतरजाल पर प्रसिद्द है ) | उस तस्वीर में और उन के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा जादुई था की मैं उन की कवितायेँ पढे बिना नहीं रह सका | वे अपनी कविताओं के नाम बड़े रहस्मयी ढंग से रखा करते थे और कभी कभी तो अटपटे भी | ब्रह्मराक्षस नाम भी कुछ ऐसा ही था | ब्रह्मराक्षस मुक्तिबोध साहित्य का हस्ताक्षर है , उस का केंद्र है | धीमे धीमे से फैलता हुआ शब्द चित्र जैसे जैसे ह्रदय में उतरता है , शरीर में एक सिहरन सी उठने लगती है | "सूनी , परित्यक्त बावडी " बस आप के सामने आकृति ले लेती है और उस के आस पास वर्णित सभी वस्तुएं सजीव हो उठती हैं | इन सभी के साथ सजीव हो उठता है ब्रह्मराक्षस का मनोवैज्ञानिक चित्र | हड़बढाया , अपनी कमजोरियों को कोरे ज्ञान से छुपाने को आतुर ब्रह्मराक्षस का चित्र | इस पात्र से कभी घृणा होती है , कभी हास्यास्पद लगता है और कभी बेहद डरावना | डरावना क्यूंकि उस में कुछ हम भी प्रतिबिंबित है , कुछ हमारा समाज भी | ब्रह्मराक्षस का अंत और मुक्तिबोध की उस का शिष्य बन जाने की इच्छा एक अजीब सा बैक्स्लेप है जो हमें सोचता हुआ छोड़ जाता है | मन में अनेक प्रश्न उठते हैं कि क्या मुक्ति स्वयं को भी , या यूँ कहें कि ब्रह्मराक्षस को स्वयं में देखते थे ?

अब तक मैं समझ चूका था कि मुक्तिबोध की रचनाएँ , पढ़ कर अभिभूत होने के लिए , या रूमानी होने के लिए नहीं हैं ...वे हमें झकझोर देती हैं , जगा देती हैं और कई मर्तबा जगाती हैं |

मुक्तिबोध व्यक्तिगत रूप से मार्क्सवाद की ओर झुके हुए थे और इस का असर उन के साहित्य में परिलक्षित होता है| पर मार्क्सवादी विचारधारा से अधिक उनकी रचनाओं में से मनोविज्ञान झांकता है जो कि उन की एक अलग पहचान बनाता है | मुक्तिबोध दर्शन और मनोविज्ञान के छात्र रहे और उन की तमाम रचनाओं में यह प्रतिबिंबित होता है | अंतर्द्वंद, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण , अपने भीतर के अन्धकार में झांकना और इस मंथन से गुज़र कर विषैले या भयानक द्रश्य (सामान्यतः) बना देना उन का हस्ताक्षर रहा | "एक साहित्यिक की डायरी" में छपे आलेख "तीसरा क्षण " में वस्तु और दर्शन के तादात्म्य पर उन का यह विश्लेषण उल्लेखना के योग्य है |

‘‘एक तो मैं वस्तु-पक्ष का ठीक-ठीक अर्थ नहीं समझता। हिन्दी में मन से बाह्य वस्तु को ही वस्तु समझा जाता है-मेरा खयाल है। मैं कहता हूँ कि मन का तत्त्व भी वस्तु हो सकता है। और अगर यह मान लिया जाये कि मन का तत्त्व भी एक वस्तु है तो ऐसे तत्त्व के साथ तदाकारिता या तादातम्य का कोई मतलब नहीं होता क्योंकि वह तत्त्व मन ही का एक भाग है, हाँ, मैं इस मन के तत्त्व के साथ तटस्थता का रुख की कल्पना कर सकता हूँ; तदाकारिता नहीं।’’

इस मन की वस्तु को तटस्थता के साथ देखना मुक्तिबोध की कविताओं और कहानियों की आत्मा है | इस विश्लेषण में कभी वह इतने ईमानदार हो जाते हैं , कि खुद को कटहरे में खडा करने से भी नहीं चूकते | या यूँ कहें कि उन्हें अपने आप से कोई सहानुभूति नहीं थी ना ही कोई मोह था और यही कारण भी है कि वो इतना गहरा आत्म मंथन करने में सक्षम रहे | दर्शन एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की नींव प्रश्न होते हैं | मनोविज्ञान में ये प्रश्न किसी एक व्यक्ति द्बारा दूसरे से किये जाते हैं और दर्शन में स्वयं से भी | मुक्शबोध ने ये प्रश्न स्वयं से किये दार्शनिक शैली में और उनका उत्तर ढूंढा मनोवैज्ञानिक स्तर पर ... और जब हमें सवाल से पहले उत्तर ज्ञात हो तो , एक अजीब मानसिक स्थिति निर्मित होती है , जो या तो हमें सवाल करने से ही रोक देती है या एक जटिल द्वंद उत्पन्न कर देती है | मुतिबोध की रचनाओं में यही शंकाएं , प्रश्न और उनके समाधान आपस में जूझते दीखते हैं और जैसा कि मैं इस आलेख में पहले भी लिख चूका हूँ , इसी अंदरूनी बहस को हम अभिलिखित रूप में मुक्तिबोध का साहित्य कहते हैं | उन की कविता "मृत्यु और कवि " में मुक्तिबोध ने स्वयं इस द्वंद को आराधना का दर्जा दिया है और आह्वाहन किया है कवि से कि वह इस आत्म मंथन में किसी निष्कर्ष पर झपट ना पडे क्यूंकि चिंतन का कंटेंट भी निष्कर्ष जितना ही महत्त्वपूर्ण है |

ऐसा मत कह मेरे कवि, इस क्षण संवेदन से हो आतुर
जीवन चिंतन में निर्णय पर अकस्मात मत आ, ओ निर्मल !
इस वीभत्स प्रसंग में रहो तुम अत्यंत स्वतंत्र निराकुल
भ्रष्ट ना होने दो युग-युग की सतत साधना महाआराधना
इस क्षण-भर के दुख-भार से, रहो अविचिलित, रहो अचंचल
अंतरदीपक के प्रकाश में विणत-प्रणत आत्मस्य रहो तुम
जीवन के इस गहन अटल के लिये मृत्यु का अर्थ कहो तुम ।

हांलांकि इसी आत्म मोह की कमी के चलते उन के जीवन काल में उन का कोई काव्य संकलन भी प्रकाशित ना हो सका , (चाँद का मुंह टेडा है, उन के मरणोपरांत प्रकाशित हुआ ) | उन की कई रचनाओं के संकलन और प्रकाशन में बड़ा हाथ रखने वाले श्रीकांत वर्मा के शब्दों में कहें तो ,

कुछ चीजों से मुक्तिबोध को एलर्जी थी जिनमें सबसे पहला नम्बर है सफलता का। सामाजिक सफलता से मुक्तिबोध को जो दहशत थी उसकी छाप हर जगह है। समृद्ध होकर जीने के लिए आदमी को जो कीमत चूकानी पड़ती है वह हमेशा ही मुक्तिबोध की परेशानी का विषय रही। ‘पक्षी और दीमक’ के जरिए इस परेशानी और दहशत को समझा जा सकता है। और इसी से यह भी समझा जा सकता है कि सामाजिक सफलता के रास्ते में भागकर मुक्तिबोध ने क्यों निर्वासित होना पसन्द किया।

संकलन कर्ताओं का ये मानना है कि यदि स्वयं मुक्तिबोध अपना संकलन प्रकाशित करवाते तो शायद साहित्य को इस से और लाभ होता |

मुक्ति बोध की रचना शैली में एक ख़ास बात और है जो है , लम्बी कवितायें और गेयता का अभाव | लम्बी कविताओं का का कारन कुछ हद तक अभिव्यक्ति की सीमा को माना जा सकता है जो की मुक्तिबोध को शायद आतुर कर देती हो और उस का परिणाम ये लम्बी कवितायें रहीं | मुक्तिबोध के अनुभव स्रोत अनेक थे और अभिव्यक्ति का स्रोत मात्र एक, उन की कलम | गेयता एक ऐसा विषय है जिस का सरोकार तत्त्व से कम और रस से अधिक है | मुक्तिबोध की कविताओं पर गौर किया जाए तो गेयता का अभाव भी अपनी आप में उन की शैली की एक मांग है | (मेरे ख्याल में ) | सृजन के कुओं की जिस गहराई में जा कर उन्होंने चिंतन किया , वहाँ गेयता गौण हो जाती है और शनै शनै ये अभाव उस शैली का एक अभिन्न अंग बन जाता है | तुलना के लिए नयी कविता के ही जाने माने सर्जक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को लें , उन्होंने मुक्त छंद के साथ गीत भी लिखे , और उन के सृजन में जो कोमलता द्रष्टिगोचर होती है वह मुक्तिबोध को कभी छू कर नहीं गयी | मुक्तिबोध की रचनाधर्मिता का सत्य जितना सपाट था , उस का चिंतन उतना ही गहरा , उतना ही कठोर | ये पक्ष "ब्रह्मराक्षस " से "भूरी भूरी ख़ाक धूल" तक पूरी तरह सशक्त और अटल रहता है |

इस पक्ष के सिवाय मुक्तिबोध की तुलना किसी कवि से , समकालीन या पूर्व के , अत्यंत कठिन हैं | प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपायी के शब्दों में -

"वे हिंदी साहित्य के एकमात्र गोत्रहीन कवि-आलोचक थे जिनकी परंपरा में कोई पूर्वज परिलक्षित नहीं होता"|

यहाँ "श्रीकांत वर्मा" की यह टिपण्णी भी मुक्तिबोध के इस एकाकी पक्ष को समझने में सहायक है ,

"मुक्तिबोध के साहित्य को कसौटी के रूप में स्वीकार करना खतरे से खाली नहीं। उसमें इतनी प्रचण्डता है कि उस पर परखने पर अपने अन्य गुणों के लिए महत्त्वपूर्ण दूसरों के साहित्य निश्चित ही टुच्चा नजर आएगा। बुद्धिमानी इसी में है कि मुक्तिबोध के साहित्य को उनके ही साहित्य की कसौटी के रूप में देखा जाए। "

उपसंहार करते हुए यह कहना चाहूँगा कि मुक्तिबोध हिन्दी साहित्य आन्दोलनों की दिशा तय करने वाले एक युग प्रवर्तक लेखक थे , जो अपने युग से अधिक आने वाले युगों में जाने जाएंगे | उन्हें सिर्फ एक वाद के हाशिये पर रखना एक भूल होगी क्यूंकि उनका साहित्य मानव मन की दुर्गम गहराई से उपजा हुआ , खालिस साहित्य है | मुक्तिबोध की रचनाओं को पढ़ते हुए हम महसूस करते हैं कि वो आजीवन कुछ ढूंढते रहे थे ....जैसा उनकी बहुत कम लाइनों कि कविता बेचैन चील प्रखरता से कहती है ....

बेचैन चील!!
उस जैसा मैं पर्यटनशील
प्यासा-प्यासा,
देखता रहूँगा एक दमकती हुई झील
या पानी का कोरा झाँसा
जिसकी सफ़ेद चिलचिलाहटों में है अजीब
इनकार एक सूना!!

हिन्दी साहित्य के इस महान दार्शनिक और विचारक को मेरा नमन |

9 comments:

  1. मुक्तिबोध को समझने का दिव्यांशु जी आपका यत्न सराहनीय है। वे समय की नब्ज पकड कर लिखने वाले कवि थे।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुक्तिबोध के साथ कविता प्रयोगवाद को एक युग का दर्जा दिला पाती है। मुक्तिबोध की रचनायें झकझोतरी हैं।

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  3. मुक्तिबोध पर बहुत अच्छा आलेख, बधाई।

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  4. मुक्तिबोध के लिये सही उक्ति - मुक्तिबोध की रचनाएँ , पढ़ कर अभिभूत होने के लिए , या रूमानी होने के लिए नहीं हैं ...वे हमें झकझोर देती हैं , जगा देती हैं और कई मर्तबा जगाती हैं |

    उत्तर देंहटाएं
  5. पंकज सक्सेना13 नवंबर 2009 को 1:48 pm

    मुक्तिबोध मुझे कभी पल्ले नहीं पडे पर आपका आलेख जरूर समझ आ गया।

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  6. मुक्तिबोध को समझने की अच्छी कोशिश।

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  7. दिव्यांशु जी ,
    आप के लेख ने कालेज का समय याद दिला दिया,
    जब मुक्तिबोध को पढ़ा था..
    आलेख बहुत अच्छा है बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  8. mere liye kaafi nayi aur rochak jaankari hai yeh, shayad kabhi padha ho mukhtibodh ko maine par kuch dhumil sa hi yaad hai....ek umda aalek padhne ko mila uske liye shukirya...

    उत्तर देंहटाएं

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