महान प्रकृतिविज्ञानी चार्ल्स राबर्ट डार्विन (१२ फरवरी, १८०९- १९ अप्रैल, १८८२) को प्रजातियों के विकास की नई अवधारणाओं के जनक के रूप में जाना जाता है। वे आधुनिक विज्ञान के भी जनक हैं। सबसे पहले उन्होंने ही ये सिद्धांत दिया था कि प्रजातियों का उद्भव विकासात्मक परिवर्तनों के कारण हुआ और यह वैज्ञानिक थ्योरी भी सबसे पहले उन्होंने ही दी थी कि प्राकृतिक चयन वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से इस तर्ह के परिवर्तन होते हैं।
रचनाकार परिचय:-

सूरज प्रकाश का जन्म १४ मार्च १९५२ को देहरादून में हुआ।

आपने विधिवत लेखन १९८७ से आरंभ किया। आपकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं:- अधूरी तस्वीर (कहानी संग्रह) 1992, हादसों के बीच (उपन्यास, 1998), देस बिराना (उपन्यास, 2002), छूटे हुए घर (कहानी संग्रह, 2002), ज़रा संभल के चलो (व्यंग्य संग्रह, 2002)।

इसके अलावा आपने अंग्रेजी से कई पुस्तकों के अनुवाद भी किये हैं जिनमें ऐन फैंक की डायरी का अनुवाद, चार्ली चैप्लिन की आत्म कथा का अनुवाद, चार्ल्स डार्विन की आत्म कथा का अनुवाद आदि प्रमुख हैं। आपने अनेकों कहानी संग्रहों का संपादन भी किया है।

आपको प्राप्त सम्मानों में गुजरात साहित्य अकादमी का सम्मान, महाराष्ट्र अकादमी का सम्मान प्रमुख हैं।

आप अंतर्जाल को भी अपनी रचनात्मकता से समृद्ध कर रहे हैं।

उन्होंने चिकित्सा शास्त्र, भूविज्ञाना, जीव विज्ञान, प्राकृतिक विज्ञान आदि विषयों का गहरा अध्ययन किया और कई नई अवधारणाएं दीं। उन्होंने अपनी खोजों के लिये लम्बी लम्बी यात्राएं कीं और शोध किये। बीगज जहाज पर उन्होंने पाँच वर्ष तक लम्बी यात्राएं की और इन यात्राओं के अनुभवों को विभिन्न खोजों और प्रयोगों के रूप में वे सामने लाते रहे।
१८५९ में लिखी अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक “ओरिजिन आफ स्पेशीज” से जहाँ एक ओर उन्हें मानव विकास की अपनी नई अवधारणाओं से विश्व में प्रसिद्धि मिली और वे महानतम वैज्ञानिकों की श्रेणी में गिने जाने लगे, वहीं दूसरी ओर, उन्हें अपने नये और अधार्मिक विचारों के कारण चर्च की नाराज़गी झेलनी पड़ी। रूढ़िगत समाज को डार्विन साहब के विकास के सिद्धांत मान्य नहीं थे। चर्च को लगता था कि डार्विन की थ्योरी मानव और पशुओं के बीच के महत्वपूर्ण फर्क को ही खत्म कर देगी। लेकिन डार्विन अपनी खोजों में लगे रहे और हर भार नये शोध पत्रों, पुस्तकों और आलेखों के माध्यम से अपनी बात कहते रहे।

डार्विन साहब आजीवन बीमार ही रहे और हर तरह के इलाज आजमाते रहे। लेकिन बार बार हमला करने वाली और लम्बी बीमारियों ने उनके हौसलों पर कोई असर नहीं डाला और वे मरते दम तक अपने शोधों में लगे रहे।संयोग से उन्होंने अपनी ही कज़िन एम्मा वेजवुड से शादी की थी। पत्नी ने आजीवन उनकी सेवा की और उन्हें हर तरह के संकटों से दूर रखने का प्रयास किया। लेकिन शायद बहुत नज़दीकी खून के रिश्ते में शादी करने का ख़ामियाजा उन्हें इस रूप में भुगतना पड़ा कि उनकी सारी संतानें हमेशा बीमार रहीं।
आधुनिक विज्ञान को उन्होंने बहुत कुछ दिया। बेशक जीते जी वे समाज के, गिरिजाघर के और दूसरे वर्गों के हमले झेलते रहे लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि समाज को उनकी देन बहुत बड़ी है। अपने अकेले के बलबूते पर उन्होंने प्राकृतिक और जीव विज्ञान की सभी शाखाओं को समृद्ध किया और मानव विकास की विचारधारा को एक नई सोच दी।
उन्होंने अपनी आत्मकथा अपने परिवार के सदस्यों के लिये ही लिखी थी लेकिन उनके बेटे फ्रांसिस डार्विन ने पिता के जीवन के अनछुये पहलुओं को सामने लाने के मकसद से इस आत्मकथा में अपनी ओर से अंश जोड़े हैं जिससे इस पुस्तक का महत्व और भी बढ़ जाता है और हम एक पुत्र की नज़र से एक महान पिता के जीवन में झाँकने का एक और मौका पाते हैं।
इसी पुस्तक के तीसरे हिस्से में डार्विन साहब के धर्म पर अलग-अलग मंचों से और निजी पत्रों में व्यक्त किये गये विचारों को शामिल किया गया है। उनके ये विचार भी उनके वैज्ञानिक शोधों जितने ही महत्वपूर्ण हैं और हमारी सोच को आज भी एक नई दिशा देते हैं।
हिन्दी पाठकों के सामने ये आत्मकथा पहली बार लाते हुए हम गर्व का अनुभव कर रहे हैं और विश्वास करते हैं कि आपको हमारा ये प्रयास अच्छा लगेगा।

12 comments:

  1. जीवन की अभिव्यक्ति का सच।

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  2. यह सुखद है कि पुत्र नें अपने पिता के जीवन के अन छुवे पहलुओ को सार्वजनिक करने का यत्न किया और डारविन की आत्मकथा को प्रस्तुत किया।

    सूरज जी और तिवारी जी बधाई के पात्र हैं।

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  3. भूमिका पढ कर पुस्तक को पढने की इच्छा हो गयी है। दोनों लेखकों को हिन्दी में इस प्रस्तुति का धन्यवाद।

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  4. डारविन स्वयं शोध का विषय हैं उनकी आत्मकथा से उन्हे समझने का अवसर प्राप्त होगा।

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  5. सूरज जी मैने पी डी एफ से रचनाकार में इस पुस्तक को पढने की कोशिश की थी लेकिन अब श्रंखला बद्ध रूप से यहाँ पढूंगा। इससे लेखक-अनुवादकों से संवाद का भी आनंद रहेगा।

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  6. पंकज सक्सेना14 नवंबर 2009 को 1:03 pm

    भूमिका अच्छी है। पुस्तक की प्रतीक्षा में।

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  7. विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत का अभूतपूर्व स्थान है. ऐसे महान व्यक्तित्व के जीवन पर प्रकाश डाल कर लेखक द्वय ने निःसंदेह एक सराहनीय कार्य किया है. "चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा" जैसे ज्ञानवर्धक आलेख के प्रकाशन के लिए हम साहित्य - शिल्पी के आभारी हैं.
    ---किरण सिन्धु .

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  8. साहित्य के माध्यम से अच्छा ज्ञानवर्धन कर रहे हैं आप.

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